गुरुवार, 27 जून 2013

प्रमोद यादव के 4 हास्य-व्यंग्य

मौत आनी है...

कभी-कभी मैं भी आप सब की तरह निहायत ही बेवकूफी – भरी बातें सोच लेता हूँ. एक दिन बैठे-बैठे अनायास ही भेजे में एक बात आई कि अगर व्यक्ति को ये मालूम हो जाये कि अमुक दिन, अमुक समय ( मान लो चार दिन बाद, चार बजकर चार मिनट पर ) उसकी मौत मुकर्रर है तो इन चार दिनों में वह क्या-क्या होमवर्क करेगा...कैसे जियेगा वह यह चार दिन..रो-रोकर जियेगा या क्रांतिकारियों की तरह हंसकर...हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा या कोई काम भी करेगा..मौत की सजा पाए कैदियों की तरह टेंशन में जियेगा या साधु-बाबाओं की तरह कूल-कूल मरेगा...इन्हीं तथ्यों का अध्ययन करने कुछ खास लोगों के इंटरव्यू लिये. प्रस्तुत है उसकी एकबानगी –

सबसे पहले मैंने एक कवि महोदय को पकड़ा. दिन हो या रात, सुबह हो या शाम, अपनी उटपटांग कविताओं से उसने पूरे शहर का जीना हराम किये था. सबसे पहले इसे ही डराने का प्लान किया. उनसे कहा – ‘ कविवर, अगर आपको मालूम हो जाये कि चार दिन बाद, चार बजकर चार मिनट पर आपकी मृत्यु निश्चित है तो इन चार दिनों में आप क्या-कुछ करेंगे, संक्षेप में अपनी ‘ प्रायरिटीस ’ बताएं.. बहादुरी के साथ जियेंगे या घुट-घुट कर ? ‘ वे बोले – ‘घुट-घुट कर तो अभी जी रहे हैं बंधु....रात-रात भर नींद हराम कर,अपने दिमाग को तार-तार कर नित-नवीन कविताएँ लिखो... और दिन को कोई सुननेवाला नहीं...किसी के पास फुर्सत ही नहीं.. कोई समझने वाला नहीं.. अजीब जमाना आ गया है , साहित्य से किसी को सरोकार ही नहीं..मौत आये तो आये....हमें कोई डर नहीं ( हम तो वैसे भी मरे हुए हैं )..एक काव्य-संग्रह छ्प जाये और किसी बड़े साहित्यकार के हाथों विमोचित हो जाये, यही कोशिश इन चार दिनों में करेंगे..इसके बाद ही मरने का आनंद आएगा वरना मेरी आत्मा भटकती रहेगी...’

एक व्यापारी से जब यह बात कही तो वह लगभग उछल-सा गया- ‘ चार दिन बाद मौत ? अरे चार दिनों में तो मैं उन पैसों को गिन भी न पाऊंगा जो अब तक कमाए हैं...सबसे पहले तो अपने चारों लड़कों से हिसाब लूँगा...पट्ठों ने कभी ठीक से हिसाब नहीं दिया.. फिर बीबी के सारे गहने उतरवाकर लाकर में डाल दूँगा..मेरे मरने के बाद गहनों का उसे क्या काम ? सेठ किरोडीमल हमेशा मेरे कारोबार में मेरा दुश्मन रहा है...वक्त-बेवक्त मुझे मारता रहा है..इस बार मैं उसे मारूंगा....चार दिनों के लिये बिना किसी लिखा-पढ़ी के चालीस लाख रूपये उससे चलाव मांगूंगा...चौथे दिन में सटक लूँगा...मेरे सटकते ही साला वो भी सटक जाएगा...’

मैंने पूछा- ‘ और कुछ ? ‘

शर्माते हुए, कान में फुसफुसाते बोले – ‘ प्लीज..किसी को ना बताइयो...मेरी पत्नीनुमा एक औरत और है...बाहरवाली...चम्पाबाई....पैसे मांग-मांगकर मुझे कंगाल कर दी है...अपनी मौत की दुखद खबर ( दुखद- उसी के लिये ) सबसे पहले उसे ही सुनाऊंगा ताकि चार दिन तक वह भी मरती रहे..मेरे बाद तो उसे मरना ही है..’

एक नये - नवेले मंत्री से जब यह बात कही तो वे बौखला-से गये, बोले – ‘ क्यों डरा रहे हो भाई....सत्ता-सुख भोगे अभी चार दिन भी नहीं हुए और आप सत्ता-च्युत की बातें कर रहे.. न कोई हवाला न कोई घोटाला ना कोई टू जी ना कोई आबंटन और.हमें टपकाने की बातें कर रहे हैं..’

