मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

श्याम गुप्त के पाँच प्रेम गीत

१.मेरे गीत सुरीले क्यों हैं...

मेरे गीतों में आकर के तुम क्या बसे,
गीत का स्वर मधुर माधुरी होगया।
अक्षर अक्षर सरस आम्रमंजरि हुआ,
शब्द मधु की भरी गागरी होगया।

तुम जो ख्यालों में आकर समाने लगे,
गीत मेरे कमल दल से खिलने लगे।
मन के भावों में तुमने जो नर्तन किया,
गीत ब्रज की भगति- बावरी होगया। ...मेरे गीतों में ..... ॥

प्रेम की भक्ति सरिता में होके मगन,
मेरे मन की गली तुम समाने लगे।
पन्ना पन्ना सजा प्रेम रसधार में,
गीत पावन हो मीरा का पद होगया।

भाव चितवन के मन की पहेली बने,
गीत कबीरा का निर्गुण सबद होगया।
तुमने छंदों में सज कर सराहा इन्हें ,
मधुपुरी की चतुर नागरी होगया। .....मेरे गीतों में..... ॥

मस्त में तो यूहीं गीत गाता रहा,
तुम सजाते रहे,मुस्कुराते रहे।
गीत इठलाके तुम को बुलाने लगे,
मन लजीली कुसुम वल्लरी होगया।

तुम जो हंस हंस के मुझको बुलाते रहे,
दूर से छलना बन कर लुभाते रहे।
भाव भंवरा बने, गुनगुनाने लगे ,
गीत कालिका -नवल-पांखुरी होगया। .....मेरे गीतों में... ॥


तुम ने कलियों से जब लीं चुरा शोखियाँ ,
बनके गज़रा कली खिलखिलाती रही।
पुष्प चुनकर जो आँचल में भरने चले ,
गीत पल्लव सुमन आंजुरी होगया ।

तेरे स्वर की मधुर माधुरी मिल गयी,
गीत राधा की प्रिय बांसुरी होगया ।
भक्ति के भाव में तुमने अर्चन किया,
गीत कान्हा की प्रिय सांवरी होगया । .... मेरे गीतों में.... ॥


२-यदि तुम आजाते जीवन में….

यदि तुम आजाते जीवन में,
निश्वासों में बस कर मन में ।
कितने सौरभ कण से हे प्रिय!
बिखरा जाते इस जीवन में ।

गाते रहते मधुरिम पल-छिन,
तेरे ही गीतों का  विहान  ।
जाने कितने वे इन्द्रधनुष,
खिल उठते नभ में बन वितान ।

             खिल उठतीं कलियाँ उपवन में।
             यदि तुम आजाते  जीवन में ।।

महका महका आता सावन,
लहरा लहरा गाता सावन ।
तन मन पींगें भरता नभ में,
नयनों मद भर लाता सावन ।

जाने कितने  वर्षा-वसंत,
आते जाते पुष्पित होकर ।
पुलकित होजाता जीवन का,
कोना कोना सुरभित होकर ।

              उल्लास समाता कण कण में,
              यदि तुम आजाते जीवन में ।।

संसृति भर के सन्दर्भ सभी,
प्राणों की  भाषा बन् जाते ।
जाने कितने नव-समीकरण,
जीवन की  परिभाषा गाते ।

पथ में जाने  कितने दीपक,
जल उठते बनकर दीप-राग ।
चलते हम तुम मन मीत बने,
बज उठते नव संगीत साज ।

                 जलता राधा का प्रणय-दीप,
                 तेरे मन के वृन्दाबन में   ।
                 यदि तुम आजाते जीवन में ।।

३.सुमुखि अब तो प्रणय का वरदान देदो...

सुमुखि !अब तो प्रणय का वरदान देदो ॥

जल उठें मन दीप, ऐसी-
मदिर, मधु मुसकान देदो ।
अधखुली पलकें झुकाकर,
प्रीति का अनुमान देदो ।

सुमुखि ! अब तो प्रणय का वरदान देदो ।।

दीप बनकर मैं, तेरे-
दर पर जलूँगा ।
पथ के कांटे दूर, सब-
करता चलूँगा ।
मानिनी कुछ मुस्कुराकर,
मिलन का सुख सार देदो।
सिर झुका कर, कुछ हिलाकर,
मान का प्रतिमान देदो ।।

सजनि अब तो प्रणय का वरदान देदो ।।

तुम कहो तो मैं,
प्रणय की याचिका का ।
प्रार्थना स्वर-पत्र,
तेरे नाम भर दूं ।
तुम को हो स्वीकार, अर्पित-
एक नूतन पुष्प करदूं ।
भामिनी कुछ गुनगुनाकर ,
गीत का उनमान देदो ।

