शनिवार, 29 जून 2013

उमेश मौर्य की व्यंग्य कहानी - अंगूरी जनता

अंगूरी जनता

गणित, मैथ और अंग्रेजी ये तीनों विषय मेरे पैदा होने के पहले से ही कमजोर थे। आकलन करना, अन्‍दाजा लगाना तो मेरे लिए टेढी जलेबी थी। टेढी खीर क्‍यों कहें उसमें क्‍या टेढ़ापन होता है। इसलिए मॉ के पेट में जब से प्रवेश मिला। संसार देखने की उत्‍कट अभिलाषा जाग उठी। कवि हृदय के कारण एक नये अनुभव के लिए लालायित था। विज्ञान के अनुमान से तो नौ माह की गणित बैठा लिया था। लेकिन वहॉ भी मेरा अनुमान गलत ही निकला। सात महीने में ही संसार वालों के लिए आफत बन बैठा। उस जमाने में न आईसीयू, न एन आईसीयू । बहुत मुश्‍किल से जिन्‍दा बचा रहा। मेरी बुआ जी मुझे चिड़िया का बच्‍चा कहा करती थी। बुकवा उबटन लगाते समय खाल के बाल, नहीं, बाल के खाल, ये भी गलत है। शरीर से चमड़ी निकल जाती थी, उबले आलू के छिलके की तरह। मॉ ने वहॉ भी मुझे जी भर के दर्द से चिल्‍लाने न दिया। बोलती बेटा सो जा नहीं तो बिल्‍ली खा जायेगी।

जैसे आज लोग चिल्‍लाते हैं, किसी मॉग को लेकर, सरकार की परेशानियों से तो लोग कहते हैं-चुप हो जा नहीं तो पुलिस पकड़ लेगी। लाठियाँ बरसेगी। बचपन में बिल्‍ली का डर अब पुलिस और सरकार का डर। चोर डाकू और लुटेरों से तो ज्‍यादा इनसे डर लगने लगा है। सही बोलो तो फॅसो, गलत बोलो तो मीडिया बिल्‍कुल तैनात है। कुछ भी बोलोगे वो अपना प्‍वाइंट निकाल ही लेगी। चर्चा करने की। इससे बढ़िया चुप ही रहो। अरे भाई एक बार एक बच्‍चे को एक अजगर ने पकड़ लिया। सौभाग्‍यबस वहॉ मीडिया आ पहुची। अब लाईव प्रसारण शुरू बच्‍चा तड़फड़ा रहा है। मीडिया वाला- देखो कैसे तड़फड़ा रहा है बच्‍चा। पिछले 30 मिनटों से अजगर इसे निगलने की नाकाम कोशिश कर रहा है। तभी गॉव से एक आदमी ने देखा बोला- ये आदमी पागल है क्‍या ? बच्‍चा तड़फड़ा रहा है और इसे वीडियो बनाने की पड़ी है। उसने अपनी घार दार हंसिया निकाली और अजगर के टुकड़े करके बच्‍चे की जान बचाई। क्‍या कहे मीडिया वालों को इन्‍हें तो बोर्डर पे होना चाहिए। जो इतने सारे घुसपैटी आते है। एक भी नहीं आयेंगे। आयेंगे तो पूरे चैनल के सामने। कहॉ-कहॉ से इन्‍हें खबर मिल जाती है। गोली से जादा तेज तो इनकी जुबान चलती है। सभी डरते है। दुनिया का ऐसा कोई भी पद या प्रतिष्‍ठित व्‍यक्‍ति न होगा जो इनसे न डरता हो। जनता तो आम बात है। लेकिन एक बात समझ में नहीं आती।

जनता को आम ही क्‍यों बोलते हैं। अंगूर जनता, केला जनता, सन्‍तरा जनता, कटहल जनता, सेव जनता, इतने सुन्‍दर सुन्‍दर फल लगे है। केवल आम ही मिला। जिसने भी ये नाम दिया है मैं उससे सहमत नही। समय के अनुसार सब कुछ बदलता है तो इसे भी बदलना चाहिए। जैसे आज का समय में मुझे नाम देना पडे़ तो मैं तो अंगूर जनता कहूँगा। अभी के सरकारी खांचे में बिल्‍कुल सही बैठता है। और ये प्रस्‍ताव संसद में पास भी हो जायेगा। पूर्णतया सिद्ध किया अनुभूत नुस्‍खा है। अब देखो सरकार जनता को पूरा का पूरा एकदम खाये जा रही है। निगल रही है। कुछ भी नही छोड़ रही है गुठली भी। अंगूरी जनता कहेंगे तो बिल्‍कुल एक साथ समूह में लगे अंगूर जैसे लटके लोग। एक एक कर तोड़ो और निगल लो। न आम न गुठली। हजम सब चाहे जब। ये आम नहीं अंगूरी जनता है। अब चूसने का और गुठलियों का जमाना गया। निगलने का समय आ गया। बड़े आसानी से पच भी जाता है।

''आम नहीं, अंगूर जनता। सुख सुविधा से दूर जनता॥''

-उमेश मौर्य

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