शुक्रवार, 3 मई 2013

आर. वी. सिंह का आलेख - मीडिया का उपजीव्य हैं अपराध

मीडिया का उपजीव्य हैं अपराध

डॉ. आर.वी. सिंह

उपजीव्य का अर्थ है, वह सामग्री जिसपर किसी का जीवन निर्भर हो। आज के भारतीय समाज में मेरे तईं मीडिया का यदि कोई उपजीव्य है तो वह है अपराध। चूंकि आहार, निद्रा, भय और मैथुन में जानवरों को सबसे प्रीतिकर मैथुन लगता है, इसलिए स्वाभाविक है कि मीडिया को इससे संबंधित अपराध सबसे संभावनाशील प्रतीत होते हैं। आप चाहे जिस पेपर को उठा लें, उसकी अधिकांश सामग्री मैथुन संबंधी अपराधों से संबंधित होती है, फिर चाहे वह विवाहेतर संबंधों के कारण हुए हत्या के समाचार हों, प्रेम-अस्वीकरण के कारण तेजाब से जलाने के समाचार हों, या किशोरियों और अबोध बच्चियों के साथ यौन दुराचार के समाचार हों।

इन समाचारों को पढ़कर सुरुचि-संपन्न पाठक को वितृष्णा होती है कि हमारा समाज कैसा हो चला है! कि हमारे समाज में कैसे-कैसे घिनौने अपराध घटित हो रहे हैं ! लेकिन एक लिहाज से देखें तो ये समाचार ही कालान्तर में पाठक को संस्कारित करते हैं। धीरे-धीरे पाठक के मन में इस तरह के समाचारों के लिए एक प्रकार की स्वीकार्यता का भाव बन जाता है। वह समाज के इन विद्रूपों को सहज मानकर स्वीकार कर लेता है। कुछ समय पहले हम घूसघोरी, घोटाले आदि को जघन्य अपराध मानते थे, किन्तु उनकी त्वरा समाज में इतनी अधिक हो गई कि अब हमने उन्हें सामान्य मान लिया है। अब यदि कोई बड़ा अफसर, पुलिस वाले, नेताजी लोग यह सब नहीं करते तो हमें असामान्य लगता है। ऐसा इसलिए हुआ कि हमने इन गुणों को उपर्युक्त महानुभावों के सामान्य आचरण का हिस्सा मान लिया है।

यही बात मीडिया पर लागू होती है। टेलीविजन का कोई भी समाचार चैनल खोल लीजिए। यदि क्षण-क्षण में उसपर किसी बड़े अपराध की खबर न हो तो लगता है कि आज देश में कुछ घटित ही नहीं हुआ। हम अगले चैनल को खंगालते हैं कि शायद वहाँ से कोई ऐसी खबर आ रही हो। घोटाले, चोरबाजारी, डकैती, हत्या और युवा महिलाओं के साथ बलात्कार तो अब तक बिलकुल आम खबरें थीं, लेकिन इधर बिलकुल नई परंपरा शुरू हुई है अबोध बच्चियों के साथ बलात्कार की।

देश में हर रोज, यहाँ-वहाँ से खबरें आ रही हैं जिनमें पाँच-छह वर्ष तक की बच्चियों के साथ बर्बरतापूर्वक बलात्कार का विवरण होता है। चाहे टेलीविज़न हों या अख़बार, सबकी रुचि इन खबरों में होती है। और इन खबरों को इस प्रकार, इतनी बार हमारे सामने लाया जाता है कि हम धीरे-धीरे उनके अभ्यस्त हो जाते हैं। कुछ दिनों बाद हम उनपर ध्यान देना बंद कर देते हैं। मनोविज्ञान के विद्यार्थी के रूप में मैंने पढ़ा था कि किसी कुत्ते के कान के पास घंटी बजाई गई और तत्काल बाद उसे खाने के लिए बिस्कुट दिया गया। बार-बार यही क्रिया दोहराई गई। कुत्ते के दिमाग में बैठ गया कि घंटी बजेगी तो बिस्कुट मिलेगा। यही हाल हम लोगों का हो गया है। हम कंडीशन्ड हो गये हैं कि समाचार पत्र आएगा तो उसमें अपराध और खास तौर से बलात्कार की खबर जरूर होगी। टेलीविजन पर समाचारों वाला चैनल खुलेगा तो अपराध और उसमें भी किसी विकृत मानसिकता वाले पुरुष द्वारा किसी बच्ची के साथ किए गए यौन अपराध की खबर जरूर होगी।

इस प्रकार अपराध, और उसमें भी यौन अपराध मीडिया का उपजीव्य बन गए हैं। ऐसा लगने लगा है कि इन्हें अपनी सामग्री में शामिल किए बिना मीडिया का जीवित बचे रहना असंभव है। यदि ऐसा न होता तो मीडिया इन्हीं खबरों को इतनी लगन से क्यों प्रचारित-प्रसारित करता?

