शनिवार, 1 जून 2013

सुशील यादव का व्यंग्य - समान विचार-धारा के कुत्ते

समान विचार-धारा के कुत्ते

शुरू शुरू में जब इस कालोनी में रहने आया तो बहुत तकलीफ हुई। सीसेन(शेरू) को भी नया माहौल अटपटा लगा।

अपने देहात में, जो ‘आजादी’ कुत्ते और आदमी को है, वो काबिले तारीफ है।

कुत्तों को खम्बे हैं, आदमी को झाड़ –झंखार ,खेत-मेड,तालाब, गढ्ढे हैं। पूरी मस्ती से, जहाँ जो चाहे करे ।

आदमी को,देहात में समान विचार-वाले लोग, गली-गली मिलते रहते हैं। जय -जोहार और खेती –किसानी के अतिरिक्त दीगर विचारों का आदान –प्रदान कम होता है। यथा ,विचारों के मिलने न मिलने का कोई मुद्दा नहीं होता।

गाँव के आदमी और कुत्ते में ,वैचारिक-खिंचाव लगभग नहीं के बराबर होता है। कारण कि अगर वे आदमी हैं तो मानसून के दिनों में केवल , बारिश होने, न होने ,कम होने की चिंता से ग्रसित रहते हैं। अगर कुत्ते हैं तो पिछले बरस महाजन के यहाँ शादी में खाए हुए दोने -पत्तलों के चटकारे लेने में मशगूल रहते हैं।

वे सब ,इन्ही को बहस के मुददे बना लंबे –लंबे खींचते रहते हैं। अब भला इन बातों से, टकराव का वायरस कहाँ तक पनपे ?और टकराव हो भी जाए तो, महाजन की कितनी बेटियां हैं और कब अगली शादी होनी है सो कुत्तों को आजीवन याद रखने की चीज हो जाती है ,या आदमी बारिश पर कितनी भी बहस कर ले , वो तो बारिश है उसे एक ही के खेत में कब गिरना है ,वो अपनी मर्जी से ,अपने हिसाब से ,अपने तरीके से भरपूर गिरेगा। जिसे जो चाहे करना हो कर ले।

गाव के शांत माहौल को ‘बाहरी-हवा’ से निपटने में दम फूल सा जाता है। एक बाहिरी ‘हवा’ है , जो गाव के शांत माहौल को कभी –कभार बिगाड़ के रख देती है। चुनाव आते ही गांव दो खेमो में बट जाता है।

’बाहरी-हवा’ ,ज्ञान का पम्पलेट, जहां –जहाँ बाँट के चल देती है,लोग मौसम को कुत्ते महाजन के घर को ,भूल जाते हैं। कुत्ते पोस्टरों तक टांग उठाने की कोशिश करते हैं मगर उस तक पहुंच नहीं पाते।

सामान- विचारों वाले देहात में खलल पैदा हो जाती है।

बाहरी हवा के कारनामे,गाँव के कुत्ते भी बखूबी समझते हैं। माहौल बिगड़ते देख ,वे इतने जोर -जोर से भौंकने लग जाते हैं कि पडौस के गाव भी झांकने आ जायें।

‘बाहरी-हवा’ ने गांव में एक दिन कुहराम मचा दिया ,सर –फुटौव्वल का माहौल बना दिया।

वे अपने नेता को ‘सेकुलर’ बताने के चक्कर में हरेक कौम के लोग इक्कठा करने लगे।

लठैत के सहारे उनके नेता सेकुलर हो गए । भाषण पर तालियाँ पिटी, टी.व्ही कवरेज मिला ,माहौल पर सेकुलर की हवा मानो छा सी गई।

देहातियों को बहस का नया शब्द ‘सेकुलर’ मिल गया।

वे आए दिन बहस करने लगे।

सेकुलर दिखाने के लिए ,आपस में टोपियां बदलने लगे।

वे टोपी बदलते-बदलते, कब सर के बाल नोचने लगे ,कब सर को धड़ाम से वजनदार लोहे की टोपी पहनाने लगे ?

पता ही नहीं चला।

गाव में सामान-विचारों के मुद्दे पर लोग बटने लगे,विचारों का पोस्टमार्टम होने लगा ,तर्क हाशिए पर जाने लगा ,कुतर्क करने वालो के पास भीड़ जुटने लगी।

बातो की इतनी छीछालेदर गाँव ने कभी देखी न थी।

कुत्ते हरेक को कुतर्की समझ ,दूर –दूर तक भौंकते -पछियाने लगे।

गाव अब रहने लायक रह नहीं गया।

माहौल को इतना बिगड़ते देख , मुझ जैसे कई समझदार, गाव छोड़ देने में समझदारी देखने लगे।

सो तब से गाँव छोड़ शहर के संभ्रांत कालोनी में आ बसा हूँ।

कुत्ता साथ में लाना पड़ा,वहाँ किसके भरोसे छोड़ता ?

मगर सीसेन जब से आया है ,खुले में घूमने की उसकी आजादी छिन गई है।

उसके भौंकने पर कालोनी की संभ्रान्तता को देखते हुए लगाम लगाए रखना पड़ता है। वरना लोग हमें असभ्य –देहाती न समझें।

दिशा-मैदान के लिए, उसे घर वालों का मुंह ताकना पड़ता है।

हमारी पूरी कोशिश होती है कि उसे बुरा न लगे उसका फील –गुड हिट न हो।

हमारी तरफ से हर कोई ,घर के एक अशक्त को जो सेवा दी जा सकती है, वही ‘सिसेन’(शेरू) इन दिनों, पा रहा है।

बावजूद इसके ,वो बहुत दुखी है।

उसे इस नए शहर के माहौल मिसफिट है, इस माहौल में अपने सामान –विचार धारा वाले दोस्त की उसे सख्त तलाश है।

सुशील यादव

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