‘ अरे मंत्रीजी, मैंने सिर्फ कल्पना करने को कहा है..’ मैंने जवाब दिया - ‘ बताएं, इन चार दिनों में क्या-कुछ करेंगे ? शांति के साथ मरेंगे या क्रांति के साथ ?

वे संजीदा होकर बोले – ‘ मरने की तारीख ब्राडकास्ट हो जाये तो फिर क्या शांति और क्या क्रांति...फिर भी अपनी प्राथमिकताएं बताता हूँ..चार दिनों में कम से कम चार सौ कार्यों का उद्घाटन अथवा भूमिपूजन करूँगा..जिन-जिन लोगों के काम करने का वादा किया है,उनसे काम के पहले ही दाम वसुलूँगा...अब चार दिन में राज्यमंत्री से केबिनेट या मुख्यमंत्री तो बन सकता नहीं फिर भी मुख्यमंत्रीजी से निवेदन करूँगा कि ‘ नायक ‘ फिल्म के नायक की तरह मुझे एक दिन के लिये मुख्यमंत्री बना दे ताकि मेरा सपना साकार हो और मैं चैन से मर सकूँ.. ‘

बालीवुड की एक नवोदित अभिनेत्री से बात की तो वह तमक गई, बोली- ‘ शुभ-शुभ बोलो जी...हमने तो अभी तक किसी फिल्म में आईटम सांग भी नहीं किया और हमें निपटाने की सोच रहे हो ? चार दिन बाद अगर सचमुच टा-टा करने की नौबत आती है तो सबसे पहले यही चाहूंगी कि “ शीला की जवानी “ , “ मुन्नी बदनाम हुई “ , “ फेविकोल से “या “ छम्मक-छल्लो “ , से भी बेहतर ठुमके लगा, बालीवुड की सभी हिरोइनों को पीछे धकेल दूँ..तभी मर पाऊंगी वरना यमराज जी आके बैठे रहें- मुझे नहीं जाना उनके साथ..’

अंत में एक भिखारी से जब बाते की तो वह बेखौफ होकर बोला – ‘ चार दिन में तो सब कुछ निपटा दूँगा..कल ही हिसाब-किताब किया है..पूरे चौतीस लाख रूपये भीख से बटोरे हैं..पत्नी होती तो सब उसके नाम चढा देता...अब तो अपने दोनों दामादों को जो सदर नाका और गोल बाजार इलाके में भीख मांगते हैं - दस-दस लाख दे दूँगा...उनकी शादी में ज्यादा कुछ नहीं दे पाया था...बाकी के चौदह लाख रूपये सेक्टर नाईन चौक में जो एक हसीन भिखारन बैठती है, उसके खाते में डाल दूँगा. शुरूआती दिनों में सामने वही बैठती थी दस-दस घंटे नान-स्टाप...उसे देख-देख कर ही बैठना सीखा था..कई बार वह मेरी पत्नी की तरह भी रही...पर कई बार रूठने पर वह दूसरे के साथ भी बैठ जाती...कुल मिलाकर आज भी वो मुझे अच्छी लगती है..इसलिए उसका भी हक बनता है....मैं तो कल ही यह सब निपटा दूँगा..’

‘ बाकी के तीन दिन क्या करोगे भाई ? ‘ मैंने प्रश्न दागा.

उसने ‘ आती क्या खंडाला ‘ स्टाइल में जवाब दिया – ‘ ऐश करेंगे... सेक्टर नाईन चौक में.... और क्या...? ‘

उसके इस जवाब ने मुझे काफी प्रभावित किया कि मौत चाहे चार दिन बाद आये या चालीस दिन बाद, आदमी को ऐश के लिये जरुर समय बचाकर रखना चाहिए..मौत तो आनी-जानी है..अपना काम करेगी ही...हमें भी अपना काम ( ऐश) करते रहना चाहिये.. मेरी तरह ज्यादा अनाप-शनाप बातें सोच दिमाग खराब नहीं करना चाहिय्रे...चलता हूँ....मेरा भी समय हो गया ( ऐश करने का ). नमस्ते...

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थानेदार से इंटरव्यू

‘ सबसे पहले बताएं कि आप थानेदार कैसे बने ? ‘

‘ जैसे सब बनते हैं...ले-देकर..’ थानेदार ने जवाब दिया.

