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May 2013
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खतरनाक है बोतलबंद पानी पर बढ़ती निर्भरता

प्रमोद भार्गव

अब तक बोतलबंद पानी को पेयजल स्‍त्रोतों से सीधे पीने की तुलना में सेहत के लिए ज्‍यादा सुरक्षात्‍मक विकल्‍प माना जाता रहा था, किंतु नए अध्‍ययनों से पता चला है कि राजधानी दिल्‍ली में विभिन्‍न ब्राण्‍डों का जो बोतलबंद पानी बेचा जा रहा है, वह शरीर के लिए हानिकारक है। इसकी गुणवत्‍ता इसे शुद्ध करने के लिए इस्‍तेमाल किए जा रहे रसायनों से हो रही है। भारतीय अध्‍ययनों के अलावा अंतरराष्‍टीय संस्‍थाओं ने इस सिलसिले में जो अध्‍ययन किए हैं, उनसे भी साफ हुआ है कि नल के मुकाबले बोतलबंद पानी ज्‍यादा प्रदूषित और नुकसानदेह है। इस पानी में खतरनाक बैक्‍टीरिया इसलिए पनपे हैं, क्‍योंकि नदी और भूजल ही दूषित हो गये है। इन स्‍त्रोतों को प्रदूषणमुक्‍त करने के कोई ठोस उपाय नहीं हो रहे हैं, बावजूद बोतलबंद पानी का कारोबार सालाना 10 हजार करोड़ से भी ज्‍यादा का हो गया है।

ऐसी पुख्‍ता जानकारियां कई अध्‍ययनों से आ चुकी हैं कि देश के कई हिस्‍सों में धरती के नीचे का पानी पीने लायक नहीं रह गया है, इससे छुटकारे के लिए ही बोतलबंद पानी चलन में आया था। इसकी गुणवत्‍ता के खूब दावे किए गए, पर अब बताया जा रहा है कि यह भी मानव शरीर के लिए मुफीद नहीं है। ताजा रिपोटोंर् के आधार पर केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्रााधिकरण को दिल्‍ली में बोतलबंद पानी के संयंत्रों में शुद्धिकरण की स्‍थिति और उनके जलस्‍त्रोतों की जांच करने के लिए चिट्‌ठी लिखी है। साथ ही चिट्‌ठी में यह भी हवाला दिया है कि वह दिल्‍ली और राष्‍टीय राजधानी क्षेत्र में बेचे जा रहे बोतलबंद पानी में उपलब्‍ध रासयनिक तत्‍वों, जीवाणुओं और वीषाणुओं की जांच कर रिपोर्ट दे, यह पानी पीने के लायक है भी या नहीं ?

हालांकि अब इस तरह के इतने अध्‍ययन आ चुके है कि नई जांच की जरुरत ही नहीं है। पंजाब के भंटिडा जिले में हुए एक अध्‍ययन से जानकारी सामने आई थी कि भूजल और मिट्‌टी में बड़ी मात्रा में जहरीले रसायन घुले हुए हैं। इसी पानी को पेयजल के रुप में इस्‍तेमाल करने की वजह से इस जिले के लोग दिल और फेफड़ों से संबंधित गंभीर बीमारियों की गिरफ्‌त में आ रहे हैं। इसके पहले उत्‍तर प्रदेश और बिहार के गंगा के तटवर्ती इलाकों में भूजल के विषाक्‍त होने के प्रमाण सामने आए थे। नरौरा परमाणु संयंत्र के अवशेष इसी गंगा में डाले जाकर इसके जल को जहरीला बनाया जा रहा है। कानपुर के 400 से भी ज्‍यादा कारखानों का मल गंगा में बहुत पहले से प्रवाहित किया जा रहा है। गंगा से भी बद्‌दतर हाल में यमुना है। इसीलिए इसे एक मरी हुई नदी कहा जाने लगा है। यमुनोत्री से लेकर प्रयाग के संगम स्‍थल तक यह नदी करीब 1400 किमी का रास्‍ता नापती है। इस धार्मिक नदी की यह लंबी यात्रा एक गंदे नाले में बदल चुकी है। इसे प्रदूषण मुक्‍त बनाने के लिए इस पर अभी तक करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुकें हैं, लेकिन बद्‌हाली जस की तस है। गंदे नालों के परनाले और कचरों डंफर इसमें बहाने का सिलसिला अभी भी थमा नहीं है। यमुना में 70 फीसदी कचरा दिल्‍लीवासियों का होता है, रही-सही कसर हरियाणा और उत्‍तरप्रदेश पूरी कर देते हैं। गंदे पानी को शुद्ध करने के लगाए गए संयंत्र अपनी क्षमता का 50 प्रतिशत भी काम नहीं कर रहे हैं। यही कारण है कि मथुरा के आसपास के इलाकों में यमुना के दूषित पानी के कारण चर्मरोग, त्‍वचा कैंसर जैसी बीमारियां लोगों के जीवन में पैठ बना रही हैं। पशु और फसलें भी अछूते नहीं रह गए हैं। जांचों से पता चला है कि इस इलाके में उपजने वाली फसलें और पशुचारा जहरीले हैं।

उत्‍तरी बिहार की फल्‍गू नदी के बारे में ताजा अध्‍ययनों से पता चला है कि इस नदी के पानी को पीने मतलब है, मौत को घर बैठे दावत देना। जबकि सनातन हिन्‍दू धर्म में इस नदी की महत्‍ता इतनी है कि गया में इसके तट पर मृतकों के पिंडदान करने से उनकी आत्‍माएं भटकती नहीं है। उन्‍हें मोक्ष प्राप्‍त हो जाता है। भगवान राम ने अपने पिता दशरथ की मुक्‍ति के लिए यहीं पिंडदान किया था। महाभारत युद्ध में मारे गए अपने वंशजों का पिंडदान युधिष्‍ठिर ने यहीं किया था। वायु पुराण के अनुसार फल्‍गू नदी भगवान विष्‍णु का अवतार है। इस नदीं के साथ यह दंतकथा भी जुड़ी है कि एक समय यह दूध की नदी थी। लेकिन अब यह बीमारियों की नदी है।

मध्‍यप्रदेश की जीवन रेखा मानी जानी वाली नर्मदा भी प्रदूषित नदियों की श्रेणी में आ गई है। जबकि इस नदी को दुनिया की प्राचीनतम नदी घाटी सभ्‍यताओं के विकास में प्रमुख माना जाता है। लेकिन औद्योगिक विकास की विडंबना के चलते नर्मदा घाटी परियोजनाओं के अंतर्गत इस पर तीन हजार से भी ज्‍यादा छोटे-बड़े बांध बनाए जा रहे हैं। तय है, पानी का बड़ी मात्रा में दोहन नर्मदा को ही मौत के घाट उतार देगा। मध्‍यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट में कहा गया है, इसके उद्‌गम स्‍थल अमरकंटक में भी यह प्रदूषित हो चुकी है। तमाम तटवर्ती शहरों के मानव मल-मूत्र और औद्योगिक कचरा इसी में बहाने के कारण भी यह नदी तिल-तिल मरना शुरु हो गई है। भारतीय प्राणीशास्‍त्र सर्वेक्षण द्वारा किए एक अध्‍ययन में बताया गया है कि यदि यही सिलसिला जारी रहा तो इस नदी की जैव विविधता 25 साल के भीतर पूरी तरह खत्‍म हो जाएगी। इस नदी को सबसे ज्‍यादा नुकसान वे कोयला विद्युत संयंत्र पंहुचा रहे हैं जो अमरकंटक से लेकर खंबात की खाड़ी तक लगे हैं।

इन नदियों के पानी की जांच से पता चला है कि इनके जल में कैल्‍शियम, मैगिन्‍नीशियम, क्‍लोराइड, डिजॉल्‍वड अॉक्‍सीजन, पीएच, बीओडी, अल्‍केलिनिटि जैसे तत्‍वों की मात्रा जरुरत से ज्‍यादा बढ़ रही है। ऐसा रासयनिक उर्वरकों, कीटनाशकों का खेती में अंधाधुंध इस्‍तेमाल और कारखानों से निकलने वाले जहरीले पानी व कचरे का उचित निपटान न किए जाने के कारण हो रहा है। बीते कुछ सालों में जीएम बीजों का इस्‍तेमाल बढ़ने से भी रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की जरुरत बढ़ी है। यही रसायन मिट्‌टी और पानी में घुलकर बोतलबंद पानी का हिस्‍सा बन रहा है, जो शुद्धता के बहाने लोगों की सेहत बिगाड़ने का काम कर रहा है। कीटनाशक के रुप में उपयोग किए जाने वाले एंडोसल्‍फान ने भी बड़ी मात्रा में भूजल को दूषित किया है। केरल के कसारगोड जिले में अब तक एक जहार लोगों की जानें जा चुकी हैं और 10 हजार से ज्‍यादा लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में हैं।

हमारे यहां जितने भी बोतलबंद पानी के संयंत्र हैं, वे इन्‍हीं नदियों या दूषित पानी को शुद्ध करने के लिए अनेक रसायनों का उपयोग करते हैं। इस प्रक्रिया में इस प्रदूषित जल में ऐसे रसायन और विलय हो जाते हैं, जो मानव शरीर में पहुंचकर उसे हानि पहुंचाते हैं। इन संयंत्रों में तमाम अनियमितिताएं पाई गई हैं। अनेक बिना लायसेंस के पेयजल बेच रही हैं, तो अनेक पास भारतीय मानक संस्‍था का प्रमाणीकरण नहीं है। जाहिर है, इनकी गुणवत्‍ता संदिग्‍ध है। हमने जिन देशों से औद्योगीकरण का नमूना अपनाया है,उन देशों से यह नहीं सीखा कि उन्‍होंने अपने प्राकृतिक संसाधनों को कैसे बचाया। यही कारण है कि वहां की नदियां तालाब, बांध हमारी तुलना में ज्‍यादा शुद्ध और निर्मल हैं। स्‍वच्‍छ पेयजल देश के नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन इसे साकार रुप देने की बजाय केंद्र व राज्‍य सरकारें जल को लाभकारी उत्‍पाद मानकर चल रही हैं। यह स्‍थिति देश के लिए दुर्भाग्‍यपूर्ण है।

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी मप्र

मो 09425488224

फोन 07492 232007

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है।

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एक फरिश्‍ते से मुलाकात

दोनों किडनी तुम्‍हारी फेल हो चुकी है, अब किडनी बदलवाना ही एकमात्र उपाय है, डाक्‍टर साहब ने बिरजू माली को कहा.

बिरजू घबरा गया, किडनी बदलवाने में कितना खर्च आता है डाक्‍टर साहब, उसने पूछा ?

डाक्‍टर साहब कुछ देर सोचने के बाद कहे कि यही कोई ढाई-तीन लाख रूपए.

बिरजू बेहोश होते-होते बचा और नीम-बेहोशी में ही डाक्‍टर के चेंबर से निकल कर, बस स्‍टैंड की तरफ जाने लगा. जीने की अब कोई आशा नहीं बची थी. घर पर भरा-पूरा परिवार, दो लड़के, तीन लड़कियां, एक पत्‍नी, बूढ़े मां-बाप सभी तो थे, सोचते हुए बिरजू स्‍टैंड पहुंच चुका था. गांव के लिए अभी बस आने में देर थी, बिरजू वहीं एक फुटपाथी चाय की दूकान के बेंच के छोटे से हिस्‍से में बैठ गया. उसे मितली आ रही थी. वह समझ नही पा रहा था कि वह अब क्‍या करें.

इतने में उसके गांव जाने वाली आखिरी बस आ चुकी थी पर बिरजू को हिम्‍मत नहीं हुआ कि वह उठ कर बस पर जा बैठे.

देखते-देखते रात घिर आयी, बिरजू चुपचाप उठकर यात्री शेड में एक कोने में बैठ गया, बैठ क्‍या गया, दीवार के ओट में पीठ सटा कर लेट सा गया. उसे पेट में दर्द भी हो रहा था और मितली भी आ रही थी.

उसी यात्री शेड में पत्‍थर के बेंच पर एक सज्‍जन बहुत देर से बैठे बिरजू को देख रहे थे, ऐसा मालूम होता था जैसे कुछ समझने की कोशिश कर रहें हो. कभी अपनी कलाई घड़ी देखते, कभी बिरजू को, अंततः उस सज्‍जन से नहीं रहा गया और वे बिरजू के पास चले गए और पूछा कि तुम्‍हें क्‍या तकलीफ है भाई ?

बिरजू जैसे नींद से जागा, उसे अंजान शहर में बस स्‍टैंड़ के यात्री सेड में किसी से कोई उम्‍मीद न थी. बिरजू नीम-बेहोशी में कहा कि बाबूजी मेरा नाम बिरजू है, डाक्‍टर ने कहा है कि मेरे अंदर का कुछ खराब हो गया है, जिसे बदलवाने में काफी रूपया लगेगा. किडनी बिरजू को याद नहीं था इसलिए किडनी के संबंध में बता नहीं पाया. बिरजू ने उस सज्‍जन को सहानुभूति जताते देख, सिर्फ इतना ही गुजारिश किया कि बाबूजी मैं शायद सुबह तक न बचूं तो मेरे गांव में मेरे माता-पिता, बाल-बच्‍चों तक खबर पहुंचा देंगे तो मरते हुए इस आदमी की दुआ आपको लगेगी, आप फूले-फलेंगे.

वो सज्‍जन दरअसल एक प्रसिद्ध होमियोपैथ सजल आनंद थे और किसी मरीज को देखकर लौटने के क्रम में बस के इंतजार में वहां बैठे थे. वे बिरजू के मरज को लक्षणों के अनुसार समझ गए और मितली एवं पैट दर्द के आधार पर इलाज शुरू करते हुए चंद खुराक कागज के पुडिया में बना कर बिरजू को दिया और एक खुराक खिला भी दिया. घंटा भर बीत चूका था, बिरजू अब धीरे-धीरे उठ बैठा, उसे कुछ-कुछ अच्‍छा लग रहा था. होमियोपैथ डाक्‍टर श्री आनंद ने बिरजू को अपना पता लिख कर दिया और कहा कि गांव जाकर दवाईयां लेते रहना और खत्‍म हो जाए तो मेरे पास आना, मैं तुम्‍हें फिर दवाईयां दूंगा.

बिरजू श्रद्धा से झूक गया और जैसा डाक्‍टर साहब ने कहा था वैसा ही किया. रात बीतने लगी, डाक्‍टर साहब की बस आ गयी थी, वे चले गए. सुबह तक बिरजू की हालत में कुछ सुधार हो चुका था, वह भी सुबह बस पकड़ अपने गांव चला गया. रास्‍ते में उसने डा. सजल आनंद के बारे में सोच रहा था कि सचमुच एक फरिश्‍ते की तरह उन्‍होंने उसे गांव तक पहुंचने लायक बनाया अन्‍यथा उसकी तो मृत्‍यु यात्री सेड में ही निश्‍चित थी. गांव पहुंच कर सारा वृत्तांत अपने माता-पिता, पत्‍नी, बच्‍चों को खुशी-खुशी सुनाया परंतु उसे और न ही उसके परिवार के किसी सदस्‍य को यह भरोसा हुआ कि चंद पुड़ियों में दिये गए औषधि से बिरजू का रोग ठीक होने वाला है. बिरजू खूद भी ऐसा मान कर नहीं चल रहा था कि सफेद चुटकी भर पाउडर से उसे रोग मुक्‍ति मिलेगी, पर मरता क्‍या नहीं करता. इसी चुटकी भर पाउडरनुमा औषधियों के बदौलत वह शहर से गांव आ सका था. पंद्रह दिन बीत गए और बिरजू की दवाईयां भी खत्‍म हो गयी थी. अपने रोग में सुधार देखते हुए उसने शहर जाकर होमियोपैथ डाक्‍टर से मिलने का मन बनाया और सुबह की बस पकड़ कर डाक्‍टर साहब के यहां पहुंच गया.

डाक्‍टर साहब का पता पूछते हुए वह जब डाक्‍टर सजल आनंद के घर पहुंचा तो देखता है कि डाक्‍टर साहब अपने घर के बगल में एक खुले मैदान में एक पेड़ के नीचे बेंत का टेबुल और कुर्सी में बैठे है और रोगियों को देखते जाते है और दवाईयां भी देते जाते है. दूर से ही बिरजू को आते देख डाक्‍टर साहब ने उसे पहचान लिया और जोर से पुकारते हुए कहा , आओ बिरजू, अब कैसी तबियत है ?

बिरजू झेंप सा गया,, उसे इतने अमीर और संभ्रांत डाक्‍टर से ऐसी उम्‍मीद ही नहीं थी कि डाक्‍टर साहब को उसका नाम भी याद रहेगा और रोग भी.

बिरजू जबरन मुस्‍कुराने की कोशिश करता हुआ कहा कि ठीक हूं डाक्‍टर साहब, पहले से सेहत में सुधार आया है. डाक्‍टर साहब ने बिरजू से कुछ सवालात किए और फिर चुपचाप कुछ सोचते हुए दवाईयों की पुडिया बनाने लगे.

चुप देखकर बिरजू ने डाक्‍टर साहब से बड़ी हिम्‍मत कर पूछा कि डाक्‍टर साहब मेरे अंदर क्‍या खराब है, कुछ दिन पहले एक दूसरे डाक्‍टर ने बताया था पर मैं भूल गया, क्‍या आप बता सकते है कि मेरे अंदर क्‍या खराब हुआ है ?

डाक्‍टर साहब तब तक बिरजू के लिए दवाईयां तैयार कर चुके थे. एक खुराक उसी समय खाने की ताकीद करते हुए बाकी पुड़ियों को एक बड़े लिफाफे में देते हुए बिरजू को समझा दिया कि दवाईयां कैसे और कब खानी है.

डाक्‍टर साहब ने कहा कि बिरजू तुम्‍हारे अंदर कुछ भी खराब नहीं है. घबराने की कोई बात नहीं है. तीन महीने की दवाईयां दे दिया है, अब तीन महीने बाद आना, परहेज जो मैंने बताया उस पर अमल करना, दवाईयां खत्‍म होते-होते तुम्‍हारा रोग भी जाता रहेगा.

बिरजू न चाहते हुए भी खुश होने का स्‍वांग भरते हुए डाक्‍टर साहब को उनकी फीस देना चाहा पर डाक्‍टर साहब ने कहा अभी रखो, तुम जब पूर्ण रूप से ठीक हो जाओगे तब जो दोगे, मैं रख लूंगा.

बिरजू क्‍या करता, कुछ पैसे लाया था, उसे अपने पास ही रख लिया और दवाईयां लेकर गांव चला गया. जिस तरीके से डाक्‍टर साहब ने बिरजू को दवाईयां खाने और परहेज करने को कहा था, बिरजू उसी तरह तीन महीने तक दवाईयां खाता रहा और परहेज करता रहा परिणामतः तीन महीने बाद बिरजू का रंग रूप बदल गया था. अब वह खेतों में भी आसानी से काम करता था. खाना-पीना भी अब उसका सामान्‍य हो चुका था, अब उसे किसी भी तरह की शिकायत नहीं थी.

एक दिन बिरजू ने सोचा कि ठीक तो वह हो ही चुका है, कुछ घर का चावल, चूड़ा और मडुआ ही ले जाकर डाक्‍टर साहब से मिल आता हूं. दूसरे दिन सभी सामानों को लेकर शहर चला गया डाक्‍टर साहब से मिलने, उन्‍हें चावल, चूड़ा और मडुआ देकर बिरजू बहुत खुश हुआ. डाक्‍टर साहब भी खुशी-खुशी बिरजू के उपहार को स्‍वीकार किए. बिरजू डाक्‍टर साहब से बिदा लेकर वापस जा ही रहा था कि उसे न जाने क्‍यों उस डाक्‍टर से मिलने का ख्‍याल आया, जिन्‍होंने उसके किडनी फेल होने की बात कही थी और ऑपरेशन करवाने को कहा था.

बिरजू उस डाक्‍टर के क्‍लिनिक पहुंचा, घंटे भर बाद बिरजू को डाक्‍टर साहब से मुलाकात हुई. बिरजू ने डाक्‍टर साहब को याद दिलाया कि कुछ महीने पहले वह यहां आया था, डाक्‍टर साहब को याद आ गया, हां-हां, मुझे याद आ गया, डाक्‍टर साहब ने कहा, तुम्‍हारा दोनों किडनी फेल हो चुका था और तुम्‍हें ऑपरेशन कराना था जिसमें दो-ढाई लाख खर्च था. क्‍या रूपए का इंतजाम हो गया, डाक्‍टर साहब ने पूछा ?

बिरजू ने कहा एक बार फिर देखिए कि अभी क्‍या हालत है? कब तक ऑपरेशन करवा लेना चाहिए. डाक्‍टर साहब खुश हो गए और सोचा आसामी तो लौट आया. उन्‍होंने जांच करना शुरू किया, घंटे भर जांच करने के बाद डाक्‍टर साहब के माथे का पसीना सूख ही नहीं रहा था. उन्‍हें बार-बार लग रहा था कि जांच में कहां भूल हो रही है. दोनों किडनी तो बिल्‍कुल ठीक-ठाक नजर आ रहा है. ऐसा कैसे संभव है, सोच रहे थे डाक्‍टर साहब.

