शनिवार, 25 मई 2013

महावीर सरन जैन का आलेख - संस्कृत भाषा काल में विभिन्न समसामयिक अन्य लोकभाषाओं/ जनभाषाओं का व्यवहार

संस्कृत भाषा काल में विभिन्न समसामयिक अन्य लोकभाषाओं/ जनभाषाओं का व्यवहार होता था या नहीं

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

काल की दृष्टि से भारतीय आर्यभाषाओं को तीन वर्गों में विभक्त किया जाता है।

(क) प्राचीन भारतीय आर्य-भाषा (प्रा0भा0आ0भा0 काल) - 1500 ई0 पूर्व से 500 ई0 पूर्व तक।

(ख) मध्य भारतीय आर्य-भाषा (म0भा0आ0भा0 काल) - 500 ई0 पूर्व से 1000 ई0 तक।

(ग) आधुनिक भारतीय आर्य-भाषा (आ0भा0आ0भा0 काल) - 1000 ई0 से वर्तमान समय तक।

प्राचीन भारतीय आर्य भाषाएँ :

इन भाषाओं का प्राचीनतम रूप ऋग्वेद में देखने को मिलता है। ऋग्वेद का समय अनिश्चिचित है। ऋग्वेद के मंत्रों को पढ़ने से ज्ञात होता है कि उनकी रचना का समय एवं स्थान फैला हुआ है। ऋग्वेद कई शताब्दियों और कई स्थानों की रचना है। उसमें विद्यमान भाषा-भेदों के कारण हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं। ये भाषा-भेद देश और काल के भेद के कारण हैं। ऋग्वेद के दस मंडलों में से प्रथम और दशम मंडल अपेक्षाकृत बाद की रचना प्रतीत होती हैं। ऋग्वेद के दूसरे मंडल से लेकर सातवें मंडल तक का भाग सबसे प्राचीन है।

(HERMANN OLDENBERG: Prolegomena on Meter and Textual History of the Rig-Veda, trans. into English V. G. Paranjape and M. A. Mehendale (from Metrische und textgeschichtliche Prolegomena, Berlin, 1988), Delhi: Motilal Banarsidass, 2005)

ऋग्वैदिक साहित्य के अन्तर्गत संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् आते हैं। संहिता से उपनिषद् तक का विकास भाव-धारा की दृष्टि से ही नहीं भाषा की दृष्टि से भी महत्वपूपर्ण है। यह विकास शताब्दियों मे ही सम्भव हुआ । भाषिक अध्ययन की दृष्टि से ब्राह्मण-ग्रन्थों का महत्व अधिक है। इसका कारण यह है कि ये ग्रन्थ मुख्यतः गद्य में हैं। उनसे वाक्य-रचना की प्रणाली को जानने में सहायता मिलती है।

जिस भाषा में ऋग्वेद की रचना हुई है, वह बोलचाल की भाषा न होकर उस समय की मानक साहित्यक भाषा थी। उसके समानान्तर लोक-भाषाएँ भी रही होंगी किन्तु उनके लिखित साहित्य के अभाव के कारण उन्हें जानने का कोई साधन अब नहीं है। ऋग्वेद में वर्णित है कि जैसे सूप से सत्तू को शुद्ध किया जाता है वैसे ही बुद्धिमान लोग बुद्धिबल से परिष्कृत भाषा को प्रस्तुत करते हैं (ऋग्वेद, 10/ 71 - 2 )।

हमें प्राचीन एवं मध्यकाल के भारतीय आर्य-भाषाओं के साहित्यिक भाषिक रूप ही उपलब्ध हैं। विभिन्न क्षेत्रों एवं राज्यों में सामान्य जन के द्वारा बोले जाने वाले भाषिक रूप उपलब्ध नहीं हैं। किसी काल में सामान्यतः साहित्यिक भाषा का आधार उस काल की मानक / सम्पर्क भाषा होती है। भारतीय आर्य-भाषाओं के विकास के परम्परागत अध्ययनों को पढ़ने के बाद पाठक को यह प्रतीति होती है कि प्राचीन एवं मध्यकाल में तो भाषाओं की संख्या कम थी मगर आधुनिक काल में भाषाओं की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हो गई। इस प्रकार की धारणा अवैज्ञानिक तथा अतार्किक है। इसका कारण यह है कि आधुनिक काल में सामाजिक सम्पर्क बहुत बढ़ा है तथा निरन्तर बढ़ रहा है। यह सर्वमान्य सिद्धान्त है कि किसी भाषा क्षेत्र में सामाजिक सम्पर्क जितना अधिक होता है, भाषा भेद उतना ही कम होता है। वैदिक साहित्य का अध्ययन करने पर इतना तो पता चल ही जाता है कि वेदों की छान्दस् भाषा को उदीच्य प्रदेश के पुरोहित सबसे शुद्ध मानते थे तथा उस काल में मध्यदेशी एवं प्राच्य आदि जन भाषाएँ भी बोली जाती थीं। डॉ० बाबूराम सक्सेना ने प्रतिपादित किया है कि ऋग्वेदसंहिता के सूक्ष्म अध्ययन से मालूम होता है कि उसके सूक्तों में जहाँ तहाँ बोली भेद हैं।

