गुरुवार, 16 मई 2013

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बाल कविताएँ


         

 

कितने अच्छे अम्मा बाबू

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          बाबूजी अम्मा से कहकर ,
          भटा भर्ता बनवाते थे।
         बड़े मजे से हँसकर हम सब,
          रोटी के संग खाते थे।

          धनिया,हरी प्याज ,लहसुन की,
          तीखी चटनी बनती थी।
          छप्पन भोजन से भी ज्यादा,
          स्वाद हम सभी पाते थे।

         घर में लगे ढेर तरुवर थे,
         बिही आम के जामुन के।
        तोड़ तोड़ फल सभी पड़ौसी,
         मित्रों को बँटवाते थे।

         काका के संग खेत गये तो,
         हरे चने तोड़ा करते।
         आग जलाकर इन्हीं चनों से,
         होला हम बनवाते थे।

          लुका लुकौअल खेल खेलते,
          इधर उधर छिपते फिरते।
         हँसते गाते धूम मचाते,
         इतराते मस्ताते थे।

         कभी नहीं बीमार पड़े हम,
         स्वस्थ रहे सब बचपन में।
         कई मील बाबू के संग हम,
         रोज घूमने जाते थे।

        कितने अच्छे अम्मा बाबू,
       सच का पाठ पढ़ाया है।
        कभी किसी का अहित न करना,
        यही सदा समझाते थे।

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चींटी की शादी
 
            चींटा की मिस चींटी के संग,
            जिस दिन हुई सगाई।
           चींटीजी के आंगन में थी,
            गूंज उठी शहनाई।

            घोड़े पर बैठे चींटाजी, 
           बनकर दूल्हे राजा।
           आगे चलतीं लाल चींटियां,
           बजा रहीं थीं बाजा।

           दीमक की टोली थी संग में,
           फूँक रहीं रमतूला।
           खटमल भाई नाच रहे थे ,
           मटका मटका कूल्हा।

           दुरकुचियों का दल था मद में,
           मस्ताता जाता था।
           पैर थिरकते थे ढोलक पर,
           अंग अंग गाता था।

           घमरे, इल्ली और केंचुये,
           थे कतार में पीछे।
           मद में थे संगीत मधुर के,
           चलते आंखें मींचे।

          जैसे ही चीटी सजधज कर,
          ले वरमाला आई।
          दूल्हे चींटे ने दहेज में,
          महंगी कार मंगाई।

         यह सुनकर चीटी के दादा,
         गुस्से में चिल्लाये।
         " शरम न आई जो दहेज में ,
         कार मांगने आये।

         धन दहेज की मांग हुआ,
        करती है इंसानों में।
        हम जीवों को तो यह विष सी,
        चुभती है कानों में।"

         मिस चींटी बोली चींटा से,
         "लोभी हो तुम धन के।
          नहीं ब्याह सकती मैं तुमको,
          कभी नहीं तन मन से।

         सभी बराती बंधु बांधवों,
         को वापिस ले जाओ।
          इंसानों के किसी वंश में,
          अपना  ब्याह रचाओ।"

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  1. बाल कविताओं के माध्यम से अच्छा सन्देश दिया

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