घंटे भर बाद बिरजू पूछा, क्‍या डाक्‍टर साहब कब ऑपरेशन कीजिएगा ?

डाक्‍टर साहब कुछ भी बोल नहीं पा रहे थे. बिरजू भी फिर कुछ नहीं बोला, चेंबर से बाहर निकला और सीधा बस स्‍टैंड की ओर एक फरिश्‍ते से सुखद मुलाकात की बात सोचता हुआ चल दिया. जिसने

बिरजू को नया जीवन दिया था, सचमुच बिरजू जैसे गरीब रोगी के लिए सजल बाबू जैसे डाक्‍टर एक फरिश्‍ता ही थे जो रूपए के लिए नहीं मानवता की सेवा के लिए डाक्‍टरी कर रहे थे.

राजीव आनंद

मोबाइल 9471765417

पालि भाषाः व्युत्पत्ति, भाषा-क्षेत्र एवं भाषिक प्रवृत्तियाँ

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

 

कुछ विद्वान संस्कृत से पालि-प्राकृत की उत्पत्ति मानते हैं।

(प्रकृतिः संस्कृतम्। तत्र भवं तत् आगतं वा प्राकृतम् – सिद्धहेमशब्दानुशासन, 8/1/1)

यह प्रतिपादित किया जा चुका है कि प्रा0भा0आ0भा0 काल में संस्कृत संस्कारित भाषा थी। समाज के शिक्षित वर्ग की भाषा थी। उसी के समानान्तर विविध जनभाषाओं/ लोकभाषाओं की भी स्थिति थी।संस्कृत काल में भी अनेक लोकभाषाएँ बोली जाती थीं।

http://www.rachanakar.org/2013/05/blog-post_5218.html.

प्राकृत का अर्थ ही है – प्रकृत।

(प्रकृत्या स्वभावेन सिद्धं प्राकृतम्)। ( - - - प्रकृतीनां साधारणजनानामिदं प्राकृतं)। इनके परिप्रेक्ष्य में अधिक तर्कसंगत यह मानना है कि संस्कृत के समानान्तर जो जन-भाषाएँ थीं, उन्हीं के विकसित रूप प्राकृत हैं।

व्युत्पत्तिः

पालि भाषा की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। पालि शब्द का अर्थ क्या है और वह कहाँ की भाषा थी। इन दोनेां प्रश्नों को लेकर भी विद्वानों में मतभेद हैं। पालि शब्द की निरुक्ति को लेकर अनेक कल्पनाएँ की गई हैं।

(1)पंक्ति शब्द से निम्नलिखित विकास क्रम में पालि की निष्पत्ति बतायी जाती है-

पंक्ति > पंति > पत्ति > पट्ठि > पल्लि > पालि ।

इस विकास क्रम में ध्वनि-नियम से अधिक अपनी बात प्रमाणित करने का आग्रह है। दंत्य से मूर्द्धन्य तथा फिर मूर्द्धन्य से पार्श्विक के विकास क्रम की प्रवृत्ति संगत नहीं है।

(2) पल्लि (गांव) से पालि को निष्पन्न बताया जाता है। पल्लि-भाषा अर्थात गांव की भाषा । इस व्युत्पत्ति में भी कठिनाइयाँ हैं। एक तो यह कि द्वित्व व्यंजन में एक व्यंजन -ल् का लोप और पूर्व स्वर का दीर्घत्व प्रथम प्राकृत काल की प्रवृत्ति के अनुकूल नहीं है दूसरी यह कि सामान्यतः इस स्थिति में शब्द के दूसरे अक्षर के ह्रस्व स्वर का दीर्घीकरण होना चाहिए था। पालि में ह्रस्व स्वर ही है।

(3) प्राकृत > पाकट > पाअड़ > पाअल > पाल > पालि

यह स्वन परिवर्तन भी विकास क्रम की प्रवृत्ति के अनुरूप नहीं है।

(4) एक विद्वान ने पाटलिपुत्र शब्द से पालि को व्युत्पन्न करने का प्रयास किया है । उनका कथन है कि ग्रीक में पाटलिपुत्र को पालिबोथ्र कहते हैं। विदेशियों द्वारा किसी शब्द के उच्चारण को भारतीय भाषा का अभिधान मानना भी संगत नहीं है। इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण भी उपलब्ध नहीं है ।

(5) एक विद्धान ने पालि का सम्बन्ध पर्याय शब्द से जोड़ा है -

पर्याय > परियाय > पलियाय > पालि

प्राचीन बौद्ध साहित्य में बुद्ध के उपदेश के लिए पर्याय शब्द का प्रयोग होता था इसलिए पर्याय से पालि को निष्पन्न बताया गया है । एक मत यह भी है कि पाल्

धातु से पालि शब्द बना है जिसका अर्थ पालन करना या रक्षा करना है। जिस भाषा के द्वारा बुद्ध के वचनों की रक्षा हुई, वह पालि है। वास्तव में पालि का सम्बन्ध बुद्ध वचनों/ बौद्ध साहित्य से ही है, इस कारण अन्तिम दो मत अपेक्षाकृत अधिक संगत हैं।

भाषा-क्षेत्रः

पालि किस स्थान की भाषा थी - इस सम्बंध में भी मत भिन्नता है। श्रीलंका के बौद्ध भिक्षुओं ने इसे मगध क्षेत्र की भाषा माना है किन्तु पालि का मागधी प्राकृत से भाषिक संरचनागत सम्बन्ध नहीं है। इस कारण यह मगध क्षेत्र की भाषा नहीं हो सकती। इसी संदर्भ में यह भी दोहराना उपयुक्त होगा कि पाटलिपुत्र शब्द के ग्रीक उच्चारण से पालि की व्युत्पत्ति के मत का भी हमने समर्थन नहीं किया है।

संस्कृत के अघोष संघर्षी व्यंजन ( ऊष्म ) स् , ष् , श् में से मागधी में श् का तथा अर्द्धमागधी एवं शौरसेनी में स् का प्रयोग होता है। पालि में केवल स् का ही प्रयोग होता है। इस कारण पालि का आधार मागधी तो हो ही नहीं सकता। इसका मूल आधार अर्द्धमागधी एवं/अथवा शौरसेनी ही हो सकती है। इस सम्बंध में आगे विचार किया जाएगा।

भाषिक प्रवृत्तियाँ :

सम्प्रति, संस्कृत से पालि के भेदक अन्तरों को जानना आवश्यक है। ये निम्न हैं :

(1) संस्कृत तक ए , ओ , ऐ ,औ सन्ध्यक्षर थे अर्थात् अ $ इ > ए / अ $उ > ओ / आ $ इ > ऐ / आ $ उ > औ। ( सन्ध्यक्षर = दो स्वर मिलकर जब एक अक्षर का निर्माण करें )

( दे० डॉ. महावीर सरन जैन: परिनिष्ठित हिन्दी का ध्वनिग्रामिक अध्ययन, पृष्ठ 175-182)

पालि में ऐ एवं औ के स्थान पर ए एवं ओ का प्रयोग होने लगा। अय् एवं अव् के स्थान पर भी ए एवं ओ का प्रयोग होने लगा। व्यंजन गुच्छ के पूर्व ए एवं ओ का ह्रस्व उच्चारण होने लगा। इस प्रकार पालि में ए एवं ओ के ह्रस्व एवं दीर्घ दोनों प्रकार के उच्चारण विकसित हो गए।

(2) प्राचीन भारतीय आर्य भाषाओं में प्रयुक्त ऋ एवं लृ का लोप हो गया।

(3) व्यंजन गुच्छ में एक व्यंजन का लोप तथा अन्य व्यंजन का समीकरण पालि एवं प्राकृत भाषाओं का महत्वपूर्ण भेदक लक्षण है। वैदिक संस्कृत एवं लौकिक संस्कृत के शब्दों में प्रयुक्त पहले व्यंजन का लोप होकर बाद के व्यंजन का समीकरण हो जाता है अथवा बाद के व्यंजन का लोप होकर पूर्व व्यंजन का समीकरण हो जाता है। उदाहरण:

(अ) पहले व्यंजन का लोप तथा बाद के व्यंजन का समीकरणः

सप्त > सत्त / शब्द > सद्द / कर्क > कक्क / सर्व > सब्ब / निम्न > निन्न

(आ) बाद के व्यंजन का लोप तथा पहले व्यंजन का समीकरणः

लग्न > लग्ग / तक्र > तक्क / शुक्ल > सुक्क / शक्य > सक्क / अश्व > अस्स

(4) शब्द-रूपों में व्यंजनान्त रूपों का अभाव हो गया । शब्द सस्वर बन गए।

(5) द्विवचन का लोप हो गया। आगे भी इस वचन का प्रयोग होना बन्द हो गया।

(6) वैदिक भाषा में रूप-रचना में अधिक विविधता और जटिलता है। उदाहरणार्थ, प्रथम विभक्ति के बहुवचन में देव शब्द के देवाः और देवासः दोनों रूप मिलते हैं। इसी तरह तृतीया के एकवचन मे देवैः और देवभिः दोनों रूप मिलते हैं। संस्कृत में आकर रूप अधिक व्यवस्थित हो गए और अपवादों तथा भेदों की कमी हो गयी। उदाहरणार्थ, पूर्वोक्त दोनों वैकल्पिक रूप छँट गए और एक-एक रूप (देवाः तथा देवैः) रह गए। मगर वैदिक भाषा में प्रयुक्त जिन भाषिक रूपों का लौकिक संस्कृत में लोप हो गया था, पालि में हमें उन भाषिक रूपों का भी प्रयोग मिलता है।

(7) आत्मनेपद लुप्तप्राय है।

पालि का महत्व बौद्धमत की हीनयान शाखा के साहित्य के माध्यम के रूप मे बहुत अधिक है। दूसरे शब्दों में बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा का मूल साहित्य पालि में निबद्ध है।

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

(सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान)

123, हरि एन्कलेव

बुलन्द शहर

mahavirsaranjain@gmail.com

जो सहि दुःख पर छिद्र दुरावा ...लघु कथा     ( डा श्याम गुप्त )

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी में वर्मा जी ने सुन्दर कविता पाठ के अनन्तर कवितांश... “ नयनों में अश्रु कलश छलके” पर डा शर्मा ने मध्य में टोक कर कहा ,’नयनों में... नहीं, ‘नयनों के अश्रु-कलश .’ कहिये|

क्यों, क्या अर्थ है आपका ? वर्माजी पूछने लगे, अब ज्यादा बाल की खाल न खींचिए।

‘यह तथ्यात्मक व कथ्यात्मक त्रुटि है।’ डा शर्मा बोले, ‘अश्रु कलश नयनों में कैसे छलकेंगे...अश्रु नयनों में या नयनों से छलकते हैं तो अश्रु-कलश स्वयं नयन हुए या नयन के अन्दर ...तो नयनों के छलकेंगे या नयनों से।’

‘आप सदैव छींटाकशी करते ही रहते हैं। आपके कमेन्ट भी तीखे होते हैं| आप छिद्रान्वेषी प्रवृत्ति के हैं हर बात में छिद्र खोजते हैं और दूसरों के छिद्र उजागर करते रहते हैं। यह अवगुण है|’ लाल साहब बोले, ‘ तुलसी बावा कह गए हैं ..

’                                   जो सहि दुःख पर छिद्र दुरावा ,

वन्दनीय सोई जग यशु पावा।

इस प्रकार आप न वन्दनीय होते हैं न वन्दनीय होने के यश का आनंद उठा पाते हैं, अधिकाँश लोग आपसे दूर हो जाते हैं|

‘और बीच में टोकते भी हैं।’ चौहान जी बोले।

‘ हाँ, बाद में चुपचाप अकेले में बता दिया करिए, सबके सामने नहीं।’ वर्मा जी कहने लगे।

नहीं ...डा शर्मा हंसकर कहने लगे, ‘कविता यदि गोष्ठी में हो रही है या इंटरनेट पर लिखी जा रही है तो समष्टि के लिए है। इसमें व्यक्तिगत क्या ? फिर सत्य कथन में छुपाव व दुराव कैसा, कोई व्यक्तिगत बात तो है नहीं।

तो क्या महाकवि तुलसीदास जी यूं ही कह गए हैं। लाल साहब ने प्रश्न उठाया|

नहीं....शर्माजी बोले, ‘ तुलसी बावा तो उचित ही कह गए हैं, शंका का प्रश्न ही नहीं, पर प्रश्न उठता है कि ‘छिद्र’ किसे कहा जाय। किसी की नैसर्गिक, प्राकृतिक, जन्म आदि से कमी दोष या विकलांगता, अपंगता, निर्धनता, सामाजिक स्थित आदि को उजागर करना, प्रचार करना आदि, चाहे पुरस्कार के रूप में ही क्यों न हो ... छिद्र व छिद्र को उजागर करना है क्योंकि वे अपूरणीय हैं। अष्टावक्र इसलिए प्रशंसनीय व प्रसिद्ध नहीं कि वे विकलांग थे, निरीह या सहायता योग्य थे अपितु अपने महाज्ञान के हेतु से। परन्तु अनाचरणगत कमियाँ, ज्ञान व जानकारी की त्रुटियाँ छिद्र नहीं, उन्हें तो बताना व उजागर करना ही चाहिए, विज्ञजनों का यह कर्तव्य है।’

‘और वर्मा जी !’ डा शर्मा वर्मा जी से उन्मुख होकर कहने लगे,’ केवल आपको चुपचाप बताने से सिर्फ आपका ही लाभ होगा परन्तु अन्यान्य कवियों को एवं समष्टि को लाभपूर्ण व सही सन्देश कैसे जायगा, जो साहित्य का उद्देश्य है। फिर उस तथ्य पर वाद-विवाद कैसे होगा ताकि वास्तव में सही क्या है यह निर्धारित हो अन्य विद्वानों के परामर्श व विचार से जो गोष्ठिओं का उद्देश्य है।’

‘बात तो सही है’, रामदेव जी बोले, ‘इसीलिये तो पुरस्कार या सम्मान बस उसी व्यक्ति को बुलाकर चुपचाप नहीं दे दिया जाता, समारोह का आयोजन होता है ? ताकि समस्त समाज का लाभ हो क्योंकि इससे लोक प्रोत्साहित होता है।’

‘सच कहा रामदेव जी’, डा शर्मा कहने लगे, ’वैसे भी हाँ जी...हां जी कहने वाले, हमें क्या अंदाज़ वाले, कौन वला मोल ले सोच वाले.. तो अधिक होते हें..छिद्रान्वेषी कम, क्

यों कि उसके लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है|

‘पर इस प्रकार लोग आपको पसंद नहीं करते व दूर भागते हैं।’ लाल जी बोले

तो मुझे क्या, मैं तो सही बात कहने का प्रयत्न करता हूँ...सांच को आंच कहाँ .....

‘.कबिरा खडा बजार में सबकी मांगे खैर,

ना कहू से दोस्ती ना काहू से बैर। ‘

कबीर और निराला को क्या क्या नहीं कहा गया, पर आज कहने वाले कहाँ हैं और कबीर, निराला कहाँ हैं।

परन्तु ‘सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, मा ब्रूयात सत्यमप्रियम...’ भी तो कहा गया है, श्यामसुन्दर जी ने बात आगे बढाते हुए कहा।

सही कहा, डा शर्मा बोले, पर क्या मैंने कुछ अप्रिय कहा ? वह तो जो सत्य सुनना ही नहीं चाहता, आलोचना सुनना ही नहीं चाहता उसे सत्य भी अप्रिय लगता है .......

‘सोना कूड़े में पडा, लेते तुरत उठाय,

सत्य बचन ले लीजिये, चाहे शत्रु सुनाय।

सही है पर यह भी तो कथन है कि ‘ सीख ताहि को दीजिये जाको सीख सुहाय..’ रामदेव जी ने कहा।

सत्य बचन, श्रीमान जी! डा शर्मा हंसकर बोले, ‘पर यहाँ कोई बानरा थोड़े ही हैं। सब क्रान्तिदर्शी, कविर्मनीषी, स्वयंभू, परिभू है उन्हें तो समझना चाहिए ....इसीलिये तो गोष्ठी होती है।

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डॉ श्याम गुप्त , सुश्यानिदी , के-३४८, आशियाना, लखनऊ -२२६०१२ 

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कहानी

कितनी देर तक

राकेश भ्रमर

चिता में आग लगने के बाद एक-एक करके लोग जाने लगे थे. अंत में केवल मैं ही चिता के पास रह गया था. कुछ दूरी पर एक डोम उत्सुक आंखों से चिता की तरफ ताक रहा था. मेरी नजरें कभी-कभी उसकी तरफ उठ जाती थीं.

सबके जाते ही मैं अपने आपको बेहद अकेला महसूस करने लगा. इस दुनिया में अंत तक कोई किसी का साथ नहीं देता. फुरसत ही नहीं है किसी के पास. वरना क्या चिता ही आग ठण्डी होने तक यहां नहीं रुकते. मैं सूनी आंखों से चिता से उठती लपटों को ताकता जा रहा था.

कल तक वह इस दुनिया में हमारी तरह हंस-बोल रहा था. आज वह चिता में लेटा हुआ था. आत्मा तो पंचतत्व में मिल गई थी. अब शरीर भी मिल रहा था. समय का चक्र कितनी जल्दी आदमी को मौत के कुएं में धकेल देता है, पता ही नहीं चलता है, किसे पता था कि विनोद इतनी जल्दी हम सबसे मुंह मोड़कर चला जाएगा. मुझे भी पता नहीं था, जबकि हम दोनों एक ही कमरे में रहते थे. हर सुख-दुःख में एक दूसरे का साथ देते थे. उसकी कोई भी बात मुझसे छिपी नहीं थी, लेकिन मौत को हम सबसे छुपाए रखा. किसी को आभास तक नहीं होने दिया कि वह सबसे जुदा होकर जा रहा है.

वह हमसे जुदा हो गया. इस बात का दुःख नहीं था. उसके मरने का भी दुःख नहीं था. वह जिन्दगी की लड़ाई लड़ते हुए मरा था, वह शहीद हो गया था. विश्वविद्यालय के हर छात्र को उसकी मौत पर गर्व था, मुझे तो सबसे ज्यादा था. वह मेरा सबसे प्यारा दोस्त था.

चिता की आग धीरे-धीरे ठण्डी पड़ती जा रही थी. विनोद का शरीर अस्तित्वहीन होता जा रहा था. उसके साथ मेरा दिल भी बैठता जा रहा था. आंसुओं को मैंने भीतर ही जज्ब कर लिया था. रोने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था, अतः उसकी चिता के पास खड़े होकर रोना क्या उसकी आत्मा को अच्छा लगता. मैंने अपने दिल को पत्थर बना लिया था.

मुझे दुःख था तो केवल इस बात का कि विश्वविद्यालय के जो छात्र विनोद की अर्थी को कंधा देकर श्मशान तक लाए थे, वह चिता की आग ठण्डी होने से पहले ही चले गए थे. जैसे कोई बेगार निभाई हो. वह विनोद जो छात्रों की भलाई के लिए शहादत की मौत मरा था, उसको ही वे लोग चिता में डालकर चलते बने थे.

चिता के बुझने तक रात काफी घिर आई थी. चारों तरफ एक डरावना-सा सन्नाटा बिखरा हुआ था. वह डोम भी न जाने कब उठकर चला गया था. विनोद की गर्म राख को मैंने हौले से छुआ. हाथ में लेकर उसे माथे से लगाया जेसे उसे अन्तिम सलामी दी हो और फिर बोझिल कदमों से शहर की ओर लौट पड़ा.

सड़के वीरान थी. कभी-कभी कोई कुत्ता भौंककर वातावरण का सन्नाटा तोड़ देता था. हॉस्टल तक पहुंचते-पहुंचते मुझे डेढ़ घण्टा लग गया.

कमरा खोलकर मैं अन्दर घुसा. बत्ती जलाते समय लगा जैसे विनोद अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था. परन्तु नहीं, यह केवल मेरा भ्रम था. अब वह कभी इस कमरे में नहीं आएगा. उसके कपड़े जैसे के तैसे हैंगर में टंगे थे. सूटकेस पलंग के नीचे पड़ा हुआ था. बुक-शेल्फ में किताबें रखी हुई थीं. मेज पर कुछ कापियां और एक खुली किताब रखी थी जैसे विनोद का इंतजार कर रही हों. मेरे दिल में एक हूक सी उठी. विनोद की मौत के बाद मुझे न तो फुरसत मिली थी, न ही इतना होश था कि उसकी वस्तुओं को समेटकर रख सकता. जरूरत ही क्या थी? लेकिन अब तो सब कुछ समेटकर रखना ही पड़ेगा. जब उनको इस्तेमाल करने वाला ही नहीं रहा तो सब कुछ बिखरा कर रखने से फायदा क्या?

किसी की मौत के बाद उसे भुला देना आसान काम नहीं होता है. विनोद के जीवन की एक-एक घटना मेरी आंखों के सामने से गुजर रही थी. मैं चाह कर भी उनसे छुटकारा नहीं पा सकता था. इस कमरे में पूरे चार साल हमनें एक साथ बिताए थे. चार साल में शायद ही कोई ऐसी रात रही हो, जब हम एक दूसरे से अलग हुए हों. गर्मी की छुट्टियों की बात अलग थी. परन्तु आज की रात अन्य रातों से भिन्न थी. आज विनोद इस दुनिया से उठ गया था. ऐसी हालत में मेरे लिए एक पल भी सोना कठिन लग रहा था. कैसे सो सकता हूं मैं? नींद तो शायद विनोद के साथ ही चली गई थी. उसे मैं कहां जाकर ढूंढ़ूं?

