रविवार, 26 मई 2013

रवि प्रकाश की कविताएँ

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  रवि की मधुशाला

बड़ी घृणा से उस को देखा जिसके हाथों में प्याला,
जिसकी आँखों में प्यास मिली जिसके अधरों पर हाला।
लेकिन जब ख़ुद पीने बैठा सारी नफ़रत भूल गया,
पीनेवाले भक्त हो गए मंदिर लगती मधुशाला॥

तारों की छाया में मुझको देता था भर-भर प्याला,
जितना साक़ी अलबेला था उतना ही मैं मतवाला।
पीते-पीते यूँ लगता था लोक यहीं परलोक यहीं,
मिले ख़ाक में आलम सारा बनी रहे पर मधुशाला॥

साँसें दे कर,नींदें दे कर नाज़ों से छप्पर डाला,
महलों सी शोभा पाता था दीवारों का उजियाला।
मुझे भरम था अटल रहेगी बिजली में,बरसातों में,
पर आँधी की आहट से ही उजड़ी मेरी मधुशाला॥

साक़ी! तोड़ दिया क्यों तूने महफिल में मेरा प्याला,
अभी प्यास बाकी थी मुझमें बाकी सांसों में ज्वाला।
कभी जाम पे जाम दिए अब बूँदों को तरसाता है,
समझ न पाया तू कैसा है कैसी तेरी मधुशाला॥

साक़ी! प्यासों में जी कर ही जप लूँगा तेरी माला,
आँखों में जो रोशन है वो दीप नहीं बुझने वाला।
जैसे तू रह लेगा मुझ बिन वैसे ही मैं रह लूँगा,
मुझे मुबारक मेरे आँसू तुझ को तेरी मधुशाला॥

समझ गया मैं सब धोखा है कैसी हाला क्या प्याला,
पल दो पल का छल है केवल रूपवती साकीबाला।
नशा मिला अपने सीने में बाहर तो बस भटकन है,
अब मेरा मन ही मदिरा है मैं ही मेरी मधुशाला॥

मेरे शाँत पड़े दरिया में कंकर सा तेरा आना,
आखिर ये क्या हंगामा है साक़ी,सच-सच बतलाना।
याद मुझे करते हो या फिर अपनी याद दिलाते हो,
या खंगाला करते हो तुम मेरी सूनी मधुशाला॥

सपनों का सीने से उठ कर पलकों पर लहरा जाना,
कैसे पिघली जाती शम्मां कैसे जलता परवाना।
ये दुनिया पागल है साक़ी कुछ भी कहती रहती है,
ये क्या जाने क्या हस्ती थी तेरी-मेरी मधुशाला॥

धारों से भी आँखें मूँदीं प्यालों को कितना टाला,
तुम चले गए तो कदमों को कुछ दिन मैंने सम्भाला।
पीठ फेर कर बैठा रहता चाहे कैसा साक़ी हो,
लेकिन मुझ को रही बुलाती नई अदा से मधुशाला॥

दुनिया की बातों का बादल तुम मुझ पर बरसाते जाना,
शिकवों की,तानों की चादर मुझ को ओढ़ाते जाना।
तुझ को पाकर ज्यों फूली थी वैसे नफ़रत सह लेगी,
कालकूट भी पी लेती है नीलकण्ठ है मधुशाला॥

जब भी आओ तुम पाओगे ज़रा न बदला दीवाना,
वैसी ही फाकेमस्ती है चोला वही फकीराना।
जाम उठे हैं,लोग जुटे हैं बस तेरी रसधार नहीं,
वरना सीना तान खड़ी है अब भी मेरी मधुशाला॥

तुम बिन कैसा ख़ालीपन है मुश्किल है ये समझाना,
पाने के अरमान भूल कर केवल याद किए जाना।
अंतर्मन में रही चीखती ज़रा न रोई नैनों से,
हँसी उदासी में भी खिलखिल मेरी भोली मधुशाला॥