सुमुखि अब तो प्रणय का वरदान देदो ।।

पास आओ, मुस्कुराओ-
गुनगुनाओ ।
कुछ कहो, कुछ सुनो-
कुछ पूछो-बताओ ।
तुम रुको तो, मैं-
मिलन के स्वर सजाऊँ ।
तुम कहो तो मैं-
प्रणय-गीता सुनाऊँ ।

कामिनी ! इस मिलन पल को,
इक सुखद सा नाम देदो ।

सुमुखि ! अब तो प्रणय का वरदान देदो ।।

 


  ४-क्या कह दिया...
तुमने आकर के हाथों से क्या छू दिया,
मेरा आँचल निखर कंचनी होगया ।
जाने नयनों ने नयनों से क्या क्या कहा ,
रूप पुलकित धवल चांदनी होगया ।

तुमने आकर के हाथों से क्या छूदिया ,
मेरा आंचल निखर कंचनी हो गया ।।

तेरी बातों में जाने कहाँ खोये हम,
भूल कर दीन-दुनिया तुम्हारे हुए ।
तुमको ख्यालों में पाकर के बेसुध हुए ,
राज सारे ही दिल के बयाँ होगये ।।

मृदु स्वरों से न जाने क्या तुमने कहा,
तन खनकती हुई करधनी होगया ।।

आँगन आँगन फिरूं मन में होके मगन,
अब सुहाने लगे सब नदी बाग़ वन ।
मन की मैना व कोकिल लगीं कूकने ,
एक होने लगे जैसे धरती - गगन ।।

नर्म होठों से तुमने ये क्या छू दिया,
मेरा तन मन महक चंदनी होगया ।।

मन का हिरना फिरे है इधर से उधर,
मस्त वीणा की झंकार मन में उठी ।
मन में मलयज की शीतल लहर बह चली ,
पग की पायल झनन झनझनाने लगी ।

तुमने साँसों में बस कर ये क्या कर दिया ,
तन बदन खिल कमल-पांखुरी होगया ।।

मन में मनसिज कुसुम-शर से चलने लगे,
रंग बासन्ती आँखों में छाने लगा ।
सारे तन में यूं कलियाँ चिटखने लगीं ,
मन तेरे सुर में ही सुर मिलाने लगा ।

कितने रंगों से आँचल मेरा भर दिया,
मन तेरे प्यार की बांसुरी होगया ।।

जाने नयनों ने नयनों से क्या क्या कहा,
रूप पुलकित धवल चांदनी होगया ।।


  5  सखि कैसे ....?
सखि री ! तेरी कटि छीन,
पयोधर भार भला धरती हो कैसे ?
बोली सखी मुसकाय, हिये-
उर-भार तिहारो धरतीं हैं जैसे ।।

भौहें बनाईं कमान भला , हैं-
तीर कहाँ पे, निशाना हो कैसे ?
नैनन के तूरीण में बाण ,
धरे उर पैनी कटार के जैसे ।।

कौन यहाँ मृग-बाघ धरे ,
कहौ, बाणन वार शिकार हो कैसे ?
तुम्हरो हियो मृग भांति पिया,
जब मारे कुलांच, शिकार हो जैसे ।।

प्रीति तेरी मन मीत, प्रिया -
उलझाए ये मन, उलझी लट जैसे ।
लट सुलझाय तो तुम ही गए,
प्रिय, मन उलझाय गए कहो कैसे ?

ओठ तेरे बिम्बाफल भांति,
किये रचि, लाल अंगार के जैसे ।
नैन तेरे प्रिय, प्रेमी चकोर ,
रखें मन जोरि अंगार से जैसे ।।

अनहद -नाद को गीत बजे,,
संगीत, प्रिया अंगडाई लिए से ।
कंचन-काया के ताल-मृदंग पे ,
थाप तिहारी कलाई दिए से ।।

प्रीति भरे रस बैन तेरे , कहो -
कोकिल-कंठ भरे रस कैसे ?
प्रीति की वंशी तेरे उर की,पिय -
देती सुनाई मेरे उर में से ।।

पंकज नाल सी बाहें प्रिया, उर-
बीच धरे हो, क्यों अँखियाँ मीचे ।
मत्त मतंग की नाल सी बाहें ,
भरें उर बीच, रखें मन सींचे ।।

                                  ---- डा श्याम गुप्त 

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