विनोद अन्य छात्रों से एक भिन्न किस्म का छात्र था, पढ़ाई में अव्वल तो आता ही था, दूसरे क्षेत्रों में भी उसकी बराबरी का मुश्किल से ही मिलता था. साहित्य हो या रंगमंच, राजनीति हो या समाज सेवा... हर काम में वह आगे रहता था, हालांकि राजनीति में वह इसलिए भाग नहीं लेता था कि उसे अधिकार चाहिए थे. लोगों की सेवा ही उसके लिए प्रमुख थी.

जमींदार घराने का था वह. जब जितने पैसों की जरूरत होती, उसके घर से आ जाते, लेकिन उन पैसों का उपयोग भी वह ज्यादातर दूसरों के ऊपर ही करता था. किसी की फीस जमा करनी है, किसी के पास कोई पुस्तक नहीं है, किसी की शर्ट फट गई है, वह हर किसी की सहायता करने में आगे रहता. पैसे खत्म हो जाने की उसे चिंता नहीं थी. खत्म होते ही वह घर लिख भेजता था. एक सप्ताह के अन्दर ही फिर पैसे आ जाते.

मैं कभी-कभी कहता, ‘‘तुम इतने सारे पैसे घर से मंगाते हो, क्या घर में कोई पूछता नहीं कि तुम इतने पैसों का क्या करते हो?’’

‘‘अरे यार, मैं अपने मां-बाप का इकलौता बेटा हूं, जो कुछ पिताजी ने कमाकर रखा है, वह सब मेरे लिए ही तो है, अगर उसे मैं न खर्च करूं तो फिर कौन करेगा, इसलिए किसी के टोकने का सवाल ही पैदा नहीं होता, लेकिन इतना उनको मेरे ऊपर विश्वास है कि मैं फालतू खर्च नहीं करता, किसी भले काम में ही खर्च करता हूं. वह मेरी आदत से परिचित हैं.’’

उसकी बातों से मुझे आश्चर्य होता, कितने मां-बाप है जो अपने बच्चों को दूसरों के ऊपर अपनी कमाई खर्च करने की अनुमति देते हैं. विनोद बहुत भाग्यशाली था कि उसे ऐसे मां-बाप मिले थे. विनोद का हृदय ही विशाल नहीं था, वरन उसे मां-बाप भी विशाल हृदय के मिले थे.

विश्वविद्यालय के अन्दर उसके कारण ही रैगिंग खत्म हो गई थी, रैगिंग करने वाले छात्र ही उसके सबसे बड़े दुश्मन थे. पहले वह शान्ति से ऐसे छात्रों को समझाता था, तब भी अगर बात नहीं बनती तो मार-पीट पर उतारू हो जाता. वह अपनी तरफ से पहल नहीं करता था. बदमाश छात्र ही पहला वार करते थे, उसे भी जवाबी कार्यवाही करनी पड़ती थी. कई छात्रों की उसने पिटाई की थी. इस तरह उसके कई दुश्मन बन गए थे, परन्तु वह परवाह न करता. शायद यही लापरवाही उसकी मौत का कारण बनी.

कभी-कभी मैं उसको समझाने का प्रयास रकता, ‘‘विनोद, तुम अपने मां-बाप की इकलौती संतान हो, उन्होंने तुम्हें यहां पढ़ने के लिए भेजा है, मन लगाकर पढ़ाई करो, बेकार के झंझटों में क्यों अपने को फंसाते हो? किसी की सहायता करना अलग बात है, लेकिन दूसरों के लिए गुण्डों-बदमाशों से लड़ाई-झगड़ा करना... क्या यह ठीक बात है. आज तुम यहां हो, इसलिए बदमाश छात्रों को सबक सिखा सकते हो, ताकि वह किसी छात्रा से छेड़छाड़ न करें, परन्तु कब तक... कल तुम्हें पढ़ाई खत्म करके नौकरी करनी है या फिर घर जाकर पैतृक सम्पत्ति की देखभाल करोगे. तुम्हारे जाने के बाद तो फिर सब कुछ पहले की तरह ही चलने लगेगा. विश्वविद्यालय प्रांगण में लड़कियों से छेड़छाड़ होगी, उन पर गंदे फिकरे कसे जाएंगे, उनकी इज्जत को लूटा जाता रहेगा. यह सब शाश्वत सत्य है जिनको पूरी तरह मिटा पाना मुश्किल है, ऐसी घटनाएं कल भी होती थीं. आज भी हो रही हैं और कल भी होती रहेंगी, तो फिर तुम क्यों जान-बूझकर अपने आपको मुष्किलों में फंसाते हो?’’

विनोद बड़े गौर से मेरी बातें सुनता रहा. मैंने समझा कि मेरी बातों का उस पर असर हो रहा है, परन्तु ऐसी बात नहीं थी. मेरी बात खत्म होते ही वह अपनी विशिष्ट शैली में मुस्कराया जिसमें दुनिया भर की मिठास भरी हुई थी, फिर डांटने के स्वर में बोला-

‘‘अबे उल्लू, दिमाग तो तेरे पास है, लेकिन दुनिया से लड़ने का साहस नहीं है, आखिर लाला है न. जिन्दगी भर कलम घिसने के सिवा और तुमने जाना ही क्या है, देख बे, मैं राजपूत हूं और राजपूत का धर्म होता है... लड़ाई करना, जुल्म और अन्याय के विरुद्ध लड़ाई करना. इस धर्म के नाते ही जो मेरा कर्तव्य बनता है, उसे निभा रहा हूं, तू उपदेश चाहे जितना दे ले, लेकिन जो कुछ मैं करता हूं, उसे गलत नहीं समझता. जिस दिन मैं समझूंगा कि मुझसे गलती हुई है, उस दिन मेरा विनाश निश्चित है. उस दिन तेरा दोस्त नहीं रहूंगा, समझे?’’

बात करते-करते विनोद की आवाज भावुक हो गई, पता नहीं किस मिट्टी का बना था वह? ऊपर से सख्त पत्थर की तरह कठोर... चट्टान की तरह अडिग, परन्तु अंदर से वह एक भोला-भोला भावुक इंसान था जो सामान्य आदमी की तरह दुःखी होता था और खुशी महसूस करता था.

उसके बाद मेरे पास उसको समझाने का साहस नहीं बचता था. मैं चुप हो जाता था, परन्तु ज्यादा समय तक नहीं. दो एक दिन बाद उसे समझाने का दुःसाहस फिर कर बैठता, जिसका परिणाम पहले की तरह ही होता... हमारे बीच कभी-कभी झड़पें भी हो जाती. एक दूसरे से न बोलने की कसमें खाते, परन्तु इस सबसे उसके व्यवहार में कोई फर्क नहीं पड़ता था. मेरे नाराज होने के बावजूद मुझसे बात करता और हार कर मुझे उसकी बात का जवाब देना ही पड़ता था.

फिर एक ऐसी घटना घटी जिसने उसके जीवन का निर्णय कर दिया. भूगोल विभाग की एक छात्रा को कुछ छात्रों ने छेड़ दिया. वह छात्रा अपने क्लास रूम की तरफ जा रही थी. गैलरी में कुछ छात्र खड़े थे. छात्रा जैसे ही उनके करीब पहुंची, एक छात्र ने उसका हाथ पकड़ लिया. दूसरे ने उसके गाल पर चुम्बन ले लिया और तीसरे ने तो हद ही कर दी. उसने छात्रा को आलिंगन में कसकर उसके अंगों को मसल डाला. यह सब इतने अप्रत्याशित ढंग से हुआ था कि छात्रा कोई विरोध न कर पाई.

जब तक वह छात्रा कुछ समझ पाती, तीनों लड़के यह जा, वह जा. किसी और स्थिति में होता तो शायद छात्रा अपनी इज्जत का ख्याल कर चुप कर जाती, परन्तु वह क्षण वैसा नहीं था. कई अन्य छात्र इस घटना के चश्मदीद गवाह थे. छात्रा फूट-फूटकर रोने लगी थी. पलक झपकते ही पूरे विभाग में घटना की खबर फैल गई. फिर जैसे एक हंगामा खड़ा हो गया. छात्र-छात्राएं कक्षाओं के बाहर निकल आए. हर किसी के होंठों पर इसी घटना का जिक्र था.

संयोग से विनोद भी भूगोल का छात्र था. उसे जब घटना का पता चला तो छात्रा को लेकर तुरंत विभागाध्यक्ष के पास पहुंचा. एक लिखित शिकायत दर्ज कराई. विभागाध्यक्ष ने दोषी छात्रों के विरुद्ध कार्रवाई करने का आदेश दिया. विनोद इतने से ही संतुष्ट नहीं हुआ. उसने विश्वविद्यालय के उपकुलपति और प्राक्टर के पास जाकर भी शिकायत की और उचित कार्रवाई की मांग की.

विनोद हिंसा पर विश्वास नहीं करता था, लेकिन जब सीधी उंगली से घी नहीं निकलता था तो वह मारपीट और तोड़-फोड़ का रास्ता अपनाता था. हालांकि उसके बाद उसे पछतावा होता, लेकिन वह समझता था कि हिंसा का रास्ता ही एक ऐसा रास्ता है जिस पर चल कर बहरों के कानों तक बात पहुंचाई जा सकती है.

लेकिन इस मामले में विनोद कुछ नहीं कर पाया. दोषी छात्रों को मौखिक चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था. विनोद को बहुत निराशा हुई. चेतावनी से उन छात्रों पर क्या असर पड़ने वाला था, लेकिन उस छात्रा पर जो प्रभाव पड़ा था, वह क्या जीवन पर्यन्त दूर हो सकता था? कभी नहीं, विनोद चाहता था कि उन छात्रों को ऐसा सबक मिले कि फिर कभी वह किसी लड़की की तरफ नजर उठाकर न देखें, परन्तु उसका सोचा नहीं हो सका. छात्र संघ के अध्यक्ष और सचिव के पास जाकर भी उसने मामले को उठाया, परन्तु कुछ नहीं हुआ.

विनोद का साथ देने वाले गिने-चुने दो ही छात्र थे. नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता? यहां तो सभी के दामन में दाग लगे थे. इस घटना में विनोद दोषी छात्रों को सजा नहीं दिलवा सका. इससे उसका दिल टूट गया. पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था. विश्वविद्यालय के पचास प्रतिशत से अधिक छात्र उसका साथ देते थे, परन्तु इस बार उल्टा हुआ. कोई भी उसका साथ देने के लिए सामने नहीं आया. विनोद फिल्मी हीरो नहीं था, अकेले कितने लोगों से वह लड़ता.

दोषी छात्रों को पर्याप्त सजा क्यों नहीं मिली. इसका कारण भी बाद में पता चल गया था. वे छात्र षहर के धनाढ्य व्यापारियों के बेटे थे. उनकी पहुंच मंत्रियों तक थी. यही नहीं, वह जाने-माने गुण्डे भी थे. सभी उनसे डरते थे. उनके विरुद्ध आवाज उठाकर कौन अपनी जान जोखिम में डालता?

इस हार को विनोद ने व्यक्तिगत हार के रूप में लिया. मगर वह कुछ कर भी नहीं सकता था. दिल ही दिल में घुट रहा था. मैंने उसे इतना उदास और हताश कभी नहीं देखा था, मैं उसे तसल्ली देना चाहता था, परन्तु मेरे पास बोलने के लिए शब्द नहीं थे. शब्द होते तो भी शायद मेरा साथ न देते.

सभी ने सोचा था, कि मामला यहीं पर खत्म हो गया है, परन्तु आगे की घटनाओं की तरफ किसी का ध्यान ही नहीं गया था. कल की ही तो बात है, विनोद विश्वविद्यालय से लौट रहा था. सड़क पर आकर देखा कि वही तीनों छात्र पान की दुकान पर खडे़ हैं, वे सब विनोद की तरफ ही देख रहे थे. विनोद ने एक नजर उन पर डाली और फिर अपने रास्ते पर चल पड़ा.

‘‘विनोद साहब, जरा सुनिए तो सही. अपने दोस्तों से क्या इतनी जल्दी मुंह मोड़कर चल देते हैं?’’ उसके कानों में एक लड़के की आवाज पड़ी. उसके कदम रुक गए. मुड़कर देखा, वह तीनों व्यंग्य से उसे देखकर मुसकरा रहे थे.

‘‘आपने मुझसे कुछ कहा?’’ विनोद ने यथासंभव अपनी आवाज को संयत रखा. इस समय वह लड़ने के मूड़ में नहीं था. वह तीन थे और वह अकेला. चाहता तो भी उनका मुकाबला नहीं कर सकता था.

‘‘आओ, यार हमारी तुम्हारी क्या दुश्मनी? एक ही विश्वविद्यालय में पढ़ते हैं, दो दिन बाद अलग हो जाएंगे. कल कौन कहां होगा, क्या पता? फिर आपस में लड़ने-झगड़ने से क्या फायदा?’’ दूसरे छात्र ने आवाज में चाशनी घोलते हुए कहा. विनोद चकित रह गया. उसे इन बदमाश छात्रों से ऐसे व्यवहार की आशा नहीं थी.

उसने संशय भरी नजरों से उन तीनों को बारी-बारी देखा. उनके चेहरे पर मित्रता के भाव थे, क्या पता यह उनका अभिनय हो? अगर ऐसा था तो वह अभिनय अच्छा कर लेते थे. विनोद के हृदय से एक आवाज आई, ‘‘हंसते दुश्मन का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए.’’

‘‘हां, भई,’’ तभी तीसरा लड़का बोला. विनोद के विचारों को एक झटका लगा. वह लड़का कह रहा था, ‘‘आओ, आज से हम सभी दोस्त हैं, हमारी दोस्ती के लिए एक-एक पान हो जाए.’’

विनोद विचारों में गुमसुम उनके करीब खड़ा था. वह तीसरे लड़के की बात पर गौर कर रहा था और नीचे जमीन की तरफ देख रहा था. तभी अचानक वह घटना हो गई, जिसकी उसे सपने में भी आशंका नहीं थी. विचारों से उबर कर विनोद किसी की तरफ देख भी न पाया था कि अचानक एक छात्र ने अपनी जेब से लम्बे फल वाला चाकू निकाला, विनोद उसकी हरकतों से पूर्णतया अनभिज्ञ था.

एक झटके से चाकू खोलकर उस छात्र ने विनोद के पेट में घुसेड़ दिया. चाकू का पूरा फल उसके पेट में घुस गया था. यह सब अप्रत्याशित ढंग से हुआ था कि वह संभल भी न पाया. एक चीख के साथ लड़खड़ाकर गिर गया. गिरते-गिरते उस छात्र ने चाकू को एक बार ऊपर से नीचे खींचा. विनोद का पेट लगभग एक बीता फट गया था.

उसके गिरते ही छात्रों ने उसके मुंह पर घृणा से थूक दिया. बेहोश होते-होते विनोद ने उसकी आवाज को अपने कानों में घुसते सुना, ‘‘साला, हरामजादा, दुनिया की सारी लड़कियों की इज्जत का ठेका लेकर पैदा हुआ था, उल्लू का पठ्ठा... ?

अस्पताल पहुंचने के पहले ही विनोद मौत की गोद में पहुंच चुका था. दुनिया की कोई ताकत उसे बचा नहीं सकी. उसके जीवन का इतना बुरा अन्त होगा, किसने सोचा था? विनोद ने भी क्या सोचा होगा? मुझे तो अभी तक उसकी मौत का विश्वास नहीं हो रहा था, जबकि मैंने खुद अपने हाथों से उसकी चिता को आग दी थी.

पुलिस कार्यवाही के बाद विनोद की लाश को मैंने दाह-संस्कार के लिए प्राप्त कर लिया था. शहर में और कोई उसका अपना नहीं था. दोस्त होने के नाते मुझे ही आगे बढ़कर अपने कर्तव्य निभाने पड़े थे. उसके पिता को मैंने सूचना दी थी, परन्तु वह समय से पहुंच नहीं सके थे. लाश को ज्यादा दिनों तक सुरक्षित रखना भी असंभव था, अतः विनोद का दाह-संस्कार कर दिया गया. तमाम छात्रों के अलावा विश्वविद्यालय के प्रवक्ता तथा उपकुलपति भी शव यात्रा में शामिल हुए थे, परन्तु जैसा कि बयान किया जा चुका है, सारे लोग चिता में आग लगने के साथ अपने-अपने घरों को लौट गए थे.

मृत व्यक्ति का कोई कितनी देर तक साथ दे सकता है?

--

(राकेश भ्रमर)

7, श्री होम्स, कंचन विहार,

बचपन स्कूल के पास, लामती,

विजय नगर, जबलपुर-482002

मोबाइल : 9968020930

 

कुबेर

भाया! बहुत गड़बड़ है

 

बहुत गड़बड़ है,

भाया! बहुत गड़बड़ है।

इधर कई दिनों से

दिन के भरपूर उजाले में भी

लोगों को कुछ दिख नहीं रहा है

दिखता भी होगा तो

किसी को कुछ सूझ नहीं रहा है

फिर भी

या इसीलिए सब संतुष्‍ट हैं?

कोई कुछ बोल नहीं रहा है।

भाया! बहुत गड़बड़ चल रहा है।

गंगू तेली का नाम उससे जुड़ा हुआ है

क्‍या हुआ

वह उसके महलों से दूर

झोपड़पट्टी के अपने उसी आदिकालीन -

परंपरागत झोपड़ी में पड़ा हुआ है?

षरीर, मन और दिमाग से सड़ा हुआ है।

पर नाम तो उसका उससे जुड़ा हुआ है?

उसके होने से ही तो वह है

गंगू तेली इसी बात पर अकड़़ रहा है?

भाया! बहुत गड़बड़ हो रहा है

 

उस दिन गंगू तेली कह रहा था -

'वह तो ठहरा राजा भोज

भाया! क्‍यों नहीं करेगा मौज?

जनता की दरबार लगायेगा

उसके हाथों में आश्‍वासन का झुनझुना थमायेगा

और

आड़ में खुद बादाम का हलवा और,

शुद्ध देसी घी में तला, पूरी खायेगा

तुम्‍हारे जैसा थोड़े ही है, कि-

नहाय नंगरा, निचोय काला?

निचोड़ने के लिये उसके पास क्‍या नहीं है?

खूब निचोड़ेगा

निचोड़-निचोड़कर चूसेगा

तेरे मुँह में थूँकेगा।

 

मरहा राम ने कहा -

''गंगू तेली बने कहता है,

अरे! साले चूतिया हो

अब कुछू न कुछू तो करनच्‌ पड़ही

नइ ते काली ले

वोकर थूँक ल चांटनच्‌ पड़ही

कब समझहू रे साले भोकवा हो,

भीतर-भीतर कितना,

क्‍या-क्‍या खिचड़ी डबक रहा है?

अरे साले हो!

सचमुच गड़बड़ हो रहा।''

 

गंगू तेली ने फिर कहा -

''वह तो ठहरा राजा भोज!

हमारी और तुम्‍हारी सडि़यल सोच से

बहुत ऊँची है उसकी सोच।

एक ही तो उसका बेटा है

उसका बेटा है

पर हमारा तो युवराज है

अब होने वाला उसी का राज है

उसके लिये जिन्‍दबाद के नारे लगाओ

उस पर गर्व करो

और, मौका-बेमौका

उसके आगे-पीछे कुत्ते की तरह लुटलुटाओ -

दुम हिलाओ

जनता होने का अपना फर्ज निभाओ।

 

युवराज के स्‍वयंवर की शुभ बेला है

विराट भोज का आयोजन है

छककर शाही-दावत का लुत्‍फ उठाओ

और अपने किस्‍मत को सहराओ।''

'बढि़या है, बढि़या है।'

गंगू तेली की बातों को सबने सराहा।

मरहा राम सबसे पीछे बैठा था

उसे बात जंची नहीं

उसने आस्‍ते से खखारा

थूँका और डरते हुए कहा -

''का निपोर बढि़या हे, बढि़या हे

अरे! चूतिया साले हो

तूमन ल दिखता काबर नहीं है बे?

