रविवार, 26 मई 2013

कुबेर की कहानी - उजाले की नीयत

कुबेर

कहानी

उजाले की नीयत

यह जिला मुख्‍यालय से पश्‍चिम की ओर सुदूर वन प्रांत में बसे एक कस्‍बे में,मार्च महीने की एक रात में घटित एक सामान्‍य सी घटना की असामान्‍य सत्‍यकथा है।

दूर चौराहे पर मुहल्‍ले के सारे बेरोजगार युवक और कुछ बड़े-बुजुर्ग, नगाड़े की थाप और फाग गीतों की लय पर झूम रहे थे। रंगों और मस्‍तियों का त्‍यौहार होली के आगमन में कुछ ही दिन श्‍ोष थे।

सड़क के दोनों ओर पंक्‍तिबद्ध बौराए आम के पेड़ों की मादक खुशबू से वातावरण महक रहा था। जिला मुख्‍यालय से आने वाली अंतिम यात्री बस, जिसे यहाँ रात्रि प्रवास कर प्रातः पुनः जिला मुख्‍यालय हेतु प्रस्‍थान करना होता है, आ चुकी थी। यात्री अपने-अपने घर जा चुके थे। चालक और परिचालक पास के सुमन हॉटल में खाने-पीने में मस्‍त थे। हॉटल के ये अंतिम और सम्‍मानित ग्राहक थे।

पास ही विमला का पान 'पैलेस' था। हॉटल से निवृत्‍त हुए अधिकांश साहब लोग यहाँ पान चबाते हुए गपशप में व्‍यस्‍त थे। इनमें अधिकांश वन विभाग के सिपाही, शिक्षा विभाग के गुरूजी और अन्‍य विभागों में कार्यरत बाबू और इक्‍के-दुक्‍के अफसर लोग थे। 'देशी महुए' की अधिकता के कारण इनकी जुबाने बहक रही थी और कदम लड़खड़ा रहे थे।

इनके गपशप के विषय गंभीर राजनीतिक अथवा आध्‍यात्‍मिक नहीं हो सकते थे। अलबत्‍ता चर्चा के विषय थे कि कौन साहब कितना और क्‍या पीता है। किस दफेदार ने विभाग को कितना चूना लगाया और गाँव की किन-किन लड़कियों पर किसकी-किसकी नजरें गड़ी हुई हैं, इत्‍यादि .......।

कुछ लोग सुुमन हॉटल और विमला पान पैलेस के गुणों का बखान कर रहे थे। इस दूरस्‍थ वनांचल में ये दोनों ही इस गाँव (स्‍थानीय लोगों का शहर) के नाक हैं। वैसे तो यहाँ बाहर से लोटा लेकर आये अनेक सेठ लोग भी दिन दूनी रात चौगुनी फल-फूल रहे हैं, पर सुमन और विमला सेठ की बात ही कुछ और है। सुमन और विमला को उसके ग्राहक उपकी प्रबंधन क्षमता के कारण अथवा खुशामद करने के लिए इसी उपाधि से संबोधित करते हैं। वैसे ये स्‍थानीय महिलाएँ है जो व्‍यवसाय में अपने पतियों से अधिक चतुर, जवान और सुंदर हैं; परंतु सेठ की श्रेणी में हरगिज नहीं आते हैं।

