शनिवार, 11 मई 2013

निशांत शर्मा का लघुआलेख - काश ! लौट आये बचपन


काश ! लौट आये बचपन
दोस्तों, कितना अच्छा महसूस होता है वो लम्हा, जब हम अपने बचपन को याद करते हैं । बचपन के ये लम्हे कभी होठों पर मुस्कुराहट बिखेर देते हैं तो कभी आँखों को आँसुओं से भर देते हैं । जी हाँ, ऐसा ही होता है बचपन का वो दौर, जिसे दुबारा जीने की तमन्ना मेरे और आप में से हर कोई अपने दिल में लेकर ज़रूर बैठा है ।
उठो लाल अब आँखें खोलो, पानी लायी हूँ मुँह धो लो, ये बचपन में पढ़ी हमारी कक्षा की किताब की, एक कविता की महज़ लाइनें भर नहीं हैं । ये अमूमन हम सभी के बचपन की वो सुबह है, जिसमें माँ हमारे सिर पर हाथ फेरकर हमें जगाती थी । इस समय हमें माँ के हाथ से जल्दी- जल्दी नाश्ता करके स्कू ल के लिए दौड़ना याद न आए, ऐसा तो हो ही नहीं सकता ।

जहाँ एक तरफ माँ का ये प्यार याद आता है तो वहीं दूसरी ओर पापा की वो मार आज भी रोंगटे खड़े कर देती है, जब वो गली में दोस्तों के साथ शरारत करते हुए पकड़ लेते थे, साथ ही माँ का गले लगाकर अपने आँचल से आँसू पोंछना जब याद आता है तो बरबस ही आँखों से आँसू बहने लगते हैं । इसके अलावा स्कू ल में दोस्तों के साथ शरारतें करना और टीचर से डाँट खाना, फिर घर लौटकर माँ के साथ होमवर्क करना । पापा से मेला देखने ले जाने की ज़िद करना, फिर मेले में झूला झूलना और चाट- पकौड़ी खाना । ये बचपन की कुछ ऐसी यादें होती हैं, जो जब-जब ताज़ा होती हैं तब- तब मन एक बार फिर से बचपन के उस आंगन में कुलांचे भरने लगता है, जिसकी तस्वीर ताउम्र उसके ख़्यालों से मिट नहीं पाती


हम में से हर किसी के लिए उसका बचपन उसके लिए जीवन की पहली पाठशाला होती है, जहां उसे एक ओर जीवन के आधारभूत संस्कार सीखने को मिलते हैं तो वहीं दूसरी ओर वो जीवन को सफलता पूर्वक जीने की कला भी सीखता है । इसके अलावा उसे मिलता है उचित शारीरिक पोषण और मजबूत शारीरिक विकास । यहाँ माँ उसकी टीचर और ट्रेनर होती है, साथ ही पिता उसका संरक्षक, दादी और दादा होते हैं संस्कारों से भरी कहानियों की किताब तो भाई- बहन बनते हैं प्यारा दोस्त और संगी- सहेली । लेकिन बचपन, कागज़ की उस नाव की तरह होता है, जिसे समय की तेज़ धारा हमसे बहुत दूर बहाकर ले जाती है और हमारे पास रह जाती हैं तो सिर्फ इसकी यादें.....

-निशान्त शर्मा
आगरा

Nishant Sharma

Copy Editor

Jinvani Channel, Agra

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