काबर दिखता नहीं बे

जब चारों मुड़ा गुलाझांझरी

अड़बड़-सड़बड़ हो रहा है।''

बहुत गड़बड़ हो रहा है,

भाया! बहुत गड़बड़ हो रहा है।

 

वह तो राजा भोज है

हमारी-आपकी ही तो खोज है

उस दिन वह महा-विश्‍वकर्मा से कह रह था -

''इधर चुनाव का साल आ रहा है

पर साली जनता है, कि

उसका रुख समझ में ही नहीं आ रहा है

बेटा साला उधर हनीमून पर जा रहा है

बड़ा हरामी है

जा रहा है तो नाती लेकर ही आयेगा

आकर सिर खायेगा

सौ-दो सौ करोड़ के लिये फिर जिद मचायेगा।''

यहाँ के विश्‍वकर्मा लोग बड़े विलक्षण होते हैं

समुद्र में सड़क और-

हवा में महल बना सकते हैं

रातों रात कंचन-नगरी बसा सकते हैं।

राजा की बातों का अर्थ

और उनके इशारों का मतलब

वे अच्‍छे से समझते हैं

पहले-पहले से पूरी व्‍यवस्‍था करके रखते हैं।

दूसरे दिन उनके दूत-भूत गाँव-गाँव पहुँच गये,

बीच चौराहे पर खड़े होकर

हवा में कुछ नट-बोल्‍ट कँस आये, और

पास में एक बोर्ड लगा आये।

 

बोर्ड में चमकदार अक्षरों में लिखा था -

'शासकीय सरग निसैनी, मतलब

(मरने वालों के लिये सरग जाने का सरकारी मार्ग)

ग्राम - भोलापुर,

तहसील - अ, जिला - ब, (क․ ख․)।'

और साथ में उसके नीचे

यह नोट भी लिखा था -

'यह निसैनी दिव्‍य है

केवल मरने वालों को दिखता है।

 

देखना हो तो मरने का आवेदन लगाइये,

सरकारी खर्चे पर स्‍वर्ग की सैर कर आइये।

जनहितैषी सरकार की

यह निःशुल्‍क सरकारी सुविधा है

जमकर इसका लुत्‍फ उठाइये

जीने से पहले मरने का आनंद मनाइये।'

महा-विश्‍वकर्मा के इस उपाय पर

राजा भोज बलिहारी है

और इसीलिए

अब उसके प्रमोशन की फूल तैयारी है।

मरहा राम चिल्‍लाता नहीं है तो क्‍या हुआ,

समझता तो सब है

अपनों के बीच जाकर कुड़बुड़ाता भी है

आज भी वह कुड़बुड़ा रहा था -

''यहा का चरित्त्‍ार ए ददा!

राजा, मंत्री, संत्री, अधिकारी

सब के सब एके लद्दी म सड़बड़ हें

बहुत गड़बड़ हे,

ददा रे! बहुत गड़बड़ हे।''

 

गंगू तेली सुन रहा था

मरहा राम का कुड़बुड़ाना उसे नहीं भाया

पास आकर समझाया -

''का बे! मरहा राम!

साला, बहुत बड़बड़ाता है?

समझदार जनता को बरगलाता है

अरे मूरख

यहाँ के सारे राजा ऐसेइच्‌ होते हैं

परजा भी यहाँ की ऐसेइच्‌ होती है

यहाँ तेरी बात कोई नहीं सुनेगा

इत्ती सी बात तेरी समझ में नही आती है?''

लोग वाकई खुश हैं

कभी राजा भोज के

पिताश्री के श्राद्ध का पितृभोज खाकर

तो कभी उनके स्‍वयं के

जन्‍म-दिन की दावत उड़ाकर

झूठी मस्‍ती में धुत्त्‍ा्‌ हैं।

 

मरहा राम अब भी कुड़बुड़ा रहा है,

तब से एक ही बात दुहरा रहा है -

''कुछ तो समझो,

अरे, साले अभागों,

कब तक सोते रहोगे,

अब तो जागो।''

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कुबेर

जिला प्रशासन (राजनांदगाँव) द्वारा

गजानन माधव मुक्तिबोध

सम्‍मान 2012 से सम्‍मानित

(जन्‍म - 16 जून 1956)

प्रकाशित कृतियाँ

1 - भूखमापी यंत्र (कविता संग्रह) 2003

2 - उजाले की नीयत (कहानी संग्रह) 2009

3 - भोलापुर के कहानी (छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह) 2010

4 - कहा नहीं (छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह) 2011

5 - छत्तीसगढ़ी कथा-कंथली (छत्तीसगढ़ी लोक-कथाओं का संग्रह) 2013

प्रकाशन की प्रक्रिया में

1 - माइक्रो कविता और दसवाँ रस (व्‍यंग्‍य संग्रह)

2 - और कितने सबूत चाहिये (कविता संग्रह)

3 - सोचे बर पड़हिच्‌ (छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह)

4 - ढाई आखर प्रेम के (अंग्रेजी कहानियों का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद)

संपादित कृतियाँ

1 - साकेत साहित्‍य परिषद्‌ सुरगी, जिला राजनांदगाँव की स्‍मारिका 2006, 2007, 2008, 2009, 2010, 2012

2 - शासकीय उच्‍चतर माध्‍य. शाला कन्‍हारपुरी की पत्रिका 'नव-बिहान' 2010, 2011

पता

ग्राम - भोड़िया, पो. - सिंघोला, जिला - राजनांदगाँव (छ.ग.)

पिन - 491441

मो. - 9407685557

 

कुबेर

नूतन प्रसाद शर्मा 

कहानी

मैनेजर लीला

हमारे गांव वाले कम श्रद्धालू नहीं हैं. उस साल जब अच्छी फसल हुई तो ईश्वर ने कृपा की,ऐसा सोच रामलीला मंडली को बुलवाया. मंडली वालों ने आकर ऐसा जीवंत खेल खेला कि पूरा गांव राम मय हो गया. अंतिम दिन ग्रामीणों में चढ़ौत्री चढ़ाने की होड़ लग गयी. बहुतों ने विभोर हो एक जून का राशन रख, बाकी सर्वस्व भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया. इधर चढ़ौत्री का कार्यक्रम समाप्त हुआ. उधर रामलीला के पात्रों की बैठक प्रारंभ हो गयी. यह बैठक मैनेजर के शोषण के विरुद्ध हो रही थी. राम और रावण दोनों दलों के लोग गंभीर मुद्रा में बैठे थे कि राम ने मौन तोड़ा-जब हम मर मर कर कमाते है तो हमें भी बराबर हिस्सा मिलना चाहिए लेकिन मैनेजर हमें अधिकारों से वंचित कर देता हैं. यही नहीं जो वेतन बंधा है उसे भी पूरा नहीं देता.

रावण ने साथ दिया - हां भैय्या राम,मैनेजर पूरा राक्षस है. अभी ही देखो न- भण्डारपुर वालों ने कितनी तगड़ी चढ़ौत्री की उसे मैनेजर ने अपने पास रख लिया मानों सिर्फ उसका ही पसीना गिरा है. हमें छूने तक नहीं दिया सीता - मुझे डेढ़ सौ रुपये मासिक वेतन देने का आश्वासन देकर लाया है . तीन महीने यूं ही निकल गये. बहुत विनती की तो मात्र साठ रुपये ही मिले. हनुमान - तुम्हें कुछ मिले तो ! मेरी स्थिति और भी गंभीर है. पत्नी की चिट्ठी आयी है कि मुन्ना बीमार है. उसके उपचार के लिए रुपये भेजो. मैनेजर को पत्र दिखाया तो उसने फेंक दिया. कुम्भकर्ण - रात - रात भर जागने के कारण मेरी आंखें खराब हो गयी. चश्मा खरीदने के लिए रुपये मांगे तो दुत्कार दिया. समझ नहीं आता क्या करुं ?

इसी प्रकार सभी पात्रों ने अपने - अपने दुखड़े रोये लेकिन उनकी करुण आवाज का श्रोता कोई नहीं था. सुग्रीव ने कहा- रोने से काम नहीं बनने वाला. अधिकार प्राप्ति के लिए कुछ न कुछ उपाय करना होगा. जनक - हां, मैनेजर के पास अपनी मांग रखी जाये. देखे तो क्या कहता है. मेघनाथ - उससे बोलें कि वह हमारा वेतन बढ़ाये और ठीक समय पर दे. विभीषण - अगर इंकार दिया तो. . . ? लक्ष्मण - चढ़ौत्री छीन ले. . . दोनों दल मैनेजर से लोहा लेने कमर कस कर तैयार हो गये. वे चिल्लाने लगे- राम - रावण - जिन्दाबाद, और मैनेजर - मुर्दाबाद. इनकी आवाज ने मैनेजर के बहरे कानो को फाड़ दिए. उसने चढ़ौत्री के रुपयों को सात तालों वाली पेटी में बंद किया. पात्रों के पास आया. मैनेजर के संबंध में इतना जानकारी दे देना अधिक है कि वह राम और रावण को अपने क ो अपने कंधे पर बिठाकर कश्मीर से कन्याकुमारी तक दौड़ लगा सकता है. उसे देख शेर की तरह दहाड़ने वाले पात्र भींगी बिल्ली बन गये. मैनेजर ने सबको घूरकर देखा और कहा- अरे, राम और रावण कब से भाई बन गये जो चिपक कर बैठे हैं. किसी ने कुछ जवाब नहीं दिया तो उसने फिर से पूछा-गूंगे हो गये हो, जो उत्तर नहीं दे रहे हो. मैं पूछता हूं कपड़े मिल के हड़तालियों की तरह नारेबाजी क्यों लगा रहे हो ? रावण की कनखियों की इशारे ने हिम्मत दी तो राम ने कहा - रोजी- रोटी के लिए, अपने वाजिब हक के लिए. . . ।

- यानि, इतने दिनों तक भूखें रहे. यदि ऐसा होता तो जीवित रहते ? रावण ने स्पष्ट किया -वास्तविकता यह है कि आप हमे श्रम के मान से वेतन कम देते हैं. यही नहीं जो निर्धारित है वह भी पूरा नहीं मिलता. - आखिर क्या चाहते हो ? वशिष्ठ - वेतन बढ़े और समय पर मिले. - ओह् ! अब समझा विद्रोह करने पर उतारु हो . विभीषण - नहीं, हम अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं पात्रों की बात सुनकर मैनेजर ने अट्टहास किया. फिर बोला - घोर कलयुग आ गया. तभी तो जो सब प्रकार से संपन्न है उसकी भी नीयत डूब रही है. राम साक्षत् परम ब्रह्म परमेश्वर है. भरत विश्व का पोषक है. सुग्रीव पंपापुर का राजा है. रावण सोने की नगरी लंका का मालिक है. जब ऐसे ऐसे कुबेर एक मंडली के मैनेजर के सामने हाथ फैला रहे हैं तो ऐ सीते, तू अपनी मां पृथ्वी से कह दे कि वह फट जाये ताकि मैं उसमें समा जाऊं.

हनुमान ने कहा - आप तो लीला की बात बता रहे है लेकिन हकीकत यह है कि हम बहुत गरीब है. . . । - चुप रह बंदर ,पूरा अशोक वाटिका खा गया पर भूख नहीं मिटी तो चढ़ौत्री पर नजर गड़ा रहा है. परसुराम - अगर पेट भर जाता तो परेशान क्यों करते ? - तू क्या मेरी परेशानी समझेगा. कूद कूद कर गांव का तख्त तोड़ दिया उसके लिए सरपंच हर्जाना मांग रहा है. अब बता - हर्जाना तेरा बाप भरेगा. दशरथ - असंसदीय भाषा का प्रयोग क्यों कर रहे हो . अपने पास नहीं रखना है तो मत रखिये. कहीं भी नौकरी कर लेगे. - अरे जा, तू बुढ़ा गया है. राम चौथी कक्ष अनुत्तीर्ण है .

रावण ने शाला का मुंह नहीं देखा. तुम जैसे अयोग्य व्यक्तियों को कौन मूर्ख नौकरी देगा. मैनेजर बड़बड़ाता हुआ चला गया. पात्र अगली कार्यवाही करने के लिए विचार विमर्श करने लगे लेकिन उचित रास्ता नहीं दिखा. आखिर अपने अपने घर लौट जाने के लिए सोचा मगर एक के पास भी टिकिट के लिए पैसे नहीं थे. रामदल ने कहा - हो गई क्रान्ति,मिल गया अधिकार . अब घर जाने के लिए रुपये कौन देगा ? रावण दल ने कहा - तुम लोग दोगे. तुम्हारे उकसाने के कारण ही हमने मैनेजर जैसे सज्जन व्यक्ति से व्यर्थ में शत्रुता मोल ली. - अपनी गलती दूसरों पर थोपोगे ही.

राक्षस स्वभाव कहां जायेगा ? - जुबान संभाल कर बातें करो अन्यथा टांगे तोड़ कर रख देगे. - टांगे तोड़ने वाले जरा सामने आकर तो देखो. - लो आते हैं , क्या कर लोगे ? दोनों पक्ष आमने सामने हुए. . युद्ध प्रारंभ हुआ. एक दो लाशें गिर भी जाती कि मैनेजर आ गया. बोला - तुम लोगों का दुश्मन मैं हूं फिर मुझसे न लड़ कर आपस में क्यों लड़ रहे हो ? दोनों पक्षों ने एक दूसरे पर आरोप लगाये और मैनेजर से कहा - आपके साथ विश्वासघात करने का फल भोग चुके. अब से आपके विरुद्ध एक शब्द भी नहीं बोलेंगे. हम क्षमा चाहते हैं. मैनेजर ने लताड़ा - कैसे क्षमा कर दूं. लड़ाई में मेरे बहुत से सामान नष्ट हो गये. उनका हर्जाना कौन भरेगा ? - हम भरेगें , हमारे वेतन से काट लेना. - तो ठीक है,चलो मुढ़ीपार वहां आज से ही रामलीला दिखाना है ।

- जो आज्ञा. . . . । इतना कह सभी पात्र मुढ़ीपार जाने की तैयारी करने लगे.

भंडारपुर करेला व्हाया डोंगरगढ़

जिला राजनांदगांव, छत्तीसगढ़

नूतन प्रसाद शर्मा 

कहानी 

भ्रम निवारण

अष्टावक्र के जीवन की रेल अटक - अटक कर चल रही थी. जिस दिन उसे भिक्षा मिल जाती,वह दीवाली मना लेता कुछ न मिलता तो रह जात भीमसेनी एकादशी का व्रत . एक दिन की बात है - उसके पेट में चूहे धमाचौकड़ी मचाने लगे. उसने आसन लगाया और लगा खीर पुड़ी के सपने देखने. हकीकत में कुछ न मिले मगर सपने में मनचाही वस्तु पा ही सकते हैं . इसी बीच नारद जी पधारे. बोले - यहां क्या झक मार रहे हो. जाओ राजा जनक के पास. वे बड़े दानी है. अपंगों व निराश्रितों के लिए उन्होंने अपना खजाना खोल दिया है. तुम भी लूटपाट करो. अष्टावक्र ने कहा - मेरा राजदरबार में पहचान नहीं है. जिसका कोई माई बाप नहीं उसे कुछ मिलने से रहा. मैं प्रयत्न करके हार गया. वैसे सरकार हम गरीबों पर कृपा ही कर रही है. . . .

यदि वह हमारे जैसो के खाने पीने का प्रबंध ही कर देती तो दर दर सैर करने का ब्रह्मानंद प्राप्त नहीं होता. हम निकम्में हो जाते चर्बी बढ़ती तो शरीर बेडौल हो जाता. देखिए मैं कितना स्वस्थ हूं कि गाल पिचक गये हैं. पेट का पता नहीं. अब हाथ फैलाने का पुनः सलाह दे रहे हैं . मैंने तो कई महानुभवों के आगे हाथ फैलाये लेकिन कुछ हाथ नहीं आया. हां, दो- चार हाथ जरुर पड़े. नारद ने कहा - तुम आदमियों के पास गये ही नहीं. यदि जानवरों के पास जाओगे तो दुलत्ती तो मिलेगी ही. विश्वास नहीं होता है तो मैं चश्मा देता हूं . उसे लगा लो. चश्मा सत्य तथ्य से अवगत करा देगा. नारद ने अष्टावक्र को चश्मा दे दिया. अष्टावक्र चला चश्मा की परीक्षा लेने. वह उन्हीं व्यक्तियों के घर गया जिन्होंने भिक्षा नहीं दी थी. ज्ञात हुआ कि वे राजा जनक के दरबार की ओर गये हैं. अष्टावक्र दरबार की ओर भागा. रास्ते में कुछ लोग मिले. उनके हाथ में कड़कड़ाते नोट थे. अष्टावक्र ने पूछा - तुम्हें ये नोट कहां मिले !

चोरी तो नहीं की. लोगों ने कहा - हम विकलांग हैं. चोरी कैसे कर सकते हैं. हमें लाचार विवश समझ कर राजा ने सहायता दी है. अष्टावक्र की आंखों को आश्चर्य से फटना ही था. पूछा - तुम मेरी खिल्ली तो नहीं उड़ा रहे हो ! तुम न लूले लंगड़े हो न अंधे फिर अपने को विकलांग क्यों बताते हो ? एक ने जवाब दिया - तुम्हारी द्य्ष्टि में मेरी आंखें ठीक है पर मैं अंधा हूं. छात्र नेता गुण्डागीरी करते हैं. श्रमिक नेता श्रमिकों को दिग्भ्रमित करते हैं. धर्माचार्य दंगे कराते हैं. स्त्रियों की इज्जत सरे आम लूटती है मगर मेरी आंखें इन्हें नहीं देख पाती. मैं अंधा हूं. दूसरे ने कहा - रीडर अपने शिष्यों को झूठी पी. एच. डी. देते हैं लेकिन उनके विरोध में मेरे हाथ कभी खड़े नहीं होते इसलिए लूला हूं. अष्टावक्र ने फटाक से चश्मा चढ़ाया. देखा तो उनकी बातें सत्य थीं. अष्टावक्र दरबार में गया. वहां उसे देख दरबारी मुसकाये. अष्टावक्र ने उसका जवाब खिलखिलाकर दिया. दरबारी ठहाका लगाये तो अष्टावक्र ने अट्टहास किया.

ईंट का जवाब दिये बगैर हिसाब किताब बराबर नहीं होता. अष्टावक्र के दुस्साहस को देखकर राजा जनक ने गुस्से में कहा -यह दरबार है, आपका घर नहीं. अष्टावक्र ने कहा - मुझे मालूम है. राज दरबार मे ही तो एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का शुभ कर्म होता है. टांगें खींची जाती है. जूतों की वर्षा होती है. जनक और भभक गये. बोले - इस घृष्टता का जवाब बाद में लूंगा. पहले यह बताओं कि दरबार में आते ही आपको हंसी क्यों आयी. सच- सच बताइये वरना राज दण्ड का सामना करना पड़ेगा. अष्टावक्र ने कहा - मैं कोई जोकर हूं क्या ? मुझे देखकर दरबारियोंने दांत निपोरे. पहले उनसे पूछिये ? जनक ने पूछा तो दरबारियों ने बताया कि हम इनके शरीर की बनावट को देखकर हंसे थे. इसका एक पांव कश्मीर की ओर भाग रहा है तो दूसरा कन्याकुमारी की ओर. अब अष्टावक्र को स्पष्टीकरण देना था. कहा -कीड़ा कीड़ों से भेंट करता है, पक्षी पक्षी से लेकिन मैं मनुष्य होकर जानवरों की सभा में धमक गया तो हंसी आनी ही थी. एक अधिकारी था. वह राजा जनक का बहुत विश्वास पात्र था.

वह अष्टावक्र पर चढ़ने को हुआ कि अष्टावक्र ने कहा - मैं तुम्हें आदमी समझ कर सहायता मांगने गया था पर तुमने दिया कुछ नहीं. तुम पशु हो तो किसी का दुख सुनोगे क्यों !अपनी भूल पर तुम्हारे पास क्षमा मांगने मैं खुद आ रहा था पर तुम मुझ पर पहले से ही चढ़ रहे हो. कुत्ते का स्वभाव कहां जायेगा. . . वह भौकेगा ही ? अधिकारी भन्नाया - होश के साथ बोलिए. मैं कुत्ता हुआ तो कैसे ? अष्टावक्र ने स्पष्ट किया - कुत्ता अपने मालिक के लिए बड़ा ईमानदार होताहै. मालिक जिस व्यक्ति की ओर इंगित कर देता है, कुत्ता उसे ही काटने दौड़ जाता है. वह अपने मालिक को भी भौंकता है मगर उसे सावधान करने कि घर में चोर घुस आया है और आप खर्राटे ले रहे हैं. . . . वैसे ही तुम ईमानदार हो मगर सिर्फ सरकार के लिए. वह जिसकी ओर लुहा देती है, तुम बिना सोचे- समझे उस पर अत्याचार करने दौड़ जाते हो. तुम्हें न्याय - अन्याय से कोई प्रयोजन नहीं. तुम्हें बस शासकीय आदेश का पालन करना है. तुम सरकार के ऊपर नाराज भी होते हो मगर उसे सावधान करने कि होशियार, जनता तख्ता पलटने वाली है और तुम्हें होश नहीं. . . . . . ।

अधिकारी की खटिया खड़ी कर अष्टावक्र उद्योगपति के पास गये. बोले - तुम्हें अपना परिचय ज्ञात है ? उद्योपति ने कहा -अपना परिचय कि स मूर्ख को ज्ञात नहीं होगा. दूसरे लखपति हूं करोड़पति हूं तो मैं पूंजीपति हूं. राष्ट्र की उन्नति के लिए उद्योग स्थापित करता हूं. श्रमिकों का पोषण करता हूं मेरे समानउपकारी मानव कोई है ही नहीं . अष्टावक्र ने कहा - बिलकुल गलत, तुम तो भेड़िये हो भेड़िये. भेड़िया रक्त मांस के अतिरिक्त दूसरे चीजों पर हाथ फेरता ही नहीं. भेड़िये आपस में गहरे मित्र होते हैं. वे एक साथ शिकार करके उसे बांट कर खाते हैं लेकिन रात हुई कि उनका विश्वास एक दूसरे से हट जाता है. वे इस भय में सोते ही नहीं कि मेरी नींद लगी कि मेरे मित्र मुझे मार कर खा जायेगा. . . . . उसी प्रकार तुम और दूसरे उद्योगपति एक पथ के राही हो तुम दोनों ही श्रमिकों को चूसते हो. उनकी संगठन शक्ति को दोनो मिल कर तोड़ते हो मगर रखते हो आपस मे दांत काटी दुश्मनी भी. तुम्हें हमेशा भय बना रहता है कि दूसरा उद्योगपति मेरे कारोबार पर न्यूट्रान बम न पटक दें. . . . . . । उस दरबार में एक बुद्धिजीवी भी था. उसने टांग अड़ायी- आपका विश्लेषण ठीक है, मैं भी यही विचार रखता हूं. अष्टावक्र ने उसे भी उधेड़ा - वास्तव में सियार बहुत धोखेबाज और धूर्त प्राणी होता है बुद्धिजीवी की बुद्धि ठिकाने आ गयी. उसने रोष प्रकट किया - आपने मुझे सियार कहा ?