पानठेले में व्‍यस्‍त कुछ लोग अपने उन मित्रों से जल रहे थे जो इस समय नदारत थे। वे उन्‍हें जी भरकर कोस रहे थे और कयास लगा रहे थे कि नदारत रहने वाले किस मित्र के साथ कौन सी रेजा और किस साहब के साथ कौन सी बाई हमबिस्‍तर हो रही होगी। नदारत रहने वाले ये सारे मित्र छंटे हुए और गजब के जुगाड़ू लोग थे। रोज शाम, चाहे जैसे भी हो, ये अपने रात को रंगीन बनाने के लिये महुआ दारू और स्‍थानीय वन बालाओं का जुगाड़ कर ही लेते थे। कुछ लोग जो इन सब बातों से उकता चुके थे और स्‍वयं के लिये जुगाड़ न कर पाने की खीझ के कारण अत्‍यंत दुखी मन थे और इस गम को गलत करने के उद्‌देश्‍य से कुछ ज्‍यादा ही चढ़ाये हुए थे, दुलो के बारे में अत्‍यन्‍त अश्‍लील और भद्‌दी टिप्‍पणियाँ करके अपनी भद्रता को बिना संकोच अनावृत्‍त व कंलंकित कर रहे थे। उनकी इन टिप्‍पणियों से उनकी असली मानसिकता और चरित्र का दोगलापन जाहिर हो रहा था।

दुलो, जिसके बारे में सारी अश्‍लील टिप्‍पणियाँ की जा रही थी, न तो नगरवधू थी और न ही गाँव की कोई अनिंद्य रूपवती षोड़सी, जिसके इर्द-गिर्द गाँव के मनचले और तथाकथित भद्र मानसिकता वाले उपरोक्‍त साहब लोग भिनभिनाते। दुलो पचीस-तीस साल की भिखारिन थी। वह साँवली जरूर थी पर बदसूरत नहीं थी। पीठ पर निकल आए कूबड़ और एक पैर की पोलियोजन्‍य असक्‍तता से भी उसकी सुंदरता कम नहीं हुई थी। वह मैली-कुचैली धोती पहने, हाथ में कटोरा लिये दिन भर दर-दर भटकती और साप्‍ताहिक बाजार के लिये बनाई गई गुमटियों में से किसी एक में अनधिकृत कब्‍जा कर रात बिताती। वह इसी दिनचर्या अनुसार आज भी रात बिता रही थी। अधेड़ वय का अंधा सोमना उसका 'बिजनेस पार्टनर' था।

कस्‍बाई मच्‍छरों के तीखे डंक से बचने के लिये दुलो ने अपने शरीर को चादर से अच्‍छी तरह लपेट लिया था। वह अपने अतिक्रमित गुमटी में, जहाँ इस समय स्‍ट्रीटलाइट और पान ठेलों तथा होटलों के बाहर जल रहे विद्युत बल्‍बों की कुछ-कुछ रोशनी पहुँचने से उजियारा फैल रही थी, चुपचाप लेटी हुई थी। पास ही के दूसरी गुमटी में उसका तथाकथित 'बिजनेस पार्टनर' अंधा सोमना खर्राटे भर रहा था। मच्‍छरों के डंकजनित दाह को कम करने के लिये वह बार-बार अपने शरीर के उन हिस्‍सों को बुरी तरह खुजला रही थी। उसे पान ठेले पर जमें उन साहब लोगों की बेढंगी बातों के शोर की वजह से शायद नींद नहीं आ रही थी। विमला पान पैलेस से आ रही गप्‍पबाजी को वह बड़े ध्‍यान से सुन रही थी। न सिर्फ सुन रही थी बल्‍कि उन बातों से वह अब रस भी ले रही थी, और जिससे रह-रह कर उसे रोमांच हो आता था। साथ ही साथ वह मदोंर् के विषय में अपने स्‍त्रियोचित ज्ञान और इन साहबों के विषय में अपनी पूर्व अवधारणाओं और पूर्वाग्रहों को भी संशोधित करती जा रही थी। तभी उसे अपने विषय में की जा रही वह टिप्‍पणी सुनाई दी। सुनकर उन साहबों के प्रति उसके मन में जो सहज और स्‍वाभाविक सम्‍मान व श्रेष्‍ठता के भाव थे, एक ही झटके में टूटकर बिखर गये।