‘ मेरा मतलब यह नहीं था...मैं जानना चाहूँगा कि पुलिस में भर्ती होने का मन कैसे बना ? क्या परिवार में पहले भी कोई पुलिसवाला था ? ‘

‘ नहीं जी, हम सब सुखी थे...कोई न था...वो तो मेरी किस्मत कुछ खराब थी कि चोरों की वजह से पुलिस बना ‘

‘ वो कैसे ? ‘

‘ मैंने तो कभी सोचा तक न था कि पुलिस महकमे में कदम रखूँगा लेकिन दो-तीन हादसे ऐसे हुए कि पुलिस में भर्ती होने का मन बना लिया. ‘

‘ क्या हादसा हुआ था ? ‘

‘ घर से एक बार बकरी चोरी हो गई..बाप ने मेरी पिटाई कर दी कि तेरे होते यह कैसे हुआ. मैं जैसे मैं न हुआ बकरी का “ बाडीगाड “ हो गया..उन्हें शक था कि कही मैने तो नहीं बेच दी...चोरी किसी और ने की पर इल्जाम मुझ पर लगा....खैर, बात आई-गई हो गई..धीरे- धीरे वो किस्सा मैं भूल गया और घरवाले भी भूल गये. ‘

‘ आपने कहा कि चोरों की वजह से पुलिस बने ‘

‘ हाँ...ठीक ही कहा..उस घटना के बाद एक घटना और घटी...स्कूल से मेरी सायकल चोरी चली गई...इस बार भी पिटाई हुई पर बेचने का इल्जाम नहीं लगा...पिताजी ने चोरी की रपट लिखा दी पर बरसों तक नहीं मिली...मैंने महकमा ज्वाइन किया तब सायकल मिली. ‘

‘ वेरी गुड...आपकी सायकल काफी मजबूत रही होगी जो अब तक चल रही थी...कैसे मिली सायकल ? ‘

‘ इसकी एक कहानी है... थानेदार बनते ही मैंने शहर भर के तमाम पेशेवर चोरों की एक मीटिंग काल की...और कहा कि दस साल पहले स्कूल से मेरी एक हीरो सायकल चोरी हुई थी..बस इतना भर कहना था कि सारे चोर फुर्र हो गये...दूसरे दिन सुबह देखा कि थाने में लाइन से इक्कीस हीरो सायकल खड़ी थी..मैंने ईमानदारी से उसमे से एक उठा ली जिसकी शक्ल मेरे बिछुडे सायकल से मिलती-जुलती थी...बाकी सायकल स्टाफ में बाँट दी.’

‘ सर जी, आप तो कहते हैं कि चोरों के कारण इस विभाग में आये...इनसे ही आपको प्रेरणा मिली पुलिस बनने की. ‘

‘ हाँ..प्रेरणास्रोत तो वही चोर थे जो दो बार गच्चा देकर बकरी और सायकल ले गये और मार मुझे खानी पड़ी थी...तभी मैंने प्रण किया कि एक दिन पुलिस बनूँगा...चोरों को पकडूँगा ताकि मेरी तरह कोई और बालक बेवजह अपने बाप की पिटाई का शिकार न हो पर..... पर....’

‘ पर क्या सर ? ‘

‘ पर यार..पुलिस ज्वाइन करते ही मेरे ज्ञान-चक्षू खुल गये...जल्द ही जान गया कि चोर अपनी जगह है और पुलिस अपनी जगह...एक ही ट्रेक पर दोनों दौडेंगे तो चोर ही हमेशा आगे होगा और सिपाही पीछे.. पकड़ने वाला तो सर्वदा पीछे ही होता है.....कभी किसी चोर को पकड़ भी लिया तो सामान पकड़ नहीं पाते...कभी सामान पकड़ लेते हैं तो खिसियानी बिल्ली की तरह चोर ढूंढते हैं ‘

मैंने टोका – ‘ आपने सायकल बरामद कर ली तो खोई बकरी भी बटोर लिये होंगे..’

‘ आपने कैसे जाना ?...इसकी भी एक कहानी है...बकरी की मे-मे हमेशा कानो में गूंजती रहती थी, ठीक उसी तरह जिस तरह जंजीर पिक्चर में हमेशा अमिताभ बच्चन के दिमाग में घोडा दौड़ता था...एक बार एक क़त्ल के सिलसिले एक गांव गया तो जिस घर में क़त्ल हुआ था वहाँ आठ-दस बकरियाँ चरती-फुदकती दिखी..मैंने सबको गिरफ्तार कर लिया और गांववालों को छोड़ दिया...मेरी दरियादिली से वे बहुत खुश हुए..और मैं बकरी पाकर गद-गद हुआ...’

