गुरुवार, 16 मई 2013

शरद कुमार श्रीवास्तव की कविता - आस

आस

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सुबह से शाम तक

शीत से घाम तक

पूस की शीत लहरी में

जेठ की भरी दुपहरी में

प्रकॄति के रोष में

क्षिति के आक्रोश में

 

ठिठुरते झुलसते ये शरीर

खेतों में खेतिहर मजदूर

कुछ मिलों में घर से दूर

व्यस्त हैं पर मस्त हैं

सांझ के सुरक्षित ग्रास की आस पर

आस है तो जीवन है, आस ही आस

सांझ के सुरक्षित नेवाले की आस

प्रीतम के पास होने की आस

 

मुंह में कौर होगा प्रीतम ठौर होगा

थके हुए पैरों से नाचेगें थाप देकर

खुश होने के कोशिश की आस

एक सुनहरा कल पाने की आस

आस है तो जीवन है पर एक वे हैं

जिनके पास आस  है जीवन नहीं

काम का नाम नहीं,श्रम का ठाँवं नहीं

प्रीतम के पास होने का नाम नहीं

 

आस ही आस्! केवल

कि कोई मसीहा आये

और जीवन नौका पार लगाए


शरद कुमार श्रीवास्तव

4 blogger-facebook:

  1. बेनामी5:35 pm

    Dil ko choo lene wali kavita lagi...kripaya aise hi amulya prastutiyan prakishit karte rahiye.

    उत्तर देंहटाएं
  2. कर्मशील रहकर आस बनाये रखना अच्छा है जबकि कर्महीन की आस जैसे बादल पे चलना ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. AKHILESH CHANDRA6:20 am

    KAVITA ATI SUNDER HAI AAS,HI JEEVAN KA MOOL AADHAR HAI ,ASS NAHI TO JEEVEN KHATAM ITNI ACHCHI KAVITA KE LIYE AAPKO BADHAIYAN AUR DHANYAWAD AASHA HAI AAP AUR BHI RACHNAYEN HAMEN DENGEN

    उत्तर देंहटाएं

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