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दुलो कं मस्‍तिष्‍क पर मंहगू, सोमना और इन साहबों के चेहरे बारी-बारी से उभरने लगे। महंगू जो उसका पति हुआ करता था, और जिसके साथ उसने जीवन के दस वर्ष बिताये थे। वे दस वर्ष, जिनके बारे में वह कभी भी निर्णय नहीं कर पाई कि वेे दिन स्‍वार्गिक सुख के थे या नारकीय यातना के। सोमना, जो पिछले कुछ सालों से भिखमंगों की टोली में कहीं से आकर शामिल हो गया था, उसके साथ रहता है, और साथ ही गली-गली घूमकर भीख मांगा करता है। आँख वाले किसी साथी का साहचर्य उसकी मजबूरी थी। अपनी मर्दानगी को तुष्‍ट करने के लिये भी उसे एक औरत की जरूरत थी; परंतु ऐसी वैसी हरकत के द्वारा किस्‍मत से हाथ आई दुलो को वह कभी नाराज नहीं कर सकता था। फिर भी, कम से कम वह दुलो की जवानी और उसकी उम्र को स्‍पर्श इन्‍द्रिय द्वारा महसुस करना चाहता था, जानना चाहता था। और शायद इसी उद्‌देश्‍य की पूर्ति के लिये समय-कुसमय वह उनकी बाहों की मांसपेशियों को और कभी-कभी वक्ष के उभारों को भी मसलने का प्रयास करता। बदले में हर बार वह भद्‌दी गालियाँ खाता, परंतु बलात्‍कार जैसा कुकृत्‍य करने का दुःसाहस उसने कभी नहीं किया। और अंत में पान ठेले पर उसके प्रति, और समूची महिला जाति के प्रति अश्‍लील टिप्‍पणियाँ कर रहे इन साहबों के चेहरे, जो शराब के असर से स्‍वतः बेनकाब होते चले जा रहे थे।

शरीर के उन अंगों को जो अनावृत्त हो गये थे, और जहाँ मच्‍छरों का ताजा हमला हुआ था, ढंकर वह सोने का पुनः प्रयास करने लगी, परंतु नींद उससे कोसों दूर थी। उसकी आँखों में मंहगू लंगड़े की तस्‍वीर उभरने लगी। वह मंहगू के पास जाने का प्रयास कर रही है, लेकिन नश्‍ो में धुत महंगू अपशब्‍दों के साथ उसे परे ढकेल देता है। बांझ और न जाने कैसी-कैसी भद्‌दी गालियाँ देते हुए उसे वह बुरी तरह पीटने लगता है। और अंत में उसके बालों को पकड़कर, उसे घसीटते हुए, रात की घोर नीरवता और अंधेरे में, घर से बाहर गली में, छोड़ जाता है। यह रोज का क्रम है, परंतु आज दुलो की आँखों में भी खून उतर आया है। क्‍या इसीलिये उसने उसका हाथ थामा था? वह घायल सिंहनी की भांति उठती है। कपड़ों का उसे होश नहीं है। आवेगाअतिरेक में उसका शरीर कांप रहा है। वह दहाड़ रही है- ''अरे भड़वा, नामर्द, मुझे बांझ कहता है। अरे छक्‍का, कमर तो चलता नहीं, बस लात-घूंसा ही चलता है। लात-घूंसों से बच्‍चा होगा?'' और फिर वर्षों से उसके प्रति शरीर तथा मन में व्‍याप्‍त घृणा को जो मुँह में इकत्र हो आया था, अंदर से बंद किंवाड़ पर पूरे आवेग से उछाल देती है 'पचाक'। वह दरवाजे पर नहीं मंहगू के चेहरे पर थूँक रही थी, न सिर्फ थूँक रही थी, बल्‍कि उससे संबंध विच्‍छेद के दस्‍तावेजों पर हस्‍ताक्षर भी कर रही थी। तब से वह भिक्षावृत्‍ति कर जीवन निर्वाह करती हुई इस कस्‍बे में आकर ठहर गई है। शायद स्‍वार्थ और सुरक्षा की भावनावश उसे सोमना से दोस्‍ती का समझौता करना पड़ गया है।