‘ चोरों के कारण आप पुलिस बने तो निश्चित ही इनके प्रति काफी श्रद्धा होगी. ‘

‘ हाँ भाई...ठीक कहते हो... इन पर कोई कार्रवाई करने का मन नहीं करता...लेकिन केवल बेसिक-डी.ए. से तो घर चलने से रहा...ये ना हो तो भूखे ही मर जाएँ..’

‘ शहर में गुंडागर्दी, उठाईगिरी, सट्टेबाजी, छेड़खानी, शराबखोरी, लूट, पाकिटमारी, क़त्ल आदि का ग्राफ कैसा है ?’

‘पुलिस के होते (गुंडई के चलते ) किसी की मजाल है जो यह काम करे ? काफी अमन-चैन है शहर में.. साल में एकाध-दो क़त्ल हो जाता है...अपराधी हम पहले से तय कर रखते हैं...पकड़ते हैं और कोर्ट को सौंप देते हैं..अब कोर्ट का काम है कि फैसला करे कि खून उसी ने किया है या किसी और ने..हमारा काम केवल पकड़ना है..चाहे बुधारू को पकडे या समारू को..’

‘ शहर के तमाम चोर-उच्चक्कों, गुंडे-मवालियों को कोई सन्देश देना चाहेंगे ? ‘

‘ हाँ...यही कहना चाहूँगा कि हर काम सावधानी और शालीनता से करें...और अच्छे समय पर करे..जनता के साथ प्यार और नम्रता से पेश आये. .वैसे पुलिस महकमे को इसकी ज्यादा दरकार है..’

‘ पुलिस और जनता के बीच मधुर सम्बन्ध बनाने कि बात हमेशा चलती है पर लाख कोशिशों के बाद भी बनते नहीं...इस पर आप क्या कहेंगे ? ‘

‘ जनता-जनार्दन से अच्छे सम्बन्ध बनेंगे तो इनसे बिगड जायेंगे...इनसे बिगाड़ करके हमें भीख थोडे ही माँगना है...वैसे जनता समझदार है...जानती है कि पुलिस की ना दोस्ती अच्छी है ना ही दुश्मनी...’

‘ ठीक है थानेदारजी..इंटरव्यू के लिये धन्यवाद..’

‘ चलते-चलते हम भी एक बात कहें.’ थानेदार बड़ी शालीनता से गुर्राया.

‘ हाँ-हाँ...कहिये...क्या बात है ? ‘ मैंने कहा.

‘ हमें भी कभी सेवा का अवसर दें...आपकी कोई चीज कभी खोई हो तो बताएँ..खड़े-खड़े बरामद करवा देंगे...इस फील्ड मे हमारी मास्टरी है..’

एक पल के लिये सोचा कि कह दूँ – बीस साल पहले मेरी प्रेमिका खो गई, वो दिला दे लेकिन इक्कीस तोपों की सलामी जैसे इक्कीस हीरो सायकल की याद आई तो डर गया. सचमुच कहीं थानेदार बीस-इक्कीस प्रेमिका खड़ी कर दे तो...?

मैं मुस्कराकर ‘ थैंक ‘ ही बोल पाया.

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सवाल आपके, जवाब हमारे

मेरे एक मित्र हैं जो एक साप्ताहिक हिंदी पत्रिका के संपादक हैं. उन्हें मालूम है कि मुझे भी इसी तरह की बीमारी है इसलिए कभी-कभी मेरा कुशलक्षेम पूछ लेते हैं.( पर मेरा कोई लेख कभी छापते नहीं) एक बार उन्होंने फोन कर कहा कि उन्हें मेरी मदद की दरकार है. बताया कि पत्रिका के विशेष कालम ‘ सवाल आपके, जवाब हमारे ’ देखने वाले सज्जन पिछले पांच- छः दिनों से कहीं लापता हैं. उनके घरवाले कोई सवाल-जवाब नहीं कर रहे फिर भी रिपोर्ट लिखा दी है. अब मामला ये है कि हमारी पत्रिका का यह सबसे ज्यादा पापुलर स्तंभ है, इसे कंटीन्यू करना अति आवश्यक है. सवालों के जवाब देने में माहिर थे वो. बड़ा धांसू जवाब बनाते थे. मैं चाह्त्ता हूँ कि इस बार आप इसे कंटीन्यू करें. हमारे पाठक अगर तुष्ट हुए तो यह स्तंभ आगे भी आप ही देखेंगे. इस सप्ताह के सवाल किसी के हाथ भेज रहा हूँ...आशा करता हूँ, उनसे भी बेहतर और कुछ नयेपन से जवाब देंगे. मैंने हामी भर दी और कहा कि सवाल चाहे कैसा भी, कितना भी बड़ा या पेचीदा हो, जवाब मेरा केवल एक ही शब्द का होगा. मंजूर हो तो भेजे. वो मान गये. इस हफ्ते के सवाल-जवाब कुछ इस तरह बन पड़े हैं, देखें-

