मंगलवार, 4 जून 2013

समीक्षा—लौ दर्दे दिल की (गजल संग्रह)

समीक्षा—

लौ दर्दे दिल की (गजल संग्रह)

लेखिका-देवी नागरानी

 

लोकाप्रिय कथाकार श्री गोवर्धन यादव ने उनके निजी पुस्तकालय से “लौ दर्दे-दिल की” गजल संग्रह देत्रे हुए मुझसे कहा कि देवी नागरानीजी बहुत अच्छा लिख रही हैं. इस पुस्तक को जरा गौर से पढॊ.

श्री यादव ने यदि कहा है कि “अच्छा लिखा है” तो इसका कुछ अर्थ होता है. ऎसा मानते हुए पढा और पाया कि यादवजी की बात निरर्थक नहीं थी. बहुत पहले किसी का एक शेर कुछ यूँ पढा था-“ “देख पत्थर न फ़ेंक ऎहतियात बरत सतहें आब पर कोई तस्वीर बनी है” शेर उमदा है. पर एक तस्वीर कब तक बनी रहने दें, कुछ समय बाद नीरसता छा जाएगी. नीरसता को सरसता का बाना पहनाना कवि हृदय का ही काम है. नागरानीजी की ये पंक्तियां प्रभावकारी लगीं, व्यवहारिक भी और सरस भी. “जो देखा झील में ठहरा हुआ पानी, तो ये सोचा चलो हम फ़ेंककर कंकर,यूं अपना मन ही बहलाएं”(पृष्ठ 84) कबीर ने कहा है:- “मन से बडा न मेला, चित से बडा न चेला”. मन के मनोभावों को, हलचलों को ही तो कवि/कवियित्री शब्दों मे उकेरते हैं. किसी व्यक्ति के मानसिक दशा को वह व्यक्ति स्वयं अपने जीवन में संपूर्णतः उतार नहीं सकता, न गद्य में और न ही पद्य में. शायद देवी ने इसीलिए यह लिख दिया :-

“ता उम्र वो लिखते ही रहे, पढ न सक्रे हम क्या छुपती लकीरों में,अदीबों की उदासी”(‍पृष्ठ 86) हड्डी मे लगी पुरानी चोट के दर्द की तरह दिलो-दिमाक पर किसी घटना का प्रभाव सुअवसर पा कब दिख जावे,पता नहीं, किसी रचना में कब ढल जाए, या कविता/ गजल में कब उतर जावे, कह नहीं सकते. देवी नागरानी ने उसी वास्ते ऎसा लिखा होगा “लगेगी देर न कुछ उसको,शोला बनने में दबी सी आग जो दिल में,छिपाए बैठे हैं”( पृष्ठ 62) देवी नागरानी ने एक शेर में बहुत ईमानदारी और निडरता से एक सत्य बात कही है. वह शेर है “ कहते हैं उनकी गजलें हैं, शान शायरी की वो झूठ भी हैं कहते,कुछ सच में यूँ मिलाकर”(पृष्ठ-57) कवियित्री स्वयं स्फ़ूर्त प्रतीत होती हैं. वस्तुतः बाह्यगत प्रोत्साहन सीमित होता ही है. स्वयं स्फ़ूर्त व्यक्तित्व हतोत्साहन में भी निराश नहीं होता. अपनी रचनाधर्मिता के सातत्य को बनए रखता है. पृष्ठ 44-45 में कवियित्री के शब्द आशावादी हैं. “चाह रहे जीवन की देवी,शह मातों में क्या रखा है”(पृष्ठ-45) और “तभी हसीन बनेगी हमारी ये दुनिया, हसीं ख्वाब जरुरी है, आदमी के लिए”(पृष्ठ.44) किंतु मन आशा के साथ अवसाद के क्षणॊं को भी भोगता है. ऎसे ही किसी क्षण में कवियित्री को लिखना पडा होगा-“नारों का देश है ये,एक शोर सा मचा है फ़रियाद जो भी होगी,वो अनसुनी होगी(पृष्ठ.4) ‍पृष्ठ सात की गजल में सात शेर हैं और अलग-अलग पृष्ठ भूमि से सृजित हुए महसूस होते हैं. अपने आप में सातों पूर्ण है. पृष्ठ 14 की गजल आज की न्यायिक व्यवस्था प्रणाली पर सटीक बैठती है.

कवियित्री ने आत्मंथन कर कविताओं का सृजन किया है.चुन-चुन कर शब्द सजाए हैं. इस प्रक्रिया की कठिनाइयों को दर्शाने वाले शेर सहज आ गया है. “छिडती है जंग इसी देवी ख्याल में उससे भी मुझको जूझना पडता कभी-कभी” भारत को और भारत से बाहर एक समृद्ध शक्तिशाली राष्ट्र के सामाजिक जीवन एवं परिवेश को कवियित्री ने नजदीक से देखा है. यूं ऎसे कि वृद्धाश्रमों को भी देखा होगा. संभतः ये गजल उन्हीं में से कहीं जेहन मे उपजी होगी. “खाद पानी पुराने शजर को भी दें फ़र्ज बनता है देवी नयी नस्ल का”(पृष्ठ .60) सामाजिक दायित्वों के निर्वहन के प्रति नयी पीढी को सतर्क करना भी साहित्यकार का नैतिक दायित्व भी है, जिसे कवियित्री ने निभाया है. एक शेर बहुत प्रशंसनीय है. कवियित्री को इसके लिए साधुवाद. ऎसे पैने शेर बहुत कम मिलते हैं.

“चांदनी के ख्वाब हम बुनते रहे हैं धूप में रात के सायों से लेकिन किस कदर डरते रहे”(पृष्ठ.83) किसी शायर ने कहा है कि

-“दूरियां क्यों दिलो को और भी नजदीक लाती है. बिछुडकर क्यों और ज्यादा प्यार का अहसास होता है.” कवियित्री देवी नागरानी ने बडॆ सलीके से इस भाव के दूसरे पृष्ठ को वर्णित किया है. “ वो नजदीकियाँ बोरियत सी लगी, नहीं लुत्फ़ कुछ दूरियों के बिना(पृष्ठ.91) मीठे के साथ नमकीन भी हो तभी समालोचना या समीक्षा का आनन्द आता है.पृथम गजल,प्रथम पृष्ठ में, प्रथम पंक्ति” हमें अपनी हिन्दी जवां चाहिए का आग्रह है, किंत्य पूरी गजल में उर्दू शब्दों का बाहुल्य है.

पुस्तक के पीछे कवियित्री के परिचय में उनकी कृतियों की सूची दी गई है. उस सूची में और वृद्धि होती जावे. पुरस्कार/सम्मान की सूची तो कृतियों के साथ स्वमेव बढेगीं. इस शुभेच्छा के साथ आपका ही शेर,

“जो लब्जों को सच की श्याही से लिख दे कलम से होती है ऎसी इबादत”

समीक्षक

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सुरेन्द्र वर्मा

(पूर्व प्राचार्य) साबले बाडी,

बरारीपुरा छिन्दवाडा(म.प्र.)480001

फ़ोन-0919926347997

1 blogger-facebook:

  1. बहुत खूब, ध्यान से पढ़ूगा।
    गजलकार को बधाई.
    सादर,
    डॉ रावत

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