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बांझ शब्‍द उसके कानों में गूँजने लगा। लेटे रहना जब मुश्‍किल हो गया तो वह उठ कर बैठ गई। साहब लोगों की आवाजें बंद हो गई थी। हॉटल और ठेले बंद हो चुके थे। अंधेरा बढ़ चुका था। उसने आस-पास के अंधेरे को महसूस किया। अपनी जवानी पर नजर डाली। क्‍या वह सचमुच बांझ है? अपने हाथों से अपने वक्ष को, जो अभी भी गदराए और कंसे-कंसे थे, सहलाया। उसके मन ने निश्‍चय पूर्वक कहा, 'नहीं, वह बांझ नहीं है'। भावावेश के कारण उसका शरीर थर्रा उठा। उसे अपने अंदर आदिम भूख की तीव्रता घनीभूत होती जान पड़ी। उसने सोमना की ओर देखा, जो अभी बेसुध हो खर्राटे ले रहा था। उसे सोमना और मंहगू एक से लगे। सोमना पर एक हिकारत भरी नजर डालकर वह पुनः सोने का प्रयास करने लगी।

दुलो की आँखों में इस समय उस काले, लंबे और गठीले बदन वाले दफेदार की तस्‍वीर उभर आई, जिसके शरीर पर शायद लंबे घने बाल होने के कारण लोग जिसे पीठ पीछे भालू कहकर मजे लेते। दुलो भिक्षा मांगने के क्रम में जब भी उसके घर जाती, उस दफेदार की घनी, काली मूछों के ऊपर से झांकती उनकी दोनों रक्‍तवर्ण आँखें हमेशा ही उसे कामुक नजरों से घूरती रहती, जिससे उसका बदन भय से काँपने लगता। अभी, आधी रात के इस गहन अँकार में वह इन्‍हीं घनी मूंछों और इन मूंछों के ऊपर झांकती उन रक्‍तवर्ण कामुक नजरों को बड़े शिद्‌दत के साथ महसूस करने लगी। न जाने कब उसकी आँखें लग गई।

रात की वीरानी ने वातावरण को पूरी तरह से अपने कब्‍जे में ले लिया था। चौराहे पर बज रहे नगाड़े की थाप भी पता नहीं कब से बंद हो चुका था। महुवे की शराब के नश्‍ो में बेसुध होकर थिरकते लोग अपने-अपने घर जा चुके थे। अलबत्‍ता पास ही बह रहे जंगली नाले के उस ओर, जंगलों के बीच से सियारों के हुआँने की आवाजें जोर पकड़ने लगी थी।

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चादर के अंदर किसी को घुसते हुए महसूस कर दुलो की नींद खुल गई। अंधेरा घना था, उसने सोचा, सोमना होगा। लेकिन सीने पर किसी मजबूत पंजे की दबाव ने उसका भ्रम तोड़ दिया। वह समझ नहीं पाई कि उसके साथ यह क्‍या होने जा रहा है। किसी अनहोनी की आशंका से उपजी दहशत की जकड़ ने उसकी चेतना और उसके विवेक को शून्‍य कर दिया था। वह पूरी ताकत से चिल्‍लाना चाती थी, पर आवाज गले से बाहर नहीं आ पा रही थी। वह मुक्‍ति हेतु छटपटाने लगी। बहुत जल्‍द ही उसने समझ लिया कि हमलावर की नीयत क्‍या है। अंधेरे की वजह से वह उसे साफ-साफ नहीं देख पा रही थी इसीलिये वह उसे अब स्‍पर्ष के द्वारा पहचानने का प्रयास करने लगी थी। शराब की तीखी गंध जो उस व्‍यक्‍ति के धौंकनी के समान तेज चल रही सांसों से निकल रहा थी, उसके नथुनों में भरने लगी थी। उसने उसके शरीर पर लंबे-लंबे बाल अनुभव किये। घनी मूँछों के ऊपर से झाँकती दो रक्‍तवर्ण आँखों की चुभती हुई कामुकता को देखा।

