गुरुवार, 30 मई 2013

राजीव आनंद की कहानी - एक फरिश्‍ते से मुलाकात

एक फरिश्‍ते से मुलाकात

दोनों किडनी तुम्‍हारी फेल हो चुकी है, अब किडनी बदलवाना ही एकमात्र उपाय है, डाक्‍टर साहब ने बिरजू माली को कहा.

बिरजू घबरा गया, किडनी बदलवाने में कितना खर्च आता है डाक्‍टर साहब, उसने पूछा ?

डाक्‍टर साहब कुछ देर सोचने के बाद कहे कि यही कोई ढाई-तीन लाख रूपए.

बिरजू बेहोश होते-होते बचा और नीम-बेहोशी में ही डाक्‍टर के चेंबर से निकल कर, बस स्‍टैंड की तरफ जाने लगा. जीने की अब कोई आशा नहीं बची थी. घर पर भरा-पूरा परिवार, दो लड़के, तीन लड़कियां, एक पत्‍नी, बूढ़े मां-बाप सभी तो थे, सोचते हुए बिरजू स्‍टैंड पहुंच चुका था. गांव के लिए अभी बस आने में देर थी, बिरजू वहीं एक फुटपाथी चाय की दूकान के बेंच के छोटे से हिस्‍से में बैठ गया. उसे मितली आ रही थी. वह समझ नही पा रहा था कि वह अब क्‍या करें.

इतने में उसके गांव जाने वाली आखिरी बस आ चुकी थी पर बिरजू को हिम्‍मत नहीं हुआ कि वह उठ कर बस पर जा बैठे.

देखते-देखते रात घिर आयी, बिरजू चुपचाप उठकर यात्री शेड में एक कोने में बैठ गया, बैठ क्‍या गया, दीवार के ओट में पीठ सटा कर लेट सा गया. उसे पेट में दर्द भी हो रहा था और मितली भी आ रही थी.

उसी यात्री शेड में पत्‍थर के बेंच पर एक सज्‍जन बहुत देर से बैठे बिरजू को देख रहे थे, ऐसा मालूम होता था जैसे कुछ समझने की कोशिश कर रहें हो. कभी अपनी कलाई घड़ी देखते, कभी बिरजू को, अंततः उस सज्‍जन से नहीं रहा गया और वे बिरजू के पास चले गए और पूछा कि तुम्‍हें क्‍या तकलीफ है भाई ?

बिरजू जैसे नींद से जागा, उसे अंजान शहर में बस स्‍टैंड़ के यात्री सेड में किसी से कोई उम्‍मीद न थी. बिरजू नीम-बेहोशी में कहा कि बाबूजी मेरा नाम बिरजू है, डाक्‍टर ने कहा है कि मेरे अंदर का कुछ खराब हो गया है, जिसे बदलवाने में काफी रूपया लगेगा. किडनी बिरजू को याद नहीं था इसलिए किडनी के संबंध में बता नहीं पाया. बिरजू ने उस सज्‍जन को सहानुभूति जताते देख, सिर्फ इतना ही गुजारिश किया कि बाबूजी मैं शायद सुबह तक न बचूं तो मेरे गांव में मेरे माता-पिता, बाल-बच्‍चों तक खबर पहुंचा देंगे तो मरते हुए इस आदमी की दुआ आपको लगेगी, आप फूले-फलेंगे.

वो सज्‍जन दरअसल एक प्रसिद्ध होमियोपैथ सजल आनंद थे और किसी मरीज को देखकर लौटने के क्रम में बस के इंतजार में वहां बैठे थे. वे बिरजू के मरज को लक्षणों के अनुसार समझ गए और मितली एवं पैट दर्द के आधार पर इलाज शुरू करते हुए चंद खुराक कागज के पुडिया में बना कर बिरजू को दिया और एक खुराक खिला भी दिया. घंटा भर बीत चूका था, बिरजू अब धीरे-धीरे उठ बैठा, उसे कुछ-कुछ अच्‍छा लग रहा था. होमियोपैथ डाक्‍टर श्री आनंद ने बिरजू को अपना पता लिख कर दिया और कहा कि गांव जाकर दवाईयां लेते रहना और खत्‍म हो जाए तो मेरे पास आना, मैं तुम्‍हें फिर दवाईयां दूंगा.

