गुरुवार, 16 मई 2013

आशीष त्रिवेदी की लघुकथा - मातृ शक्ति

मातृ शक्ति 

आज राम नवमी का दिन था। श्रीमती शर्मा अपने पति के साथ देवी के दर्शन करने आयीं थीं। इस मंदिर की प्रसिद्धि दूर दूर तक थी। पहले तो वो हर महीने ही यहाँ आती थीं किन्तु नौकरी में व्यस्तता बढ़ जाने  के कारण पिछले शारदीय नवरात्रि के बाद आज आ पायीं थीं।

मंदिर में बहुत भीड़ थी। दर्शन करने वाले भक्तों का ताँता लगा था। माँ के दर्शन करने के बाद वो अपने साथ लाये हुए पूरी और हलवे के पैकेट बाहर बैठे भिखारियों में बाटने लगीं। उनकी नज़रें इधर उधर भटक रही थीं। दरअसल वो गौरी को ढूंढ रही थीं।

गौरी चौदह पंद्रह साल की एक अनाथ लड़की थी। वो गूंगी थी। जब वह करीब छह वर्ष की होगी तब कोई उसे मंदिर में छोड़ गया था। पुजारी जी ने उसका नाम गौरी रख दिया। गौरी मंदिर की सीढ़ियों पर ही बैठती थी। आने वाले भक्त जो दे देते थे उसी से गुजारा कर लेती थी। श्रीमती शर्मा को उसकी जो बात सबसे अच्छी लगती थी वह थी उसकी वो प्यारी सी मुस्कान जो इतनी तकलीफों के बाद भी हमेशा उसके चहरे पर खिली रहती थी।

श्रीमती शर्मा उसे ढूंढ रही थीं ताकि वे उसे भी प्रसाद दे सकें। तलाशते तलाशते उनकी निगाह एक कोने पर पड़ी। वहां एक गठरी की तरह सिमटी हुई गौरी बैठी थी। उसका चेहरा मुरझाया हुआ था। बड़ी मुश्किल से वो खड़ी हुई और मटके की तरह आगे निकल आये पेट को हाथों से संभालते हुए धीरे धीरे सीढियां उतरने लगी।

श्रीमती शर्मा का दिल धक् से रह गया। पास बैठी फूल बेचने वाली बोली " न जाने कौन राक्षस इसके साथ मुंह काला कर इसे छोड़ गया।"

मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं। स्त्री शक्ति को माता के  रूप में पूजने वालों का आना जारी था।

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