अष्टावक्र ने स्पष्ट किया -कहा नहीं, तुम शत प्रतिशत सियार हो. सियार चटखारे ले लेकर मांस खाता है. भुट्टा मिल जाये तो उसे भी सफाचट कर कहता है - मैं शुद्ध शाकाहारी हूं. वह खूंखार पशुओं की चमचई करता है कि सरकार, मैं आपका सेवक हूं. जब भी हिंसा करें तो मुझ अहिसंक के लिए जूठन बचा दिया करें. शिकार न मिले तो मुझे बताये. मैं उसके संबंध मे आपको सूचित करुंगा. . . . उसके बाद वह हिरण,चीतल, सांभर के पास जाता है. कहता है - मित्रों, मैं भी तुम्हारे समान असहाय एवं निरीह हूं. हमारा शिकार कभी भी हो सकता है. ऐसे में हमारी प्रजाति नष्ट हो जायेगी. चलो, दुश्मनों को लोहा लें मगर जब लोहा लेने का वक्त आता है तो सियार का पता ही नहीं चलता. वह तो दुम दबाकर भग गया रहता है. . . . वैसे ही तुम बुद्धिजीवी बहादुर तो होते हो और कायर भी. तुम बिना पेंदी के लोटे हो. चित भी मेरा, पट भी मेरा, अंटी मेरे बाप की . ऐसा सिद्धांत तुम्हारा है. एक ओर उ, वर्ग के जूते पालिश कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हो. दूसरी ओर बन जाते हो - निम्न वर्ग के पथप्रदर्शक भी. दुनियां में जितनी प्रतिक्रांतियां हुईं उनमें प्रमुख कारणों में तुम रहे. . . . . . ।

अष्टावक्र के तर्क से राजा जनक बड़े प्रभावित हुए. बोले - मैं आपके चश्में और आपकी बुद्धि को नमन करता हूं. वास्तव में मैं भ्रमित था. इतने दिनों तक मेरी समझ यह थी कि मेरे दरबारी मनुष्य हैं. अब मालूम हुआ कि ये पशु हैं. अष्टावक्र ने कहा - घृष्टता माफ करें हुजूर,यह तो वही बात हुई - पागल अपने को पागल नहीं समझता. वह अपने को बुद्धिश्रेष्ठ बताता है. वैसे ही आप अपने को मनुष्य की गिनती में ले रहे हैं. यह आपका भ्रम है. इन दरबारियों की गलती नहीं. ये अपनी बिरादरी के राजा की सेवा में ही उपस्थित हुए हैं. राजा जनक उत्तेजना के मारे सिंहासन से उछल पड़े. उन्होंने दहाड़ लगायी - क्या बकतें हो ? मैॅ जानवर हूं ? अष्टावक्र ने कहा - हां आप शेर हैं. शेर वन्यप्राणियों का आका होता है. वह ऐलान करता है कि मेरे रहते छोटे प्राणियों को दुख पहुंचाया तोमुझसे बुरा कोई नहीं होगा. मैं उनका रक्षक हूं. . . . . . छोटे प्राणी उसकी बातों पर विश्वास कर लेते हैं कि मुखिया के रहते किसकी हिम्मत जो हमें लाल आंखें दिखाये. . . . . . !

वे निर्भयता पूर्वक कुलांचे भरने लग जाते हैं. इतने में शेर लुकता छिपता उन तक पहुंचता है और उन्हें अपने पेट में डाल लेता है. . . ठीक इसी प्रकार आप भी आकाशवाणी, दूरदर्शन से घोषणा करते हैं - मैं प्रजापालक हूं. मेरे रहते चिंता करने की किसी को कोई आवश्यकता नहीं मगर होता है इससे ठीक उल्टा. आप इस तरीके से प्रजा का अहित करते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता. वह बेचारी आपकी जय जयकार करती रहती है. . . . . ।

अष्टावक्र के वाक्य पूरे नहीं हुए थे कि जनक ने कुटनीति चली - वाह गुरु,आपका चश्मा बड़ा गुणी है. लाओ भला मैं भी लगाकर देखूं. अष्टावक्र ने चश्मा दे दिया. जनक ने चश्मा लगाया. उससे देखा तो वास्तव में दरबार के लोग जानवर दिखें. उन्होंने कहा - मिस्टर अष्टावक्र,अगर आपका चश्मा रहा तो हम कहीं के नहीं रहेंगे. यह हम सबकी पोल निष्पक्ष अखबार की तरह खोल देगा. हम नहीं चाहते कि जनता के बीच बदनाम हों इसलिए इसका तीन सौ दो करना अनिवार्य है ! न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी ! इतना कह राजा जनक ने चश्में को तोड़ फोड़ कर मिट्टी में मिला दिया.

भंडारपुर करेला व्हाया डोंगरगढ़

जिला राजनांदगांव, छत्तीसगढ़

नूतन प्रसाद शर्मा 

कहानी

कर्तव्य परायण

लक्ष्मण अचेत पड़े थे. राम ने हनुमान से कहा - लक्ष्मण अंतिम सांसें गिन रहा है. उसका उपचार होना जरुरी है वरना लोग ऊंगली उठाएंगें कि राम सौतेले भाई है. लक्ष्मण स्वस्थ हो या न हो उन्हें क्या मतलब ! इसलिए तुम डा. सुषेण को इसी वक्त बुला लाओ. हनुमान को क्या, उन्हें आज्ञा पालन करना था. वे तैयार हो गये डा. को लाने. इतने में जामवन्त आ गये. उन्होंने कहा - आप ज्ञानीनाम अग्रगण्यम्, सकल गुण निधानम् कहलाते हैं मगर इस वक्त आपकी बुद्धि घास चरने तो नहीं चली गई ! सुषेण शत्रु राष्ट्र के डाक्टर है. वे लक्ष्मण को जीवन देंगे या मृत्यु ? दुख के कारण राम की मति मारी गई मगर आपको तो कुछ सोचना चाहिए !

हनुमान को होश आया. बोले - आपका कहना ठीक है. शत्रु को छोटा नहीं समझना चाहिए. सुषेण तो विख्यात डाक्टर है. उन्होंने जहर की सुई ही घुसेड़ दी तो उनका कोई क्या कर लेगा ! डाक्टरों को मृत्यु दान करने के लिए ही तो सर्टिफिकेट मिला रहता है. आप ही बताइये, क्या करुं ? जामवन्त ने रास्ता बताया - अयोध्या जाइये न,वहां भरत शत्रुघन है ही. एक क्या अनेक डाक्टर भेज देगें. या चलें जाइये जनकपुर, जनक तो डाक्टरों की फौज ही भेज देंगें. कौन ससुर नहीं चाहेगा कि मेरा दामाद शीघ्र स्वस्थ हो. आखिरी बा त - आप लंका के डाक्टर के सिवा किसी को ला सकते हैं.

आफत मुफत में तो भी नहीं खरीदनी चाहिए. हनुमान ने प्रश्न उठाया -मगर एक बात है, राम ने सुषेण को ही लाने आज्ञा दी है. दूसरे को बुला लाया तो वे नाराज न हो जाये ? छोड़िए, जामवन्त जी, मैं सुषेण को ही ले आता हूं. लक्ष्मण अपने रिश्तेदार थोड़े ही हैं जो चिंता करें. हनुमान चले. वे डाक्टर सुषेण के घर पहुंचे. उन्होंने पूछा - क्या आप ही डाक्टर सुषेण हैं ? सुषेण ने कहा - हां, क्यो कुछ काम है. हनुमान - जी हां, लक्ष्मण काफी सीरियस हैं. उनकी इलाज जरुरी है. आशा है ,आप उन्हें जीवनदान देंगें . सुषेण - किसी को जीवनदान देने का ठेका मैंने नहीं लिया है. मैं तो बस उपचार कर देता हूं . बाकी वह जिये या मरे. हनुमान को विश्वास हो गया कि मेरी आशंका सच में बदलेगी. इतने में मेघनाथ का आना हुआ. वह सुषेण को एक ओर ले गया.

हनुमान समझ गये कि गुप्त मंत्रणा होगी. वे उनकी ओर सरक लिए. मेघनाथ सुषेण से कह रहा था - देखिए, डाक्टर साहब, लक्ष्मण मेरे कट्टर शत्रु में से हैं . मैंने निशान लगाया था कि उनकी पूरी छुट्टी करुं लेकिन असफल रहा. खैर, आधा काम मैंने किया. बचत काम आप करें. पिता जी से कह कर आपको पदोन्नति दिलवाऊंगा साथ ही पुरस्कार भी. सुषेण ने सहमति दी . कहा - मुझे क्या, आज्ञा का पालन करना है. जाल में फंसी मछली को कोई छोड़ता भी है ! हनुमान ने सुना तो सिर पीट लिया. इसके सिवा दूसरा चारा भी तो नहीं था. उनकी इच्छा हुई कि चुप भाग जाये मगर रामाज्ञा की बात याद आयी तो विवश होकर रुकना पड़ा. मेघनाथ और सुषेण की गुफ्तगूं खत्म हो चुकी थी. सुषेण हनुमान के पास आये. बोले -आप बड़े कर्तव्य विमुख हैं. वैसे तो राम काज कीन्ह बिना मोहि कहां बिश्राम का नारा लगाते हैं मगर आराम फरमाने की सोच रहे हैं. चलिए, देर न कीजिए . सुषेण और हनुमान राम के पास आये. सुषेण ने लक्ष्मण की बारीकी से जांच की. कहा - मेरे पास संजीवनी वटी नहीं है.

यदि कोई धवलागिरी क म्पनी से उक्त औषधि ला देता है तो फटाफट उपचार किये देता हूं. राम ने हनुमान को पुनः बुलाया. कहा - तुम डाक्टर साहब के बताये पते पर जाकर दवाई ले आओ. देर करने की जरुरत नहीं. हनुमान चले. वे धवलागिरी कम्पनी में प्रविष्ट हुए. एजेन्ट से कहा -मुझे संजीवनी वटी चाहिए. मगर नकली न हो. एजेन्ट मशीन बन गया - क्या कहते हैं हमारे यहां कि सभी दवाइयां पेटेन्ट एवं विश्वनीय है. एक्सपायरी डेट खत्म होने के बावजूद एक सदी तक चलती है. दुनिया में ऐसी कोई कम्पनी नहीं जो इसकी समता करें. अपनीयोग्यता के कारण इसने कई स्वर्ण पदक जप्त किये. यदि इस कम्पनी को झूठी प्रमाणित कर दे. तो आपको एक लाख रुपये ईनाम मिलेंगे. . . . . ।

यहां वटी ही नहीं रस्म भस्म भी उपलब्ध है. हनुमान ने कहा - मैं संजीवनी वटी की मांग कर रहा हूं और तुम गिनती पहाड़ा पढ़ रहे हो. है या नहीं बताते क्यों नहीं ? एजेन्ट ने कहा - है, मगर कौनसी चाहिए ! यहां हजारो ंप्रकार की संजीवनी वटी हैं. अब तो हनुमान परेशान हुए. सोचा - इधर ये एजेन्ट साफ - साफ बताता नहीं. दूसरी ओर डा. सुषेण मुझे फंसाने की सोच रहे हैं. यदि लक्ष्मण को कुछ हो गया तो कह देंगें - मैंने हनुमान को संजीवनी वटी मंगायी थी. उन्होंने मृत्यु वटी लाकर पटक दी तो मैं क्या करुं ?इस तरह वे सारा दोष मेरे सिर मढ़ देंगे. उससे अच्छा पूरी कम्पनी को ही उखाड़ ले चलता हूं. उन्हें जिस दवाई की जरुरत पड़ेगी, स्तेमाल कर लेंगे. कम से कम मैं तो साफ बच जाऊंगा. सोचा क्या , हनुमान ने पूरी धवलागिरी कम्पनी को जड़ समेत उखाड़ा. उसे लाकर सुषेण के सामने पटक दिया.

सुषेण तत्काल लक्ष्मण का उपचार करने युद्ध स्तर पर भिड़ गये. उन्होंने प्रातः से पूर्व लक्ष्मण को चंगा कर दिया. लक्ष्मण ने हनुमान को देखा तो कहा - मेरा धनुष बाण तो लाना. जरा दुश्मनों के दांत खट्टे करुं. हनुमान अचम्भित रह गये. बोले - आपका उपचार अभी ही हुआ है. कमजोरी होगी. थोड़ा और आराम कर लीजिए लक्ष्मण ने कहा - मैं बीमार तो नहीं कि आराम करुं. मैं एकदम स्वस्थ हूं. हनुमान दौड़े -दौड़े सुषेण के पास गये. बोले - डाक्टर साहब,मैं शर्मिन्दा हूं. मुझे क्षमा करें. सुषेण ने कहा - आपने मेरे साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं किया. न आपकी कोई गलती दिखती तो क्षमा क्यों मांगना ? हनुमान ने कहा - मेरी शंका यह थी कि आप शत्रु- राष्ट्र के डाक्टर हैं.

लक्ष्मण का अहित जरुर करेंगे मगर आपने उन्हें जीवनदान दे दिया. अब आप न पुरस्कृत होंगे न मिलेगी पदोन्नति. अपने ही हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का कारण समझ नहीं आया ? सुषेण ने कहा - डाक्टर का न कोई राष्ट्र, न धर्म, न जाति होती है. वह निर्लोभी, परोपकारी, याने मानवतावादी होता है. उसका कर्तव्य एक ही है कि रोगी को जीवन देने के लिए हर संभव प्रयास करें. मैंने वही किया. हनुमान उनकी आदर्शवादिता के सामने झुक गये. अपने को धिक्कारने लगे मगर वे उस समय सन्न से रह गये जब उन्हें ज्ञात हुआ कि धवलागिरी कम्पनी को डाक्टर सुषेण के नाम चढ़ाने का आश्वासन राम ने दे दिया है.

भंडारपुर करेला व्हाया डोंगरगढ़

जिला राजनांदगांव, छत्तीसगढ़

कहानी

यंत्रणा

सुरेश सर्वेद

मेरे खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज होते ही मैं निकृष्ट जीवन व्यतीत करने लगा. मुझ पर विद्युत कर्मचारी से मारपीट करने का आरोप था. मेरे खिलाफ दो दो धाराएं लगी थी. हालांकि मैंने न मारपीट की थी न ही जान से मारने की धमकी दी थी चूंकि विद्युत कर्मचारी ने आरक्षी केन्द्र में मेरे विरुद्ध रिर्पोट दर्ज करा दी थी अतः मामला बना कर मेरे विरुद्ध कार्यवाही शुरु कर दी गई थी. मेरा प्रकरण न्यायाधीश मित्तल के न्यायालय में विचाराधीन था. लगी धाराओं के अनुसार प्रमाणित होने पर मुझे सात वर्ष तक की सजा मिल सकती थी. सात वर्ष के कारावास की सजा की याद से ही मैं कांप उठता. वैसे तो एक दिन की सजा भी सजा होती है पर मेरे विरुद्ध जो आपराधिक प्रकरण दर्ज किये गये थे. वह तो लम्बे समय तक जेल यात्रा की ओर संकेत कर रहे थे. सुनी सुनायी कहानी यह थी कि कारागृह का न सिर्फ प्रभारी ही अपितु वहां एक सिपाही से लेकर पुराने कैदी तक नये लोगों से वह व्यवहार करते है जो किसी भी स्थिति में उचित नहीं. सिपाही हवलदार और प्रभारी तो पिटते ही हैं वहां के पुराने कैदी भी अपनी बात मनवाने के लिए पिटाई कर देते हैं.

वहां काम भी बेहद लिया जाता है. न करने पर दण्डित किया जाता है. हालांकि मेरे अधिवक्ता तपन मुझे निर्दोष घोषित करवाने कृतसंकल्प थे. जब भी पेशी होती मुझे सांत्वना का अमृत अवश्य पिलवा देते . मुझे उनकी सांत्वना से थोड़ी राहत मिलती मगर क्षण भर बाद ही मैं फिर अपने विचारों में उलझ जाता मुझे हर क्षण यही अनुभव होता कि मेरा अपराध प्रमाणित हो चुका है और मैं कारागृह में सजा भोगने पहुंच चुका हूं. मैं जब भी न्यायालय जातामेरी द्य्ष्टि न्यायालय के भृत्य पूर्णेन्दू पर जा टिकती. मैं उसे हर पेशी में दस रुपये देता. वह उल्टा पुल्टा नामपुकारने में माहिर था. जो पैसा देने में अनाकानी करता उसका नाम बिगाड़ कर पुकार देता और वह व्यक्ति उपस्थित नहीं हो पाता जिसकी पेशी होती. उस पर कार्यवाही शुरु हो जाती. मैं भी डरते रहता कि मेरा भी नाम बिगाड़ के पुकार न दे इसलिए उसे बिना मांगे ही दस का नोट थमा देता. मेरी मुलाकात विकास से हुई. वह अधिवक्ता तपन का मुंशी था. उसने मुझसे कहा कि यदि तुम्हारे अपराध प्रमाणित हो गये तो समझो तुम्हारी नौकरी गयी. मैं सोचने लगा कि इसका कहना गलत नहीं .

नौकरी तो जायेगी ही साथ ही कारावास की सजा भी भोगनी पड़ेगी. कारावास की सजा मिली नहीं कि वे लोग ही मुझसे घृणा करने लगेंगे जो मुझे मान सम्मानदेते हैं. व्यक्ति जब समुद्र में डूबने लगता है तो वह तिनके को ही सहारा समझ कर उससे किनारे लगने की सोचता है पर यह संभव नहीं हो पाता पर आशा नहीं छूटती. यही हाल मेरा था हालाकि मैं यह जानता था कि मुंशी मेरी क्या मदद करेगा वह मुझे क्या बचायेगा बावजूद जाने क्यों मुझे ऐसा लगने लगा कि यही तिनका मुझे किनारा लगा सकता है. मैंने कहा-विकास तुम कोई ऐसा उपाय करो कि मैं बाईज्जत बरी हो जाऊं मेरी नौकरी भी बचेगी और जगहसाई भी. एक मुंशी होकर भी मेरी बात को उसने जिस गंभीरता से लिया उससे मेरा विश्वास उस पर जम गया. जब किसी को सजा होती या दण्ड मिलता तो मुझे लगता उसे निर्णय उसके विरुद्ध नहीं अपितु मेरे विरुद्ध गया है और मैं परेशान हो उठता उस दिन मैं न ढंग से खा पाता था और नहीं रात में चैन की नींद सो पाता था. मगर जब कोई बाईज्जत बरी होता तो मैं खुश हो जाता. उस दिन मैं भर पेट खाता और रात में चैन की नींद सोता. मैं यह जान चुका था कि न्यायालय में जीत उसकी होती है जिसके पक्ष में गवाह गवाही देता है. मुझे सदैव अपने विरोधी गवाह की गवाही पर शक लगा रहता मैं यह मान गया था कि मेरे विरुद्ध गवाही दी जायेगी और मेरा अपराध करना मान लिया जायेगा.

हालांकि मेरे अधिवक्ता अक्सर यह कहा करते थे कि यदि तुम यहां से दण्डित हो गये तो हम आगे के न्यायालय में अपील करेंगे पर मैं तो यहां एक ही न्यायालय के चक्कर काट कर पस्त हो चुका था. दूसरे न्यायालय में अपील करने की सोचना भी मेरे लिए भारी पड़ता था. मन तो कई बार अपने विरोधी गवाह से बात करने की होती मगर बात नहीं कर पाता था. उससे मेरी कोई दुश्मनी भी नहीं थी. हम अक्सर मिलते. उसके सामने होते ही जहां मैं आंखे चुरा लिया करता था वहीं वे चिल्लाकर मुझे नमस्कार किया करता था. मुझे लगता कि वह मुझे सम्मान न देकर मेरी हंसी उड़ा रहा है और कह रहा कि मैं ऐसी गवाही दूंगा कि तुम जिन्दगी भर जेल की हवा खाओगे. यह तो था उसके प्रति मेरे मन का विचार पर वह मेरे बारे में वास्तव में क्या सोचता था यह तो वही जाने पर जिस दिन उसकी गवाही हुई. गवाही के बाद अधिवक्ता तपन ने जिस प्रकार से बातें मुझे बतायी इससे मैं अनुभव कर लिया कि वह मेरा दुश्मन नहीं बना. यानि उसने मेरे विरुद्ध बयान नहीं दिया.

