गुरुवार, 23 मई 2013

पद्मा मिश्रा का आलेख -- साहित्य सृजन -और ऑन लाइन पत्रिकाएं


कम्प्यूटर युग की क्रांति के बाद इंटरनेट की दुनिया में साहित्य सृजन और विशेष रूप से हिंदी लेखन परिपक्व हुआ है .नई नई तकनीकी भाषाओँ  के अविष्कार ने यूनिकोड ,चाणक्य,मंगल सुषा,देव् नगरी और कृत्तिका ,बराह जैसी अनेक लिपियों को भी जन्म दिया है जिनसे हिंदी लेखन में सफलता तो मिली ही है ,ऐसे नवोदित रचनाकार  जिनकी रचनाएँ  यदा कदा  प्रिंट मीडिया  में छपा करती थीं, अब इंटरनेट के माध्यम से सारी दुनिया में पढ़ी जा रही हैं .

हाल   ही में  दैनिक जागरण  में प्रकाशित ''शैलेश भारतवासी  ''का आलेख -''साहित्य में ई संसार   '' पढ़ा और  मै शत प्रतिशत लेखक से सहमत हूँ , इस विशाल अंतर्जाल के माध्यम से सुदूर गांवों के भी छात्र ,कवि ,लेखक ,अब सुदूर देशों तक अपनी पहुंच बना पा रहे हैं ..आन लाइन पत्रिकाओं में इन दिनों सबसे चर्चित नाम है --''रचनाकार ''जिसमे कहानी प्रतियोगिताएं भी आयोजित होती हैं -पुरस्कार भी मिलते हैं और नियमित रचनाएँ भी प्रकाशित होती रहती हैं ,इसके सम्पादक हैं -'रवि शंकर श्रीवास्तव ''रतलामी '...''नव्या ''के सम्पादक श्री पंकज त्रिवेदी जी है जो स्वयम कवि हैं ,उनके माध्यम से अनेक अच्छे लेखक और कवि इस पत्रिका से जुड़े हैं ..-विश्वम्भर शुक्ल ,सुधा राजे ,नन्द भारद्वाज ,जगदीश किंजल्क ,तेजेन्द्र शर्मा ,डॉ नरेन्द्र कोहली ,डॉ हरीश अरोड़ा ,के अतिरिक्त प्रीत अरोड़ा ,बरखा काम्बले ,पूर्णिमा वर्मन .शैलजा पाठक ,डॉ बच्चन पाठक सलिल आदि अनेक सशक्त हस्ताक्षर शामिल हैं ..

मैं स्वयम इन पत्रिकाओं में लगातार अपनी रचनाएँ भेजती हूँ -जो नियमतः प्रकाशित होती रही हैं ...और मेरी एक पहचान  बनी है .''लेखनी ;;की सम्पादिका डॉ शैल अग्रवाल विदेश में रहते हुए भी इस पत्रिका का सफल संचालन कर रही हैं ,वे इसके नियमित प्रकाशन के लिए अत्यधिक श्रम करती हैं तथा '',परम्परा तब और अब ,माह के कवि ,काव्य संकलन ,कहानी सम्मिलन आदि अनेक शीर्षकों के माध्यम से सभी विधाओं --कविता ,कहानी आलेख ,पुस्तक समीक्षा प्रकाशित होती है .कनाडा से निकलने वाली पत्रिका ''हिंदी चेतना ''भी साहित्यकारों को एक सशक्त मंच प्रदान कराती है ,कई स्थानीय कवियों लेखकों को भी पर्याप्त जगह मिली है --श्यामल सुमन ,आशुतोष झा ,पद्मा मिश्र ,कल्याणी कबीर ,सुधा गोयल ,मनोज आजिज ,बच्चन पाठक ,अखिलेश्वर पाण्डेय ,चित्रांशी पाण्डेय ,आदि ..इन रचनाकारों ने निरंतर साहित्य सृजन कर सुदूर क्षेत्रों तक अपनी पहचान बनाई है.

''प्रवासी दुनिया '',शब्दांकन ,सृजक ,,प्रयास लमही ,बसुधा जैसी नामचीन पत्रिकाएं भी अब इंटरनेट पर मौजूद हैं और साहित्य में अपना विशिष्ट योगदान दे रही हैं ,इने आलावा कनाडा हिंदी संसथान ,साहित्यकार संसद ,काव्य मञ्जूषा ,अखिल भारतीय साहित्य परिषद जैसी वेब साइटों  के ,अंतर्गत भी अनेक आन लें पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं ,इन पत्रिकाओं की गुणवत्ता में कोई कमी नहीं है ,पर यह पाठक की मानसिक सोच पर निर्भर करता है कि वह कैसी रचनाएँ पढना चाहते हैं ,यहाँ चयन की भी सुविधा है ,मै प्रिंट मिडिया और आन लाइन प्रकाशन की तुलना नहीं करती ,क्योंकि दोनों का अपना विशिष्ट स्थान है ,परन्तु एक बात तो तय है -जहाँ एक रचना प्रकाशित होने की महीनों  प्रतीक्षा करनी पड़ती है वहीं इंटरनेट पर प्रकाशित रचनाओं की अभिव्यक्ति और गुणवता पर शीघ्र प्रतिक्रिया भी मिल जाती है.