इसके विपरीत जरा अपनी व्यवस्था पर गौर फरमाएँ। यह सच है कि शासन हर व्यक्ति के ऊपर पुलिस नहीं बिठा सकता। ऐसी पुलिस तो व्यक्ति के अंदर खुद-ब-खुद ही बैठी होनी चाहिए। यानी हमारा अंतःकरण ही हमारी अपराध-भावना को वर्जित करे, तो ही हम अपराध करने से बच सकते हैं। ऐसी अंतःकरणीय पुलिस व्यवस्था तो हमारे माता-पिता, हमारे गुरुजनों और हमारे पूरे परिवेश को तभी से करनी पड़ेगी, जब हम पैदा होते हैं। बल्कि तब से जब हमारा गर्भाधान संस्कार होता है।

दिक्कत यह है कि हमारा पूरा परिवेश अपराधमय हो गया है। हममें से हर व्यक्ति कहीं न कहीं चोर और अपराध मानसिकता से ग्रसित है। मौका मिला नहीं कि हमने अपराध किया नहीं। छोटी-छोटी चोरियाँ, छोटी-छोटी बेईमानियाँ, छोटे-छोटे व्यभिचार हम सभी करते हैं या करने का मौका ताड़ते रहते हैं। स्कूल दाखिले के समय बच्चों की उम्र कम लिखाना, सात-आठ साल के बच्चे की भी टिकट न लेना, परीक्षा में नकल मार लेना, पड़ोसी के लॉन से बाहर झाँकते फूल तोड़कर अपने मंदिर में चढ़ा देना, अपने घर का कचरा बगल में डाल देना, बिजली चुरा लेना, अपने कुत्ते को दूसरे के घर के आगे ले जाकर पॉटी करा देना, दफ्तर से जल्दी खिसक लेना, अपनी डेस्क का काम टालते रहना, अपनी पात्रतानुसार क्लेम लेने के लिए मेडिकल बिल में कुछ राशि बढ़वा लेना, ऐसे ढेरों प्रकरण मैं उद्धृत कर सकता हूँ, जिसमें हम बेईमानी कर लेते हैं और उसका तनिक भी अपराध-बोध हमें नहीं होता। जब इन्हीं अपराधों का अनुपात बढ़ जाता है तो वे बड़े घोटाले का रूप ले लेते हैं। तब बावेला मचता है, लोगों की तस्वीरें छपती हैं, उनको जेलें होती हैं। मीडिया हरकत में आ जाता है।

भारत अन्य विषयों के साथ-साथ यौन-चर्या में भी विश्व-गुरु रहा है। इसका प्रमाण है हमारा कोक-शास्त्र, हमारा काम-सूत्र, खजुराहो के मंदिर और कोणार्क का भित्ति-शिल्प। हमने काम-कला के कैसे-कैसे चित्र उकेरे हैं, यह इन स्थानों पर पर्यटन कर चुके हर चक्षु-धारी व्यक्ति को ज्ञात है। इस नाते यौनिकता तो हमारी रग-रग में व्याप्त रही है। यानी यौन-चर्या का संस्कार लेकर हम कम से कम पिछली कई दशाब्दियों से चले आ रहे हैं। इसलिए आज के भारतीय समाज में यौन अपराधों की बढ़ी हुई आवृत्ति के लिए यदि कोई पश्चिमी प्रभावों, फिल्मों और मीडिया को दोष दे तो हमें उसकी कम-अक्ली और अल्पज्ञता पर तरस खाना चाहिए।

अलबत्ता, यह सच है कि जो बात सदियों से दबी-ढकी थी, उसे मीडिया ने जग-जाहिर कर दिया। हमारी कुछ पत्रिकाएँ सेक्स सर्वे छापती हैं। हमारे कुछ अख़बार अपने आखिरी पन्नों पर विश्व की जानी-मानी जवान औरतों की नंगी-अधनंगी तस्वीरें छापते हैं। मैं तो मजाक में अपने साथियों से कहता हूँ कि चूंकि अपने देश में पढ़े लिखे लोगों की संख्या मुश्किल से साठ-सत्तर प्रतिशत है, इसलिए अख़बार केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि देखने के लिए भी बहुत-सा मसाला छापते हैं। ऐसा मसाला छपने पर तो हम बावेला नहीं मचाते। स्त्री-पुरुष अपने बेडरूम में अपना यौन-जीवन किस रूप में जी रहे हैं, इसके बारे में सर्वे करना और उसे जगजाहिर करना आखिर किस उद्देश्य से किया जाता है? क्या विवाहित जोड़ों को शिक्षित करने के उद्देश्य से? क्या विवाहित जोड़ों को इतने व्यापक पैमाने पर, लाखों की संख्या में छपने वाली पत्रिकाओं व पत्रों के माध्यम से काम की शिक्षा देने की जरूरत अपने देश में अब भी रह गई है? तेजी से आबादी बढ़ाने में माहिर अपने लोगों के बारे में ऐसी धारणा तो शायद ही कोई प्रबुद्ध व्यक्ति रखता होगा। हमें तो इस तरह की कामुकता-पूर्ण सामग्री छापने का एक ही कारण प्रतीत होता है और वह है व्यावसायिकता। खालिस व्यावसायिकता। पैसा-पैसा और बस पैसा।

इसका एक मुजाहिरा कुछ समय पहले हुआ था, जब एक बड़े व्यवसाय-गृह ने एक टीवी चैनल के समाचार-संपादकों पर सौ करोड़ की घूस माँगने का आरोप लगाया और बताया कि घूस न देने पर कैसे उसकी करतूत उजागर करने की धमकी दी गई। यानी अपराधों को उजागर करते-करते हम खुद उन्हीं में लिप्त हो गए। जिन घोटालों की खबरें दिखाकर हमने नाम और दाम कमाया, खुद भी वही करने लगे। बात तो कुल मिलाकर वही हुई न, कि अपराध ही मीडिया का उपजीव्य है!!

जो लोग इसके अपवाद हैं वे मेरी इस धारणा से असहमत हो सकते हैं। मैं ऐसे लोगों की कदमबोसी करना चाहूँगा, बशर्ते वे ऐसे हों।

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