जिन लम्हों पर मुझे नाज़ है उन पर तेरा पछताना,
हाथों से कानों को ढक कर जीने से भी घबराना।
अपनी ही नज़रों में ख़ुद  को मत गिरने देना साक़ी,
बिखर न जाए पुर्ज़ा-पुर्ज़ा वरना तेरी मधुशाला॥

साक़ी जब से रूठ गया है सूख गई सारी हाला,
टूटे प्यालों से भी लेकिन पीता है पीने वाला।
प्यास न तुम यूँ बुझने देना मैं भी पीता जाऊँगा,
अलग-अलग भी रहे चहकती तेरी-मेरी मधुशाला॥

लगता है इस वीराने में जम कर बरसेगी हाला,
सुरा ख़त्म होने से पहले फिर भर जाएगा प्याला।
अहले-दुनिया कुछ भी सोचें,कुछ भी समझे जाने दो,
रहे पिलाता मेरा साक़ी रहे बुलाती मधुशाला॥

लगता था इस वीराने में जम कर बरसेगी हाला,
सुरा ख़त्म होने से पहले फिर भर जाएगा प्याला।
अहले-दुनिया सच कहते थे चार दिनों की चाँदी है,
नहीं पिलाता अब तो साक़ी नहीं बुलाती मधुशाला॥

 

              दीप विरह का
चन्दा-तारे बुझते होँ पर,दीप विरह का जलने देना।
दृग मेँ आँसू सजते होँ पर,स्नेह-स्वप्न भी पलने देना॥

जीवन की निष्ठुर घड़ियोँ मेँ,कुछ पल ऐसे भी आएँगे।
मुक्ताहल सज्जित लड़ियोँ मेँ,कुछ कंकर गूथे जाएँगे॥

जिन अधरोँ पर फागुन चहके,उनसे बिरहा भी गा देना।
जिन सांसों में ज्वाला दहके,उनमेँ जलधर भी पा लेना॥

इस नगरी के जो नायक हैं,
पीड़ाओं के ही गायक हैं॥

 


             संकल्प
प्राची का देखो अरुण-भाल,रातों की अलकें रहने दो।
उत्ताल तरंगों को देखो,अब झुकती पलकें रहने दो॥

कब तक सांसों में सांस घुलें,नैनों के निर्मम बाण चलें।
रजनी के सूने पहरों में,कितना बिरहा का गान चले।
तारों की झिलमिल बस्ती में,असहाय अकेला प्राण चले।
मलयपवन के हलकोरों में,क्यों सपनों का सन्धान चले।
चिन्ता के देखो काल-जाल,स्मिति की रेखाएँ रहने दो।
निष्प्राण प्रसूनों को देखो,हिलती लतिकाएँ रहने दो॥

मंदिर भी है मदिरालय भी,मधु के धारें हैं झड़ियाँ हैं।
वंशी की आकुल तानें भी,सुख-दुख की जुड़ती कड़ियाँ हैं।
स्नेह-समर्पण के भारों में,अनिवार लजीली घड़ियाँ हैं।
मधुपों की व्याकुल गुनगुन भी,सावन की भीनी लड़ियाँ हैं।
व्यालों सी ज्वालाएँ देखो,बुझते अंगारे रहने दो।
धरती का बंजर आँचल देखो,टूटे तारे रहने दो॥

             ग़ज़ल
मैं वफाओं की तमन्ना में सितारों तक गया।
इक खुशी की चाह में दिलकश नजारों तक गया॥
   
सर्द पीले चाँद के साए तले कितने बरस,
मैं जवानी की चढ़ाई से उतारों तक गया॥

और कुछ अपने सिवा जिसको नज़र आता न था,
वो समन्दर आज प्यासा आबशारों तक गया॥

वो नज़ारा देख लेगा धार के उस पार का,
डूबने की चाह लेके जो किनारों तक गया॥

आज आँगन में जला दूँ चाँद-सूरज के दिए,
ईंट-पत्थर को हटाता मैं दिवारों तक गया॥

तू कभी कह दे मुझे महबूब अपना झूम के,
ये दुआ लेके 'रवि' खिलती बहारों तक गया॥

 

