गुरुवार, 13 जून 2013

अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव की दो लघुकथाएँ

ना घर का न घाट का
बहुत  दिनों पहिले  एक छोटे से शहर में गोपाल मेहता नामक  व्यक्ति  रहता था , वह  स्थानीय अस्पताल में  कम्पौंदर  के पद  पर काम  करता था .
उसकी पत्नी रीता बड़ी सुशील एवम सुंदर थी वोह दो बच्चो का पिता था 5 साल की राधा और 2 साल का राम , परिवार खुशहाल था

एक दिन गोपाल की मुलाकात विमला नामक सुंदर लड़की से हुई और वोह उसके प्रेम जाल में जो पड़ा तो फंसता ही चला गया वोह उस पर अपनी सारी कमाई उड़ाने लगा सारे समय वोह विमला के पास पड़ा रहता बेचारी पत्नी बहुत परेशान रहती लाख वह गोपाल को समझाती पर वह उस से ही झगडा करता उसे मारता पीटता

ऐसे ही दिन बीतते गये एक दिन विमला बोली तुम मुझसे शादी कर लो ना कहने पर उसने बहुत झगडा किया और उससे कोर्ट में शादी करली कुछ दिन बीतने के बाद विमला बोली देखो तुम्हारी पत्नी मैं हूँ ..अतः सारी तनख्वाह मुझे दो वोह तनख्वाह लेने लगी न देने पर वोह अपने दोस्तों के साथ जाकर जबरदस्ती छीन लेती

अब गोपाल की पत्नी रीता के बहुत बुरे हाल थे उसे खुद और बच्चों का पेट पालना मुश्किल हो गया तब उसने गोपाल से कहा की मैं तुम्हारी कानूनी पत्नी हूँ और मेरे रहते तुम दूसरी शादी नहीं कर सकते यदि मैं कोर्ट में गयी तो ना केवल तुम्हारी शादी रद्द होगी तुम जेल भी जाओगे और
और नौकरी भी जाएगी अतः मुझे भी घरखर्च दो गोपाल ने उसे भी खर्च देना स्वीकार किया

अब स्तिथि यह है की विमला पूरी तन्ख्योह ले लेती है और रीता बाकी ऊपर की कमाई ....गोपाल की हालत ख़राब है वोह फटे और गन्दे कपडे पहने भूँखा प्यासा सड़कों पर डोलता है उसे दोने औरतें नहीं पूछती पैसे लेने के बाद वे उससे मुँह मोड़ लेती हैं

अब वह न घर का है न घाट का


सबक : क्या गोपाल जैसे पति इस कहानी से कुछ सबक लेंगे
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बाजी पलट गई...
बहुत पुरानी बात है  सर्दियों की रात में  फर्स्ट क्लास  के डिब्बे में एक
फौजी अफसर देहरादून से दिल्ली का सफ़र कर रहा था . गाडी के बीच के
स्टेशन पर रुकने पर एक आकर्षक महिला उस डिब्बे में चढ़ी और सामने की
सीट पर बैठ गयी कुछ समय बीतने पर वोह उठी और उस फौजी अफसर के पास जाकर
बोली जो भी तुम्हारे पास कीमती सामान है वोह मुझे दे दो वर्ना मैं
शोर मचौंगी अफसर कुछ नहीं बोला और अपनी
किताब पढता रहा जब दो. तीन बार कहने पर भी फौजी अफसर ने कोई प्रतिक्रिया
नहीं दी तो वोह महिला गुस्से से पागल हो उठी और उसने अपने
कपडे फाड़ डाले और शरीर पर खरोंचे बना लीं और बचाओ बचाओ चिल्लाने लगी तथा
जन्जीर्र खींच कर गाडी खड़ी कर दी

गाडी रुकने गौर्ड तथा जनता पुलिस के साथ डिब्बे में आ गयी वोह औरत जोर जोर
से चीख और रो रही थी और उस फौजी अफसर की ओर
इशारा कर के कह रही थी कि इसने मेरी इज्ज़त पर हाथ डाला सब लोग फौजी अफसर को
बुरा भला कहने लगे जो अभी भी शांति से अपनी
किताब पढ़ रहा था जब शोर बहुत मच गया तो वोह उठा और शांति से अपने कंधे
से शाल गिरा दी

सबने देखा कि उसका एक हाँथ कंधे से और और दूसरा कोहनी से कटा था वोह
मुस्कराने लगा लोगों ने पहिचाना वे सेना से वीर चक्र प्राप्त
रिटायर्ड ब्रिगेडियर बलराम सिंह हैं जो देहरादून के एक प्रसिद्ध नागरिक थे
अब चौकने की बारी उस महिला की थी उसने भागने का प्रयास किया
पर पकड़ी गयी .....बाजी पलट गयी थी


नोट सब लोग इतने भाग्यशाली नहीं होते और मौका होता तो महिला की बात सही
मानी जाती और पुरुष जेल में होता

3 blogger-facebook:

  1. बाज़ी पलट गयी बढ़िया कहानी है .... फौजी के दोनों ही हाथ कटे हुये थे तो किताब कैसे पकड़े हुये था ?

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. akhileshchandra srivastava9:54 pm

      Kahani dhyan se padhne ke liye dhanyabad ab yeh to retired brigediar saheb hi batayenge ki unhone kitab kaise pakdi thi

      Rachanayen log padhe aur galti pakadne par utsahit hokar tippani bhi karen isi liye kuch avsar diya jata hai

      हटाएं
  2. बेनामी6:03 pm

    sangeeta ji you caught the right point...how could be he was able to hold the book.

    उत्तर देंहटाएं

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