रविवार, 26 मई 2013

देवेन्द्र कुमार पाठक के दोहत्थड़-दोहे

देवेन्द्र कुमार पाठक के

दोहत्थड़-दोहे

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पद-मद ने जब दी भुला, पद की हद-मरजाद;

बुद्धि निरंकुश हो गई, बना मनुज ज़ल्लाद.

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पदलिप्सा मेँ भ्रष्ट हो, बढ़-चढ़ करेँ कुकृत्य;

महिमामंडित हो रहे, छल,अन्याय,असत्य.

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दुधमुँह तन,मन,ज़ेहन के घर,देहरि,आँगन;

फिरेँ ख़ौफ़ के अज़दहे, पल-पल काढ़े फन.

~*~

घर ने कब कितना किया, लड़की पर विश्वास;

रहता काबिज़ हर घड़ी, शक़ का बदअहसास.

~*~

सदा बोझ समझा उसे, कहा पराया धन;

धरा-धर्म धारे रही, सहती उत्पीड़न.

~*~

वस्तुमात्र समझा किया तुमने कन्यादान;

उसके सपनोँ का रखा, कब-कब,कितना मान.

~*~

जनगीत

 

लोग अँखमुँद पछियाय रहे

~ ~ ~

जोड़-तोड़,गठजोड़;

मच गई वही पुरानीहोड़;

चुनावी खच्चर धाय रहे.

लोग अँखमुँद पछियाय रहे.

 

दिल्ली की दल-दली गंदगी

गाँवशहर तक बह कर आती,

बड़े-बड़ोँ के नीचपने की

कीच बजबजाती-गंधाती;

सत्ता साधन साध्य,

है जिनका सत्ता ही आराध्य;

कठकीड़े हैँ वे कुर्सी के,

लहू प्रजा का पी- पी के;

खूब मुटियाय रहे.

 

लोग अँखमुँद पछियाय रहे.

लोकतंत्र की फुलबगिया मेँ

ये ज़हरीले साँप पल रहे,

श्रम की पावन पुण्य धरा पर

पदलिप्सा के पाप पल रहे;

निरे काग़ज़ी शेर,

आँकड़ोँ के बल बने दिलेर;

मजदूरोँ का हर हिस्सा-हक,

ठलुए-कामचोर ये नाहक,

हड़प-हथियाय रहे.

लोग अँखमुँद पछियाय रहे.

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