सोमवार, 6 मई 2013

उमेश मौर्य की लघुकहानी - सावधान- अंतिम खबर

सावधान- अंतिम खबर

न कहीं तूफान आया, न कही बाढ़ आयी, न कहीं अकाल, न कहीं बम धमाका, न ही कहीं कोई बड़े घोटाले का केश लेकिन हर आदमी एकदम बौखलाया हुआ था। जो जितना बड़ा आदमी। जो जितना आधुनिक था उतना ही परेशान था। जिनके बैंक बैलेंस ज्‍यादा थे और संचार माध्‍यम पर निर्भर थे। उसी अनुपात में उनकी उलझनें बढ़ी हुई थी। लेकिन क्‍यों सब कुछ तो सामान्‍य था। मौसम समाचारानुसार। तो गड़बड़ कहाँ थी। हुआ ये कि कल सुबह सुबह टी.बी. पर एक समाचार जो कि सारे चैनलों पे समान था। कि अभी 15 मिनट बाद विश्‍व के समस्‍त संचार माध्‍यम के साधन काम करना बन्‍द कर देंगे। दुनिया की सबसे अन्‍तिम खबर यही है। संचार के माध्‍यम से अन्‍तिम आवाज है। जिसका दुनिया भर के किसी भी वैज्ञानिक के पास कोई भी हल नहीं है। विज्ञान की उपलब्‍धियों से केवल कारण ज्ञात किये जा सके हैं निवारण की कोई सम्‍भावना नहीं है। सब ऊपर वाले के हाथ है। अफसोस !

जो गंभीर प्रकृति के व्‍यक्‍ति न थे उन्‍होंने हॅसी में उड़ा दिया। जो गंभीर थे या अति गंभीर उन्‍होंने तैयारियाँ शुरू कर दी। समाचार सच निकला सारे संचार माध्‍यम बंद। सारे नेटवर्किंग मीडिया के सामान डिब्‍बा हो गये। मोबाईल, कम्‍प्‍यूटर, टी वी, रेडियो, इंटरनेट, वायरलेस, रडार, विमान सेवाएं पथ भ्रष्‍ट हो गई, नेट बैकिंग पर आश्रित बैंक विनाश के कगार पर आ गये। जो जहाँ था वहीं था। केवल व्‍यक्‍तिगत रूप से सारे संचार चल रहे थे। बस गाड़ी, डाक, समाचार पत्र इत्‍यादि सभी मशीनी प्रणाली कार्य कर रही थी। कितने लोगों को हार्ट अटैक आ गया। कितनों ने आत्‍महत्‍या कर ली। कितनों के सारे रिकार्ड नेटवर्क के साथ खत्‍म हो गये। कितने धनी भिखारी हो गये।

लेकिन उस गॉव के लोग आज भी मस्‍त थे। जिन्‍होंने आधुनिकता के साथ पूर्णरूप्‍ से हाथ नहीं मिलाया था। उनका आपसी तालमेल, व्‍यवहार संचार माध्‍यम के व्‍यक्‍तिगत साधन, आपस में विश्‍वास की मजबूती, विश्‍वास के आधार पर आय-व्‍यय का आदान प्रदान। किताबों में कागजों में पढ़ाई-लिखाई के प्रतियों की सुरक्षा। प्रकृति के सभी माध्‍यमों के साथ सहचर्य जीव-जन्‍तु, पेड़-पौधे आस पास के वातावरण की सुरक्षा दोनों ही एक दूसरे के लिए पूरक थे। प्रदूषण को ध्‍यान में रखते हुए मशीनों का आविष्‍कार और उपयोग। प्रकृति के पंच तत्‍वों का ध्‍यान सदैव उन ग्रामवासियों ने दिया। जिससे वो गॉव एकदम स्‍वर्गीय वातावरण से भरा था। समाचार माध्‍यम से जब उन लोगों को जानकारी मिली तो लोग अनायास ही बोल पड़े-अपना तो ये गॉव ही अच्‍छा है। लोग चाहे जो सोचें। विकास भी है विश्‍वास भी।

-उमेश मौर्य

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