दूसरा लाभ यह है कि पाठक विश्व भर के कवियों ,लेखकों की रचनाएँ घर बैठे पढ़ सकते हैं ,उनके विषय में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं ..कि वर्तमान समय में कौन सी विधा या विषय प्रासंगिक और इस दिशा में क्या सृजन हो रहा है ,मैं स्वयम डॉ नरेन्द्र कोहली के समग्र साहित्य को पढना चाहती थी -पर व्यावहारिक रूप से यह सम्भव नहीं था -और महंगा भी था ..पर जब इंटरनेट के सम्पर्क में आई तो मेरी चिर प्रतीक्षित इच्छा पूरी हुई मैंने उनकी अनेक कृतियों --महा समर ..कुंती ,रामकथा, बासुदेव आदि के विषय में पर्याप्त जानकारी प्राप्त की ....परन्तु दुःख भी होता है की हमारे देश में सभी को कम्प्यूटर की जानकरी नहीं है आज भी ..पर हमारे दैनिक पढ़े जाने वाले पत्रों में साहित्य के लिए कोई जगह नहीं है.

पहले जमशेदपुर में हिंदुस्तान ''में रचनाकर्म छपता था ,जिसके सम्पादक स्वं० मंधान जी थे ,तब पूरा साहित्यिक माहौल बन गया था ,हमें हर अंक की प्रतीक्षा होती थी ,बाद में वह बंद हो गया ..फिर ''दैनिक जागरण '' ने साहित्य को जगह दी -सम्पादक थे एस के उपाध्याय व् बिरेन्द्र ओझा जी ..उस समय भी साहित्यिक पृष्ठ की उत्कृष्टता  मन मोह लेती थी पर उसने भी साहित्य से मुंह मोड़ लिया-  'नए पत्र 'इस्पात मेल  ''में भी  साहित्य का पृष्ठ  गायब हो  गया   ,अब प्रभात खबर ने बीड़ा उठाया है --वह भी नियमित नहीं ..वरिष्ठ और गम्भीर लेखन के लिए अभी भी दूरी है ..साहित्य समाज हित के लिए होता है ,यह बात कब समझी जाएगी ?...निश्चित रूप से इंटरनेट के आगमन से वरिष्ठ साहित्यकारों का सृजन पढना सुलभ हो गया है ,जिसे कभी -पढने जानने की तीव्र इच्छा होने पर पत्र  में प्रकाशित रचनाओं पर ही निर्भर रहना पड़ता था -अब वे भी इस माध्यम को अपनाने लगे हैं जिससे उनकी पाठक संख्या बढ़ी है .राजेन्द्र यादव और नामवर सिंह जैसे साहित्यकारों ने भी नेट की दुनिया को कूड़ा कह कर नाकारा था पर अब वे भी दिखने लगे है ,इस माध्यम से उनका सृजन भी पढ़ा जाता है .


अतः यह जरुर कहना चाहूंगी कम्प्यूटर युग की इस क्रांति में अपना योगदान दें ,ज्ञान व् रचनाधर्मिता के उत्थान के लिए भी ..और बदलते समय की जरूरतों के साथ साथ ..नई पीढ़ी के साथ कदम से कदम मिला कर चलने के लिए भी .खूब लिखें ..सशक्त लिखें --ज्ञान के हर स्रोत के साथ जुड़ें

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---पद्मा मिश्रा -साहित्यकार

7 blogger-facebook:

  1. Is gambhir aalekh ke liye bahut bahut dhanyavaad !
    Is se sambandhit vishay par ek nayi charcha shuru hone ki sambhawana hai .
    Manoj 'Aajiz'
    Jamshedpur
    mkp4ujsr@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(25-5-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  3. उत्तम प्रस्तुति। आप बधाई के पात्र हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  4. Padmaji ko dhanyavad itne sunder dhandh se rachnakaron ki baat rakhne ke liye

    उत्तर देंहटाएं
  5. यह कलापूर्ण आलेख निर्झर टाइम्स पर 'विधाओं की बहार...' में संकलित की गई है।
    कृपया http://nirjhar.times.blogspot.com पर अवलोकन करें।आपकी प्रतिक्रिया सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  6. बहुत ही अच्छा सुझाव है.. अमल जरूर करेंगे....

    उत्तर देंहटाएं

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