रविवार, 26 मई 2013

सुरेश सर्वेद की कहानी - यंत्रणा

कहानी

यंत्रणा

सुरेश सर्वेद

मेरे खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज होते ही मैं निकृष्ट जीवन व्यतीत करने लगा. मुझ पर विद्युत कर्मचारी से मारपीट करने का आरोप था. मेरे खिलाफ दो दो धाराएं लगी थी. हालांकि मैंने न मारपीट की थी न ही जान से मारने की धमकी दी थी चूंकि विद्युत कर्मचारी ने आरक्षी केन्द्र में मेरे विरुद्ध रिर्पोट दर्ज करा दी थी अतः मामला बना कर मेरे विरुद्ध कार्यवाही शुरु कर दी गई थी. मेरा प्रकरण न्यायाधीश मित्तल के न्यायालय में विचाराधीन था. लगी धाराओं के अनुसार प्रमाणित होने पर मुझे सात वर्ष तक की सजा मिल सकती थी. सात वर्ष के कारावास की सजा की याद से ही मैं कांप उठता. वैसे तो एक दिन की सजा भी सजा होती है पर मेरे विरुद्ध जो आपराधिक प्रकरण दर्ज किये गये थे. वह तो लम्बे समय तक जेल यात्रा की ओर संकेत कर रहे थे. सुनी सुनायी कहानी यह थी कि कारागृह का न सिर्फ प्रभारी ही अपितु वहां एक सिपाही से लेकर पुराने कैदी तक नये लोगों से वह व्यवहार करते है जो किसी भी स्थिति में उचित नहीं. सिपाही हवलदार और प्रभारी तो पिटते ही हैं वहां के पुराने कैदी भी अपनी बात मनवाने के लिए पिटाई कर देते हैं.

वहां काम भी बेहद लिया जाता है. न करने पर दण्डित किया जाता है. हालांकि मेरे अधिवक्ता तपन मुझे निर्दोष घोषित करवाने कृतसंकल्प थे. जब भी पेशी होती मुझे सांत्वना का अमृत अवश्य पिलवा देते . मुझे उनकी सांत्वना से थोड़ी राहत मिलती मगर क्षण भर बाद ही मैं फिर अपने विचारों में उलझ जाता मुझे हर क्षण यही अनुभव होता कि मेरा अपराध प्रमाणित हो चुका है और मैं कारागृह में सजा भोगने पहुंच चुका हूं. मैं जब भी न्यायालय जातामेरी द्य्ष्टि न्यायालय के भृत्य पूर्णेन्दू पर जा टिकती. मैं उसे हर पेशी में दस रुपये देता. वह उल्टा पुल्टा नामपुकारने में माहिर था. जो पैसा देने में अनाकानी करता उसका नाम बिगाड़ कर पुकार देता और वह व्यक्ति उपस्थित नहीं हो पाता जिसकी पेशी होती. उस पर कार्यवाही शुरु हो जाती. मैं भी डरते रहता कि मेरा भी नाम बिगाड़ के पुकार न दे इसलिए उसे बिना मांगे ही दस का नोट थमा देता. मेरी मुलाकात विकास से हुई. वह अधिवक्ता तपन का मुंशी था. उसने मुझसे कहा कि यदि तुम्हारे अपराध प्रमाणित हो गये तो समझो तुम्हारी नौकरी गयी. मैं सोचने लगा कि इसका कहना गलत नहीं .

नौकरी तो जायेगी ही साथ ही कारावास की सजा भी भोगनी पड़ेगी. कारावास की सजा मिली नहीं कि वे लोग ही मुझसे घृणा करने लगेंगे जो मुझे मान सम्मानदेते हैं. व्यक्ति जब समुद्र में डूबने लगता है तो वह तिनके को ही सहारा समझ कर उससे किनारे लगने की सोचता है पर यह संभव नहीं हो पाता पर आशा नहीं छूटती. यही हाल मेरा था हालाकि मैं यह जानता था कि मुंशी मेरी क्या मदद करेगा वह मुझे क्या बचायेगा बावजूद जाने क्यों मुझे ऐसा लगने लगा कि यही तिनका मुझे किनारा लगा सकता है. मैंने कहा-विकास तुम कोई ऐसा उपाय करो कि मैं बाईज्जत बरी हो जाऊं मेरी नौकरी भी बचेगी और जगहसाई भी. एक मुंशी होकर भी मेरी बात को उसने जिस गंभीरता से लिया उससे मेरा विश्वास उस पर जम गया. जब किसी को सजा होती या दण्ड मिलता तो मुझे लगता उसे निर्णय उसके विरुद्ध नहीं अपितु मेरे विरुद्ध गया है और मैं परेशान हो उठता उस दिन मैं न ढंग से खा पाता था और नहीं रात में चैन की नींद सो पाता था. मगर जब कोई बाईज्जत बरी होता तो मैं खुश हो जाता. उस दिन मैं भर पेट खाता और रात में चैन की नींद सोता. मैं यह जान चुका था कि न्यायालय में जीत उसकी होती है जिसके पक्ष में गवाह गवाही देता है. मुझे सदैव अपने विरोधी गवाह की गवाही पर शक लगा रहता मैं यह मान गया था कि मेरे विरुद्ध गवाही दी जायेगी और मेरा अपराध करना मान लिया जायेगा.

