बुधवार, 8 मई 2013

रेनूका चौहान का आलेख - प्रतिभावान बालक व माता पिता का व्यवहार

प्रतिभावान बालक व माता पिता का व्यवहार

श्रीमती रेनूका चौहान

व्याख्याता (हिन्दी विभाग)

नोएड़ा कन्या इन्टर कॉलिज

प्रस्तावना

सभी देशों में बहुत से ऐसे बालक होते हैं जो अपने स्कूल और कॉलेज कार्यों में अत्यधिक तीव्र प्रगति प्रदर्शित करते हैं। अमेरिका की फोर्ड फाउन्डेशन द्वारा सहायता प्राप्त एक अनुंसधान से पता चला है कि बहुत से बालक ऐसे होते हैं जो सामान्य शिक्षा अवधि से कम ही अपनी स्कूली तथा कॉलेज शिक्षा को समाप्त करके समाज केा अपना प्रभावशाली योगदान देने योग्य बना सकते हैं। ऐसे प्रखर बुद्वि बालकों की संख्या लगभग उतनी ही होती है जितनी मन्द बुद्वि बालकों की। ये स्कूली जनसख्ंया का लगभग एक प्रतिशत होते हैं परन्तु अधिकांश स्कूलों में इनकी और कोई विशेष ध्यान नही दिया जाता। यह एक दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति है क्योंकि इन्हीं प्रतिभाशाली बालकों में आगे चलकर मानव जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व की आाशा की जाती है। परन्तु प्रतिभाशाली बच्चे सामान्यत: इन विशेष सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। इस प्रकार की लापरवाही से अनेक प्रकार की हानि हो सकती है। विशिष्ट बालक सामान्य बालकों की अपेक्षा अधिक या कम गुण वाले पाये जाते हैं। बाल विकास प्रतिभावान बालकों के लालन-पालन और शिक्षा दीक्षा आदि का विशेष प्रबन्ध करने का ज्ञान प्रदान करता है।

बाल विकास के अध्ययन के साथ साथ विशिष्ट बालक का भी अध्ययन किया जाता है। प्रत्येक बालक की आनुवांशिकता और दूसरे बालकों के समान नहीं होती है। इस असमानता के कारण ही बालकों के शारीरिक, मानसिक, तथा अन्य प्रकार के गुणों में सार्थक भिन्नता पायी जाती है। जिन बालकों के गुण समूह प्रतिमानों की अपेक्षा अधिक या कम पाये जाते हैं उन्हें विशिष्ट बालक कहते हैं।

प्रतिभाशाली बालक प्राय: अपने स्तर के उन सभी कार्यों को बिना किसी की सहायता के कुशलता से कम समय में पूरा कर लेते हैं। ये बालक अपने बचे हुये समय में कुछ अधिक व विशिष्ट प्रकार का कार्य करना चाहते हैं। जबकि मध्यम स्तर के परिवारों व विद्यालयों में इनकी अपनी विलक्षणता को किसी सृजनात्मक व मौलिक रूप में प्रकट या प्रयुक्त करने का अवसर नहीं मिल पाता हैं फलस्वरूप ये समाज व विद्यालयों में कुसमायोजन की समस्या को जन्म तो देते हैं साथ ही उनकी प्रतिभा सम्पन्नता भी व्यर्थ हो जाती है। कभी-कभी अपनी विलक्षणता के उपयुक्त उपयोग न होने के कारण ये बालक असमाजिक कायरें में सलंग्न हो जाते हैं और शातिर बन जाते हैं ।

अन्य विश्ष्टि बालकों की भाँति ही प्रतिभाशाली बालक भी वर्तमान शिक्षा पद्वति से सामान्य कक्षाओं में लाभान्वित नहीं हो पाते हैं कभी कभी ये अपनी विलक्षण बुिद्व व क्षमताओं के कारण भी सामान्य परिस्थितियों में समायोजित नहीं हो पाते आौर समस्यात्मक बालक घोषित कर दिये जाते हैं। पिछले कुछ दशकेंा से अधिकांश पश्चिमी देशों में शैक्षिक रूप से पिछडे एवं विकलांग बालकों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता रहा है। किन्तु प्रतिभाशाली बालकों के लिए विशेष योजनायें व शैक्षिक व्यवस्था कहीं-कहीं है।