बुलंदशहर से बाली बेताल का प्रश्न – अपने सात-वर्षीय सुपुत्र के आचार-व्यवहार से परेशान हूँ. कोई उसे कितना भी छेड़े, गुस्सा दिलाये, वह कभी उत्तेजित नहीं होता.शांत ही रहता है. चेहरे पर कोई भाव नहीं होता. बहुत कम बोलता है और इतनी धीमी आवाज में बोलता है कि खुदा जाने उसे खुद भी सुनाई पड़ता है कि नहीं. भगवान जाने बड़ा होकर क्या बनेगा?

जवाब – ‘ पी.एम.’

झुमरीतलिया से तरुण तालुकदार का प्रश्न – जब से कोयला आबंटन घोटाले के बारे में पढ़ा-सुना है, मैं एक अपराध भाव से घिर गया हूँ. कोयले की सिगड़ी से मेरे घर में खाना बनता है. जब-जब खाना खाता हूँ..मुझे लगता है – मैं भी कहीं न कहीं इस घोटाले में इनवाल्व हूँ..मैं ठीक से खा नहीं पाता. सलाह दें, क्या करूँ?

जवाब – ‘ फाका ‘

मुंबई से मालती मुले का प्रश्न – एक स्त्री का अंतिम लक्षय क्या होता है ?

जवाब – ‘ शादी ‘

भाटापारा से बचकामल का प्रश्न – पत्नी लड़कर मायके चली गयी है. उसे शक है कि मैं किसी से प्रेम करता हूँ लेकिन सच मानिये, इश्वर की सौगंध खाकर कहता हूँ- मेरी कोई प्रेमिका न कभी थी, ना है और अब तो पत्नी भी नहीं है. बताइये, क्या करूँ?

जवाब – ‘ ऐश ’

नईदिल्ली से नवीन नौटियाल का प्रश्न – रात में भयानक सपने आते हैं. कभी देखता हूँ कि मैं रेल की पटरी पर कटकर मर गया तो कभी नदी में डूबकर मर रहा हूँ. इससे छुटकारा पाने क्या करूँ?

जवाब – ‘ जागरण ‘

कोलकाता से कामदेव कामले का प्रश्न – निपट कुंवारा हूँ. सीधे-सपाट जिंदगी से उब गया हूँ. वही रोज-रोज का खाना-पीना, सोना-पढ़ना...क्या करूँ कि जिंदगी में जलजला आ जाये?

जवाब – ‘ शादी ‘

जबलपुर से जनकलाल का प्रश्न – मेरी मासिक आय केवल पन्द्रह सौ रूपये है. सौभाग्य कहिये या दुर्भाग्य, एक गरीब सुन्दर लड़की से शादी कर मंहगाई के इस दौर में आफत मोल ले ली है. बताएं, अब मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब – ‘ परिवार-नियोजन ‘

भोपाल से भोलाराम जी का प्रश्न – मुझे कोई भी काम-धंधा सूट नहीं होता , बतायें- क्या करूँ ?

जवाब – ‘ राजनीति ‘

आखिरी प्रश्न चेन्नई से के. चिल्वन का – विज्ञानं का स्टूडेंट हूँ , बताएं- अगर सूरज रात को निकलने लगे तो क्या होगा ?

जवाब – ‘ दिन ‘

‘ सवाल-जवाब ‘ प्रकाशित हुआ तो पाठकों ने काफी पसंद किया. संपादक मित्र ने बधाईयां देते ( और घोर चिंता करते ) प्रश्न किया कि कल को अगर वह लापता सज्जन ( जो यह स्तंभ देखते थे ) वापस आ जाये तो उसे क्या जवाब दें ?