(मध्यदेश का भाषा विकास : नागरी प्रचारिणी पत्रिका, वर्ष 50, अंक 1-2, सम्वत् 2002 (सन् 1945))।

विद्वानों के एक वर्ग की मान्यता है कि वैदिक भाषा से लौकिक संस्कृत का विकास हुआ है। विद्वानों के दूसरे वर्ग का मत है कि संस्कृत का विकास वैदिक के बदले तद्युगीन किसी बोली से हुआ जो अनेक कारणों से महत्वपूर्ण बन गयी। वैदिक एवं लौकिक संस्कृत के भाषिक विकास के गहन अध्ययन से दूसरा मत अधिक तर्क संगत प्रतीत होता है। इसका तार्किक आधार यह भी है कि किसी लोक भाषा का संस्कारित रूप ही संस्कृत है। संस्कृत का अर्थ ही है - संस्कारित भाषा। इस वर्ग की मान्यता को समझने के लिए हम खड़ीबोली का उदाहरण ले सकते हैं। अपभ्रंश काल में शौरसेनी का सम्पर्क भाषा के रूप में व्यवहार होता था। 15 वीं शताब्दी से लेकर 18 वीं शताब्दी तक शौरसेनी की परम्परा का निर्वाह ब्रज ने अधिक किया। राजनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक आदि कारणों से दिल्ली के चतुर्दिक बोली जाने वाली खड़ी बोली हिन्दी भाषा-क्षेत्र की अन्य उपभाषाओं / बोलियों की तुलना में आगे निकल गई और अन्य उपभाषाओं एवं पंजाबी आदि भाषाओं के भाषिक तत्वों के समाहार से स्वाधीनता आन्दोलन के समय सम्पूर्ण भारत की सर्वमान्य राष्ट्रभाषा बन गयी । राष्ट्रभाषा या साहित्यिक भाषा बनने का यह अर्थ नहीं कि उसके बाद हिन्दी भाषा क्षेत्र की अन्य उपभाषाओं / बोलियों का व्यवहार होना बन्द हो गया । संस्कृत भाषा भी समसामयिक अन्य लोकभाषाओं/ जनभाषाओं की तुलना में आगे निकल गयी और भारत की सांस्कृतिक भाषा बन गयी । यह प्रश्न उपस्थित किया जा सकता है कि इसका क्या प्रमाण है संस्कृत काल में अन्य जन भाषाएँ विद्यमान थीं। इसका कारण यह है कि वे भाषिक रूप उपलब्ध नहीं हैं। इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि साहित्य में ही यत्र तत्र कुछ उल्लेख मिलते हैं जो उस काल की भाषा-भिन्नताओं की सूचना देते हैं। अथर्ववेद के 12 वें कांड के पृथिवी सूक्त में “जन बिभ्रती बहुधा विवाचसं” का उल्लेख प्राप्त है जिससे सामान्य जनों द्वारा विविध भाषिक रूपों के अस्तित्व का संकेत प्राप्त होता है। वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धा कांड में शुद्ध भाषा सीखने हेतु व्याकरण का अध्ययन करने तथा अपभाषित से बचने के निर्देश प्राप्त हैं। इसी रामायण के हनुमान जब राम का संदेश लेकर लंका में सीता के पास पहुँचते हैं तो उनके मन के द्वन्द को रचनाकार ने अभिव्यक्त किया है। द्वन्द का कारण है कि सीता को संदेश किस भाषा में दिया जाए - दैवी भाषा संस्कृत में अथवा मानुषी भाषा में। हनुमान अपने से प्रश्न करतें हैं कि “यदि मैं दैवी भाषा शुद्ध परिष्कृत संस्कृत में बात करूँ तो कहीं देवी सीता यह न समझ लें कि मैं रावण द्वारा वानर का भेष बनाकर आया हूँ” :

यदि वाचं प्रदास्यामि मानुषीमिह संस्कृताम्।

रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति।

(वाल्मीकि रामायण – 5/30/17-19)

कालिदास के कुमार सम्भव में वर्णित है कि शंकर एवं पार्वती के विवाह के अवसर पर सरस्वती शंकर से जिस भाषा में बात करती हैं उससे भिन्न भाषा में वे पार्वती से बात करती हैं। भरत मुनि ने नाना देशों के प्रसंग के अनुसार भाषिक प्रयोगों का विधान किया है।

(नाट्यशास्त्र, 18/ 17-19)।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि यद्यपि संस्कृत भाषा काल में हमें विभिन्न समसामयिक अन्य लोकभाषाओं/ जनभाषाओं के रूप उपलब्ध नहीं हैं तथापि भाषा-व्यवहार की सर्वसामान्य मान्यता तथा तद्युगीन साहित्य के उपर्युक्त संदर्भों के आधार पर यह माना जा सकता है कि संस्कृत भाषा काल में विभिन्न समसामयिक अन्य लोकभाषाओं/ जनभाषाओं का व्यवहार होता था।

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