शनिवार, 29 जून 2013

ललिता भाटिया की लघुकथाएँ

01

बेटियां

जून की तपती दोपहर में एक मजदूर सड़क के बीच में खड़ा चिल्ला रहा था   =अरे कोई मेरी बेटी को बचाओ दो बदमाश उसे बिल्डिंग के अंदर ले गए हे। उस की पुकार पर एक सेठ ने ड्राइवर से गाडी रोकने को कहा।

सेठ का ड्राइवर ओर मजदूर उस अधबनी बिल्डिंग में घुस गए। तभी लड़की भागती हुई बाहर आई। सामने सेठ को देख उस के कदम ठिठक गए पापा कहते हुए वो सेठ जी से लिपट गई। ये देख मजदूर चुप चाप अपनी राह चल पड़ा तो सेठ जी ने पीछे से आवाज़ दी कर पूछा तुम तो कह रहे थे अंदर तुम्हारी बेटी है।

क्या तुम्हारी ओर क्या मेरी बेटियां तो सबकी सांझी होती हैं। ये सुन सेठजी नतमस्तक हो गए।

02 

नेनी मात्र आया

बीना पोते के जन्म पर  अमेरिका जा रही थी .इस से पहले बेटे बहू ने साथ चलने को नहीं कहा ऐसा नहीं था .फोन पर तो वो हमेशा ही कहते थे एक बार तो वो लेने भी ए पर वो अपना देश छोड़ कर जाना नहीं चाहती थी .पति रहने तक तो वो अपने घर में ही रही पर पति के जाने के बाद बेटी दामाद जिद कर के अपने साथ ले आये .फिर भी वो मौका मिलते ही अपने घर में ८-१० दिन वो ज़रूर रह कर आती .पर कहते हे न कि सूद मूल से प्यारा होता हे ओर इस बार सूद ने उसे अमेरिका बुला ही लिया .बीना रोती बिलखती बेटी ओर चीनू को छोड़ प्लेन में सवार हो गई .रुई  के फाय स पोता गोद में आते ही बीना निहाल हो गई .समय बीता बहू भी ऑफिस जाने लगी .एक दिन बहू अपने साथ दो बच्चे ओर ले आई - माँ ये मेरी एक दोस्त के बच्चे हैं इन कि दादी कुछ समय के लिए इंडिया गई हुई है आप-------

अरे बहू कोई बात नहीं मैं इन का भी ध्यान रख लूंगी .वो बच्चे भी जल्दी उस से घुल मिल गए .बच्चे उसे नेनी बुलाते थे ओर वो समझती बच्चे उसे नानी बुलाना चाहते हे पर शायद ये उन के बोलने में गड़बड़ी हे .वो खुद को उन कि नानी ही समझती रहती .एक दिन पार्क में एक वृद्ध  महिला से मिली जो वास्तव में एक नेनी थी .उस से उसे नेनी का अर्थ पता चला उसे लगा आज उस के पैरों के नीचे से ज़मीन ही नहीं सर के ऊपर से आसमान भी छिन गया .क्या सच में वो अपने पोते की दादी नहीं नेनी हे . नेनी - मात्र आया .उस  ने चुन्नी से आँख के कोर साफ़ किये ओर भारी कदमों से घर की ओर चल दी .

ललिता भाटिया

नैनी २११ सुभाष नगर रोहतक 124001

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