हर पल हर क्षण मैं भयभीत भयाक्रांत रहता . न मैं किसी से ढंग से बात कर पाता था न किसी से खुल कर मिल पाता था. तरह तरह के विचार मेरे मन में उठते रहते. मैं स्वयं को कभी कारावास में पाता तो कभी स्वतंत्र विचरण करते हुए. जिस दिन मेरे प्रकरण का निर्णय होने वाला था. अदालत तो ग्यारह बजे लगती थी मगर मैं नौ बजे ही वहां टिक गया था. अधिवक्ता का अता पता नहीं था. मुझे उस पर गुस्सा आने लगा था. मेरे मन में विचार उठने लगा था कि मेरे अधिवक्ता मेरे विरोधी के पक्ष में तो नहीं चला गया. पर क्षण भर बाद ही अब तक की हुई प्रक्रिया पर विश्लेषण करता तो अपने ही विचार के प्रति मुझे स्वयं पर गुस्सा ही नहीं तरस भी आने लगता. अधिवक्ता अपने सही समय पर पहुंच गये. वे दूसरे पक्षकारों के काम निपटाने लगे. मैं बार बार उससे पूछता मैं निरपराध घोषित होंऊगा या नहीं. मैं बार बार उनके कार्य में अवरोध पैदा करते रहता. कई बार तो वह गुस्सा जाते फिर अपने को नरम करते हुए कहते- हां भई हां,तुम निरापराध घोषित होओगे. मुझे कुछ आवश्यक काम है उसे निपटाने दो. ‘ मैं यह भली भांति जानता था कि मेरे अधिवक्ता जिम्मेदार व्यक्ति है मगर वे जैसे ही किसी दूसरे कार्य से दूसरी ओर जाता तो मुझे लगता कि निर्णय के समय तक ये पहुंच नहीं पायेगें और मुझे सजा सुना दी जायेगी मगर ऐसा नही हुआ. जैसे ही मेरी पुकार हुई मेरे अधिवक्ता पहुंच गये. टाइप राइटर चलने लगा .

मैं जान गया था कि इस टाइप राइटर से मेरा भविष्य लिखा जा रहा है. जैसे जैसे टाइप राइटर की बटन दबती तो कभी मुझे मेरा भविष्य उज्जवल दिखता तो कभी मुझे लगता मेरा भविष्य चौपट होने वाला है. जब मैं चाह रहा था कि जो कुछ भी टाइप किया जा रहा है. उसे मैं देखूं पर क्या यह संभव था. कदापि नहीं. मेरे हाथ पैर शून्य होने की स्थिति में पहुंच चुके थे. मैं मानसिक यंत्रणा झेल रहा था. मेरे अधिवक्ता निश्चिंत थे . मेरा मन निर्णय सुनने बेचैन था. मेरी बेचैनी को कोई महसूस नहीं कर रहा था. निर्णय जैसे ही मेरे पक्ष में आया. मुझे बाईज्जत बरी होने का निर्णय सुनाया गया. मैं इतना खुश हुआ कि अधिवक्ता समेत न्यायाधीश के कदम चूमने का मन हुआ पर मैं उतावला नहीं हुआ. मैंने आभार व्यक्त किया और अपने घर की ओर लौट गया. हालांकि मैं बाइज्जत बरी हो चुका था पर आरक्षी केन्द्र से लेकर न्यायालीन प्रक्रिया में भोगे दिनों की यंत्रणा चाह कर भी मैं नहीं भूल पाता.

साईं मंदिर के पीछे,

वार्ड नं 16

तुलसीपुर राजनांदगांव छत्तीसगढ़

 

खोल न्याय का बंद कपाट

सुरेश सर्वेद की कहानी

नीलमणी भवन के सामने जीप चरमरा कर रुक गयी. वह भवन वनक्षेत्र पाल हिमांशु का था. जीप से आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो के क ई आरक्षक सहित अधीक्षक नित्यानंद नीचे आये. उनकी द्य्ष्टि ने नीलमणी की भव्यता देखी. भव्यता ने स्पष्ट कर दिया कि इसके निर्माण में कम से कम पचास लाख का खर्च आया होगा. विजयानंद का आदेश मिलते ही आरक्षकों ने नीलमणी को घेर लिया. कुछ आरक्षक सहित विजयानंद भीतर गये. उन्होंने भीतर से मुख्य द्वार को भी बंद कर दिया. इस कार्यवाही से भगदड़ मचनी ही थी. आसपास के लोगो का ध्यान इस ओर खींच गया. लोग जिज्ञासा वश नीलमणी भवन के सामने जुट गये. वे आपस में कानाफूंसी करने लगे. भीतर वनक्षेत्रपाल हिमांशु उपस्थित था. विजयानंद ने उसे अपना परिचय पत्र दिखाया. कहा- हमें आपके यहां छापा मारने का अधिकार मिला है. . . ।‘

फिर उन्होंने आरक्षकों को छानबीन करने का आदेश दिया. आरक्षक इधर उधर बिखर गये. हिमांशु को पूर्व से पता चल चुका था कि उसके घर छापा पड़ने वाला है. छापे से पूर्व स्वीकृति पत्र लेना पड़ता है. विजयानंद स्वीकृति लेने वनमंडलाधिकारी चन्द्रभान के पास गये वनमंडलाधिकारी चन्द्रभान वनसंरक्षक सीमांत की बैठक में गये थे. विजयानंद को वहां दौड़ना पड़ा । उन्होंने जब वनमण्डलाधिकारी से वनक्षेत्रपाल के घर में छापा मारने की स्वीकृति मांगी तो वनमण्डलाधिकारी ने शंका व्यक्त करते हुए कहा- स्वीकृति देना मेरे अधिकार क्षेत्र में आता है या नहीं मुझे इसकी जानकारी लेने दो तब ही मैं आपका सहयोग कर पाऊंगा. ‘ विजयानंद शंकित हो गये. उन्हें लगा- वनमण्डलाधिकारी वनक्षेत्रपाल को बचाना चाह रहे हैं. उन्होंने कहा- देखिये,यह शासकीय कार्य है. इसमें आपको सहयोग देना चाहिए. आप समय खराब मत करिये. इस बीच यदि हिमांशु अवैध सम्पति का अफरा तफरी करेगा या कहीं भाग जायेगा तो इसकी जिम्मेदारी आप पर आ सकती है. ‘ चन्द्रभान भला क्यों आफत मोल लेते. उन्होंने स्वीकृति दे दी. हिमांशु को अवसर मिल गया था. उसने बहुमूल्य वस्तुओं सहित पांच सौ ग्राम स्वर्णाभूषण कुछ जमीन के कागजात इधर उधर कर दिया. उसे लगा कि अब वह आर्थिक अपराधी के रुप में नही पकड़ा जायेगा. हिमांशु से विजयानंद पूछताछ करने लगे. यद्यपि हिमांशु निश्चिंतता व्यक्त कर रहा था पर उसकी बुद्धि अस्थिर थी. उसे कंपकंपी छूट रही थी. उसने उत्तर दिया- आपको गलत जानकारी मिली है. मेरे पास अवैध सम्पति नहीं है. ‘

लेकिन हिमांशु का कालाधन पकड़ाता गया. उसके यहां एक करोड़ रुपए की पासबुक मिली . बैंक लाकर से पांच सौ ग्राम स्वर्णाभूषण जप्त हुआ. पचास लाख के जमीन के कागजात पकड़े गये साथ ही नीलमणी भवन तो अवैध सम्पति का साक्ष्य था ही. हिमांशु का अपराध पकड़ा गया. उसके विरुद्ध मामला दर्ज किया गया. उस न्यायालय का न्यायाधीश निर्द्वन्द थे. हिमांशु का प्रकरण दर्ज होते ही उसकी निंदा शुरु हो गयी. अधिकारी मित्र उसकी स्तरीय जीवन पद्धति से जलते थे. उन्हें प्रसन्नता होने लगी. कुछ दिन हिमांशु अधिकारी मित्रों के बीच बैठ नहीं सका. मित्रों से सामना होता तो वे मुस्काते वह भी हिमांशु के लिए असहनीय होता. उसे लगने लगा था कि उनके फंसने से अधिकारी मित्र प्रसन्न है. हां ऐसा ही होता है. व्यक्ति का जीवन सामान्य रहता है तब तक उस पर ऊंगली नहीं उठती. जैसे ही उस पर कष्ट आया या किसी प्रकरण में फंसा तो वह दुनियाँ का सबसे बड़ा अपराधी बन जाता है. उसकी बदनामी शुरु हो जाती है. यह स्थिति हिमांशु के लिए भी उपस्थित हो रही थी. वह अपने अधिवक्ता पल्लवी से मिल कर आ रहा था कि रास्ते में भाविका मिल गयी. वह नगर निगम में आयुक्त थी. हिमांशु उसे देख कर कटना चाहा मगर आमने सामने हो ही गया.

भाविका ने हिमांशु से कहा- तुम्हारे बारे में सुना तो अच्छा नहीं लगा. मुझे तो लगता है- तुम्हारे किसी परिचित जलनखोर ने ही तुम्हें फंसाया है. ‘ भाविका की बातों ने हिमांशु को अप्रभावित रखा. उसने कहना चाहा- तुम मेरे हितैषी नहीं, तुम तो जले में नमक झिड़क रही हो. मेरे फंसने पर तुम्हें भी उतनी ही प्रसन्नता हो रही है जितनी मेरे विरोधियों को. . . ।‘ पर कुछ नहीं कह सका. वह अपनी पीड़ा दबा गया. भाविका आगे बढ़ गयी. वह ठेकेदार कामेश्वर के घर गयी. दरअसल शासन ने पांच स्थानों पर सुलभ शौचालय बनाने की स्वीकृति दी थी. भाविका इसका ठेका कामेश्वर को देना चाहती थी. उसने कहा-तुम्हें पाँच स्थानों पर सुलभ शौचालय का निर्माण करवाना है. जिसके लिए प,ीस लाख की स्वीकृति मिली है. उसमें पांच प्रतिशत मुझे देना पड़ेगा. ‘ कामेश्वर ने भाविका की शर्त स्वीकार कर ली. उनमे इधर उधर की चर्चा होने लगी. इसी मध्य भाविका ने हिमांशु के संबंध में चर्चा करते हुए कहा- मैं तो हिमांशु की कर्तव्य निष्ठा से प्रभावित थी. वह तो भ्रष्ट निकला. वास्तव में वन विभाग ही भ्रष्टाचार का केन्द्र है. जब अपराधी को कठोर दण्ड मिलेगा तभी बेईमानी खत्म होगी. ‘ जब तक व्यक्ति स्वतः फंस नहीं जाता, वह अपने आप को निर्दोष ही मानता है. कामेश्वर को अपना स्वार्थ सिद्ध करना था. वह भाविका की बातों से असहमत होते हुए भी हामी भर रहा था. हिमांशु की अधिवक्ता पल्लवी थी. पल्लवी ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि तुम्हारे विरुद्ध साक्ष्य है. कानूनी कार्यवाही से अपराध प्रमाणित होने के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं. तुम्हें सजा भी हो सकती है. पर तुम घबराना मत यहां हार गये तो हम उ, न्यायालय तक लड़ेगे. . . . ।

हिमांशु सजा की बात सुन कर कांप उठा था. वह परेशान सा रहने लगा. इधर न्यायाधीश निर्द्वन्द अपने बंगले के बरामदे में बैठे थे. उनकी द्य्ष्टि चहचहाती गौरैया चिड़ियों पर थी. वस्तुतः वहां चिड़ियों की पंचायत जुड़ी हुई थी. उसमें काली नामक चिड़िया के विरुद्ध कार्यवाही हो रही थी. दरअसल चिड़ियों ने अन्न के दाने संचय कर रखे थे ताकि भविष्य में अन्न क ा अभाव होने पर उसकी पूर्ति हो सके. काली ने संचित अन्न से आधे को ही चुरा लिया था. सभी चिड़ियां काली के अपराध से उत्तेजित थी. सुनहरी ने कहा- काली का अपराध अक्षम्य है. उसे कड़ा से कड़ा दण्ड मिलना चाहिए. ताकि दूसरी चिड़ियां अपने समाज को हानि पहुंचाने का दुस्साहस न कर सके. ‘ - हमारे समाज की दण्ड संहिता में अपराधी को जान से मारने या एक पैर और चोंच तोड़ने का प्रावधान है. भूरी ने वजनी शब्दों में कहा- यही दण्ड काली को भी मिलनी चाहिए. ‘ पीली गंभीर मुद्रा में बैठी थी. वह पूर्व के नियमों में संशोधन कराना चाहती थी. उसने अपना तर्क प्रस्तुत किया- नहीं,हमें इस लीक से हटना चाहिए. वरना हमारे प्रजाति के लुप्त होने का खतरा बढ़ जायेगा. साथ ही जो प्रजाति बचेगी वह अपंग रहेगी. अतः दण्ड में परिवर्तन आवश्यक है. ‘

पीली के विचारों पर सबने ध्यान दिया. उनमें जोरदार बहस छिड़ी. वे कानून में परिवर्तन करने तैयार हो गये. पंचायत ने अपने निर्णय से काली को अवगत कराया- काली,पंचायत इस निर्णय पर पहुंची है कि तुम्हें शारीरिक दण्ड न दिया जाये. तुमने आर्थिक अपराध किया है. तुम्हें इंक्यावन चोंच अन्न के दाने क्षतिपूर्ति के रुप में लाने होगे. तुम्हें यह निर्णय स्वीकार है या नहीं. . ?‘ काली अपंगता या मृत्यु दण्ड की आशंका से भयभीत थी. पर पंचायत के सौहाद्रपूर्ण निर्णय से उसके प्राण लौट आये. वह मन ही मन प्रसन्नता से बड़बड़ायी-मैं परिश्रम से और पेट काटकर अन्न जमा कर दूंगी. उसने पंचायत से कहा- मुझे कोई आपत्ति नहीं . पंचायत का निर्णय मुझे स्वीकार्य है. ‘ काली अपने कार्य में जुट गयी. उसे अन्न के दाने लाने थे. वह उड़ी तथा न्यायाधीश के बंगले की ओर गयी. वह सीधा पाकगृह में घुसी. न्यायाधीश निर्द्वन्द की जिज्ञासा प्रबल थी. उनकी द्य्ष्टि काली को खोजने लगी. अंततः उसने खोज ही निकाला. काली चांवल के भरे ड्रम पर बैठी थी. काली ने न्यायाधीश को देख लिया. उसने चांवल निकालना बंद कर दिया. वह चुपचाप बैठी दूसरी ओर देखने लगी. तथा वह तिरछी नजर से न्यायाधीश की ओर देखने लगी. न्यायाधीश ने जानबूझ कर द्य्ष्टि दूसरी ओर कर ली. काली को अवसर मिला. उसने चांवल पर चोंच मारा और फूर्र से उड़ गयी. न्यायाधीश देखते ही रह गये. काली को अपने कार्य की सफलता पर प्रसन्नता थी.

न्यायाधीश के भी विचारों में उथल पुथल मचने लगा - हमारी भी न्याय व्यवस्था का जल रुककर गंदा हो गया है. समयानुसार उसका प्रवाहमान होना आवश्यक है. परिवर्तन होना चाहिए तभी मानव समाज को लाभ मिलेगा. आज हिमांशु के प्रकरण का निर्णय था. वह न्यायालय जाने निकला कि नित्यनंदन मिल गया. नित्यनंदन ने कृतज्ञता ज्ञापित करने पहले से नमस्कार किया. हिमांशु ने उसे सम्मान देने हाथ मिलाया. नित्यनंदन वन विभाग में दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी था. वह अस्थायी था. उसे कभी बिठा दिया जाता. कभी काम पर बुला लिया जाता. वह परेशान था. नित्यनंदन ने अपनी समस्या हिमांशु को बतायी. हिमांशु ने दौड़धूप कर नित्यनंदन को स्थायी वनरक्षक का पद दिलवा दिया. इससे नित्यनंदन हिमांशु का आभारी था. नित्यनंदन को ज्ञात था कि हिमांशु का आपराधिक प्रकरण दर्ज है. उसका निर्णय आज है. उसकी द्य्ष्टि हिमांशु पर जा टिकी. वह कह रही थी- इसने मेरी रोजी रोटी की व्यवस्था की. मेरा भविष्य बनाया. मैं इसकी विपत्ति के समय सहायता करने में असमर्थ हूं. हिमांशु वहां से न्यायालय पहुंचा. न्यायाधीश निर्द्वन्द अपनी कुर्सी पर बैठ चुके थे.

वहां भृत्य पक्षकारों की पुकार करने लगा. हिमांशु कारावास की सजा मिलने के डर से भयभीत था. उसकी पुकार हुई तो वह कटघरे में जा खड़ा हुआ. न्यायाधीश निर्द्वन्द उत्साहित दिख रहे थे. मानों किसी विजय यात्रा पर निकले हो. उन्होंने निर्णय दिया- हिमांशु का अपराध प्रमाणित हो गया है. न्यायालय इस निर्णय पर पहुंचा है कि हिमांशु पद पर पूर्ववत बना रहेगा. उसे पदोन्नति का भी अवसर दिया जायेगा. लेकिन उसके वेतन से प,ीस प्रतिशत की कटौती होगी और पेंशन से बीस प्रतिशत. वह धनराशि शासकीय कोष में जमा होगी. ‘ इस निर्णय से हिमांशु ही नहीं अपितु अधिवक्ता पल्लवी भी अवाक रह गयी. कानून में उपरोक्त दण्ड का प्रावधान नहीं था. पल्लवी ने हिमांशु से कहा-न्यायालय का निर्णय तुम्हारे लिए हानिकारक है. तुम्हारा वेतन कटेगा. पेंशन में भी कटौती होगी. तुम क्या खाओगे. तुम्हारा भविष्य अंधकार में चला जायेगा. इसके विरुद्ध तुम उ, न्यायालय में मुकदमा लड़ो. तुम्हें बचाने मैं हर संभव प्रयास करुंगी. तुम निरपराध सिद्ध होकर रहोगे. हिमांशु को अधिवक्ता का कहना अपने पक्ष में लगा. उसके बहकावे में आता कि उसे न्यायालय की दौड़धूप का स्मरण आ गया. उसे कई पेशी दौड़नी पड़ी थी. आर्थिक हानि तो उठानी पड़ी साथ ही मानसिक त्रासदी के साथ समय भी गंवाना पड़ा था. अब वह इस क्रमबद्धता को दुहराना नहीं चाहता था. उसने सोचा-अपराध प्रमाणित होने पर भी मेरी नौकरी नहीं गयी. कारावास का दण्ड नहीं मिला. हां,वेतन और पेंशन में कटौती होगी. मैं उ,स्तरीय जीवन यापन से वंचित रहूंगा लेकिन निकिृष्ट जीवन तो जीना नही ंपड़ेगा और फिर पदोन्नति के लिए भी तो बाधक नहीं है. उसने उ, न्यायालय मे अपील करने की बात अस्वीकार कर दी. हिमांशु के प्रकरण की जानकारी भाविका को मिली.

वह सकते में आ गयी. वह विचारने लगी- जो व्यक्ति घूस देता है वही पकड़वा देता है. मुझे भी किसी ने फंसा दिया तो प्रकरण दर्ज होगा. अपराध प्रमाणित होने पर वेतन कटेगा. उसके विचार ने दूसरा पहलू बदला-शासन आराम से मुझे खाने पीने लायक परिवार चलाने लायक रुपये दे रहा है फिर घूंस लेकर कर मुसीबत मोल लेने का प्रयास क्यों करुं ? वह कामेश्वर के पास गयी. कहा- देखो,सुलभ शौचालय को मजबूत और टिकाऊ बनाना है. उसमें उ, स्तर का छड़ सीमेंट ईंट लगना चाहिए. रुपये जनता के है. जनहित में कार्य होना चाहिए. अगर किसी प्रकार की धांधली हुई या शिकायत मिली तो बिल रोक दूंगी. ‘ कामेश्वर क्षण भर भाविका का मुंह ताकता रहा. उसमें शंका उत्पन्न हो गयी-भाविका को अधिक प्रतिशत देने वाला कोई दूसरा ठेकेदार तो नहीं मिल गया. उसने कहा- यदि आपको पांच प्रतिशत कम पड़ रहे हैं तो मैं और बढ़ा सकता हूं. ‘ - मुझे लेन देन से मतलब नहीं है. बस रुपयों का सदुपयोग होना चाहिए. ‘ भाविका अपनी बात पर अटल थी. अंततः कामेश्वर को उसकी बात माननी ही पड़ी. कहा- ठीक है. आपकी मंशा के अनुरुप ही सुलभ शौचालय बनेंगे. ‘ भाविका को लगा कि अपराध के फंदे से उसका गला मुक्त हो गया. साथ ही उसके वेतन की कटौती नहीं हो रही है. . . . . ।

न्यायाधीश निर्द्वन्द जितने भी निर्णय दे रहे थे वह द. प्र. सं. के अनुसार न होकर स्व विवेक से लिये गये निर्णय के अनुसार था. उनके निर्णय स्वस्थ और मौलिक थे. वे आरोपियो के हित में थे. लाभकारी निर्णय पक्षकारों पर भारी नहीं पड़ रहा था. पर अधिवक्ताओं को इसमें अपना अहित दिखा. पक्षकार दण्डित होने पर उसे सहजता से स्वीकार कर लेते. वे उकसाने पर भी आगे मुकदमा लड़ने से इंकार कर देते. साथ ही वे अधिवक्ताओं से बचने लगे. इससे अधिवक्ताओं की रोजी रोटी छिनने लगी. उन्होंने न्यायाधीश निर्द्वन्द का विरोध करना शुरु कर दिया. अपना प्रभुत्व पुनः स्थापित करना था अतः वे षड़यंत्र रचने लगे. इसे कार्य रुप में परिणित करने वे कानून का सहारा लेने लगे. अधिवक्ताओं का संघ था. उसने न्यायाधीश निर्द्वन्द की कार्य विधि के विरुद्ध उ, न्यायालय में याचिका दायर कर दिया. दायर याचिका में कहा गया कि न्यायाधीश निर्द्वन्द ने न्याय प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया है. उन्होंने शासन के संहिता के अनुरुप निर्णय न देकर घर का कानून लागू कर दिया है. उनका निर्णय दप्रस के अनुसार नहीं है. इससे दप्रस की अवमानना हुई है. उनकी मनमानी से लगता है कि उनकी बुद्धि विक्षिप्त हो चुकी है.