बिरजू श्रद्धा से झूक गया और जैसा डाक्‍टर साहब ने कहा था वैसा ही किया. रात बीतने लगी, डाक्‍टर साहब की बस आ गयी थी, वे चले गए. सुबह तक बिरजू की हालत में कुछ सुधार हो चुका था, वह भी सुबह बस पकड़ अपने गांव चला गया. रास्‍ते में उसने डा. सजल आनंद के बारे में सोच रहा था कि सचमुच एक फरिश्‍ते की तरह उन्‍होंने उसे गांव तक पहुंचने लायक बनाया अन्‍यथा उसकी तो मृत्‍यु यात्री सेड में ही निश्‍चित थी. गांव पहुंच कर सारा वृत्तांत अपने माता-पिता, पत्‍नी, बच्‍चों को खुशी-खुशी सुनाया परंतु उसे और न ही उसके परिवार के किसी सदस्‍य को यह भरोसा हुआ कि चंद पुड़ियों में दिये गए औषधि से बिरजू का रोग ठीक होने वाला है. बिरजू खूद भी ऐसा मान कर नहीं चल रहा था कि सफेद चुटकी भर पाउडर से उसे रोग मुक्‍ति मिलेगी, पर मरता क्‍या नहीं करता. इसी चुटकी भर पाउडरनुमा औषधियों के बदौलत वह शहर से गांव आ सका था. पंद्रह दिन बीत गए और बिरजू की दवाईयां भी खत्‍म हो गयी थी. अपने रोग में सुधार देखते हुए उसने शहर जाकर होमियोपैथ डाक्‍टर से मिलने का मन बनाया और सुबह की बस पकड़ कर डाक्‍टर साहब के यहां पहुंच गया.

डाक्‍टर साहब का पता पूछते हुए वह जब डाक्‍टर सजल आनंद के घर पहुंचा तो देखता है कि डाक्‍टर साहब अपने घर के बगल में एक खुले मैदान में एक पेड़ के नीचे बेंत का टेबुल और कुर्सी में बैठे है और रोगियों को देखते जाते है और दवाईयां भी देते जाते है. दूर से ही बिरजू को आते देख डाक्‍टर साहब ने उसे पहचान लिया और जोर से पुकारते हुए कहा , आओ बिरजू, अब कैसी तबियत है ?

बिरजू झेंप सा गया,, उसे इतने अमीर और संभ्रांत डाक्‍टर से ऐसी उम्‍मीद ही नहीं थी कि डाक्‍टर साहब को उसका नाम भी याद रहेगा और रोग भी.

बिरजू जबरन मुस्‍कुराने की कोशिश करता हुआ कहा कि ठीक हूं डाक्‍टर साहब, पहले से सेहत में सुधार आया है. डाक्‍टर साहब ने बिरजू से कुछ सवालात किए और फिर चुपचाप कुछ सोचते हुए दवाईयों की पुडिया बनाने लगे.

चुप देखकर बिरजू ने डाक्‍टर साहब से बड़ी हिम्‍मत कर पूछा कि डाक्‍टर साहब मेरे अंदर क्‍या खराब है, कुछ दिन पहले एक दूसरे डाक्‍टर ने बताया था पर मैं भूल गया, क्‍या आप बता सकते है कि मेरे अंदर क्‍या खराब हुआ है ?

डाक्‍टर साहब तब तक बिरजू के लिए दवाईयां तैयार कर चुके थे. एक खुराक उसी समय खाने की ताकीद करते हुए बाकी पुड़ियों को एक बड़े लिफाफे में देते हुए बिरजू को समझा दिया कि दवाईयां कैसे और कब खानी है.

डाक्‍टर साहब ने कहा कि बिरजू तुम्‍हारे अंदर कुछ भी खराब नहीं है. घबराने की कोई बात नहीं है. तीन महीने की दवाईयां दे दिया है, अब तीन महीने बाद आना, परहेज जो मैंने बताया उस पर अमल करना, दवाईयां खत्‍म होते-होते तुम्‍हारा रोग भी जाता रहेगा.