प्रतिभाशाली बालक कौन है ? ये सामान्य बालकों से किस प्रकार भिन्न हैं ? इनको समझने की आवश्यकता क्यों है ? इनकें लिए किस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए तथा ऐसे बालकों केा किस तरह की समस्याओं का सामना करना पडता है? इन सभी प्रश्नों के उत्तर के लिए प्रायः सभी मनोवैज्ञानिकों, चिकित्साशास्त्रीयों, समाजशास्त्रीयों, शिक्षाविद, गृहविज्ञानवेत्ता आदि अपने अपने दृष्टिकोणों के अनुसार अध्ययनरत हैं।

व्यक्तिगत भिन्नताओं के साथ साथ इन प्रश्नों का महत्व और भी अधिक हो गया है। यह एक सर्वमान्य सत्य है कि सभी व्यक्ति प्राय: शारीरिक, मानसिक, शैक्षिक एंव सामाजिक रूप से किसी न किसी सीमा तक एक दूसरे से भिन्न होते हैं। किन्तु कभी-कभी ये भिन्नतायें इस सीमा तक पायी जाती हैं की विश्ष्टि वर्गोें में रखकर शिक्षा देना आवश्यक हो जाता है। भारत जैसे प्रजा तान्त्रिक प्रणाली वाले देश में सरकार समाज परिवार तथा शिक्षा संस्थाओं का प्रथम कर्तव्य है कि वे इन विशिष्ट बालकों की पहचान कर उनकी आवश्यकताओं के अनुकूल शिक्षा एंव निर्देशन प्रदान कर उन्हें श्रेष्ठ नागरिक बनाने में सहयोग प्रदान करें।

प्रतिभाशाली बालकों से सम्बन्धित सभी समस्याओं पर दृष्टिपात करने से यह निष्कर्ष निकलता है की प्रतिभाशाली बालकों को विशेष शिक्षा देने व उनकी प्रतिभा को मुखरित करने के लिए विशिष्ट कक्षाओं, अध्यापकों, विद्यालयों व व्यवसायों के प्रशिक्षण की व्यवस्था का होना अत्यधिक आवश्यक है।

प्रतिभाशाली बालक (Gifted Children)

प्रतिभाशाली बालक जन्म से ही अपनी प्रखर बुद्भि के कारण अलग से ही पहचाने जाते है । वे अपनी प्रतिभा के बल पर ऐसा कार्य करने लगते हैं की माता-पिता तथा अन्य लोगों को भी चकित कर देते हैं । जैसे मेकाले ने जब आठ साल का था तब उसने “ए ट्रीट्रीज टू कन्वर्ट दी नेटीव्ज ऑफ मलाबार टू क्रिश्चियनिटी लिख कर विश्व को आश्चर्य में डाल दिया था। प्रतिभावान बालक अपनी कक्षा के सामान्य विद्यार्थियों से कहीं अधिक चतुर होते हैं। साधारण कक्षाओं में ये बालक अपने आप को ठीक ढंग से समायोजित नहीं कर पाते। अध्यापक के लिए ये बालक निरन्तर समस्या उत्पन्न करते रहते हैं।

“When a gifted child is also a sensitive nervous child, his adjustment difficulties naturally bend to increase.”

प्राय: यह देखने में आता है कि कुछ बालकों की बुद्वि लब्धि व शैक्षिक उपलब्धि सामान्य स्तर की ही होती हैे किन्तु किसी विशेष क्षेत्र में जैसे - कला, संगीत, अभिनय , तकनीकी, नेतृत्व, आदि में उनकी योग्यता अभिव्यक्ति उच्चकोटि की होती है। इन बालकों को उस क्षेत्र विशेष में उल्लेखनीय उपलब्धि के आधार पर प्रतिभाशाली के रूप में परिभाषित किया है। उपर्युक्त दृष्टिकोंण के आधार पर प्रतिभाशाली बालकों कों दो वर्गों में बांटा जा सकता है

· प्रतिभासम्पन्न बालक (Talented)

· प्रखर बुद्वि वाले बालक ( Intelligent)

ऐसे बालकों की विशेष योग्यताओें को जानने के लिए उनका ध्यान पूर्वक अवलोकन करने की आवश्यकता होती है।

