गुरुवार, 30 मई 2013

श्याम गुप्त की लघुकथा - जो सहि दुःख पर छिद्र दुरावा

जो सहि दुःख पर छिद्र दुरावा ...लघु कथा     ( डा श्याम गुप्त )

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी में वर्मा जी ने सुन्दर कविता पाठ के अनन्तर कवितांश... “ नयनों में अश्रु कलश छलके” पर डा शर्मा ने मध्य में टोक कर कहा ,’नयनों में... नहीं, ‘नयनों के अश्रु-कलश .’ कहिये|

क्यों, क्या अर्थ है आपका ? वर्माजी पूछने लगे, अब ज्यादा बाल की खाल न खींचिए।

‘यह तथ्यात्मक व कथ्यात्मक त्रुटि है।’ डा शर्मा बोले, ‘अश्रु कलश नयनों में कैसे छलकेंगे...अश्रु नयनों में या नयनों से छलकते हैं तो अश्रु-कलश स्वयं नयन हुए या नयन के अन्दर ...तो नयनों के छलकेंगे या नयनों से।’

‘आप सदैव छींटाकशी करते ही रहते हैं। आपके कमेन्ट भी तीखे होते हैं| आप छिद्रान्वेषी प्रवृत्ति के हैं हर बात में छिद्र खोजते हैं और दूसरों के छिद्र उजागर करते रहते हैं। यह अवगुण है|’ लाल साहब बोले, ‘ तुलसी बावा कह गए हैं ..

’                                   जो सहि दुःख पर छिद्र दुरावा ,

वन्दनीय सोई जग यशु पावा।

इस प्रकार आप न वन्दनीय होते हैं न वन्दनीय होने के यश का आनंद उठा पाते हैं, अधिकाँश लोग आपसे दूर हो जाते हैं|

‘और बीच में टोकते भी हैं।’ चौहान जी बोले।

‘ हाँ, बाद में चुपचाप अकेले में बता दिया करिए, सबके सामने नहीं।’ वर्मा जी कहने लगे।

नहीं ...डा शर्मा हंसकर कहने लगे, ‘कविता यदि गोष्ठी में हो रही है या इंटरनेट पर लिखी जा रही है तो समष्टि के लिए है। इसमें व्यक्तिगत क्या ? फिर सत्य कथन में छुपाव व दुराव कैसा, कोई व्यक्तिगत बात तो है नहीं।

तो क्या महाकवि तुलसीदास जी यूं ही कह गए हैं। लाल साहब ने प्रश्न उठाया|

नहीं....शर्माजी बोले, ‘ तुलसी बावा तो उचित ही कह गए हैं, शंका का प्रश्न ही नहीं, पर प्रश्न उठता है कि ‘छिद्र’ किसे कहा जाय। किसी की नैसर्गिक, प्राकृतिक, जन्म आदि से कमी दोष या विकलांगता, अपंगता, निर्धनता, सामाजिक स्थित आदि को उजागर करना, प्रचार करना आदि, चाहे पुरस्कार के रूप में ही क्यों न हो ... छिद्र व छिद्र को उजागर करना है क्योंकि वे अपूरणीय हैं। अष्टावक्र इसलिए प्रशंसनीय व प्रसिद्ध नहीं कि वे विकलांग थे, निरीह या सहायता योग्य थे अपितु अपने महाज्ञान के हेतु से। परन्तु अनाचरणगत कमियाँ, ज्ञान व जानकारी की त्रुटियाँ छिद्र नहीं, उन्हें तो बताना व उजागर करना ही चाहिए, विज्ञजनों का यह कर्तव्य है।’

‘और वर्मा जी !’ डा शर्मा वर्मा जी से उन्मुख होकर कहने लगे,’ केवल आपको चुपचाप बताने से सिर्फ आपका ही लाभ होगा परन्तु अन्यान्य कवियों को एवं समष्टि को लाभपूर्ण व सही सन्देश कैसे जायगा, जो साहित्य का उद्देश्य है। फिर उस तथ्य पर वाद-विवाद कैसे होगा ताकि वास्तव में सही क्या है यह निर्धारित हो अन्य विद्वानों के परामर्श व विचार से जो गोष्ठिओं का उद्देश्य है।’

‘बात तो सही है’, रामदेव जी बोले, ‘इसीलिये तो पुरस्कार या सम्मान बस उसी व्यक्ति को बुलाकर चुपचाप नहीं दे दिया जाता, समारोह का आयोजन होता है ? ताकि समस्त समाज का लाभ हो क्योंकि इससे लोक प्रोत्साहित होता है।’

‘सच कहा रामदेव जी’, डा शर्मा कहने लगे, ’वैसे भी हाँ जी...हां जी कहने वाले, हमें क्या अंदाज़ वाले, कौन वला मोल ले सोच वाले.. तो अधिक होते हें..छिद्रान्वेषी कम, क्

यों कि उसके लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है|

‘पर इस प्रकार लोग आपको पसंद नहीं करते व दूर भागते हैं।’ लाल जी बोले

तो मुझे क्या, मैं तो सही बात कहने का प्रयत्न करता हूँ...सांच को आंच कहाँ .....

‘.कबिरा खडा बजार में सबकी मांगे खैर,

ना कहू से दोस्ती ना काहू से बैर। ‘

कबीर और निराला को क्या क्या नहीं कहा गया, पर आज कहने वाले कहाँ हैं और कबीर, निराला कहाँ हैं।

परन्तु ‘सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, मा ब्रूयात सत्यमप्रियम...’ भी तो कहा गया है, श्यामसुन्दर जी ने बात आगे बढाते हुए कहा।

सही कहा, डा शर्मा बोले, पर क्या मैंने कुछ अप्रिय कहा ? वह तो जो सत्य सुनना ही नहीं चाहता, आलोचना सुनना ही नहीं चाहता उसे सत्य भी अप्रिय लगता है .......

‘सोना कूड़े में पडा, लेते तुरत उठाय,

सत्य बचन ले लीजिये, चाहे शत्रु सुनाय।

सही है पर यह भी तो कथन है कि ‘ सीख ताहि को दीजिये जाको सीख सुहाय..’ रामदेव जी ने कहा।

सत्य बचन, श्रीमान जी! डा शर्मा हंसकर बोले, ‘पर यहाँ कोई बानरा थोड़े ही हैं। सब क्रान्तिदर्शी, कविर्मनीषी, स्वयंभू, परिभू है उन्हें तो समझना चाहिए ....इसीलिये तो गोष्ठी होती है।

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डॉ श्याम गुप्त , सुश्यानिदी , के-३४८, आशियाना, लखनऊ -२२६०१२ 

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