शनिवार, 11 मई 2013

आस्था अग्निहोत्री की लघुकथा - अधर्मी

मंत्रों का उच्चारण करते-करते न जाने कब तुम्हारा नाम जपने लगी  ...पुरोहित बहुत नाराज़ हुआ ... दुनिया ने भी तीखी नज़रों से मेरी ओर देखा ...घर वाले चीखे ... अरे मूर्ख ये क्या बक रही है ... भगवान् तुझे माफ़ नहीं करेंगे ...उनका मज़ाक उड़ाते तनिक भी लज्जा नहीं आती ...मैं मुस्कुरायी और बोली ...नहीं आती ...जब तुम लोगों को धर्म के नाम पर ये आडम्बर करने में लज्जा नहीं आती तो भला मुझे प्रेम करने में क्यों लाज आये ...जिस भगवान् और जात-धर्म के नाम पर तुम लोग एक-दूसरे का खून बहाते हो,नफरत फैलाते हो ...उस भगवान् ने तो सिर्फ प्रेम ही रचा था ...उसी ने रचा था वो प्यार से भरा सेब जिसे कभी आदम और हव्वा ने खाया था ...जिस प्रेम के कारण इस सृष्टि का निर्माण हुआ ...धर्म के नाम पर लोगों को भड़काने का काम तो तुम जैसों ने किया ...और आज भी कर रहे हो ...जब तुम्हें इसमें लाज नहीं आती तो भला मुझे अपने प्रियतम का नाम जपने में क्यों आये ...

प्रेम करना और प्रेम फैलाना तो भगवान् का काम करने जैसा है ...भगवानों के लिए बनायी गई इन आलीशान इमारतों,हीरे जड़े तख्तों,सोने के मुकुटों,धर्म के नाम पर होने वाले व्यापारों और आडम्बरों को छोड़ कर ...वो हर जगह निवास करता है ... मेरे भी दिल में और मेरे प्रियतम के नाम में भी ...हर उस गरीब में जो पूजाघरों के बाहर भूख से बिलख के मर जाता है ... जिसे दूध,तेल और खाना खिलाने की जगह पत्थर की मूर्तियों पे बहाना ज्यादा उचित समझा जाता है ...अपने साड़े साती उतारने के लिए लोग लाखों बहा देते हैं ...करोड़ों के रत्न अपनी उँगलियों पे जड़वा लेते हैं ...मगर किसी गरीब औरत के तन को ढकना उन्हें ज़रूरी नहीं लगता ...

अगर इतना कुछ होने पे लोगों को लाज नहीं आती तो मुझे क्यों आये भला ... बस इतना सुनना था की सब मेरी जान के दुश्मन हो गए ...कल हिन्दुओं के किसी संगठन ने मेरे खिलाफ एक फतवा जारी कर दिया ... की मैं अधर्मी हूँ ... हिन्दू और ब्राह्मण समाज के लिए एक कलंक हूँ ...इसलिए मुझे हिन्दू समाज से बेदखल किया जाता है ...और मेरा किसी भी मंदिर में जाना या किसी भी धार्मिक अनुष्ठान में हिस्सा लेना वर्जित है ...

सच मैं आज बहुत खुश हूँ ...वक़्त लगा लेकिन इस पाखण्ड से मेरा पीछा छूटा ...जब धर्म हैवानियत पे उतर आये तो मुझे अधर्मी होने में लाज नहीं आएगी ...मैं भगवान् के दिए हुए प्रेम के वरदान के साथ ताउम्र खुश रह सकती हूँ ...बिना शर्म के बिना किसी धर्म के ...

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  1. युवा पीढ़ी के साथ एक अच्‍छी बात है कि उसे सिर्फ भावना के नाम पर नहीं बहलाया जा सकता। उसे तर्क चाहिये और अपनी बात कहने के लिए भी उसके पास तर्क हैं। आस्‍था के ये तेवर अच्‍छे लगे। खूब

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  2. बहुत शानदार अभिव्यक्ति.. हर पंक्ति में अपने प्रियतम के प्रति जो भाव साझा किया जा रहा हैं वो सचमुच लाजवाब हैं|सबसे अच्छी बात की लेखिका आस्था को खारिज नहीं करती बस कुछ अंधविश्वासों एवं व्यर्थ की बातों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं|पहली ही पंक्ति पढ़ते मुंह से "आह" निकल पड़ता हैं !मंत्रों का उच्चारण करते-करते न जाने कब तुम्हारा नाम जपने लगी..

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