शनिवार, 29 जून 2013

आशीष त्रिवेदी की लघुकथा - अंतिम पड़ाव

अंतिम पड़ाव 

अचानक मोबाइल फ़ोन की घंटी बजने लगी। जिसका फ़ोन था वह कुछ झेंप सा गया। फ़ोन लेकर दूसरी तरफ कोने में चला गया। सब लोग जुनेजा साहब की अंतिम यात्रा में शमशान घाट पर इकट्ठे हुए थे। चिता को अग्नि देने की तैयारियां चल रही थीं। संस्कारों में कुछ वक़्त लग रहा था।

सभी इस फ़िराक में थे कि जल्द ही फुर्सत पाकर अपने- अपने घर लौटें। अतः समय काटने के लिए लोग धीमे स्वर में बातचीत कर रहे थे। बातों का काफिला महंगाई की मार, राजनीति के गिरते स्तर से होता हुआ कुछ विशेष व्यक्तियों के चरित्र की चीर फाड़ तक आ पहुंचा था।

जुनेजा साहब के बड़े पुत्र ने उन्हें मुखाग्नि दी। चिता धू  धू  कर जलने लगी। कुछ ही समय में समस्त माया, मोह, मान प्रतिष्ठा, अहंकार को पोषित करने वाला शरीर राख बन जाने वाला था। धीरे धीरे लोग वहां से निकलने लगे। छल प्रपंच, राग द्वेष, हार जीत के संसार में वापस जाने के लिए। एक दिन वे भी यहाँ आयेंगे कभी वापस न लौटने के लिए।

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