न्यायपालिका का भविष्य खतरे में है अतः न्यायाधीश निर्द्वन्द को निर्णय देने के अधिकार से वंचित रखा जाये. अधिवक्ता संघ के कर्मों की जानकारी न्यायाधीश निर्द्वन्द को मिली. वे विचलित हो उठे. वे अंर्तसोच में पड़ गये- क्या मेरी बुद्धि विक्षिप्त हो चुकी है ? ‘ उन्होेने अपने निर्णय का विश्लेषण किया. पुनर्परीक्षण से दिया गया निर्णय सही लगा. पर उन्हें बुद्धि विक्षिप्तता पर अभी भी शक था. वे परीक्षण कराने मनोचिकित्सक अनुश्री के पास पहुंचे. वहां सचिन भी था. वे न्यायाधीश के निर्णय से अवगत हो चुके थे. अनुश्री ने सचिन से कहा-न्यायाधीश निर्द्वन्द ने न्यायक्षेत्र में नया रास्ता खोला है. इससे दण्डित व्यक्ति अपराध की ओर उन्मुख नहीं होगा. वह समाज से अपमानित-उपेक्षित भी नहीं होगा. हर स्थिति में न्यायाधीश क ी बुद्धि कौशल एवं विवेक को प्रतिष्ठा मिलनी ही चाहिए. ‘ न्यायाधीश निर्द्वन्द ने मनोचिकित्सक के मुंह से अपनी बुद्धि स्वस्थता की प्रशंसा सुनी. वे पूर्ण आश्वस्त हो गये. उन्हें किसी प्रकार के परीक्षण कराने की आवश्यकता नहीं थी. वे मनोचिकित्सक से मिले बगैर ही लौट गये. यद्यपि न्यायाधीश निर्द्वन्द की विचारधारा की प्रशंसा यत्र तत्र सर्वत्र हो रही थी पर अधिवक्ता संघ द्वारा दायर याचिका की याद आते ही उनका चित्त छिन्न-भिन्न हो जाता. उस रात उनकी आँख देर से लगी. स्वप्न में उन्होंने स्वयं को न्यायालय में पाया. वे वहां एक न्यायाधीश के रुप में नहीं अपितु एक अभियुक्त के रुप में वहां उपस्थित थे. न्याय की कुर्सी में न्यायाधीश प्रेमपाल बैठे थे.

न्यायालय ने उनसे पूछा-आपने नियमों का उल्लंघन करके दप्रस की अवमानना की है. आप अपराध पर अंकुश लगाने नियुक्त हुए है पर स्वयं आपने अपराध किये है. आप अपराधी है ? ‘ न्यायाधीश निर्द्वन्द छटपटा उठे. उन्होंने कहा- नहीं,मैं अपराधी नहीं. मैंने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा में कार्य किया हैं. न्यायाधीश का कर्म अपराधियों को दण्डित करना ही नहीं है. वे व्यक्ति को सही दिशा देने और स्वस्थ समाज निर्मित करने नियुक्त होते है. . . . । चिकित्सक रोगी की प्राण रक्षा के लिए दवाईयाँ बदल देता है. अध्यापक विद्यार्थी को उत्तीर्ण करने कृपांक देता है तो जनहित में दण्डसंहिता में परिवर्तन क्यों संभव नहीं. मैने कानूनों की पुस्तकों के अनुरुप निर्णय न देकर भी न्यायापालिका की शाख बढ़ाई है. मैं निरपराध हूं. . . . . . . . . । ‘ अचानक उनकी नींद टूट गयी. यद्यपि स्वप्न के द्य्ष्य लुप्त हो गये पर वे असुरक्षा के भय से मुक्त नहीं हो पाये. स्वतंत्र न्यायपालिका में पदस्थ होकर भी वे चारों ओर से घिर गये थे. दूसरे दिन न्यायाधीश निर्द्वन्द ने अपने द्वारा दिये निर्णय की प्रतियां उ, न्यायालय को भेज दी. ताकि उसमें निष्पक्ष मंथन हो सके. साथ ही त्यागपत्र भी प्रस्तुत कर दिये. उ, न्यायालय ने न्यायाधीश निर्द्वन्द के प्रपत्रों और अधिवक्ता संघ की याचिका को उ,तम न्यायालय को विचारार्थ प्रेषित कर दिया. उ,तम न्यायालय जांच कार्य में संलग्न हो गया. उसने तीन न्यायाधीशों की एक खण्डपीठ बिठायी. खण्डपीठ ने प्रश्न रखा- न्यायाधीश के निर्णय से क्या शासन और समाज पर आर्थिक बोझ पड़ा? उनका अहित हुआ? ‘

उत्तर मिला- नहीं,न्यायाधीश के निर्णय से अभियुक्तों को कारावास नहीं हुआ. कारागृह में बंदियों की संख्या कम हुई. इससे शासन के खर्च में बचत हुई साथ ही उसे नकद लाभ भी मिला. पक्षकारों ने दण्डीत होने के बावजूद अपील करने से इंकार कर दिये इससे स्पष्ट होता है कि निर्णय अनुचित नहीं. इससे न्यायालय में प्रकरणों ंकी संख्या कम हुई. न्यायालय में पड़े प्रकरणों को समय पर निदान का अवसर मिलेगा. ‘ प्रश्न- क्या अपराधी को उचित दण्ड नहीं मिला? क्या आपराधिक कार्यों को बढ़ावा मिला ? ‘ - नहीं, आपराधियों को उचित दण्ड ही मिला, यही कारण है कि अपराध की संख्या में कटौती आयी हैं । अधिकारी वर्ग में धन संचय का भय व्याप्त है । उनमें वेतन और पेंशन कटौती का दहशत है । अन्य आपराधिक प्रवृत्तियों में भी गिरावट आयी है ।‘ खण्डपीठ ने न्यायाधीश निर्द्वन्द से कहा - आपके प्रकरण पर खण्डपीठ विचार कर रही है । कार्यवाही पूर्ण होने पर आपको सूचना दी जायेगी । आप अपने पद पर रह कर कार्य करें . . . . . . ।‘

साईं मंदिर के पीछे,

वार्ड नं 16

तुलसीपुर राजनांदगांव छत्तीसगढ़

दया मृत्यु

सुरेश सर्वेद

तुलसीपुर, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

स्कड प्रक्षेपास्त्रों को आकाश में ही नष्ट करने पैट्रियड का अविष्कार हो चुका हैं पर तार पेट्रोल और बेल्ट बम धड़ल्ले से प्रयुक्त हो रहे है. आतंकी अपनी कमर में बेल्ट बम बांध कर जाता है और बटन दबाकर विस्फोट कर देता है. इससे लाशें बिछ जातीं हैं. यद्यपि मेटल डिटेक्टर बमों की उपस्थिति की जानकारी देता है पर उन्हें तत्काल नष्ट नहीं कर पाता. इसी विषय को लेकर वैज्ञानिकों की ‘ विज्ञान भवन ‘ में बैठक थी. वहां आकाश और नीलमणी भी उपस्थित थे. नीलमणी ने अपनी बात रखी - ‘ मित्रों,हम एक ऐसे बम का निर्माण करें कि बमों की उपस्थिति का पता तो लगे साथ ही वे तत्काल निष्क्रिय भी हो जाये. साथ ही अपराधी की पहचान भी बता दें. . . . ।‘

वैज्ञानिक गंभीरता पूर्वक विचार कर ही रहे थे पर उन्हें प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा था . उधर आकाश के ओंठो पर मुस्कान थी. दरअसल उसने पूर्व में ही इस विषय पर विचार किया और उसने ‘सेफ्टी लाइफ‘ नामक यंत्र बनाने का काम भी प्रारंभ कर दिया. इस यंत्र में उपरोक्त चिंतन के समस्त उत्तर समाहित थे. आकाश ‘सेफ्टी लाइफ‘ बनने के बाद वैज्ञानिकों को हतप्रभ करना चाहता था इसलिए उसने अपने अनुसंधान की चर्चा अब तक कहीं नहीं की थी. अभी वैज्ञानिक चिंतन कर ही रहे थे कि एक धमाका हुआ. दरअसल प्रणव उ, शिक्षा प्राप्त युवक था. वह शासकीय सेवा में नहीं था. उसने कई विषयों पर वैज्ञानिक द्य्ष्टि से शोध किया था. उसने अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन करना चाहा पर उसकी बातों को सबने हंसी में उड़ा दिया. संवादहीनता और उपेक्षा के कारण उसकी प्रतिभा दबती गई. इससे क्षुब्ध होकर वह एक हिंसक गुट में शामिल हो गया. उस गुट का नाम ‘क्रांतिकारी चीता दल ‘ था. जिसे संक्षिप्त में ‘ क्राचीद ‘ कहा जाता था. उस गुट मे कानून विद् ऋषभ , अर्थशास्त्री विश्वास जैसे अनेक लोग थे. विश्वास को पकड़ने के लिए सरकार ने दस लाख का पुरस्कार रखा था.

‘ क्राचीद ‘ आर्थिक द्य्ष्टि से कमजोर था. विश्वास चाहता था कि रुपये ‘ क्राचीद ‘ के काम आयेउसने स्वयं को पकड़वाने के लिए पुलिस को अपना पता दे दिया. साथ ही कहा कि पुरस्कार के रुपये प्रणव को मिले. पर सरकार ने विश्वास को गिरफ्तार तो करवा ली मगर पुरस्कार की राशि प्रणव को देने के बजाय उसकी खोज बीन शुरु कर दी इसकी खबर जैसे ही प्रणव को लगी वह छिपे -छिपे रहने लगा. उसमें उग्रता आ गई थी. उसे जैसे ही विज्ञान भवन में वैज्ञानिको की बैठक होने की सूचना मिली. वह बेल्टबम कमर में बांध कर ‘विज्ञान भवन ‘ में जा पहुंचा और बटन दबा दिया इससे जोरदार धमाके के साथ विस्फोट हुआ . इस विस्फोट से सात वैज्ञानिको के अंग क्षत -विक्षत हो गए. नीलमणी की टांगे और भुजाएं शरीर से अलग हो गयी. प्रणव का शरीर कई टुकड़ों में बंट गया. प्रणव ने दूसरों के तो प्राण लिया पर स्वयं के प्राणों की रक्षा नहीं कर सका. आत्मघाती का भयावह पक्ष यही होता है कि वह दूसरों पर हमला करने से पूर्व स्वयं को मृत समझता है. घायल और बेहोश वैज्ञानिकों को अस्पताल लाया गया. उसमें आकाश भी था. उसके शरीर से छर्रे निकाले गये. रक्त देकर उपचार की व्यवस्था की गई. कई घण्टों बाद उसकी चेतना लौटी.

चेतनावस्था में आते ही आकाश पीड़ा से छटपटा उठा. चिकित्सकों ने उसे ढाढस बंधाया पर सहानुभूति से उसकी पीड़ा खत्म नहीं होनी थी. उसकी व्याकुलता को देखना सामर्थ्य से बाहर था. यद्यपि आकाश का सतत उपचार चल रहा था पर कोमल स्थल पर चोंट लगने के कारण उसकी पीड़ा ज्यों की त्यों बनी हुई थी. आकाश ‘सेफ्टी लाइफ ‘ को पूरा करना चाहता था इसके लिए वह जीना चाहता था पर असहनीय पीड़ा ने उससे जीने का साहस छीन लिया था. अब वह मृत्यु चाहने लगा था. उसने अपने अधिवक्ता सुमन के द्वारा न्यायालय में ‘ दयामृत्यु ‘ के लिए आवेदन कर दिया. ‘दयामृत्यु ‘ एक जटिल प्रश्न है. विश्व की न्याय पालिका असमंजस में है कि दयामृत्यु दी जाये या नहीं. आवेदन प्रस्तुत होने के बाद शासकीय अभिभाषक बालकृष्ण ने इसका विरोध किया. कहा-न्यायालय को दयामृत्यु की छूट नहीं देनी चाहिए. यदि न्यायालय दयामृत्यु को इजाजत देना शुरु कर दिया तो इसका दुष्परिणाम यह होगा कि चिकित्सक अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटेगे. वे असाध्यरोग से ग्रस्त व्यक्तियों और वृद्धों को स्वस्थ करने की जिम्मेंदारी से पीछे हटेगें. व्यक्ति सामान्य से रोग को लेकर बवाल पैदा करेगा और छोटे छोटे रोगेा से मुक्ति पाने दयामृत्यु की मांग करेगा जबकि ऐसे रोगों का उपचार से निदान संभव होगा. आकाश के अधिवक्ता सुमन ने अपना पक्ष रखा. कहा-शासकीय अभिभाषक का तर्क ग्राह्य है लेकिन जिसका जीवन मृत्यु से बदतर हो. भविष्य कष्ट के सागर में गोते खा रहा हो,वह दयामृत्यु पाने का अधिकारी है. जहां तक मेरे पक्षकार आकाश की बात है तो वर्तमान में वह इसी वर्ग में आता है. न्यायालय से निवेदन है कि वह मेरे पक्षकार की स्थिति को देखते हुए उसके आवेदन पर सहानुभूति पूर्वक विचार करने की कृपा करें.

माननीय न्यायाधीश नागार्जुन ने वकीलों के तर्को को गंभीरता पूर्वक सुना. वे स्वयं आकाश की स्थिति को देखना चाहते थे ताकि निर्णय देने में आसान हो . वे अस्पताल परिसर पर पहुंचे कि एक पीड़ायुक्त चीख से वे ठिठक गये . उन्होंने उस पीड़ायुक्त चीख के संबंध में जानना चाहा तो उन्हें बताया गया कि यह चीख आकाश की है. आकाश की तड़पन और व्याकुलता ने न्यायाधीश को झकझोर कर रख दिया. उन्होंने आकाश के ‘दयामृत्यु ‘ के आवेदन को स्वीकृति दे दी. आवेदन स्वीकृति की चर्चा दावानल की तरह फैली. इसका समाचार चन्द्रहास को मिला. वह बेचैन हो गया. चन्द्रहास ‘ मानव सुरक्षा संघ‘ संस्था से संबन्धित था. यह संस्था ‘मासुस ‘ के नाम से चर्चित था. उसमें भी अनेक प्रतिभावान व्यक्ति शामिल थे. मासुस के सदस्य हिंसा एवं आतंकवाद के विरोधी थे. वे क्राचीद के हिंसक प्रवृत्ति क ी आलोचना करते. उनका मानना था कि व्यक्ति हिंसा करने के बाद अपने मूलउद्देश्य से भटक जाता है. वह समाज का हितैषी बनने के बदले समाज का शत्रु बन जाता है. उसे छिपकर रहना पड़ता है तो वह अपनी विद्या या अनुसंधान को कहीं बता नहीं पाताऔर इस तरह वह अपने हाथों अपनी प्रतिभा को नष्ट कर लेता है. मासुस का कहना था कि क्राचीद अपने कार्यशैली में बदलाव लाकर समाज हितार्थ कार्य का सम्मादन करें. आकााश के द्वारा बनाया जा रहा सेफ्टी लाइफ की जानकारी चन्द्रहास को थी.

यदि आकाश की मृत्यु हो जाती तो सेफ्टी लाइफ का कार्य अधर में लटक जाता. चन्द्रहास ने ‘मासुस ‘ के सदस्यों की बैठक रख कर कहा कि किसी भी स्थिति में आकाश को जीवित रखना है. इसके लिए चाहे कोई भी कदम उठाना क्यों न पड़े ? इधर न्यायालय ने आकाश को दयामृत्यु देने डा. महादेवन को नियुक्त किया था. डा. महादेवन अस्पताल जाने निकला ही था कि उसका पुत्र सौरभ सामने आ गया. वैसे सौरभ उसका सगा पुत्र नहीं था. एक महिला अस्पताल में आयी. वह गर्भवती थी. उसने सौरभ को जन्म दिया और उसे वहीं छोड़ कर कहीं चली गयी. सौरभ का कोई पालक था नहीं इधर डा. महादेवन की एक भी संतान नहीं थी. उसने सौरभ को अपने पास रख लिया और उस पर पिता का प्यार उड़ेलने लगा. सौरभ ने रुष्ट स्वर में कहा- पापा, आप मुझ पर कभी ध्यान नहीं देते . सदैव मरीजों के पीछे भागते रहते हैं. आपको दूसरों की जान बचाने की ही चिंता रहती है. सौरभ के आरोप से महादेवन विचलित नहीं हुआ. उसने प्यार का हाथ उसके सिर पर फेर कर आगे बढ़ लिया. . . . . । दवाई के दुष्प्रभाव से धंनजय की मृत्यु हो गयी. इससे डा. महादेवन को जनाक्रोश का सामना करना पड़ा. उसे हत्यारा तक कहा गया. महादेवन को मानसिक त्रासदी भोगनी पड़ी. उसे अपमानित भी होना पड़ा मगर उसमें न हीनता आयी और न हताशा आया क्योंकि उसने जो दवाई मरीज को दिया था वह उसके जीवनदान के लिए थी मगर उसका प्रभाव उल्टा पड़ा. आज महादेवन विचलित था उसे ऐसे व्यक्ति को मारना था जिसने न उसका अहित किया था और न उससे किसी प्रकार की शत्रुता थी. डा. महादेवन आकाश के पास पहुंचा. आकाश ने उसे देखा. महादेवन को लगा -आकाश व्यंग्य कर रहा है. कह रहा है- आओ डा. ,आओ. तुम उपचार करके मेरी पीड़ा तो खत्म नहीं कर सकते. हां,अपनी जिम्मेदारी को कायम रखने मुझे मार अवश्य सकते हो. . . . ।

डा. महादेवन मन ही मन बड़बड़ा उठा- हां-हां,मैं तुम्हें अवश्य मारुंगा. . . . . । डा. महादेवन अपना कार्य प्रारंभ करना चाहता था. वह आकाश के पास गया. उसका साहस जवाब देने लगा. उसने साहस संचय करने का प्रयास किया. मगर वह अपने को असहाय सा महसूस करने लगा. वह मन ही मन बड़बड़ा उठा-यह व्यक्ति मेरा लगता ही क्या है. न्यायालय ने मुझे इसके प्राण हरने का आदेश दिया है. मैं न्यायालय के आदेश का निरादर कर न अपनी नौकरी खोना चाहूंगा और न ही इसे जीवन दान देकर हंसी का पात्र बनाना चाहूंगा. मृत्यु मशीन को आकाश के पास लाया गया. डा. महादेवन को अब बस बटन दबाना था. उसके हाथ बटन के पास पहुंचा कि लगा-‘लकवा मार गया. उसकी बटन दबाने की शक्ति जाती रही. ‘ डा. महादेवन चुपचाप कमरे से बाहर निकल गया. कमरे से बाहर आते ही उसे लगा - सिर से भारी बोझ उतर गया. उसने शान्ति का अनुभव किया. न्यायालय के आदेश नहीं मानने के कारण डा. महादेवन को निलम्बित कर दिया गया . उसके स्थान पर डा. सुरजीत को यह कार्य सम्पादन करने की जिम्मेदारी सौंप दी गई. ‘मासुस ‘ अपने उद्देश्य की सफलता के लिए योजना बनाने लगे. वह वहां से आकाश को हटाकर एक लाश को चुपचाप रख दिया. इस सफलता से मासूस के सदस्य प्रसन्न थे.

