शनिवार, 29 जून 2013

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - घृणा

घृणा

मैं जीटी रोड पर पहुँचने वाला था। देखा उधर से रामू मुस्कराता हुआ चला आ रहा है। मैंने पूछा क्या बात है भाई ? बड़े खुश दिखाई दे रहे हो। रामू बोला अभी यूनिवर्सिटी से आ रहा था। ऑटो में एक सीट पर दो लड़कियाँ बैठी हुई थीं। ऑटो वाले एक सीट पर चार लोगों को बैठाते ही हैं। इसलिए मैं भी बैठ गया।

कुछ देर बाद एक बाबाजी ऑटो में चढ़ने लगे तो मैं किनारे हो गया ताकि बाबाजी बीच में बैठ सकें। बाबाजी बैठते इसके पहले लड़की बोली आप उधर किनारे बैठिए और मुझसे कहा आप इधर आ जाइए। मैं लड़की की तरफ आ गया और बाबाजी किनारे बैठ गए। लड़की ने धीरे से कहा कि हमें बृद्धों से घृणा है।

मैंने रामू से कहा कि तुम्हें लड़की से कह देना चाहिए था कि मैं यहीं ठीक हूँ और बाबाजी को बीच में बैठा लेना चाहिए था। रामू बोला लड़की बुलाकर मुझे अपने पास बैठा रही है और मैं कह दूँ कि यहीं ठीक हूँ। कभी तो किसी को सही सलाह दे दिया करो। रामू ऐसा कहकर मुस्कराते हुए चला गया।

रामू तो यह घटना बताकर चला गया। लेकिन मैं सोचने लगा कि अपना घर-समाज कहाँ जा रहा है ? जिस देश में वृद्धों की सेवा से आयु, यश, धन, विद्या, बल आदि बढ़ने की बात शास्त्रों में कही गयी है आज उसी देश के युवा कहते हैं कि हमें वृद्धों से घृणा है ?

जिस लड़की को वृद्धों से घृणा होगी, क्या वह अपने वृद्ध माता-पिता अथवा दादा-दादी से घृणा नहीं करेगी ? यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली लड़की कितना दिन और माता-पिता के साथ रहेगी ? शादी के बाद क्या वह अपने सास-ससुर की सेवा कर पाएगी ? क्या वह अपने वृद्ध सास-ससुर से घृणा नहीं करेगी ?

यही सब सोचते-सोचते मेरे लिए जीटी रोड मानो दूर होती जा रही थी। यह वाक्य अब भी मेरे मन-मस्तिष्क में गूँज रहा था कि ‘हमें वृद्धों से घृणा’ है।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।
ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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2 blogger-facebook:

  1. बूढों के जीने के अधिकार पर ही प्रश्न चिन्ह लग गया है. सुन्दर रचना

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  2. हर शख्श को एक दिन इस उम्र में आना है. युवावर्ग अपने ‘कल’ की भी सोचें.सटीक रचना पर बधाई.
    प्रमोद यादव


    उत्तर देंहटाएं

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