रविवार, 2 जून 2013

2 पुस्‍तक समीक्षाएँ - एक टुकड़ा बादलों का व बाबुल तू बगिया का तरूवर

पुस्‍तक समीक्षा (1)

एक टुकड़ा बादलों का (काव्‍य-संग्रह)

रचनाकार - निर्मला सिंह गौर

प्रकाशक - संधी प्रकाशन, जयपुर ः पृष्‍ठ 86 - मूल्‍य रू. 125

लेखिका सम्‍पर्क सूत्र - nirmalasinghgaur@rediffmail.com

समीक्षक - दिलीप भाटिया

लम्‍बे अंतराल के पश्‍चात्‌ निर्मलदी ने 81 फूलों जैसी कविताओं का सुगंधित महकता गुलदस्‍ता साहित्‍य-जगत को दिया है। निर्मल कम लिखती हैं, पर अच्‍छा लिखती हैं। गुणवत्‍ता की कई कसौटियों पर यह संकलन उत्तीर्ण है। पाठकों को संतुष्‍टि, त्रुटिहीन मुद्रण, सामयिक ज्‍वलंत विषयों पर संवेदनशील भावपूर्ण प्रस्‍तुति, सरल भाषा, भावों की गहराई, सारगर्भित सृजन, सकारात्‍मक दृष्‍टिकोण, समाधानात्‍मक संदेश निर्मल की कविताओं के सद्‌गुण हैं। शुभेच्‍छुक भगीरथ शुक्‍ल के विचारों का प्रशस्‍ति पत्र पाठकों को संकलन पढ़ चिन्‍तन-मनन-मंथन करने की प्रेरणा देगा। लेखिका का आत्‍मकथ्‍य सकारात्‍मक उपसंहार के साथ जीवन दर्शन सिखाता है।

आंसू, युद्ध, बादल, बेटी, मां, वृद्धावस्‍था, लड़की, बालविवाह, मित्रता, पंछी, पर्यावरण, आधुनिकता, जन्‍मदिन, सफर, कल्‍पना, वंश, प्रतिमा, उत्‍सव, तृष्‍णा, संदेश, दर्द, मन, समन्‍दर, दीप, उत्‍थान, बहार, उदासी, प्रेम, शीशा, हार-जीत, पतझड़, चुप्‍पी, बेबसी, सावन, दिल इत्‍यादि अनेकों विषयों पर ये 81 कविताऐं पाठक के दिल को छूने में सक्षम हैं, चिंतन हेतु समर्थ हैं एवं मंथन हेतु सक्षम हैं, कई कविताओं को पढ़कर मेरे नयन अश्रुपूरित हो गए एवं ‘‘सूर्य‘‘ सदृश निर्मलदी की रचनाओं से मुझ ‘‘दीपक‘‘ सदृश भाई को बहुत कुछ सीखने को मिला।

प्रतिक्षा इत्‍यादि कुछ शब्‍दों को प्रूफ रीडिंग की आवश्‍यकता थी, कुछ रचनाओं के अंत में खाली स्‍थान को सामयिक चित्रों से भरा जा सकता था, ई-मेल विहीन पाठकों की सुविधा हेतु आशीर्वाद की इच्‍छा रखने वाली लेखिका को पत्र प्राप्‍ति हेतु पता भी देना चाहिए था, पेपरबेक होने से मूल्‍य कुछ कम हो सकता था, सृजन-प्रकाशन की यात्रा में सहयात्रियों के सहयोग के प्रति आभार प्रदर्शन की औपचारिकता भी निभानी चाहिए थी।

संकलन का मूल्‍यांकन इस परमाणु वैज्ञानिक का अधिकार नहीं है, यह कर्त्तव्‍य तो पाठक एवं पुरस्‍कार/सम्‍मान प्रदान करने वाले निर्णायक निभाऐंगे।

निर्मलदी के तीसरे संकलन की साहित्‍य-जगत के साथ दिलीप भाई भी प्रतीक्षा करेगा। इस संकलन के लिए दी को बधाई एवं सृजन की निरन्‍तरता हेतु मंगलशुभ भावनाऐं

--

पुस्तक समीक्षा (2)

बाबुल तू बगिया का तरूवर (काव्‍य-संग्रह)