             ग़ज़ल
मैं ग़ज़ल को ले चलूँगा गाँव की चौपाल में,
रोज़ फिर गाता फिरूँगा लावनी की ताल में।

एक मिसरा ओस हो और एक मिसरा चाँदनी,
शेर मेरे खिल उठे हों बच्चियों के गाल में।

आज मैं अपनी सुनूँगा आज तुम अपनी कहो,
कौन किसका हाथ पकड़े बेबसी के हाल में।

मंज़िलों को दूर कर दो या मिटा दो रास्ते,
फर्क देखो फिर हमारी साँस के सुरताल में।

मैं तुम्हारे नाम लिख दूँ प्यार की ये सल्तनत,
और हम जीते चलें इक -दूसरे के हाल में।

गेसुओं में यार के वो देर तक उलझी रही,
लड़खड़ाहट है 'रवि' बादे-सबा की चाल में॥

          अर्पण का उपहार

मेरे सूने पथ को दे दो,कलियों का श्रृंगार प्रिये॥

आँधी के निष्ठुर झोंके थे,सघन घटाओं का घेरा;
बुझते मन के महाशून्य में,किस-किसने डाला डेरा।
तुम बिन थोड़े उच्छवास थे,कुछ आहें आधार प्रिये॥

प्रेमपंथ की सिकता पर ज्यों,मंद समीरण का तिरना;
भीगी अलकों की छाया में,पलकों का उठना-गिरना।
तेरी आँखों से चलता है,सांसों का व्यापार प्रिये॥

अट्टहास कर सावन गरजे,चमक उठे विद्युन्माला;
छलछल कलकल के नादों से,सजी रहेगी मधुशाला।
तेरे उर की मदिरा में हो,मेरा मन साकार प्रिये॥

अम्बर की नीली झीलों से,झाँक रहे हों जब तारे;
अवसादों के भँवरजाल में,तिरते हों सपने सारे।
अपने कंधों पे रख देना,मेरे मन का भार प्रिये॥

आँखों में जब जलधर उतरे,अधरोंपर कुछ हास मिले;
दुख की कसक भरी कड़ियों में,भोला सा मधुमास मिले।
सब धुँधले रेखाचित्रों को,लेने दो आकार प्रिये॥

धरती के भीगे आँचल को,ज्यों किरणों का छोर मिले;
रातों की अंधी गलियों में,जैसे खोई भोर मिले।
यूँ ही धीमे से तुम लाना,अर्पण का उपहार  प्रिये॥

 


            सर्दी
बुझती लौ को सम्भाले सूरज तो गुज़र गया है,
सहमी-सहमी राहों पर सन्नाटा पसर गया है।

क्या जाने खाना खा के कैसे सपने खिलते हैं,
झाड़ू,झाड़न,मिट्टी में जिसका दोपहर गया है।

अपना मफ़लर,कोट लिए जहाँ ठिठक जाता हूँ मैं,
उन पेचीदा ढालों पर इक साया उतर गया है।

मुझे देख के बेगाने कानों में कुछ कहते है,
अपनों की महफ़िल में शायद मेरा ज़िकर गया है।

बढ़ते-बढ़ते दीवारें आसमान में फैल चलीं,
किसी कुँवारी के सपनों सा आँगन सिहर गया है।

अभी ओस की बूँदों से धरती गीली-गीली थी,
दूर गगन के दामन में फिर बादल ठहर गया है॥

 


                           रवि प्रकाश
                                          (प्रवक्ता हिन्दी)
                                          ग्राम व डाकघर-झड़ग
                                          तैहसील-जुब्बल ज़िला-शिमला
                                          हिमाचल प्रदेश-171206
                                          दूरभाष-9318748000

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