बुधवार, 5 जून 2013

पूरन सिंह की लघुकथाएँ


लघुकथा - डॉ0 पूरन सिंह
साक्षात्‍कार
उन दिनों मैं कानपुर में एस डी एम था। मेरी पहली पोस्‍टिंग वहीं थी और डी. एम चतुर्भुज चौबे उम्र में ही नहीं पद में भी मुझसे ऊपर थे।


एक शू फैक्‍ट्री जिसे राज्‍य से वित्‍तीय सहायता प्राप्‍त थी उसमें विभिन्‍न पदों को भरा जाना था। अन्‍य अधिकारियों के अलावा एक वरिष्‍ठ प्रशासनिक अधिकारी को भी साक्षात्‍कार के लिए बुलाया गया था


मुझे अपने कमरे में डी एम चतुर्भुज चौबे ने बुलाया था और शू फैक्‍ट्री में साक्षात्‍कार लेने के लिए जाने को कहा जबकि अन्‍य जगहों पर वे स्‍वयं ही जाते थे यह बात मैं अच्‍छी तरह जानता था।


मैंने कहा, 'सर आप नहीं जाएंगे । आप चले जाते तो ...........।'


'नहीं, मैं नहीं जा पाऊंगा आप चले जाओ ।' फिर वे मेरी आंखों में आंखें डालकर धूर्तता से बोले थे, 'आप चले जाइए सुमन साहब आपको इस काम ...... माई मीन टू से शूमेकिंग का गहरा अध्‍ययन है। मैं जानता हूं आपने ये काम नहीं किया होगा क्‍योंकि आप उल्‍टा सीधा पढ़कर आरक्षण के सहारे इधर घुस आए हो... लेकिन आपके चाचा, ताऊ, पिता तो आज भी जुड़े होंगे। आप उन्‍हीं में से निकलकर आए हो......... आपका फैमिली एक्‍पीरिएंस विल हैल्‍प यू।'


'सर आप जानते हैं आप क्‍या कह रहे हैं और इसका क्‍या अर्थ है... आप जानते हैं मैं आपके अगेंस्‍ट ......' मैं चीखा था ।


तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते..... मैं ब्राह्‌मण हूं। मेरी जडें पाताल में हैं और तुम्‍हारे घर रेत पर...... मैं चाहूँ तो ......।' यह बात भी डी एम चतुर्भुज चौबे ने बड़ी शान से कही थी।


मैं वापिस अपने कमरे में लौट आया था।


यह बात सुबह ग्‍यारह बजे की थी और सायं चार बजे मुझे वरिष्‍ठ अधिकारी को अपमानित करने, अवमानना करने के आरोप में सस्‍पेंड कर दिया गया था।
 
लघुकथा - डॉ0 पूरन सिंह


आराधना

पं0 देवकीनंदन के यहां बेटे की चाह में सात बेटियां हो गई थीं। पण्‍डित जी अधेड़ावस्‍था से बुढ़ापे की ओर अग्रसर थे। घर की आर्थिक स्‍थिति दयनीय थी। जैसे-तैसे बड़ी बेटी की शादी कर पाए थे । अभी छः बेटियों के पेट के आयतन से लेकर डोली तक के सफर के बारे में सोच - सोचकर पण्‍डितजी मर-मर कर जी रहे थे। रात दिन भगवान से प्रार्थना करते कि कोई रास्‍ता बताओ प्रभु और नहीं बता सकते तो बुला लो अपने ही पास।


भगवान ने अपने भक्‍त को दुखी देख रास्‍ता दिखाया था।


पण्‍डित जी की छोटी बेटी आराधना में पण्‍डितजी को अपने घर के कल्‍याण का सपना साकार होते दिखने लगा था। आराधना के गले में मां सरस्‍वती का वास था। और वैसे भी रास्‍ता तो मां सरस्‍वती से ही मां लक्ष्‍मी की ओर जाता है सोच लिया था पण्‍डित जी ने।


बेटी को रामकथा वाचन और हारमोनियम बजाने के लिए खुद ही शिक्षा देने लगे थे। लोक धुनों और फिल्‍मी गीतों की तर्ज पर बिटिया आराधना भजन गाने लगी थी। छोटे-छोटे जागरणा में गाते - गाते कैसेट्‌स और टी. वी. तक का सफर मासूम आराधना ने थोडे़ ही समय में पूरा कर लिया था। मां सरस्‍वती से शुरू हुआ सफर मां लक्ष्‍मी तक सहज हो गया था।


अब पण्‍डित जी के घर में धन धान्‍य के अंबार लगे थे। किसी प्रकार की कमी नहीं थी।


धीरे धीरे पण्‍डितजी ने श्‍ोष पांचों बेटियों की शादियां धूम धाम से कर दी थीं। एक बेटी की शादी पहले की कर दी थी। रह गई थी तो बेचारी आराधना।


मासूम बेटी अब जवान हो चली थी लेकिन पण्‍डितजी को उसके विवाह की कोई चिंता नहीं थी वे तो उसके कार्यक्रमों से आए धन का गुणा - भाग लगाने में ही व्‍यस्‍त रहते थे और युवा बेटी आराधना अब बाहरी वैभव और शानशौकत के बीच जब भी एकांत पाती तो आंसुओं में डूब जाती थी।
 
240 Faridpuri West Patel Nagar New Delhi 110008 / mob 09868846388

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