बुधवार, 8 मई 2013

विजय शिंदे का आलेख - हिंदी भाषा और विवेकी राय

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हिंदी भाषा और विवेकी राय

डॉ. विजय शिंदे

भारत देश विविधता से संपन्न देश है। भाषा की दृष्टि से भी भारत में विविधता है। इस अनेकता में गंदी राजनीति का प्रवेश हुआ और भारत में भाषावाद की समस्या निर्माण हो गई। भाषावार प्रांत रचना के बावजूद भी राज्यों में सीमावाद, भाषावाद... के कारण शिक्षा व्यवस्था को कई मुश्किलों का सामना करना पड रहा है। अक्सर देखा जाता है, सीमा पर रहने वाले लोग दोनों भाषाओं की जानकारी रखते हैं। लेकिन राजनेता उनको हथियार बनाकर कुर्सियां हासिल कर लेते हैं। राष्ट्रभाषा हिंदी भी विवाद के बीच फंसी है और उसके साथ जनता तथा देश को भी छला जा रहा है। देश के भीतर का यह वास्तव है और इधर राजनीति के चलते हिंदी को आंतर्राष्ट्रीय रूप में मान्यता देने के प्रयास शुरू है। "हिंदी विश्व की तीसरी सबसे बडी भाषा है। लगभग एक करोड बीस लाख भारतीय मूल के लोग विश्व के 132 देशों में बिखरे हुए हैं जिनमें आधे से अधिक हिंदी से परिचित ही नहीं, उसे व्यवहार में भी लाते हैं।"1 परंतु दूसरी ओर यह भी यथार्थ है कि हिंदी अपने ही देश में उपेक्षा की पात्र है। विभिन्न राज्यों की सरकार द्वारा द्वितीय भाषा के रूप में अंग्रेजी को स्थान दिया जा रहा है। अग्रेंजी को शिक्षा के माध्यम रूप में माना जाना गुलामी का द्योतक है। उच्च शिक्षा तथा तकनीकि शिक्षा में अंग्रेजी को आधार बनाया गया है। हिंदी की इस अवहेलाना के लिए हम ही जिम्मेदार है। बात अवहेलना की नहीं है, यहां की जनता जिस भाषा को समझती है उस भाषा में उसको शिक्षा न देने का मतलब है उसके विकास के मार्गों में अवरोध निर्माण करना। इस तरह से एक अर्थ में हम अपने ही देश का नुकसान कर रहे हैं। "हिंदी यदि राष्ट्रभाषा के रूप में पूरी तरह स्वीकार्य नहीं हुई है तो उसका कारण राजनीतिक मतिभ्रम है।"2 वैसे हिंदी के पास विश्व की अन्य भाषा की तुलना में सशक्त देवनागरी लिपि है और उसको आधार बनाकर शास्त्रीय विश्व भाषा बनने का सामर्थ्य उसमें है। हिंदी भाषा के आंचलिक कथाकार, सशक्त ललित और वैचारिक निबंधकार विवेकी राय के मन में हिंदी के प्रति विशेष आदर-प्रेम है। समय दर समय उनके साहित्य में वह व्यक्त भी हुआ है। यहां मेरा उद्देश्य यहीं है कि विवेकी राय के साहित्य को ध्यान में रखते हुए हिंदी भाषा की स्थिति का विवेचन करना।

विवेकी राय के साहित्य में हिंदी भाषा के प्रति आदर, मान-सम्मान और देशवासियों द्वारा की गई अवहेलना का चित्रण है। विश्वभाषा हिंदी दूर की कौडी है, प्रथम जरूरत है उसे अपने देश में उचित मान-सम्मान देने की। इसी दृष्टि से विवेकी राय जैसे हिंदी प्रेमी, अध्येता उसके प्रचार-प्रसार के लिए प्रयासरत रहे हैं।