हालांकि मेरे अधिवक्ता अक्सर यह कहा करते थे कि यदि तुम यहां से दण्डित हो गये तो हम आगे के न्यायालय में अपील करेंगे पर मैं तो यहां एक ही न्यायालय के चक्कर काट कर पस्त हो चुका था. दूसरे न्यायालय में अपील करने की सोचना भी मेरे लिए भारी पड़ता था. मन तो कई बार अपने विरोधी गवाह से बात करने की होती मगर बात नहीं कर पाता था. उससे मेरी कोई दुश्मनी भी नहीं थी. हम अक्सर मिलते. उसके सामने होते ही जहां मैं आंखे चुरा लिया करता था वहीं वे चिल्लाकर मुझे नमस्कार किया करता था. मुझे लगता कि वह मुझे सम्मान न देकर मेरी हंसी उड़ा रहा है और कह रहा कि मैं ऐसी गवाही दूंगा कि तुम जिन्दगी भर जेल की हवा खाओगे. यह तो था उसके प्रति मेरे मन का विचार पर वह मेरे बारे में वास्तव में क्या सोचता था यह तो वही जाने पर जिस दिन उसकी गवाही हुई. गवाही के बाद अधिवक्ता तपन ने जिस प्रकार से बातें मुझे बतायी इससे मैं अनुभव कर लिया कि वह मेरा दुश्मन नहीं बना. यानि उसने मेरे विरुद्ध बयान नहीं दिया.

हर पल हर क्षण मैं भयभीत भयाक्रांत रहता . न मैं किसी से ढंग से बात कर पाता था न किसी से खुल कर मिल पाता था. तरह तरह के विचार मेरे मन में उठते रहते. मैं स्वयं को कभी कारावास में पाता तो कभी स्वतंत्र विचरण करते हुए. जिस दिन मेरे प्रकरण का निर्णय होने वाला था. अदालत तो ग्यारह बजे लगती थी मगर मैं नौ बजे ही वहां टिक गया था. अधिवक्ता का अता पता नहीं था. मुझे उस पर गुस्सा आने लगा था. मेरे मन में विचार उठने लगा था कि मेरे अधिवक्ता मेरे विरोधी के पक्ष में तो नहीं चला गया. पर क्षण भर बाद ही अब तक की हुई प्रक्रिया पर विश्लेषण करता तो अपने ही विचार के प्रति मुझे स्वयं पर गुस्सा ही नहीं तरस भी आने लगता. अधिवक्ता अपने सही समय पर पहुंच गये. वे दूसरे पक्षकारों के काम निपटाने लगे. मैं बार बार उससे पूछता मैं निरपराध घोषित होंऊगा या नहीं. मैं बार बार उनके कार्य में अवरोध पैदा करते रहता. कई बार तो वह गुस्सा जाते फिर अपने को नरम करते हुए कहते- हां भई हां,तुम निरापराध घोषित होओगे. मुझे कुछ आवश्यक काम है उसे निपटाने दो. ‘ मैं यह भली भांति जानता था कि मेरे अधिवक्ता जिम्मेदार व्यक्ति है मगर वे जैसे ही किसी दूसरे कार्य से दूसरी ओर जाता तो मुझे लगता कि निर्णय के समय तक ये पहुंच नहीं पायेगें और मुझे सजा सुना दी जायेगी मगर ऐसा नही हुआ. जैसे ही मेरी पुकार हुई मेरे अधिवक्ता पहुंच गये. टाइप राइटर चलने लगा .

मैं जान गया था कि इस टाइप राइटर से मेरा भविष्य लिखा जा रहा है. जैसे जैसे टाइप राइटर की बटन दबती तो कभी मुझे मेरा भविष्य उज्जवल दिखता तो कभी मुझे लगता मेरा भविष्य चौपट होने वाला है. जब मैं चाह रहा था कि जो कुछ भी टाइप किया जा रहा है. उसे मैं देखूं पर क्या यह संभव था. कदापि नहीं. मेरे हाथ पैर शून्य होने की स्थिति में पहुंच चुके थे. मैं मानसिक यंत्रणा झेल रहा था. मेरे अधिवक्ता निश्चिंत थे . मेरा मन निर्णय सुनने बेचैन था. मेरी बेचैनी को कोई महसूस नहीं कर रहा था. निर्णय जैसे ही मेरे पक्ष में आया. मुझे बाईज्जत बरी होने का निर्णय सुनाया गया. मैं इतना खुश हुआ कि अधिवक्ता समेत न्यायाधीश के कदम चूमने का मन हुआ पर मैं उतावला नहीं हुआ. मैंने आभार व्यक्त किया और अपने घर की ओर लौट गया. हालांकि मैं बाइज्जत बरी हो चुका था पर आरक्षी केन्द्र से लेकर न्यायालीन प्रक्रिया में भोगे दिनों की यंत्रणा चाह कर भी मैं नहीं भूल पाता.

साईं मंदिर के पीछे,

वार्ड नं 16

तुलसीपुर राजनांदगांव छत्तीसगढ़

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