सोमवार, 6 मई 2013

सुनील जाधव की कविताएँ

 

एक पंछी फुदक रहा ...

१.

एक डाली से दूजी डाली पर

कभी यहाँ तो कभी वहाँ

कभी इधर तो कभी उधर

कभी नीचे तो कभी ऊपर |

२.

जामुन की डाली पर बैठा

रसीले जामुनों का स्वाद चख रहा

काले-काले मोटे ताजे

जामुनों से सिर्फ बीज नीचे फेंक रहा |

३.

अपनी ही चाल पर इतराता

जामुनों के गुच्छों से घिरा

अकेला गाता, मदमाता

हर्ष और उत्साह से आनंद मनाता |

---

झूठ का कीड़ा..

कुछ लोगों को कितना

प्रिय होता हैं झूठ बोलना ,

और झूठ के प्रति

स्वयं का समर्पित होना |

शायद उनके नसों में

खून नहीं दौड़ता ,

दौड़ता होगा झूठ बनकर

उनके नसों-नसों में |

या फिर हो सकता हैं

उनकी गर्दन पर जूठ का बैठा हो कीड़ा ,

जब वह सच बोलना चाहता हो

कच्च करके कटता होगा झूठ का कीड़ा |

दुगने, तिगुने और चौगुने रफ्तार से

शायद झूठ बोलकर मिलता होगा आनंद ,

शरीर में संचार करता होगा जोश

चेहरे की शर्मीली मुस्कान बताती हैं प्रमाआनंद |

--

[४४ ] कीचड़ उछालना....

होता हैं पसंद कुछ लोगों को

कीचड़ उछालना,

औरों के उज्वल तन पर

कीचड़ के फुव्वारों के द्वार खोलना |

उनके नेत्रों में

सफेद रंग खटकता हैं ,

जबतक न लगा ले काला रंग

यूहीं दिल भटकता हैं |

बेचैनी होती हैं उनको

बदरंग दाग लगाना ,

रात भर षड्यंत्र करते हैं वह

किस-किस की नींद भगाना |

उनके शरीर का हर अवयव

करता हैं काम ,

हर पल ढूंढता स्वच्छ शरीर

करता हैं बदनाम |

--

उड़ता हुआ पंछी..

१.

सूरज की तेज रौशनी में

उड़ता हुआ पंछी

एक पेड़ ढूंढे रे

सहारे के लिए ,

बसेरे के लिए |

२.

कुछ बुँदे ढूंढे

प्यास बुझाने के लिए ,

दिल बचाने के लिए

जिन्दा रहने के लिए

उड़ता हुआ पंछी |

३.

भूख से व्याकुल वह

दिशाहीन भटक रहा

कुछ दानों के लिए ,

पेट के आतों के लिए

उड़ता हुआ पंछी |

४.

आओ हम सब

अपने-अपने आंगन में

एक पेड़ लगाये

पेड़ लगाकर

उड़ते हुए पंछी को राहत दें |

५.

लटकाएं हम पेड़ों पर

पानी के बर्तन

रखें हम दीवारों पर

या आँगन में पानी के बर्तन

उड़ते पंछी की प्यास बुझायें |

६.

चलो आज ही कुछ दाने

बिखेर दें आँगन में

छत पर

या रखें कोई काटोरे में

उड़ते हुए पंछी की भूख मिटाए |

---

                                        सागर के सीने पर


१.
असीम
सलिल बीच
अटकेलियाँ करती 
उमड़-घुमड़
लघु लहरे
जैसे
नन्ने बालक
अगणित रूप में
खेल खेल रहे |
२.
कभी
भासित होता
खेल,मस्ती
लड़ाई झगड़ा
होता पुन: मेल
नीचे-ऊपर
कभी दायें-
कभी बायें
उधम मचाती लहरे |
३.
सागर के सीने पर
चल रहा हँसी
ठिठोलियों का मंजर
गर्जन-तर्जन
हार-जीत का जश्न मानती लहरे
उच्छल कूद तो
कभी दौड़ लगाती लहरे
छूकर आती किनारों को
वीर उत्साही मुस्कुराती हुयी लहरें |
४.
बीच समन्दर में
ऊँची-नीची ,
छोटी-बड़ी लहरें
आपस में
घुल-मील कर
अपरिमित
शक्ति का
प्रदर्शन करती
जश्न मनाती लहरें |
५.
गंभीर सोच है


उसकी
अथाह गहराई
उसमें
विशाल हृदय
दीर्घ काया
नाना भांति के
जीवों का
रत्नों की हैं वह माया  |
 

 

 

डॉ.सुनील गुलाबसिंग जाधव

१.जन्म : ०९/०९/१९७८

२.शिक्षा : एम.ए.{हिंदी} नेट ,पीएच.डी

३.कृतियाँ :

कविता : १.मैं बंजारा हूँ २.रौशनी की ओर बढ़ते कदम ३.सच बोलने की सजा ४.

कहानी : १.मैं भी इन्सान हूँ २.एक कहानी ऐसी भी

शोध : १.नागार्जुन के काव्य में व्यंग्य २.हिंदी साहित्य विविध आयाम

अनुवाद : १.सच का एक टुकड़ा [नाटक]

एकांकी : १.भ्रूण

४.संशोधन : १.नागार्जुन के काव्य में व्यंग्य का अनुशीलन

२.विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में लगभग पचास आलेख प्रकाशित

५.अलंकरण : १. अंतर्राष्ट्रीय सृजन श्री पुरस्कार [ताशकंद]

२. अंतर्राष्ट्रीय सृजन श्री पुरस्कार [दुबई]

३.हिंदी रत्न [नांदेड]

६.विदेश यात्रा : १.उज्बेक [रशिया ] २.यू.ए.इ ३.व्हियतनाम ४.कम्बोडिया ५.थायलंड

७.विभिन्न राष्ट्रिय अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में आलेख, कविता, कहानियाँ प्रकाशित :-

नव्या ,सृजन गाथा, प्रवासी भारतीय, रचनाकार, पुरवाई, रूबरू, हिंदी चेतना, अम्स्टेल गंगा,

साहित्य सरिता, आर्य संदेश, नव निकष , नव प्रवाह, १५ डेज, अधिकार, रिसर्च लिंक,

शोध समीक्षा एवं मूल्यांकन, संचारिनिका, हिंदी साहित्य आकादमी शोध पत्रिका,केरल ..आदि |

८.ब्लॉग : navsahitykar.blogspot.com

९.काव्य वाचन :

१. अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन, ताशकंद

२. अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन,दुबई

३. विश्व कवि सम्मेलन, कैनडा

४. अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन,कम्बोडिया

१०.सम्प्रति : हिंदी विभाग ,यशवंत कॉलेज, नांदेड

११.पता : महाराणा प्रताप हाउसिंग सोसाइटी,

हनुमान गड कमान के सामने ,

नांदेड ,महाराष्ट्र -०५

१२.चलभाष :- ०९४०५३८४६७२

१३.ई मेल : suniljadhavheronu10@gmail.com

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