इधर डा. सुरजीत को अपना कार्य संपन्न करना था. वह जब आकाश के पास गया तो उसने पाया वह चुपचाप पड़ा है. डा. सुरजीत ने उसका चेहरा तक नहीं देखा और लाश को आकाश समझ उसके भुजा में एक सुई चुभोयी. इससे खारा जल प्रविष्ठ हुआ. फिर उसने मृत्यु मशीन का बटन दबा दिया कि सुई के द्वारा उसके हृदय में दर्दनाशक प्रशामक द्रव्य प्रवाहित हुआ अंत में घातक पोटेशियम क्लोराइड प्रवेश कर गया. बाद में उसे मृत घोषित कर दिया गया. न्यायालयीन कार्यवाही के अनुसार तो आकाश की मृत्यु हो चुकी थी पर वास्तव में वह जीवित था. उसे तो ‘मासुस ‘ ने पूर्ण सुरक्षा के साथ अपने पास रखा था. मासुस आकाश का उपचार अपनी विधी से करने लगा. उपचार से आकाश स्वस्थ हो गया. वह पुनः ‘ सेफ्टी लाइफ ‘ को पूरा करने जुट गया. एक अवसर ऐसा आया कि उसने सेफ्टी लाइफ को पूर्णरुप देने में सफलता हासिल कर ली. मासुस को समय -धन-बुद्धि का व्यय करना पड़ा था. इसका पुरस्कार यह मिला कि ‘सेफ्टी लाइफ ‘ के निर्माण में उसके योगदान को महत्वपूर्ण माना गया. कर्तव्य के निर्वहन में उदासीनता के आरोप से डा. महादेवन बच नहीं पाया था. उसकी जीविका छीन गई थी. उसे आर्थिक कठिनाइयों से जूझना पड़ रहा था. एक दिन उसे पता चला कि आकाश तो जीवित है. वह आकाश की खोज करने लगा और उसने आकाश को पा ही लिया. उसने आकाश से कहा- तुम यहां छिपे बैठे हो. तुम्हारे कारण मेरी नौकरी गई. लोग मुझे कायर की संज्ञा दे रहे है. तुमने मानवहित के लिए ‘सेफ्टी लाइफ बनाया है. इसे अंधेरे में न रखो. इसे प्रकाश में लाओ और साथ ही मेरी जीविका वापस दिलवाओ. ‘ आकाश को अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करना था. साथ ही डा. महादेवन को न्याय दिलाना था. वह न्यायालय जाने तैयार हो गया. . . ।

‘ क्राचीद‘ के सदस्य ऋषभ ने एक पुस्तक लिखी थी. उसका नाम ‘न्याय और अधिकार चाहिए‘ था. उस पुस्तक में ‘ दयामृत्यु‘ पर भी विचार कि या गया था कि किस परिस्थिति में दयामृत्यु को स्वीकृति देनी चाहिए . उसने उक्त पुस्तक को कानूनविदों को पढ़ाया मगर उसे सम्मान न मिलकर उसकी लेखनी को हंसी में उड़ा दिया गया. इससे वह आक्रोशित हो गया और ‘क्राचीद में शामिल हो गया. चूंकि वह ‘क्राचीद ‘ का सदस्य थाउसमें उग्रता कूट कू ट कर भर गयी थी. व्यक्ति वातावरण और संगति के अनुसार व्यवहार करने लगता है अतः ऋषभ अवहेलित हुआ था तोउसमें उग्रता आ ही गयी थी. उसने सोचा-जब मुझे कहीं न्याय नहीं मिला तो क्यों न न्यायालय को ही उड़ा दूं ? ऋषभ ने कमर मे बेल्टबम बांधा और न्यायालय जा पहुंचा. आकाश भी डा. महादेवन के साथ वहां उपस्थित था. ऋषभ ने न्यायालय को उड़ाने बटन दबाया. बार-बार बटन दबाया पर विस्फोट नहीं हुआ. वस्तुतः आकाश के पास सेफ्टी लाइफ थी. उसके कारण बेल्टबम निष्क्रिय हो गया. ऋषभ बेल्टबम पर खींझ गया अचानक उसकी नजर आकाश की ओर गयी. उसन े देखा-वह मुस्करा रहा है कार्य की असफलता से वह खीझा तो था ही उल्टा आकाश को मुस्कराते देख उसका क्रोध फनफना उठा. वह आकाश की ओर कीटकीटा कर दौड़ा. आकाश चिल्ला पड़ा- ‘ इसे पकड़ो,इसके पास बेल्ट बम है. ‘ न्यायालय में देखते ही देखते भगदड़ मच गयी.

ऋषभ प्राण बचाकर भागना चाहा पर वह पकड़ा गया. न्यायालय ने आकाश को जीवित देखा तो अवाक रह गया. न्यायालय में विचार उठा-यह पीड़ित जीवन जी रहा था. यदि इसके आवेदन को न्यायालय द्वारा अमान्य कर दिया जाता तो स्वच्छ न्याय नहीं होता लेकिन इसे दयामृत्यु दी वह भी एक भूल थी क्योंकि यदि यह मर जाता तो मानव कल्याण के लिए जो कार्य इसने किया है वह नहीं हो पाता. न्यायालय ने स्वयं से प्रश्न किया कि उसका निर्णय सही था या गलत कोई तो बताये. . . . ।‘

न्यायालय दुविधा में था कि ऋषभ ने अपनी पुस्तक न्यायालय को सौंपते हुए कहा-सर,सदा से यही चला आ रहा है. मेरे समान अपराधी पकड़ा जाता है. उस पर न्यायलयीन कार्यवाही होती है और अपराध प्रमाणित होने की स्थिति में उसे दण्ड दे दिया जाता है. चाहे अपराध करने के पीछे कारण कुछ भी क्यों न हो. क्या यह प्रथा चलती ही रहेगी. ‘ न्यायालय ने कहा- नहीं. . नहीं,अब ऐसी कहानी बार-बार नहीं दुहरायी जायेगी. उन्होंने पुस्तक की ओर इंगित करते हुए कहा- ‘ सेफ्टी लाइफ ‘ ने अपनी प्रतिभा का प्रमाण प्रस्तुत कर दिया. अब इसकी योग्यता को कौन नकार सकता है. यदि यह पुस्तक अपने उद्देश्य में सफल रही तो इसका सम्मान होकर रहेगा. . . . . ।

साईं मंदिर के पीछे,

वार्ड नं 16

तुलसीपुर राजनांदगांव छत्तीसगढ़

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कुण्डलिया - बंजर पड़ी जमीन है

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१.

बंजर पड़ी जमीन है, धधक रही सम आग।

दस्तक देती आपदा, जाग मनुज अब जाग॥

जाग मनुज अब जाग, नीर को रक्षित कर ले,

भरा पात्र में खूब, जरा नयनों में भर ले।

छीन रहा है चैन, भयानक है ये मंजर,

पिसने को मजबूर, सिसकता जीवन बंजर॥

२.

सूखा आमंत्रित हुआ, हरियाली के दाम।

लालच ने साजिश रची, किया स्वार्थ ने काम॥

किया स्वार्थ ने काम, सुने बिन अंतर्मन को,

लगा दिया ही दाग, चेतना के दामन को।

घुसा सभी में आज, हवस का दानव भूखा,

लाज-शर्म का स्रोत, पड़ा है जबसे सूखा॥

३.

समझाते पुरखे रहे, पानी है अनमोल।

हँसी उड़ाई आपने, आज हुए गुम बोल॥

आज हुए गुम बोल, बूँद को तरस रहे हैं,

बादल बनकर नैन, रात-दिन बरस रहे हैं।

चार कोस चल रोज, घड़े दो भरने जाते,

बचा-बचा उपयोग, करो सबको समझाते॥

४.

पानी काफी घट गया, बहुत बढ़ गई प्यास।

व्याकुलता चहुँओर है, निशिदिन, बारहमास॥

निशिदिन, बारहमास, तभी तो छीना-छोरी,

डाका, लूट-खसोट, चीखना, सीनाजोरी।

दीख रहे हैं लोग, बने सम दुश्मन जानी,

आये दिन ले रूप, खून का बहता पानी॥

५.

पाँवों में छाले पड़े, जलता बहुत शरीर।

लोग सभी हलकान हैं, नहीं दीखता नीर॥

नहीं दीखता नीर, दूर तक मरुथल फैला,

चक्कर खाये माथ, दिखे सबकुछ मटमैला।

सूख रहे तालाब, ताल, पोखर गाँवों में,

यही नगर का हाल, चुभें कंकड़ पाँवों मे॥

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कुण्डलिया - जंगल का कानून

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१.

हत्यारों का राज है, जंगल का कानून।

मँहगी होती दाल तो, सस्ता होता खून॥

सस्ता होता खून, रोज बहता सड़कों पर,

झोंपड़पट्टी फूँक, दीप जलते महलों पर।

पुछवैया है कौन, वक्त के उन मारों का,

सबके अंदर नाच, रहा भय हत्यारों का॥

२.

आई जबसे आपकी, ये गूँगी सरकार।

आतंकी हैं घूमते, निर्भय ले हथियार॥

निर्भय ले हथियार, डकैती अब होती है,

आप उड़ाते मौज, नित्य जनता रोती है।

नौकरशाही भ्रष्ट, जान लेती मँहगाई,

घोटालों की बाढ़, झूठ की आँधी आई॥

३.

चलते सीना तान के, अनपढ़ चार गँवार।

करते उनकी चाकरी, शिक्षित बीस हजार॥

शिक्षित बीस हजार, घूमते मारे-मारे,

लठमारों के भाग्य खुले, हैं वारे-न्यारे।

धूल फाँकते हंस, काग महलों में पलते,

ठोकर खाते संत, चोर कारों में चलते॥

४.

अपने दमपर है नहीं, दस की भी औकात।

खानदान के नामपर, करते सौ की बात॥

करते सौ की बात, लाख जेबों में भरते,

मक्खनबाजी रोज, साठ चमचे मिल करते।

जिन दीनों को खूब, दिखाते ऊँचे सपने,

सबकुछ उनका छीन, सजा लेते घर अपने॥

५.

हिन्दी भाषा खो रही, नित अपनी पहचान।

अंग्रेजी पाने लगी, घर-घर में सम्मान॥

घर-घर में सम्मान, "हाय, हैल्लो" ही पाते,

मॉम-डैड से वर्ड, "आधुनिकता" झलकाते।

बनूँ बड़ा अँगरेज, सभी की है अभिलाषा,

पूरा करने लक्ष्य, त्यागते हिन्दी भाषा॥

रचयिता - कुमार गौरव अजीतेन्दु

शाहपुर, पटना - ८०१५०२ (बिहार)

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  रवि की मधुशाला

बड़ी घृणा से उस को देखा जिसके हाथों में प्याला,
जिसकी आँखों में प्यास मिली जिसके अधरों पर हाला।
लेकिन जब ख़ुद पीने बैठा सारी नफ़रत भूल गया,
पीनेवाले भक्त हो गए मंदिर लगती मधुशाला॥

तारों की छाया में मुझको देता था भर-भर प्याला,
जितना साक़ी अलबेला था उतना ही मैं मतवाला।
पीते-पीते यूँ लगता था लोक यहीं परलोक यहीं,
मिले ख़ाक में आलम सारा बनी रहे पर मधुशाला॥

साँसें दे कर,नींदें दे कर नाज़ों से छप्पर डाला,
महलों सी शोभा पाता था दीवारों का उजियाला।
मुझे भरम था अटल रहेगी बिजली में,बरसातों में,
पर आँधी की आहट से ही उजड़ी मेरी मधुशाला॥

साक़ी! तोड़ दिया क्यों तूने महफिल में मेरा प्याला,
अभी प्यास बाकी थी मुझमें बाकी सांसों में ज्वाला।
कभी जाम पे जाम दिए अब बूँदों को तरसाता है,
समझ न पाया तू कैसा है कैसी तेरी मधुशाला॥

साक़ी! प्यासों में जी कर ही जप लूँगा तेरी माला,
आँखों में जो रोशन है वो दीप नहीं बुझने वाला।
जैसे तू रह लेगा मुझ बिन वैसे ही मैं रह लूँगा,
मुझे मुबारक मेरे आँसू तुझ को तेरी मधुशाला॥

समझ गया मैं सब धोखा है कैसी हाला क्या प्याला,
पल दो पल का छल है केवल रूपवती साकीबाला।
नशा मिला अपने सीने में बाहर तो बस भटकन है,
अब मेरा मन ही मदिरा है मैं ही मेरी मधुशाला॥

मेरे शाँत पड़े दरिया में कंकर सा तेरा आना,
आखिर ये क्या हंगामा है साक़ी,सच-सच बतलाना।
याद मुझे करते हो या फिर अपनी याद दिलाते हो,
या खंगाला करते हो तुम मेरी सूनी मधुशाला॥

सपनों का सीने से उठ कर पलकों पर लहरा जाना,
कैसे पिघली जाती शम्मां कैसे जलता परवाना।
ये दुनिया पागल है साक़ी कुछ भी कहती रहती है,
ये क्या जाने क्या हस्ती थी तेरी-मेरी मधुशाला॥

धारों से भी आँखें मूँदीं प्यालों को कितना टाला,
तुम चले गए तो कदमों को कुछ दिन मैंने सम्भाला।
पीठ फेर कर बैठा रहता चाहे कैसा साक़ी हो,
लेकिन मुझ को रही बुलाती नई अदा से मधुशाला॥

दुनिया की बातों का बादल तुम मुझ पर बरसाते जाना,
शिकवों की,तानों की चादर मुझ को ओढ़ाते जाना।
तुझ को पाकर ज्यों फूली थी वैसे नफ़रत सह लेगी,
कालकूट भी पी लेती है नीलकण्ठ है मधुशाला॥

जब भी आओ तुम पाओगे ज़रा न बदला दीवाना,
वैसी ही फाकेमस्ती है चोला वही फकीराना।
जाम उठे हैं,लोग जुटे हैं बस तेरी रसधार नहीं,
वरना सीना तान खड़ी है अब भी मेरी मधुशाला॥

तुम बिन कैसा ख़ालीपन है मुश्किल है ये समझाना,
पाने के अरमान भूल कर केवल याद किए जाना।
अंतर्मन में रही चीखती ज़रा न रोई नैनों से,
हँसी उदासी में भी खिलखिल मेरी भोली मधुशाला॥

जिन लम्हों पर मुझे नाज़ है उन पर तेरा पछताना,
हाथों से कानों को ढक कर जीने से भी घबराना।
अपनी ही नज़रों में ख़ुद  को मत गिरने देना साक़ी,
बिखर न जाए पुर्ज़ा-पुर्ज़ा वरना तेरी मधुशाला॥

साक़ी जब से रूठ गया है सूख गई सारी हाला,
टूटे प्यालों से भी लेकिन पीता है पीने वाला।
प्यास न तुम यूँ बुझने देना मैं भी पीता जाऊँगा,
अलग-अलग भी रहे चहकती तेरी-मेरी मधुशाला॥

लगता है इस वीराने में जम कर बरसेगी हाला,
सुरा ख़त्म होने से पहले फिर भर जाएगा प्याला।
अहले-दुनिया कुछ भी सोचें,कुछ भी समझे जाने दो,
रहे पिलाता मेरा साक़ी रहे बुलाती मधुशाला॥

लगता था इस वीराने में जम कर बरसेगी हाला,
सुरा ख़त्म होने से पहले फिर भर जाएगा प्याला।
अहले-दुनिया सच कहते थे चार दिनों की चाँदी है,
नहीं पिलाता अब तो साक़ी नहीं बुलाती मधुशाला॥

 

              दीप विरह का
चन्दा-तारे बुझते होँ पर,दीप विरह का जलने देना।
दृग मेँ आँसू सजते होँ पर,स्नेह-स्वप्न भी पलने देना॥

जीवन की निष्ठुर घड़ियोँ मेँ,कुछ पल ऐसे भी आएँगे।
मुक्ताहल सज्जित लड़ियोँ मेँ,कुछ कंकर गूथे जाएँगे॥

जिन अधरोँ पर फागुन चहके,उनसे बिरहा भी गा देना।
जिन सांसों में ज्वाला दहके,उनमेँ जलधर भी पा लेना॥

इस नगरी के जो नायक हैं,
पीड़ाओं के ही गायक हैं॥

 


             संकल्प
प्राची का देखो अरुण-भाल,रातों की अलकें रहने दो।
उत्ताल तरंगों को देखो,अब झुकती पलकें रहने दो॥

कब तक सांसों में सांस घुलें,नैनों के निर्मम बाण चलें।
रजनी के सूने पहरों में,कितना बिरहा का गान चले।
तारों की झिलमिल बस्ती में,असहाय अकेला प्राण चले।
मलयपवन के हलकोरों में,क्यों सपनों का सन्धान चले।
चिन्ता के देखो काल-जाल,स्मिति की रेखाएँ रहने दो।
निष्प्राण प्रसूनों को देखो,हिलती लतिकाएँ रहने दो॥

मंदिर भी है मदिरालय भी,मधु के धारें हैं झड़ियाँ हैं।
वंशी की आकुल तानें भी,सुख-दुख की जुड़ती कड़ियाँ हैं।
स्नेह-समर्पण के भारों में,अनिवार लजीली घड़ियाँ हैं।
मधुपों की व्याकुल गुनगुन भी,सावन की भीनी लड़ियाँ हैं।
व्यालों सी ज्वालाएँ देखो,बुझते अंगारे रहने दो।
धरती का बंजर आँचल देखो,टूटे तारे रहने दो॥

             ग़ज़ल
मैं वफाओं की तमन्ना में सितारों तक गया।
इक खुशी की चाह में दिलकश नजारों तक गया॥
   
सर्द पीले चाँद के साए तले कितने बरस,
मैं जवानी की चढ़ाई से उतारों तक गया॥

और कुछ अपने सिवा जिसको नज़र आता न था,
वो समन्दर आज प्यासा आबशारों तक गया॥

वो नज़ारा देख लेगा धार के उस पार का,
डूबने की चाह लेके जो किनारों तक गया॥

आज आँगन में जला दूँ चाँद-सूरज के दिए,
ईंट-पत्थर को हटाता मैं दिवारों तक गया॥

तू कभी कह दे मुझे महबूब अपना झूम के,
ये दुआ लेके 'रवि' खिलती बहारों तक गया॥

 

             ग़ज़ल
मैं ग़ज़ल को ले चलूँगा गाँव की चौपाल में,
रोज़ फिर गाता फिरूँगा लावनी की ताल में।

एक मिसरा ओस हो और एक मिसरा चाँदनी,
शेर मेरे खिल उठे हों बच्चियों के गाल में।

आज मैं अपनी सुनूँगा आज तुम अपनी कहो,
कौन किसका हाथ पकड़े बेबसी के हाल में।

मंज़िलों को दूर कर दो या मिटा दो रास्ते,
फर्क देखो फिर हमारी साँस के सुरताल में।

मैं तुम्हारे नाम लिख दूँ प्यार की ये सल्तनत,
और हम जीते चलें इक -दूसरे के हाल में।

गेसुओं में यार के वो देर तक उलझी रही,
लड़खड़ाहट है 'रवि' बादे-सबा की चाल में॥

          अर्पण का उपहार

मेरे सूने पथ को दे दो,कलियों का श्रृंगार प्रिये॥

आँधी के निष्ठुर झोंके थे,सघन घटाओं का घेरा;
बुझते मन के महाशून्य में,किस-किसने डाला डेरा।
तुम बिन थोड़े उच्छवास थे,कुछ आहें आधार प्रिये॥

प्रेमपंथ की सिकता पर ज्यों,मंद समीरण का तिरना;
भीगी अलकों की छाया में,पलकों का उठना-गिरना।
तेरी आँखों से चलता है,सांसों का व्यापार प्रिये॥

अट्टहास कर सावन गरजे,चमक उठे विद्युन्माला;
छलछल कलकल के नादों से,सजी रहेगी मधुशाला।
तेरे उर की मदिरा में हो,मेरा मन साकार प्रिये॥

अम्बर की नीली झीलों से,झाँक रहे हों जब तारे;
अवसादों के भँवरजाल में,तिरते हों सपने सारे।
अपने कंधों पे रख देना,मेरे मन का भार प्रिये॥

आँखों में जब जलधर उतरे,अधरोंपर कुछ हास मिले;
दुख की कसक भरी कड़ियों में,भोला सा मधुमास मिले।
सब धुँधले रेखाचित्रों को,लेने दो आकार प्रिये॥

धरती के भीगे आँचल को,ज्यों किरणों का छोर मिले;
रातों की अंधी गलियों में,जैसे खोई भोर मिले।
यूँ ही धीमे से तुम लाना,अर्पण का उपहार  प्रिये॥

 


            सर्दी
बुझती लौ को सम्भाले सूरज तो गुज़र गया है,
सहमी-सहमी राहों पर सन्नाटा पसर गया है।

क्या जाने खाना खा के कैसे सपने खिलते हैं,
झाड़ू,झाड़न,मिट्टी में जिसका दोपहर गया है।

अपना मफ़लर,कोट लिए जहाँ ठिठक जाता हूँ मैं,
उन पेचीदा ढालों पर इक साया उतर गया है।

मुझे देख के बेगाने कानों में कुछ कहते है,
अपनों की महफ़िल में शायद मेरा ज़िकर गया है।

बढ़ते-बढ़ते दीवारें आसमान में फैल चलीं,
किसी कुँवारी के सपनों सा आँगन सिहर गया है।

अभी ओस की बूँदों से धरती गीली-गीली थी,
दूर गगन के दामन में फिर बादल ठहर गया है॥

 


                           रवि प्रकाश
                                          (प्रवक्ता हिन्दी)
                                          ग्राम व डाकघर-झड़ग
                                          तैहसील-जुब्बल ज़िला-शिमला
                                          हिमाचल प्रदेश-171206
                                          दूरभाष-9318748000

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