गुरुवार, 16 मई 2013

दिनेश पालीवाल का व्यंग्य - सरकार में घुस, घूस खा, मौज कर!

व्‍यंग्‍य

सरकार में घुस, घूस खा, मौज कर!

घूस खाने के लिए सरकार में या तो खुद घुसो या फिर अपने किसी रिश्‍तेदार के घुसने पर उसके रिश्‍ते को घूस का जरिया बनाओ। आज का यही राजनीतिक फंडा है जिसका डंडा और डंका पूरे देश में चल और बज रहा है। बलिहारी मंत्री जी आपके, घूस दयी दिलवाय! खुद मंत्री न बन पाएं, कोई बात नहीं। मंत्री से निकट की रिश्‍तेदारी है तो भी चलेगा। मंत्री के नाम पर रिश्‍वत के वारे-न्‍यारे करो। खुद खाओ और मंत्री जी को खिलाओ या जब मंत्री जी चुनाव लडे तो उनके चुनावी क्षेत्र में चुनाव के संचालक बन कर उस खाए पैसे के हिस्‍से से मंत्री जी की जीत के लिए वोट खरीदो। चुनाव जितवाओ ताकि आगे भी खाने-पीने का डौल बना रहे। यही तरोताजा ताकत का मंत्र है भैए! इसी से आपकी मर्दाना कमजोरी दूर होती है। आपका हाजमा बढ़ता है। अफसरी में आपकी असरदार सरदारी चलती है। मंत्री जी चुनाव जीतते हैं और आपका भविष्‍य न केवल सुरक्षित होता है बल्‍कि आपकी पांचों उंगलियां घी में डूबी रहती हैं और आपको मलाई-मक्‍खन खाने की गारंटी मिली रहती है।

इसीलिए आजकल की सरकारें मां-बेटे की सरकारें है या बाप-बेटों की । भैया-भाभी की सरकारें हैं या बाप-बेटी, ससुर-बहुओं की। बहरहाल हर हाल में सत्‍ता पर काबिज आजकल सिर्फ परिवार ही बने हुए हैं। बंसल जी ने सफााई दी कि वे भांजे के मामा जरूर हैं पर मैया मैं नहिं रिश्‍वत खायो! विपक्ष हम सबके बैर परो है, बरबस स्‍तीफा मांगने को शोर मचायो! मेरे करोबारी संबंध अपने भांजे से नहीं हैं। बहन का लड़का है तो खामखां उसके लपेटे में विपक्ष ने मोहे लपटायो! मैया मैं नहीं रिश्‍वत खायो! यह दूसरह बात है कि चंडीगढ़ में उनके चुनाव का मैनेजमेंट वही भंजे जी करते हैं और वही भारत सरकार के रेल मंत्रालय में आला अफसर हैं। मामूजान रेल मंत्री बने तो वे क्‍यों केवल संतरी बने रहें? क्‍यों न मामा के नाम पर नामा कमाएं? माल काटें। हर कोई सरकार में यही कर रहा है। मामू के भांजे ने किया तो क्‍या बुरा किया?

मंत्री जी कह रहे हैं कि उनके अपने भांजे से कोई कारोबारी संबंध नहीं हैं। क्‍या ऐसे संबंध कोई बेवकूफ लिखत-पढ़त में बनाता है? वे तो बस होते हैं और उनकी वदौलत दौलत के वारे-न्‍यारे होते रहते हैं। पकड़े जाएं तो पल्‍ला झाड़ लो कि हमारे उनसे कारोबारी संबंध नहीं हैं! वरना बिना डकार लिए ढकोसते जाओ! रिश्‍तेदारी का यही मजा है। चोर-चोर मौसेरे होते हैं। लाख सफाई दी जाए, कालिख तो लगेगी ही। ये पब्‍लिक है और पब्‍लिक सुसरी सब जानती और समझती है कि किस दीवार में कहां-कहां कितना पानी मर रहा है। सीलन की गीलन कहां-कहां तक पहुंच रही है और दीवार कहां-कहां से दरकती जा रही है। कहां-कहां से कितनी गिरने वाली है। गिरती दीवारों के नीचे कांग्रेसी नीरो की तरह बैठे चैन की बंसी बजा रहे हैं। दीवारें गिरती हैं तो गिरती रहें पर अपने आदमियों की हर हाल में रक्षा करो। एक को निकालोगे, एक से स्‍तीफा लोगे तो सबसे स्‍तीफा लेना पड़ेगा।

ऐसे तो पूरी सरकार का ही स्‍तीफा हो जाएगा। पी एम तक पर कोयला की कालिख पुती हुई है। पी एम से स्‍तीफा लो तो पूरी सरकार का ही स्‍तीफा हो जाएगा, इसलिए घपलों-घोटालों-रिश्‍वतों की तरफ से आंखें मूंदे रहो। खाने वालों को खाने दो। आखिर वे सब अपने हैं। खएंगे-कमाएंगे तभी तो चुनाव पैसे की दम पर जीतेंगे! जीतेंगे तभी तो अपनी सरकार बनेगी। सरकार बनेगी तो अपनी दाल जम कर गलेगी। अपनों के हजार खून माफ! विपक्ष चिल्‍लाता है तो चिल्‍लाने दो। विपक्ष की आदत बन गई है, हर किसी से हर हगनी-‘मूतनी हरकत पर स्‍तीफा मांगने की! भौंकने दो उन्‍हें। हाथी की तरह अपनी मस्‍त चाल में यों ही झूमते-झूलते चलते रहो। आग लगे बस्‍ती में, अपन राम मस्‍ती में! मस्‍ती मारो यारो। जनता मरती है तो मरने दो। जनता का काम है, मरना और अपना काम ह,ै राज करना, राज के नाम पर देश को डकारना। डकारते रहो और डकार भी मत लो कि जनता को पता चले कि खाया-पिया जा रहा है।

बुरा हो सी बी आई का। कर्नाटक के चुनाव के ऐन वक्‍त बंगलौर की कंपनी का रिश्‍वती कांड उजागर कर दिया और सरकार की किरकिरी कर दी। पकड़-धकड़ कर मंत्री तक आंच पहुंचा दी और मंत्री को बचाने में पूरी पार्टी की जान सांसत में डाल दी। सी बी आई ने यह हरकत कर अपनी छवि सुधारने की नाजायज हरकत कर डाली। उसकी यह हिमाकत कि वह अपने आकाओं को ही निशाने पर ले डाले! कोर्ट अपनी किरकिरी बचाने के लिए ऐसे कारनामे कर डाले!

--डॉ दिनेश पालीवाल

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  1. बहुत मजेदार व्यंग्य ... खूबसूरती से बनायीं गयी कहावतें और मुहावरे ... जैसे डंडा और डंका , बलिहारी मंत्री जी आपने , घूस दई दिलवाय ,.... और मैया मोरी में नहीं रिश्वत खायो ....

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