मैंने कहा – ‘ राम-राम ‘

कुछ दिनों बाद ज्ञात हुआ कि वो लापता सज्जन परमानेंट लापता हो गये. सबको ‘ राम-राम ‘ कर ‘ ऊपर ‘ की यात्रा में निकल गये. अब संपादक मित्र चिंता-मुक्त थे और मैं चिंताग्रस्त क्योकि जवाब के साथ – साथ मुझे सवाल भी बनाने थे. संपादक मित्र ने रहस्योदघाटन किया कि कोई इतना खाली नहीं है कि यह सब फालतू काम करे. पत्रिका चलाने के लिये यह सब हमें ही करना होता है. अब आप जी-जान से लग जाइये इस ( फालतू ) काम में.

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प्रोजेक्ट – पीड़ा

कुछ दृश्य इन दिनों लगभग अदृश्य हो गए हैं – मंदिर के पास, सूखी इमली पेड़ के ठूंठ पर उड़-उड़कर उठता-बैठता चील...घर के मुंडेर पर दिन-भर काँव – काँव का कर्कश धमाल-ध्वनि करता कौआ...घर के भीतर दीवाल पर टंगे फोटो-फ्रेम के पीछे अवैध कब्ज़ा जमाता गौरैया.. बीच सड़क पर हौले-हौले चलता गधा..और गधे के पीठ पर मन भर का सील-बट्टा. इनमे से कुछ दृश्य अब पुनः लौटने लगे हैं, लेकिन एक दूसरे ही फार्म मे. दस किलो के बच्चे की पीठ पर बीस किलो का बस्ता देख बरबस ही गधे का स्मरण हो आता है. के. जी. के बच्चों पर इतने के. जी. का भार ? बड़ी पीड़ा होती है. भगवान जाने इतना सब ये कैसे पढते हैं ? और इनके टीचर इतना सब पढ़ाते कब हैं ?जहाँ तक मेरी जानकारी है, आजकल के टीचर्स की टीचिंग , टचिंग नहीं होती.

हमारे ज़माने मे तो एक या दो ही पुस्तक हुआ करते इसलिए उनके नाम भी आज तक याद है – बड़ी पहली और छोटी पहली. और तो और, हमें बड़ी पहली का पहला पाठ भी आज तक जुबानी याद है – “ अमर घर चल, चल घर अमर, घर चल अमर , चल अमर घर “ ये और बात है कि उस जमाने में, उस समय इस लाइन का अर्थ हम नहीं समझ पाए पर आज समझ में आता है कि स्कूल से बढ़िया घर होता है. पहले पाठ से ही सचेत करते लेखक घर चलने कहता है – ‘ चल घर चल...स्कूल में भला क्या रखा है ? ‘

आज के दौर में बच्चे क्या-कुछ पढते हैं , मुझे नहीं मालूम पर इतना मालूम है- अधिकांश बच्चे इंग्लिश मीडियम में पढते हैं. बस से जाते हैं , बस से आते हैं...बस के बिना बेबस हो जाते हैं. पहले के दौर में ‘ ट्यूशन ‘ गधे बच्चों की थाती हुआ करती. केवल उन्हें ही ‘ फिट ‘ माना जाता. आज केवल होशियार बच्चे ही ट्यूशन पढते हैं. पहले केवल दो प्रतिशत ही पढ़ा करते , आज अठानवे प्रतिशत पढते हैं. पहले हाईस्कूल जाने के बाद ही टीचर गधे बच्चों के लिये ट्यूशन की सिफारिश करते , आज बिना किसी सिफारिश के नर्सरी के बच्चे तक ट्यूशन में बैठ जाते हैं. अजीब दौर आया है शिक्षा-जगत में. सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया है