प्रतिभावान बालकों की समस्यायें (Problems of Gifted Children)

प्रतिभावान बालकों को अपने शैक्षिक, सामाजिक समायोजन में अन्य बालकों की अपेक्षा अधिक समस्याओं का सामना करना पडता है जैसे-

· विद्यालय में समायोजन की समस्या

· समाज में समायोजन की समस्या

· घर में समायोजन की समस्या

· धीमी प्रगति

· समूह समायोजन की समस्या

प्रतिभावान बालकों के शैक्षिक, सामाजिक समायोजन में बाल विकास की भूमिका

बालविकास के अन्तर्गत विशिष्ट बालकों का भी अध्ययन किया जाता है। विशिष्ट बालक कौन है ? इनको समझने की आवश्यकता क्यों है ? इसके लिए किस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए तथा ऐसे बालकों केा किस तरह की समस्याओं का सामना करना पडता है ? इन सभी प्रश्नों के उत्तर के लिए ही बालविकास के अध्ययन द्वारा सम्बन्धित समस्याओं का समाधान किया जाता है।

बालविकास के अध्ययन में वैज्ञानिकों ने यह ज्ञात किया है कि प्रतिभावान बालकों के शैक्षिक व सामाजिक समायोजन में माता पिता की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अत: यह माता पिता के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है की वे बच्चे की योग्यता के अनुसार समुचित वातावरण का निर्माण करें तभी वे अपने बच्चों की समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। किन्तु माता पिता ऐसा नहीं कर पाते हैं ।

आजकल की इस भागदौड वाली जिन्दगी में इतना व्यस्त हो जाते हैं की वे अपने बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं जिसके कारण प्रतिभाशाली बालक अमुक कार्यों को करना प्रारम्भ कर देते हैं।

Psychologist point out that parent also plays an equally important role in the proper development of the gifted children. It is very important for the parents to provide the right environment for the gifted children, so that they may find scope to make good use of their intelligence.

जो अवसर उन्हें मिलना चाहिए उससे वे वंचित रह जाते हैं। अनेक प्रकार की बातें व आदतें उनके लिए समस्या बन जाती हैं। जैसे - वे अपने बडे भाई बहनों की बातें सुनना व उनके साथ खेलना चाहते हैं किन्तु उनके भाई बहन छोटा समझकर उनका साथ नहीं देते जिससे प्रतिभाशाली बालक के मन में कुण्ठा व घृणा उत्पन्न हो जाती है। अत: माता-पिता को चाहिए की वे बच्चों की प्रतिभा को समझें। ठीक इसी प्रकार बच्चा परिवार के साथ साथ विद्यालय में भी समायोजित नहीं हो पाता । प्रतिभाशाली बालक अन्य बालकों की अपेक्षा अधिक तीव्र होते हैं। किन्तु कई बार प्रतिभाशाली बालकों की प्रतिभा भी भिन्न- भिन्न होती हैं।

There is every possibility of the gifted children developing bed social habits due to lack of enrichment of educational programmes. They feel, very often, that the tasks given to them are not interesting and for from satisfying. So they engage themselves in loafing and indulging in antisocial activities for excitement, sometimes, they invite disciplinary problems in the class room.

Gifted children need recognition. Sincere praise from their parents, teachers, and friends mopes them feel that they are liked. If they are denied recognition, they escape into daydreaming. Gifted children must fell that they are protected in Cass of need the parents should encourage them in gaining new experiences. Every parent must think that the child seeps understanding and sympathy of his parents in his search for further learning. Parents should keep themselves well informed about many facts, so that they can answer the child’s questions readily and correctly. As the child grows older, he should be encouraged to read and to find out the answer to his question himself.

