रविवार, 26 मई 2013

आत्माराम यादव पीव की कविताएँ

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सफलता से भेंट
एक दिन चौराहे पर
मेरी सफलता से हो गई मुलाकात
रोककर वह बोली मुझे तुमसे
महत्वाकांक्षा से हरदम
क्या /क्यों करते हो तुम बात?
मैं ने  कहा
लोगों को नीम की निबौरियों खाते
कई बरसों से देख रहा हूं
जो आम के भ्रम में निबौरियाँ खाते हैं
और आम से अच्छा
वे निबौरियों की बताते हैं।
सुनकर मेरी बात सफलता मुस्कुराई
मैं ने पुन: कहा-
देखना एक दिन ये ही लोग
शक्ति संगठित हो समृद्धि का वरण करेंगे
तब नवजात शिशु की भाँति
तू हमारी गोद में होगी
और मेरे महत्वाकांक्षी लोग
फिर तेरे पिता /जनक होंगे।
तब आम की जगह
निबौरियाँ खिलाने की ढिठाई
तू अपने पिता /जनक से
कभी भी नहीं कर सकेगी।
मुंह बिचलाकर सफलता ने कहा 
तुम लोग कितनी भी करलो कोशिश
तुम लोगों में शक्ति संगठन नहीं होगा
फिर तुम यही लोग समृद्घि का वरण क्यों कैसे करेंगे?
मेरे कारण जानने पर
सफलता ने बताया
जिन लोगों के तुम हिमायती हो
उन लोगों ने मेरी बहुत उपेक्षा की है ?
इनके सारे शरीर में दिमाग में
एक जबरजस्त रूग्णता छायी है।
इसलिये हरेक और बंठी
गप्प हाँकती तरूणायी है।
मैं ने हरेक से मिलना चाहा
पर मुझसे मिलने को
वक्त किसी को न था।
सभी व्यस्त है डींग मारते,
वक्त  सभी  का कटता।
जब तक तरूणायी को
तुम उचित दिशा नहीं दे सकते
तब तक प्यारे तुम
मुझको बिलकुल नहीं पा सकते?
वैसे भी मुझे पाना
तुम लोगों के भाग्य में नहीं है
क्योंकि तुम में से हर एक व्यक्ति
एक दूसरे की निंदा /छींटाकशी
चाय की चुस्कियों के साथ
होटलों में बैठकर कर रहा है
और बाकी सारे युवा
सोसल मिडिया के हाथो छल रहा है
इसलिये इनका कुछ कर पाना
या संगठित हो जाना संभव नहीं है?
संगठन की हर एक कोशिश में
व्यक्ति खुद को उचित
व दूसरों को अनुचित ठहराता है।
हर एक संगठन की बैठक में
वह अपने ही नीति नियमों को
अपनाने से डरता है
पर मन ही मन
उन नीति आदर्शों पर
उसका चलने का मन करता है
जब सब रजामन्दी से मिलकर
अपनी नीति आदर्शों का
तुम अनुकरण कर नहीं अपनाओगे ,
यकीनन तुम/ ये लोग
मेरे जनक/ पिता होंगे।
और मैं उनकी संतान
फिर मेरे पिता/ जनक के घरों में,
होगी समृद्धि और वैभवता
हरेक चेहरे पर दमकेगी खुशी
और आँखों में चमक
हर व्यक्ति समस्यामुक्त होगा
और शिक्षा का यश
सर्वत्र होगा
तब लौट आयेगी भारत में
अमन शांति और भाईचारा
फिर देश में बहेगी दूध की नदियों
खेतों में लहराती हरियाली।
फिर शुरू होगी सुबह साँझ  आते जाते 
गायों के काफिले टुन टुन करती गले में उनके घण्टियां
उनके खुरों से उडती धूल
तब छा जायेगी आकाश में ।
यकीनन तभी
इन्द्रधनुष के सप्तरंगों को जियेगा /जियेंगे
मेरे जनक तुम /ये लोग।
उनके परिधान
होली के रंग अबीरों से होंगे।
हृदय में होगी फिर वही प्यास /चाह
कान्हा के ओठों पर रखी बाँसुरी की
जिसके सप्तरंगी स्वर
देर रात गये तक कानों में गूंजेंगे
जीवन के सुमधुर गीत गाते हुये
और गहरी नींद के बाद होगी
पीव वही फिर आशामयी जीने की सुबह।