उल्टे-पुल्टे के इस दौर में इन दिनों स्कूली बच्चों में अंग्रेजी का एक शब्द काफी पापुलर है – ‘ प्रोजेक्ट ‘ जिस देखो वही प्रोजेक्ट बनाने में मशगूल दिखता है. के.जी.-1 से क्लास-12 तक के स्टूडेंट इस प्रोजेक्ट-रूपी पहाड पर ट्रेकिंग करते, पसीने से तर-बतर होते दिखते हैं. केवल दो प्रतिशत स्टूडेंट ही अपने मन से कोई प्रोजेक्ट तैयार करते होंगे , बाकी सब मम्मी-पापा, चाचा-चाची, भैया-भाभी, मामा-मामी ‘ हेल्प-लाईन ‘ से बनाते हैं. प्रोजेक्ट का विषय भी इतना रुखा और विकट होता है कि मम्मी-पापा के भी पसीने छूट जाये. वो तो भला हो ‘ गूगल ‘ इंटरनेट का कि माँ-बाप को बेइज्जत होने से बचा लेते हैं. आज के बच्चे खुद तो कम काम करते हैं, पैरेंट्स से ज्यादा मशक्कत करवाते हैं. आज का पापा ( या मम्मी ) आफिस में, आफिस या कंपनी का काम कम करते हैं, बच्चों के प्रोजेक्ट का काम ज्यादा करते हैं. शायद इसी कारण अच्छी- अच्छी कपनियां इन दिनों डूब रही है. बीच- बीच में काम करते- करते कभी- कभी कुढते भी है उस दैत्यरूपी टीचर से जो यह सब बच्चों को परोसता है.

कई महीनों से मेरे छोटे भाई की बेटी प्राची जो नवीं पढ़ती है, मुझे ‘ प्रोजेक्ट ‘ परोसती आ रही है. आफिस निकलने के पहले ही आर्डर देगी कि अमुक विषय पर प्रोजेक्ट तैयार करना है... इंटरनेट से डाउनलोड कर शाम तक ले आयें. कभी अंग्रेजी में मांगती तो कभी हिंदी में. शुरू-शुरू में तो दो-चार बार आफिस के मित्रों से निकलवा लिया पर यह तो रोज का कार्यक्रम हो गया था. प्रोजेक्ट के चक्कर में आखिरकार मुझे नेट चलाना, डाउनलोड करना आ गया.

काफी दिनों से ये काम करते - करते महसूस किया कि बहुत ही कष्टप्रद काम है- प्रोजेक्ट बनाना. इसके विषय भी तरह-तरह के होते हैं. कभी ‘ जानवरों पर जुल्म ‘ विषय पर ढूंढने कहती है तो कभी ' प्रोजेक्ट टाइगर ’ पर लेख निकालने, कभी विलियम शेक्सपियर की जीवनी मांगती है, तो कभी जार्ज बनार्डशा के बारे में पूछती है, कभी किरण बेदी पर शार्ट नोट्स मांगती है तो कभी पी.टी.उषा पर. आश्चर्य कि कभी गाँधी, नेहरु, सुभाष पर आज तक नहीं मांगी. कभी रानी लक्षमीबाई या रानी दुर्गावती पर नहीं मांगी मैंने पूछा भी कि क्या इन विषयों पर प्रोजेक्ट तैयार करने नहीं कहते, तो कहती है- ‘ आउटडेटेड लोग हैं ये... प्रोजेक्ट में इनका कोई काम नहीं. ‘

कई बार मैंने समझाया कि कभी-कभार कुछ अपने मन से भी कर लिया करो तो कहती है – अपने मन से तो टीचर्स भी कुछ नहीं करते तो हम क्यूँ करें ?एक दिन उसे एक बहुत ही साधारण विषय पर एक प्रोजेक्ट अपने मन से बनाने को कहा. विषय था – ‘ टीचर ‘. उसने जो कुछ लिखा, आप भी पढ़ें –

