शुक्रवार, 3 मई 2013

सत्यप्रसन्न की दो कविताएँ - आजकल, एक चिट्ठी पिता के नाम

 


                             आजकल

आजकल,
नहीं लगते हत्यारे,
पहले जैसे खूँखार, क्रूर;
और अमानवीय।
उनके चेहरे पर अब
होती है मासूमियत,
और व्यवहार से झलकता है
अपनापन।

अब वे खामोशी से भी नहीं आते।
बल्कि बाक़ायदा देने लगे हैं
ईश्तेहार अपने आने का।
यहाँ तक कि बयाँ कर देते हैं साफ़,
अपने क़्त्ल करने का तरीका भी।
परंपरागत हथियारों से
परहेज़ है उन्हें।
यकायक क़ातिलाना हमला करना भी
नापसंद है उनको।
   

उन्होंने ईज़ाद कर ली हैं
नई-नई तकनीकें और यन्त्र।
कि कैसे बंद की जा सकती हैं
चलती हुई साँसें।
और रोकी जा सकती है
धड़कनें दिलों की।
इतनी मोहक,आकर्षक
और दर्शनीय हो गयी हैं
क़त्ल की अधुनातन युक्तियाँ उनकी
कि हम खुशी-खुशी
प्रस्तुत हो जाते हैं;
अपने ही क़त्ल के लिये,
आजकल।
                     “सत्यप्रसन्न”

       

 

           एक चिट्ठी पिता के नाम

ऒ! दिवंगत पिता,
इहलोक की तमाम,
यातनाओं, कष्टों, कुन्ठाओं से
मुक्त हो कर, उम्मीद है कि;
तथाकथित देवलोक में;
शायद पहले से ही उपस्थित
अपने अनेकानेक बंधु बाँधवों,
इष्ट मित्रों के साथ,
कुशल से ही होगे।

अम्मा के भरपूर विरोध के बावज़ूद;
तुम्हारी बीमा पालिसी की रकम से
बना लिया है, हमने अपना
एक अदद, एक छत्ता मकान;
जिसे घर कहने की हिम्मत
अब भी नहीं है मुझमें।

जैसे तैसे निपटा ही गये थे तुम
बड़की का ब्याह।
छुटकी बैठी है अब भी कुँआरी।
गोकि हो गयी है; तीस की वो भी।

मुन्ने ने कर ही लिया है
आख़िरकार, इस साल बी.ए. पास
आठवें प्रयास में,
और जुट गया है जद्दोज़हद मे,
ज़िन्दगी की;
बेचते हुये दरवाजे-दरवाजे
शेम्पू, तेल के पाउच
किसी अनाम निर्माता के।

   
बढ़ गया है मितियाबिंद
अम्मा की आँख का।
हो गयी है कमजोर बीनाई।
करोड़ों-करोड़ झुर्रियों से भरा
एक कैनवास है अम्मा इन दिनों।
लेकिन,
बिना सबसे पहले उसके उठे
होता नहीं सबेरा
अब भी इस एक छत्ते मकान का।

तुमने कभी बताया नहीं कि
क्या संबंध था तुम्हारा,
सामने वाले मैदान के किनारे के
आम और नीम के दो पेड़ों से।
तुम्हारे जाने के बाद से
सूख गये हैं दोनों ही।
काट ले गये हैं लोग
आधा शरीर उनका अब तक।

पड़ोस के गुप्ताजी
शाम होते ही बैठ जाते हैं
बिछाकर, शतरंज की वही बिसात,
जिसकी अधूरी बाजी के बीच
उठा था दर्द तुम्हारे सीने में।
और चल दिये थे तुम
छोड़ कर सब कुछ वैसे का वैसा
दस साल पहले।

 

अभी-अभी साठ की दहलीज़
पर रखे हैं मैंने भी अपने पाँव।
तुम्हारे अक्स सी ही लगने लगी है
मुझे भी अपनी छाँव।
इधर गठिया से भी हो गया है नाता।
तुम्हारी बहू को अब भी मेरा,
मुन्ने या छुटकी के लिये
कुछ करना नहीं भाता।
दोनों बच्चे कालेज में पढ़ रहे हैं।
अपने आप को अपने ही तरीके से
गढ़ रहे हैं।
एक सुबह तो दूसरा शाम को रुलाता है,
आगे तो मुझे बस
अँधेरा ही अँधेरा नज़र आता है।

तुम्हारी पुरानी खूँटी पर
अपनी कमीज टाँगता हूँ,
खुद को तुम्हारी जगह आँकता हूँ।

 

बीते सालों ने अपने अदृश्य बसूलों से
छीलकर बना दिया है,
मुझे तुम सा।
मेरा अपना तो न जाने कब
कहाँ हो गया है गुम सा।

बहरहाल-
जाने क्यों,
आज बहुत याद आ रहे हो तुम।
जी चाहता है, एक बार रख लूँ सिर,
तुम्हारी गोद में;
ठीक वैसे ही;
जैसे रखा था तुमने,
हमेशा के लिये विदा होने से पहले
मेरी गोद में सिर अपना।

                  “सत्यप्रसन्न”

1 blogger-facebook:

  1. बेनामी9:16 am

    sundar rachana.
    आज बहुत याद आ रहे हो तुम।
    जी चाहता है, एक बार रख लूँ सिर,
    तुम्हारी गोद में;
    ठीक वैसे ही;
    जैसे रखा था तुमने,
    हमेशा के लिये विदा होने से पहले
    आपना सिर मेरी गोद में ।

    उत्तर देंहटाएं

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