शनिवार, 11 मई 2013

विजय अरोड़ा की कविताएँ

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मैं, विजय अरोड़ा
ये नहीं कि किसी की देखा-देखी लिखना शुरू किया हो।
पर अन्दर की छटपटाहट या कुलबुलाहट बाहर आने को बेताब थी।
सलीके से उन्हें  शब्दों का जामा पहनाने का प्रयास भर
करता हूँ। बनते -बिगड़ते रिश्तों को बहुत नज़दीक और शिद्दत से महसूस
किया है इसीलिए अधिकतर कविताओं  में रिश्तों शब्द
का प्रयोग अधीक हुआ है। वो शायद मेरी मज़बूरी भी
हो सकती है।

1105  सेक्‍टर 16 फरीदाबाद
vijayarora1960@yahoo.in


 

01

वर्तमान के कमजोर कंधों पर बैठा बीमार भविष्‍य
वक़्त की दूरबीन से दूर तक देखता हुआ
और देता हुआ आश्वासन वर्तमान को
जनता हूं तुम थक गए हो
लेकिन
धैर्य धरो
अपनी मंजिल का बूढ़ा वृक्ष
अब दूर नहीं
जिसकी थकी हुई हवा तले बैठ  कर
हम अपनी इच्‍छाओं का पसीना सुखायेंगे

2


विवशताओं की छाती पर
उग आया है उन्माद का एक और फोड़ा
फूटता है जब यह
तो निकलता है पीड़ाओं का पीला मवाद
फाहे रखे जाते हैं सहानुभूति के।
पट्टियां की जाती हैं आश्वासनों की।
दर्द के जख्‍म जब भरेंगे
तो
रह जायेगा केवल
सूखा सूखा एहसास।
उतारते रहो अपनी कुंठाओं की पपड़ियां
निकालते रहो वक़्त बेवक्त पीड़ाओं का मवाद
रखते रहो फाहे सहानुभूति के।
और फिर  वही सब कुछ।


 

3


नववर्ष पर

कभी तो मेरे सामने एक साल एक वर्ष बन कर आओ।
क्या हर बार तारीखों की भूल भूलैय्या में भटकते रहना
अच्‍छा लगता है।
कभी तुम बाल कभी महिला  तो कभी
विकलांग का रूप भर कर मुझे छलते रहे।
जब तुम मुझे इस तरह मिलते हो तो मुझे लगता है
हम किसी सार्वजनिक उत्सव में अजनबियों की
तरह मिल रहे हैं।
तुम्हारे इस तरह मिलने से लगता है
तुमने अपनी अमूल्‍य गोपनीयता ऐसे ही खोई है।
मैं हर बार तुम्हे पाने की सोचता रहा
लेकिन तुम
भेस बदल बदल कर मुझे ही छलते रहे।
तुम कभी भी स्थिर नहीं रहे।
कांपते रहे थर थराते जल की तरह।
क्योंकि
तुम कभी भी
अपने भी तो नहीं रहे।
तुम्हारा हर दिन हर पल हर महीना
उत्सवों की भीगती  रौशनी में भीगता रहा।
तुम कभी नहीं जान पाए कि
तुम इन सबसे बाहर भी कुछ हो।
कोई क्योंकर विश्वास करेगा कि
तुम्हारे आने का अर्थ
बसंत शरद या ग्रीष्म भी है।
क्योंकि
तुम कभी स्वयं भी इन्हें महसूस नहीं कर पाए।
संतुष्ट रहे अपने को
रंगीन कागजों कैलेंडरों और तस्वीरों में पा कर।
मुझे भी जी लेने दो वो पल वो छण।
जो इंसान को मशीन से आदमी बनाते हैं
कर लेने दो अपनी उस आत्‍मा का साक्षात्‍कार 
जो तुम्हारे भीतर छुपा है।
जो तुम हर रोज़ अपने साथ लिए चलते हो।
कभी  तो
इन तारीखों की भूल भूलैया से बहार निकल कर
एक साल एक वर्ष बन कर आओ।
सच मानो लोग तुम्हे स्वीकारेंगे।

4


हम लोग
हम सब लोग
चौराहों पर खड़े हो कर नारे लगाते हैं
अराजकता, अशांति की बातें करते हैं
मौजूदा सरकार को गालियाँ देते हैं।
लेकिन
थोड़ी देर बाद ही,
थक जाने के बाद
स्वयं भीड़ में शामिल हो जाते हैं
और देखते हैं,
अपनी ही प्रतिक्रिया
एक श्रोता बनकर।
मेरा देश कितना महान है जिसमें
रहने वाले लोगों को
अपनी समस्याओं की जानकारी है
उनके पास समाधान की थैलियां भी हैं।
जो इन्होंने सुरक्षित रखने के लिए चंद लोगों के
हाथों में सौंप दी हैं।
लेकिन
बाद में यही लोग
चीखते हैं
चिल्‍लाते हैं
मजमा लगाते हैं।
एक दूसरे पर थैलियों की चोरी का आरोप लगाते  हैं।
आगाह करते है
दूसरों को
अपनी चीजें संभाल कर रखने के लिए
मगर फिर से यही लोग
अपनी समाधान की थैलियां
फिक्स्ड डिपाजिट की तरह फिर से
अगले  कुछ वर्षों के लिए
सौंप देते हैं चंद लोगों को।
हम लोग
हम सब लोग
हमेशा ऐसा ही करते हैं।

3 blogger-facebook:

  1. विजय भाई, बहुत अच्छी कवितायें है, सभी !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. गिरिराज जी जानकार अछा लगा कि आपको कविताओं मैं अपनी सोच का प्रतिबिब
    दिखाई दिया। प्रयास करूंगा भाविश्यब्में भी आपको निराश न करून। साधुवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. Vijay Kumar Arora7:37 pm

    अछ लगा जानकार की आपको कविताओं मैं अपनी सोच का प्रतिबिब दिखाई दिया। प्रयास करूंगा की भविष्य मैं भी सापको निराश न करू। साधुवाद।

    उत्तर देंहटाएं

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