‘ टीचर ‘

-.स्टुडेंट्स को रोज-रोज जो टार्चर करे , उसे टीचर कहते हैं. हिंदी भाषा में इन्हें ‘ शिक्षक ‘ , ‘ गुरूजी ‘ तथा गांवों में इन्हें ‘ मास्टरजी ‘ भी कहते हैं. हमारे राज्य में इन दिनों इन्हें एक नए नाम से विभूषित किया गया है – ‘ शिक्षाकर्मी ‘ ठीक वैसे ही जैसे सफाईकर्मी, रेलकर्मी’, रंगकर्मी आदि-आदि. बेचारों का हमेशा बुरा हाल रहता है. अखबारों में अक्सर पढ़ती हूँ कि इन्हें छः-छः , आठ-आठ महीने तक सैलरी नहीं मिलती...फिर भी डटे रहते हैं...हड़ताल पर हड़ताल करते रहते हैं. मेरे पड़ोस की नीलू दीदी भी शिक्षाकर्मी है. हर रोज पच्चीस किलोमीटर दूर नदी पार कर एक गांव के प्रायमरी स्कूल में पढाने जाती है.शाम रात तक लौटती है. अक्सर बताती है कि पूरी सैलरी तो गांव आने-जाने में ही खर्च हो जाती है. केवल मध्यान भोजन ही हाथ आता है ( मतलब कि पेट में जाता है ) इस साल बड़ी दीदी की शादी की बात चल रही है. कई लड़के आये पर अधिकाँश शिक्षाकर्मी वर्ग-२ और ३ वाले थे. बड़े पापा कहते हैं- शिक्षाकर्मी को छोड़ किसी को भी दे दूंगा. इस बात से तो लगता है कि शिक्षाकर्मीयों का या तो इम्प्रेशन ठीक नहीं है या फिर सैलरी अच्छी नहीं है. मेरे पड़ोस में एक गुरूजी हैं-चन्द्रिका प्रसाद, अक्सर घर आकर लेक्चर देते रहते हैं कि टीचरशिप एक सम्माननीय कार्य है. टीचर ही बच्चों के भविष्य गढता है..टीचर ही तम दूर कर दिलो-दिमाग में रौशनी भरता है .एक साधारण - सा टीचर देश का राष्ट्रपति भी बन सकता है, यह सिध्द किया है डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने. उसी के सम्मान में पूरे देश मे पांच सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है. तब मैंने पूछा था कि क्या कभी कोई कुली राष्ट्रपति बन जाये तो उसी तरह ‘ कुली दिवस ‘ मनाएंगे ? उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया था. अंत में इतना कहूँगी कि टीचर्स डे के दिन काफी खुश रहती हूँ इसलिए कि उस दिन इन्हें काम करते देखती हूँ और हमारी छुट्टी रहती है. कम से कम एक दिन तो प्रोजेक्ट के काम से हम बच जाते हैं.

निबंध के अंत में प्राची ने आखिर ‘ प्रोजेक्ट-पीड़ा ‘ उजागर कर ही दी. पढकर मैं मुस्कुराये बिना नहीं रह सका. हौसला आफजाई करते कहा कि इसे कहते हैं- मौलिक रचना... .तुमने जो सुना-देखा लिख दिया..इससे ज्यादा अच्छा तो ‘ गूगल ‘ भी नहीं दे सकता. अब नेट का पीछा छोडो...अपने मन की सोचो लिखो.. एक बार कोशिश करके देखो, अच्छे मार्क्स मिलेंगे.. सफलता जरुर मिलेगी. उसने कोशिश कि और सफल रही. अब प्राची ‘ प्रोजेक्ट-पीड़ा ‘ से मुक्त हो गयी है और मैं भी ‘ डाउनलोड ‘ के लोड से बच गया हूँ.

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प्रमोद यादव, दुर्ग,

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जीवन-परिचय ( प्रमोद यादव )

जन्म- 30-06-1952

जन्म-स्थान- दुर्ग

राज्य-छत्तीसगढ़

भारत

रिटायर्ड आफिसर ( जनसम्पर्क अधिकारी )- भिलाई स्टील प्लांट. मूलतः फोटोग्राफर. साहित्य से अभिरुचि सन-1970 से. तब से कहानी-लेखन. सौ से अधिक कहानियाँ विभिन्न स्थानीय व राष्ट्रीय-स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. 1979 में दुर्ग-भिलाई जेसीस द्वारा युवा-

कहानीकार व बेहतरीन फोटोग्राफी के लिए सम्मानित. अनेक फोटोग्राफिक प्रदर्शनियां आयोजित. फोटोग्राफी में कई बार पुरस्कृत.

2004 में छत्तीसगढ़ स्तरीय फोटोग्राफी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार. इन दिनों हास्य-व्यंग्य लिखने में व्यस्त. अब तक लगभग बीस रचनाएँ प्रकाशित.

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  1. Badhai charo vyang apni apni jagah par uchch koti ke hain. Padhkar mazaaa aa gayaa

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    1. श्री श्रीवास्तवजी , हौसला-आफजाई के लिए आपका शुक्रिया. मेरे अन्य हास्य-
      व्यंग्य आप ‘गद्यकोश’ में भी पढ़ सकते हैं.

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  2. श्री श्रीवास्तवजी , हौसला-आफजाई के लिए आपका शुक्रिया. मेरे अन्य हास्य-
    व्यंग्य आप ‘गद्यकोश’ में भी पढ़ सकते हैं.

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  3. रचनाये अच्छी लगी |स्तरीय लेखन के लिए बधाई स्वीकारे |
    सुशील यादव
    वडोदरा

    उत्तर देंहटाएं




  4. धन्यवाद. आगे भी यही कोशिश रहेगी

    उत्तर देंहटाएं

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