बिरजू न चाहते हुए भी खुश होने का स्‍वांग भरते हुए डाक्‍टर साहब को उनकी फीस देना चाहा पर डाक्‍टर साहब ने कहा अभी रखो, तुम जब पूर्ण रूप से ठीक हो जाओगे तब जो दोगे, मैं रख लूंगा.

बिरजू क्‍या करता, कुछ पैसे लाया था, उसे अपने पास ही रख लिया और दवाईयां लेकर गांव चला गया. जिस तरीके से डाक्‍टर साहब ने बिरजू को दवाईयां खाने और परहेज करने को कहा था, बिरजू उसी तरह तीन महीने तक दवाईयां खाता रहा और परहेज करता रहा परिणामतः तीन महीने बाद बिरजू का रंग रूप बदल गया था. अब वह खेतों में भी आसानी से काम करता था. खाना-पीना भी अब उसका सामान्‍य हो चुका था, अब उसे किसी भी तरह की शिकायत नहीं थी.

एक दिन बिरजू ने सोचा कि ठीक तो वह हो ही चुका है, कुछ घर का चावल, चूड़ा और मडुआ ही ले जाकर डाक्‍टर साहब से मिल आता हूं. दूसरे दिन सभी सामानों को लेकर शहर चला गया डाक्‍टर साहब से मिलने, उन्‍हें चावल, चूड़ा और मडुआ देकर बिरजू बहुत खुश हुआ. डाक्‍टर साहब भी खुशी-खुशी बिरजू के उपहार को स्‍वीकार किए. बिरजू डाक्‍टर साहब से बिदा लेकर वापस जा ही रहा था कि उसे न जाने क्‍यों उस डाक्‍टर से मिलने का ख्‍याल आया, जिन्‍होंने उसके किडनी फेल होने की बात कही थी और ऑपरेशन करवाने को कहा था.

बिरजू उस डाक्‍टर के क्‍लिनिक पहुंचा, घंटे भर बाद बिरजू को डाक्‍टर साहब से मुलाकात हुई. बिरजू ने डाक्‍टर साहब को याद दिलाया कि कुछ महीने पहले वह यहां आया था, डाक्‍टर साहब को याद आ गया, हां-हां, मुझे याद आ गया, डाक्‍टर साहब ने कहा, तुम्‍हारा दोनों किडनी फेल हो चुका था और तुम्‍हें ऑपरेशन कराना था जिसमें दो-ढाई लाख खर्च था. क्‍या रूपए का इंतजाम हो गया, डाक्‍टर साहब ने पूछा ?

बिरजू ने कहा एक बार फिर देखिए कि अभी क्‍या हालत है? कब तक ऑपरेशन करवा लेना चाहिए. डाक्‍टर साहब खुश हो गए और सोचा आसामी तो लौट आया. उन्‍होंने जांच करना शुरू किया, घंटे भर जांच करने के बाद डाक्‍टर साहब के माथे का पसीना सूख ही नहीं रहा था. उन्‍हें बार-बार लग रहा था कि जांच में कहां भूल हो रही है. दोनों किडनी तो बिल्‍कुल ठीक-ठाक नजर आ रहा है. ऐसा कैसे संभव है, सोच रहे थे डाक्‍टर साहब.

घंटे भर बाद बिरजू पूछा, क्‍या डाक्‍टर साहब कब ऑपरेशन कीजिएगा ?

डाक्‍टर साहब कुछ भी बोल नहीं पा रहे थे. बिरजू भी फिर कुछ नहीं बोला, चेंबर से बाहर निकला और सीधा बस स्‍टैंड की ओर एक फरिश्‍ते से सुखद मुलाकात की बात सोचता हुआ चल दिया. जिसने

बिरजू को नया जीवन दिया था, सचमुच बिरजू जैसे गरीब रोगी के लिए सजल बाबू जैसे डाक्‍टर एक फरिश्‍ता ही थे जो रूपए के लिए नहीं मानवता की सेवा के लिए डाक्‍टरी कर रहे थे.

राजीव आनंद

मोबाइल 9471765417

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