लेखक-अरूण कुमार भट्ट ः प्रकाशक-शारदा साहित्‍य मंच,

रावतभाटा ः पृष्‍ठ 110 ः मूल्‍य रू. 100

‘संवेदना‘ के पश्‍चात्‌ अरूण ने 71 कविताओं का गुलदस्‍ता इस बसंत में साहित्‍य संसार को भेंट किया है। इन रचनाओं में खुशबू, पीड़ा, दर्द, घुटन, आशा, प्रेम, सेवा, सकारात्‍मकता, कटाक्ष, व्‍यंग्‍य, हताशा इत्‍यादि अनेकों रंग हैं। कुछ रचनाऐं पलकें भिगो देती हैं, कहीं अरूण हैं, कहीं पाठक स्‍वयं को ही पाता है, कविता की कसौटी पर ये रचनाऐं कितनी खरी हैं, इस मूल्‍यांकन की क्षमता मुझ परमाणु वैज्ञानिक में तो नहीं है। हां भाव, संवेदना, विचार, संदेश, कोमलता, मिठास से भरी ही नहीं, परन्‍तु छलकती ये रचनाऐं पाठक को पूरी कृति पढ़ने हेतु बांधे रखने में सक्षम हैं, यही अरूण की कलम की सार्थकता है।

‘‘जीवन यात्रा‘‘ में दर्शन, ‘‘पिता‘‘ में वेदना, ‘‘रिक्‍शोवाला‘‘ में ग्‍लानि, ‘‘सच्‍ची पूजा‘‘ में हकीकत, ‘‘श्रम की बूंद में‘‘ संदेश, ‘‘हमारे लिए‘‘ में प्रश्‍न चिन्‍ह, ‘‘प्रिय पात्र‘‘ में भाव, ‘‘आहत मन‘‘ में कचोट, ‘‘मुँह दिखाई‘‘ में स्‍वाभिमान, ‘‘हिन्‍दी का मलाल‘‘ में कटाक्ष, ‘‘फूल की चाहत‘‘ में देशभक्‍ति, ‘‘राखी‘‘ में स्‍नेह, ‘‘नतमस्‍तक‘‘ में सार्थकता, ‘‘मन की पीड़ा‘‘ में निरपेक्षता - इस प्रकार हर रचना लीक से हटकर है।

शीर्षक कविता ‘‘बाबुल तू बगिया का तरूवर‘‘ संवेदनशील है, साथ ही संकलन की आत्‍मा भी। माँ की महिमा का गुणगान कई रचनाओं में हुआ है। कन्‍या भ्रूण हत्‍या, पानी का महत्‍व, देश भक्‍ति, गांव का चित्रण, पत्र का महत्‍व, श्रम का महत्‍व, पुष्‍प की सार्थकता, कलयुग का प्रभाव, आंतकवाद, नव वर्ष, दीपावली, हंसने का महत्‍व, दीपक का महत्त्व, मासूम पीढ़ी, भारत की नारी, स्‍कूल जाते बच्‍चे इत्‍यादि अनेकों ज्‍वलंत एवं सामयिक विषयों पर रचनाकार ने समाज को कहीं प्रश्‍नों के उत्तर दिये हैं, कहीं उत्तर पाठकों पर छोड़ दिए हैं।

कुछ छूट गए ज्‍वलंत विषयों पर कवि कलम चलाते, तो संकलन का क्षेत्र व्‍यापक होता। आई.एस.बी.एन. के साथ व्‍यावसायिक प्रकाशन होता तो इस तरूवर की छाया अनेकों अनजान पथिकों को भी सुलभ होती। संकलन के मूल्‍यांकन का अधिकार पाठकों, सम्‍पादकों एवं पुरस्‍कार, सम्‍मान, प्रशस्‍ति पत्र प्रदान कर्त्ताओं को है। अनुज अरूण से मेरा यही विनम्र अनुरोध है कि नए पुराने गुणवत्‍तापूर्ण कवियों को खूब पढ़ें एवं तीसरा संकलन साहित्‍य समाज को अधिक निखार एवं गुणवत्‍ता के साथ शीघ्र प्रस्‍तुत करें।

clip_image002

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------