मौत का अपमान
एक दुधमुंहे शिशु का शव
कारूणिक आर्तनाद के बीच
सुर्ख लाल कपड़े में लिपटा
अपने घर से निकला।
जिसे कलेजे पर पत्थर रख
उसकी जननी ने लोगों को सौंपा।
उस परिवार में छाया रहा मातमी शोक
जिसमें घर की दीवालें तक नम थी।
ये सुबह उनके परिवार पर
बिजली बनकर टूटी।
बुझ गया उनके कुल का दीपक
जिसके कारूणिक रूदन का कोलाहल
झकझोर देता है इंसानियत को
मौत की खामोशी से टकराकर
हवा रोक देती है हर चलते इंसान को।
शुभ मुहूर्त की चौखट पर
दस्तक देने कोई हाथ निबाला लिये
ऐसे में मुंह तक नहीं जाता
शांत हो जाती है तब
हर चूल्हे की आग
जिसने मौत की करतूत
देखी सुनी व सूंघी होगी।
इस तरह के अन्जाने खेल खेलने पर
सभी कोसते हैं ईश्वर को
सदियों से यही
जीवन को विदाई
और मौत को अलविदा
करने की चर्चा रही है।
किन्तु हे मौत
आज हमने झुठला दी है
तेरी इस चर्चा को
और अपनायी है
तेरे अपमान की ये नई नीति
जिससे शरमाकर तू
गढ़ जायेगी मानवता पर।
मानवता से हमें क्या लेना-देना
बहुत रोते आये है उसके लिये
जितना रोये है
उतनी ही मानवता
आँसू बनकर बही है।
अब हमारी आँखों में
एक बूद आँसू भी
मानवता के लिये नहीं रह गया है
आँसुओं की जगह अब आँखों  में
हैवानियत का लावा रह गया है
इसलिये मौत
तेरे अपमान की ये नई नीति
हम ने सामूहिक रूप से
मिलकर अपनाई है
जिसमें उस जननी के
कलेजे के टुकड़े को
सुर्ख लाल कपड़े में
श्मशान जाते देखा
तब इस शोकाकुल वातावरण में
हम बगल बाजू के कमरे में
तेरा जश्न मना रहे थे।
शादी की औपचारिकता
रस्मों के बीच
हँसी ठ्टठाकर मिठाईयां खा रहे थे।
शादी तो वैसे हो चुकी थी
लेकिन यह अनौपचारिकता थी।
मिठाईयों के आगे
हे मौत
हम तुझे भूल चुके थे
इसलिए खून भरे
शोकाकुल वातावरण में
हम खुशी से
जिंदगी का जश्न मना रहे थे।
हे मौत
क्या इंसानियत का रक्त करती
यह रक्तिम परिणति की
पुर्नरावृत्ति हम कभी
अपने घर कर सकेंगे
क्या हमारी आँखों में
इस हैवानियत के दौर पर
मंथन करते आत्मवंचना हेतु
कोई समय होगा।
हे मौत
शायद तेरे अपमान की
यह ढिंठाई
मैं फिर कभी
न कर सकूँगा।

पता
एक खामोशी
मौन में समा गई
मेरे उद्वेलित ह्दय को
वह शांत करा गई।
अदृश्य अलौकिक जगत की
बजती है अनवरत
स्वरलयी ध्वनियाँ
झींगुर के कोलाहल में
मुझे पीव का पता
चुपचाप बता गई।
                                   
हरा भरा
चेहरे पर खिलती सबके मुस्कान
किन्तु दिल के उपवन में
हरदम उनके रहता है
दुख का पतझडी तूफान।
फिर भी कहता सबसे हरेक इंसान
पीव सुखमय है उसका सारा बागान।
   
सपना
मैं एक दर्शक
जीवन
सपनों का सौपान।
कहने को सच में
जुटाया  सारा सामान।
तिनकों से जोडा है
कडवे झूठों से ओढा है।
देते है सब
सच होने का प्रमाण
टूटा है मेरा
यह एकपल में सपना
पीव मैं ही रहा नहीं
कभी खुद में अपना।
                                   
समेटना
सागर में हरदम
लहरें लेती हिलौरें
साँसों को मेरी
सारी देह ही बटोरे।
लहरों से हरपल
सिन्धु रहता न खाली
अमावस्या की रातें
लगे तुम को है प्यारी।
छलके है हरदम
मेरे देह की गगरियाँ
कामनाओं का स्त्रोत उफनता
पीव रसिक बना मन साँवरिया।
                                   
गौना
गोरी के गोरे-गोरे, गाल गदराये
गोनों कराने आज, सजन उनके आये।
लाल-लाल लोचन में, ललि लाज लखि आये
आँचल की ओट से, झाँकत अंग-अंग अनुरागहि अकुलाये।
अधर लाल रसाल माल लिये,आज अधर अधकाये।
अगियाँ में अनल अरूण, उरोज उर खूब अठिलायें।
मीत मनभावन से आज मधुर मिलन चाहे
चंचल चित्त चन्द्रमुखी चूमन  को चातुरी दिखाये।
प्यार के रंग में नैनन ही कहे जाये
हिय को ज्वारि छायों पीव लाजि छाडि प्यार जताओं
नैननि को नीको नाथ चलो साथ बिरह उर आज मिटाओं।

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