शुक्रवार, 7 जून 2013

देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम' के चौपदे :- सुनते ही वन्दे मातरम् था ज़ोश जागता

चैनल कोई भी खोलिए व्याख्यान चल रहा,

कहीँ राम कहीँ कृष्ण का आख्यान चल रहा;

बाबाओँ स्वामियोँ या विदुषियोँ की होड़ है-

अँखमुँद ये देश भेड़ियाधसान चल रहा.

~~~*~~~

'सुनना' है कब-किसे, यहाँ सबको है 'सुनाना',

जिसको नहीँ सुनना- सुनाना साथनिभाना;

दरअस्ल 'सुनाने' मेँ हैँ दुनिया मेँ हम अव्वल,

हाँ, सुनते हैँ 'सुनने' का भी था इक ज़माना.

~~~*~~~

सुनते ही वन्दे मातरम् था ज़ोश जागता,

ग़ुमराह,सरफिरा कोई मदहोश जागता;

अन्याय के खिलाफ़ क्षोभ-रोष जागता,

मुद्दत से था बैठा हुआ ख़ामोश जागता.

~~~*~~~

'सुनते ' थे लोग इक घड़ी, 'गुनते' थे रात-दिन,

ज़ज़्बाते-इंक़लाब मेँ जलते थे रात-दिन;

अपने दिलो-ज़हन मेँ सुलगते थे रात-दिन;

बलिदान अपना करने हुलसते थे रात-दिन.

~~~~*~~~

हम 'सुनना' ही जब भूल गए हैँ तो क्या 'गुनेँ',

न 'गुन' पाए न 'धुन' पाए, तो 'सत्य' क्या चुनेँ;

उँचाइयोँ को हम कैसे हासिल कर पाएँगे,

मज़मे लगा लफ़्फ़ाज़ी- रस्सियाँ भले बुनेँ.

~~~*~~~

अब ये शगूफ़ेबाजियाँ , भाषण न चाहिए,

न रावण,न दुर्योधन- दुःशासन चाहिए;

मजहब, ज़मात, जाति, वंशवाद,जोड़-तोड़,

ये होड़-दौड़ छोड़ अब सदाचरण चाहिए.

5 blogger-facebook:

  1. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज (शुक्रवार, ७ जून, २०१३) के ब्लॉग बुलेटिन - घुंघरू पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

    उत्तर देंहटाएं
  2. 'सुनना' है कब-किसे, यहाँ सबको है 'सुनाना',
    - कौन सुनता है यहाँ और कौन गुनता है .क्या होना चाहिये इसकी किसे चिन्ता है !

    उत्तर देंहटाएं
  3. अब ये शगूफ़ेबाजियाँ , भाषण न चाहिए,
    ये होड़-दौड़ छोड़ अब सदाचरण चाहिए.
    - पर लोग तो दूसरों को उपदेश देकर संतुष्ट हो लेते हैं!



    उत्तर देंहटाएं
  4. Akhileshchandra srivastava8:17 am

    Achcha prayas hai

    उत्तर देंहटाएं

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