उसका प्रतिरोध अब धीरे-धीरे क्षीण होने लगा था, और उसकी आदिम भूख उसके अस्‍तित्‍व पर प्रबल होने लगी थी। क्षणिक दुर्बल संघर्ष के बाद उसका प्रतिरोध समाप्‍त हो गया।

कुछ देर बाद सब कुछ शांत हो गया। तूफान थमकर लौट चुका था।

वातावरण का अंधकार अब उसके मन पर घनीभूत होने लगा था। इस घटना से बेखबर, बेसुध सोमना की ओर उसने देखा; वह अभी भी उसी तरह खर्राटे भर रहा था। उसे क्‍या पता कि उजाले ने अंधकर से मित्रता करके उसे छल लिया था। वह शक्‍तिहीन और निश्‍तेज हो चुकी थी। उसकी कल्‍पना ने उसे उसके गर्भ में किसी नवागंतुक के स्‍पन्‍दन का अनुभव कराया। वह सिहर उठी। चुपचाप उठी और आहत कदमों से चलती हुई, जाकर सोमना के बगल में लेट गई। अब सोमना की भी नींद टूटी। उसने करवट बदलकर उसके जिस्‍म को टटोला; पीठ के कूबड़ पर हाथ फेरा, गदराए स्‍तनों को मसलकर देखा और तत्‍परता पूर्वक उसने पूरे आवेग के साथ उसे अपने आगोश में समेट लिया।

दुलो ने अब की बार बहुत सोच-समझ कर अपने अस्‍तित्‍व को सोमना के हाथों सौपा था; शायद मिटाने के लिये या शायद मिटे हुए को और मिटा कर बचाने के लिये।

वातावरण की स्‍तब्‍धता को अब एक साथ दो खर्राटे चीर रहे थे। दूर जंगल में सियारों के हुआँने की आवाजे भी अब बढ़ने लगी थी।

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कुबेर

जिला प्रशासन (राजनांदगाँव) द्वारा

गजानन माधव मुक्तिबोध

सम्‍मान 2012 से सम्‍मानित

(जन्‍म - 16 जून 1956)

प्रकाशित कृतियाँ

1 - भूखमापी यंत्र (कविता संग्रह) 2003

2 - उजाले की नीयत (कहानी संग्रह) 2009

3 - भोलापुर के कहानी (छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह) 2010

4 - कहा नहीं (छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह) 2011

5 - छत्तीसगढ़ी कथा-कंथली (छत्तीसगढ़ी लोक-कथाओं का संग्रह) 2013

प्रकाशन की प्रक्रिया में

1 - माइक्रो कविता और दसवाँ रस (व्‍यंग्‍य संग्रह)

2 - और कितने सबूत चाहिये (कविता संग्रह)

3 - सोचे बर पड़हिच्‌ (छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह)

4 - ढाई आखर प्रेम के (अंग्रेजी कहानियों का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद)

संपादित कृतियाँ

1 - साकेत साहित्‍य परिषद्‌ सुरगी, जिला राजनांदगाँव की स्‍मारिका 2006, 2007, 2008, 2009, 2010, 2012

2 - शासकीय उच्‍चतर माध्‍य. शाला कन्‍हारपुरी की पत्रिका 'नव-बिहान' 2010, 2011

पता

ग्राम - भोड़िया, पो. - सिंघोला, जिला - राजनांदगाँव (छ.ग.)

पिन - 491441

मो. - 9407685557

E-mail : kubersinghsahu@gmail.com

संप्रति

व्‍याख्‍याता,

शास. उच्‍च. माध्‍य. शाला कन्‍हारपुरी, वार्ड 28, राजनांदगँव (छ.ग.)

मो. 9407685557

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