‘समर शेष है’ उपन्यास में पंडित संतोषकुमार का प्रिय छात्र रामराज गांव से शहर में महाविद्यालयीन शिक्षा लेने के लिए जाता है तब वह बी.ए. में फेल होता है। शिक्षा संबंधी दिक्कतों को वह अपनी डायरी में नोट कर लेता है। पंडित जब उसे मिलने जाते हैं तब उसकी अनुपस्थिति में उसकी डायरी देखते हैं। रामराज ‘दी गांधीयन वे’ के लेखक राधाकृष्णन् को अंग्रेजी में पाठ लिखने के कारण कटु उक्तियों से सुशोभित करता है। वह डायरी में लिखता है, "...ब्रह्मांड बन मेरे मस्तिष्क में चक्कर काट रहा है। जीवन की सरलता का अर्थ कागज पर उतरी एक विदेशी लिपि, विदेशी भाषा, भाषा में एक पाठ और पाठ में... "3 संपूर्ण भअरत के शिक्षा क्षेत्र में अंग्रेजी के माध्यम से विद्यार्थियों पर मानसिक बलात्कार शुरू है। जापान, चीन, जर्मन आदि देश अपनी भाषा में वैज्ञानिक विकास की चरमसीमा को पार कर चुके हैं। ऐसा क्यों है कि भारत को ही अंग्रेजी के बैसाखियों की जरूरत है। एक तरफ कहा जाता है कि भअरत गांवों का देश है और दूसरी तरफ जिस भाषा के साथ गांव का कोई संबंध नहीं, उसे उस पर लादा जा रहा है। कैसे संभव है कि हमारे किसान का बच्चा, उसका परिवार, बैल, भैस, बकरियां अंग्रेजी बात समझे ! अंग्रेजी में रोएं, गाएं और डांटे ! कई ग्रामीण प्रतिभावान युवक अपनी भाषा में शिक्षा न होने के कारण उससे वंचित रहने लगे हैं। दसवीं और बारहवीं कक्षा का परीक्षा फल अंग.रेजी विषय में पास-फेल होने वाले विद्यार्थियोम पर निर्भर होता है। पूरे देश में कई ऐसे बच्चे हैं कि जो केवल अंग्रेजी विषय में फेल होने के कारण शिक्षा से वंचित रहे हैं। इन स्थितियों से बाहर निकालना है और वंचितो का वंचन पूरी तरह रोकना है तो भाषा को लेकर नीतियां बदलनी पडेगी। हिंदी को न्याय और प्रतिष्ठा देने का कार्य भारतियों को ही करना होगा।

हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कई सस्थाएं प्रयासरत है लेकिन कई ऐसी संस्थाएं भी है जो मात्र प्रदर्शन कर अंदर से अंग्रेजी को सहायता दे रही है। ‘ए.सी.बी. की बैठक’ कहानी में इस प्रकार की संस्था का चित्रण विवेकी राय ने किया है। कार्यकारणी के सभी सदस्य प्रस्ताव किस भाषा में लिखना चाहिए इस पर बहस कर रहे हैं। हिंदी सेवी संस्था का प्रस्ताव हिंदी में होना न्यायसंगत है। लेकिन अंग्रेजी के चंद चमचे हर जगह पर उसकी पूंगी बजाते रहते हैं। हिंदी सेवा संस्था में अंग्रेजी का सवाल उठता ही नहीं, लेकिन वहां भी उसकी उपस्थिति खोखली सेवा को दिखाता है। प्रस्तुत कहानी में बैठक का वर्णन करते समय लेखक ने लिखा है, "कुछ देर तक अंग्रेजी हल्ला होता रहा और फिर शांत वातावरण में वोटिंग हुई। हिंदी के पक्ष में तीन वोट आए और फिर अंग्रेजी के पक्ष में छब्बीस। अंत में तय हुआ कि सी.सी. गुप्ता अंग्रेजी में प्रस्ताव बनाएंगे और ए. राजा उसका अनुवाद करेंगे।"4 इस प्रकार की हिंदी सेवा दोगली नीति का प्रतीक है। ‘अखबार और अध्यापक’, ‘कोई एक आहट’, ‘यह किसकी लीला’, ‘शिक्षा या साजिश’, ‘यात्राः और एक हिंदी सेवी यात्रा’, ‘चूहे, अंग्रेजी और घूस’, ‘रोना हिंदी का’, आदि निबंधों में भी हिंदी भाषा, राजनीती और हिंदी सेवा संस्थाओं का चित्रण है। ‘चूहे, अंग्रेजी और घूस’ निबंध में भाषा और भ्रष्टाचार की समस्या पर जबरदस्त व्यंग्य किया है। चूहों से त्रस्त बलिया जिले के भारतीयों को मुक्ति देने के लिए स्वीजरलैंड से एक महात्मा आते हैं। भारतीय लोग चूहों को हटाने के कई प्रयत्न करते हैं पर उसमें उन्हें असफलता आती है। महात्मा के आते ही चूहे भाग जाते हैं। लोग महात्मा को पूछते हैं कि आपने ऐसा कौनसा तीर चलाया कि चूहे गायब हो गए। महात्मा कहते हैं, "बताता हूं, पहली बार तुम लोगों ने हिंदी में लिख कर रखा, चूहे समझ नहीं सके। दूसरी बार मैंने अंग्रेजी में लिखा। इस बार समझ तो गए परंतु भ्रष्ट स्वभाव के कारण ऊधम मचाने लगे, अतः तीसरी बार शांत करने के लिए अंग्रेजी में लिखने के अतिरिक्त कुछ द्रव्य भी प्रदान करना पडा।"5 प्रस्तुत निबंध भारतीय नेताओं की दोगली नीति पर कठोर आघात करता है। नेता, अंग्रेजी और घूस का चोली-दामान का रिश्ता है। इसकी सांठ-गांठ से न केवल शिक्षा का बल्कि देश के किसी भी क्षेत्र का भला होना और विकास होना संभव नहीं है। यदि राष्ट्र विकास करना है तो अंग्रेजी, भ्रष्टाचारी वृत्ति और दोगली नीति के, चमचेगिरी करने वाले प्रत्येक नेता के पिछवाडे में लाथ मारकर देश के बाहर निकालना चाहिए। "जिस दिन राज-काज करने वाले यह महसूस करेंगी कि हिंदी द्वारा काम करना सच्चे लोकतंत्र की अनिवार्यता है, उसी दिन हिंदी में काम होने लगेगा, अनुवाद की गति भी तीव्र होकर मौलिक सृजन में बदल जाएगी।"6 यही अनुवाद का कार्य ज्ञान-विज्ञान की सभी किताबों कि सहायता से अपनी भाषा में अध्ययन की सुविधा दे सकता है।