जैसे - किसी बालक की प्रतिभा गाना गाने में है तो उसे नृत्य के लिए बाधित नहीं किया जा सकता है। यदि किसी बालक की प्रतिभा दौड में है तो उसकी शारीरिक क्रिया पर ध्यान देना चाहिए और साथ ही उसकी शारीरिक क्षमताओं के अनुसार उचित पोषण युक्त आहार देना चाहिए।

बाल विकास के अन्तर्गत माता पिता का व्यवहार, व्यक्तिगत लक्षण, बच्चे की प्रतिभा, प्रेरणा और सामाजिक व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। बालक परिवार में रहता है जन्म से ही वह अनेक क्रिया कलापों को देखता व सीखता है अत: परिवार ही बालक की प्रथम पाठशाला है। जहां से उसमें कला, संस्कृति इत्यादि गुणों का समावेश होता है। बाल विकास एक ऐसा विषय है जिसके अन्तर्गत बालक के जन्म से लेकर उसके व्यक्तित्व विकास का सम्पूर्ण अध्ययन किया जाता है।

A gifted child needs opportunities for an all round development of his personality, Enrichment of educational program, if aimed entirely on the academic side, will undoubtedly ignore the development of the social, a esthetic or emotional aspects of personality.

· शिक्षा विशेष की व्यवस्था

· अतिरिक्त कक्षा व्यवस्था

· विशेष विद्यालय

· व्यक्तिगत शिक्षण

· वातावरण समृद्व बनाना

· उनकी योग्यता के अनुसार समूह तैयार करना

· प्रतिभा प्रदर्शित करने का मौका देना

· बालकों से सम्बन्धित व्यक्तियों को निर्देशन देना

· अभिभावको का दिशा निर्देशन करना

· शिक्षकों का दिशा निर्देशन करना

· प्रतिभा के अनुसार बालकों को प्रेरित करना

प्रतिभावान बालकों के अध्ययन में बाल विकास की आवश्यकता

बाल विकास का अध्ययन उन सभी के लिए आवश्यक है जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से बालक से सम्बन्ध रखते हैं। इससे विशिष्ट बालकों को शैक्षिक सामाजिक समायोजन में मदद मिलती है जिससे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राष्ट्र का भी कल्याण होता है।

आधुनिक युग में बाल मनोविज्ञान " बालविकास " का अध्ययन कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। इसके अन्तर्गत समस्त बालकों का अध्ययन कर उनकी समस्याओं का समाधान किया जाता है जिससे मानव समाज का कल्याण भी होता है। बालविकास के अन्तर्गत बालक का क्रमबद्व अध्ययन किया जाता है। जिसके द्वारा बालक के व्यवहार की प्रकृति उसकी रूचि, अभिवृत्ति, मनोवृत्ति आदि के बारे में जानकर उनकी भविष्यवाणी करने में सहायता प्रदान करता है।

इसके अन्तर्गत आयुवृद्वि के फलस्वरूप बालक के शारीरिक अनुपात व्यवहार, रूचि तथा लक्ष्यों का अध्ययन करना है।

v बालक में परिवर्तन कब, कहां, किस, रूप में होते हैं

v परिवर्तनों के कारणों का अध्ययन करना

v परिवर्तनों के फलस्वरूप व्यवहार पर पडने वाले प्रभावों को जानना

v यह ज्ञात करना की क्या परिवर्तन की भविष्यवाणी की जा सकती है

v बालकों की समस्या समाधान में सहायक

v बालकों की शिक्षा प्रशिक्षण में आवश्यक

निष्कर्ष

बाल विकास का अध्ययन उन सभी के लिए आवश्यक है जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से बालक से सम्बन्ध रखते हैं। इससे विशिष्ट बालकों को शैक्षिक, सामाजिक, समायोजन में मदद मिलती है जिससे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राष्ट्र का भी कल्याण होता है। आधुनिक युग में बाल मनोविज्ञान "बालविकास" का अध्ययन कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। इसके अन्तर्गत समस्त बालकों का अध्ययन कर उनकी समस्याओं का समाधान किया जाता है जिससे मानव समाज का कल्याण भी होता है।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची-

1. भार्गव डॉ. महेश, लवानियां भावना, विशिष्ट बालक, हरप्रसाद भार्गव कचहरी घाट, आगरा, प्रथम संस्करण, 1983

2. वर्मा डॉ. (श्रीमती) प्रीति, श्रीवास्तव डाँ. डी. एन., बाल मनोविज्ञानः बाल विकास, अग्रवाल पब्लिकेशन्स, आगरा, पन्द्रहवां संस्करण, 2007-08

3. रायजादा डाँ. विपिन सिंह, बाल मनोविज्ञान, राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी जयपुर, प्रथम संस्करण,1983

4. शर्मा प्रो. कमलेश एवं अन्य, मानव विकास, स्टार पब्लिकेशन्स आगरा

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