रविवार, 12 मई 2013

मातृ-दिवस विशेष - डाक्टर चंद जैन "अंकुर" की रचना

हिंदी मेरी माँ

 
बावन अक्षरों का विशाल साम्राज्य लिये मेरी माँ 
,छब्बीस के आगे बौनी क्यों हो गयी है आखिर क्यों
क्या तेरा ( १३) स्वर a e i. o u के आगे मौन हो गया है
  आखिर क्यों श्रीमान ,श्रीमती ,Mr और  Miss
क्या miissing है आखिर क्या तुम्हारे अंदर खो गया
माँ का तो ह्रदय विशाल है अरबी ,अंग्रेजी
सारी भाषाओं को अपनाया है उर्दू के गीत गाया है
याद रखना जिस राष्ट्र का मातृ भाषा नहीं होती
वो  गूंगों का देश हो जाता है विश्व पटल में खो जाता है
उनकी आवाज अस्तित्वहीन हो जाती है उसकी कोई नहीं सुनता


आपको लगता नहीं स्वजनों ,अदने से  पाकिस्तानी ,बौने चीनी हमे चमकाते हैं
जो हमसे  पलते है  हमें ही आंख दिखाते हैं  कभी भी  बम डाल के फरार हो जाते हैं
हमारे जमीन हड़प कर जाते है आखिर क्यों
याद रखना एक ही स्वर से राष्ट्र एक हो सकता है
एक से ही एकता का मन्त्र फूंका जा सकता है
यदि माँ के सच्चे सपूत हो तो
सारी भाषाओं के बीच माँ को ही मंच में बिठाओ ,मातृत्व का मुकुट पहनाओ
वर्ना इतिहास तुम्हें माफ़ नहीं कहेगा


मातृ भाषा केवल शब्द और व्यंजन का योग नहीं है
ये देश की आत्मा और शारीर का सांस्कृतिक योग है
अब भी न चेते तो  ये बिखरता और टूटता हुआ हिंदुस्तान पूरी तरह बिखर जायेगा
हिंदी को साम्प्रदायिक और राजनैतिक रंग देने वालों सुधर जाओ
तुम्हें भी इसी मातृ भूमि में रहना है
याद् रखना गद्दारों को कोई पनाह नहीं देता
जो माँ से टूट जाता है वो अनाथ हो जाता है
---


डाक्टर चंद जैन "अंकुर "
रायपुर ९ ८ २ ६ १ १ ६ ९ ४ ६

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------