विवेकी राय ने शिक्षा की प्रमुख समस्याओं में भाषाई समस्या पर गंभीर विचार और चिंतन किया है। कथा साहित्य की अपेक्षा निबंधों में भाषाई समस्या पर अधिक प्रकाश डाला है। विवेकी राय हिंदी के पुरस्कार कर्ता रहे हैं। उनके दृष्टि से भारत सच्चे अर्थ में तब तक आजाद नहीं होगा जब तक अपनी भाषा में संपूर्ण व्यवहार नहीं करता। हिंदी भाषा को राष्ट्रीयता के साथ जोडकर सबसे पहले शिक्षा के माध्यम के रूप में लागू करना चाहिए। अंग्रेजी भाषा में बंधक बनी संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था भारतीयों के लिए बहुत बडी विडंबना और शाप है।

संदर्भ संकेत-

1. (सं.) शशि भारद्वाज- भाषा, मई-जून, 2001, पृ. 16 (हिंदी का आंतरराष्ट्रीय रूप- जोगेंद्र सिंह)

2. (सं.) विजयकुमार देव- अक्षरा, मई-जून, 2002, पृ. 21 (विश्वभाषा हिंदीः प्रतिष्ठा का अभियान- कैलाशचंद्र पंत)

3. विवेकी राय- समर शेष है, पृ. 463

4. विवेकी राय- नई कोयल, पृ. 93

5. विवेकी राय- फिर बैतलवा डाल पर, पृ. 131

6. (सं.) तुलसी रमण- विपाषा, सितंबर-अक्तुबर, 2001, पृ. 31, (प्रशासनिक हिंदी में अनुवाद का स्थान- जगदीश चतुर्वेदी)

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद.

ब्लॉग drvtshinde.blogspot.com

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  1. wastvikta ka bebaak warnan kiya aapne shinde sahab .....neta na to desh ka phayda sochte hain n hi aam insan ka unhe siraf apni phikra hai ...

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    1. डॉ.निशा जी आपने सही कहा है वर्तमान में अपने देश के भीतर जितनी भी असंगतियां और मुश्किले निर्माण हुई है उसका मूल कारण वर्तमान का नेता ही है। उसकी सोच में सबसे पहले अपना विकास होता है और समय बचा तो देश और आम जनता का। और सच कहे जो नेता या व्यक्ति अपना सोचना शुरू करता है वहां से वह मुक्ति पाता ही नहीं। अपना सोचना गलत तो नहीं पर देश और दुनिया को बेच कर अपना सोचना सौ फिसदी अपराध की कॅटॅगिरी में आता है।

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  2. गंभीर प्रयास किये जाने आवश्यक हैं | हिंदी का मान बना रहे इसी में हमारा भी मान है

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    1. हिंदी वैज्ञानिक और शास्त्रीय भाषा है। उसमें ताकत और शक्ति है, थोडा समय लगेगा पर आपने जैसे कहा है 'गंभीर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है' अगर ऐसे हुआ तो केवल भाषा का विकास नहीं होगा तो वरन् देश की गति दस गुना रफ्तार पकडेगी।

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  3. '' निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल
    बिनु निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय को शूल ''
    आशा है कि हिंदी सबके ह्रदय में प्रतिष्ठित हो .

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    1. भारतेंदु जी ने सही कहा था। उनके समकालीन जितने भी देशभक्त थे उन्होंने देश के भविष्य को न केवल भाषा के दृष्टि से तो सर्वांगीण विकास को ध्यान में रख सोचा था, बडी इमानदारी के साथ। पर आज इमानदारी गायब है। पर आपने जिस आशा की बात की है वह जरूर पूर्ण होगी पर थोडा समय लगेगा।

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  4. हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा होते हुए भी वह स्थान नहीं पा सकी है .इसके बहुत से कारण रहे हैं .हिंदी भाषा तो एक ज्वाला मुखी के तरह है उसे कौन रोक सकता है हाँ कुछ लोग जो सत्ता में है वो हिंदी के रास्ते के अवरोधक जरुर हैं .विवेकी राय जी ने सही कहा सब से पहले हिंदी भाषा को राष्ट्रीयता के साथ जोड़ कर शिक्षा में अनिवार्य कर देना चाहिए। उनके और आपके और भी राय अच्छे लगे .सरकार को इस पर और ध्यान देने की जरुरत है . बहुत अच्छी हिंदी आलेख और चर्चा....... धन्यवाद .

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    1. रंजना जी आलेख पसंद आया आभार। आपने हिंदी भाषा की मूल ताकत को लेकर जो एक महत्त्वपूर्ण वाक्य लिखा है 'हिंदी भाषा तो एक ज्वालामुखी की तरह है उसे कौन रोक सकता है' सारे हिंदी प्रमियों के लिए आशादायी है।

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  5. "...ब्रह्मांड बन मेरे मस्तिष्क में चक्कर काट रहा है। जीवन की सरलता का अर्थ कागज पर उतरी एक विदेशी लिपि, विदेशी भाषा, भाषा में एक पाठ और पाठ में... "

    उपरोक्‍त वाक्‍य में ब्रह्माण्‍ड बन क्‍या घूमता है? और पाठ में......क्‍या है?

    विवेकी राय जी के हिन्‍दी समर्थित निबन्‍धन प्रगाढ़ मौलिकता और अधिकार के साथ हिन्‍दी को लागू करने की मांग करते हैं। बहुत ही प्रेरित निबन्‍ध छन्‍द प्रस्‍तुत किए हैं आपने।


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    1. विकेश जी आपने ऊपर पूछा है ब्रम्हांड बन क्या घूमता है? मूल पाठ के भीतर रामराज नामक पात्र के सामने मुश्किल है कि वो बचपन से ग्रामीण इलाके में पला बडा, उसकी भाषा, संस्कृति और संस्कार ठेठ गांव के, पर जैसे ही पढाई हेतु शहर में प्रवेश और अंग्रेजी से माथापच्ची शुरू होती है तब भाषा समझ में न आने के कारण 'दी गांधीयन वे' के विचार समझ में नहीं आते हैं। दोनों लेखक देशी पर भाषा के कारण ग्रामीण युवक रामराज को मुश्किल लगते हैं। और किताबों के साथ संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था ब्रम्हांड बन घूमने लगती है।

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  6. भाषा राष्ट्र की एकता, अखंडता तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि राष्ट्र को सशक्त बनाना है तो एक भाषा होना चाहिए। इससे धार्मिक तथा सांस्कृतिक एकता बढ़ती है।

    वैसे तो देश में कई भाषाएँ और हैं,
    पर राष्ट्र के माथे की बिंदी है ये हिंदी

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    1. आपने सही कहा है राजेंद्र जी यदि राष्ट्र को सशक्त बनना है तो एक भाषा का निर्णय लेना जरूरी है चाहे वह एक भाषा हिंदी हो, अग्रेंजी हो या अन्य कोई। इतने सालों से लटके रहना सबके लिए हानिकारक है। आपने हिंदी की बात कहीं है, उसमें सच्चे मायने में ज्ञान भाषा होने का दमखम है। इसिलिए तो कहा जाता है-
      'मैं राष्ट्र गगन के माथे की बिंदी हूं।
      सबकी जानी पहचानी राष्ट्रभाषा हिंदी हूं।'

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  7. आपने सही कहा है राजेंद्र कुमार जी राष्ट्र को सशक्त बनाना है तो एक भाषा का होना अत्यंत आवश्यक है।
    'मैं राष्ट्र गगन के माथे की बिंदी हूं।
    सबकी जानी पहचानी भाषा हिंदी हूं।'
    हिंदी के लिए कहा तो जाता है पर बिना कठोर कदम उठाए कुछ होगा नहीं। वास्तव यह है कि हम-आप क्या कह रहे हैं कोई मायने रखता नहीं व्यापक तौर पर साहसिक कदम प्रशासनिक और राजनैतिक तौर पर उठाने जरूरी है। किसी भी अन्य भाषा से परहेज नहीं पर ज्ञान और पढाई की एक ही भाषा होना जरूरी है, इतना तो सच है।

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  8. बहुत अच्छी हिंदी आलेख ,सोचने की जरूरत है ।

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    1. राजपुत जी जुडने के लिए आभार। जैसे ही छुट्टियां खत्म होगी मेरा आपसे जुडना हो जाएगा। आलेख पसंद आया धन्यवाद।

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