बच्चन पाठक 'सलिल' की बाल कविता - सेवा धर्म

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बाल कविता 

सेवा धर्म 

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          -- डॉ बच्चन पाठक 'सलिल'

रात चांदनी छत पर भोला 

चन्दा मामा से यों बोला 

लेकर तारों की बारात 

कहाँ निकल जाते हर रात ? 

परेशान क्यों होते हो ? 

क्यों नहीं रात में सोते हो ? 

चन्दा बोले-- मेरा काम 

सुन लो प्यारे भोला राम 

सूरज दिन भर करते काम 

फिर थक कर करते आराम 

सरिता, वन, पथ, और पहाड़ 

सब पर छा जाता अन्धकार 

मैं अपना धर्म निभाता हूँ 

पथिकों को राह दिखाता हूँ 

दिन की तपन मिटाता हूँ 

शीतल लेप लगाता हूँ 

भोला बोला -- हो तुम महान 

तेरी सेवा का हो जय गान 

मैं भी जब पढ़ लिख जाऊंगा 

सेवा धर्म निभाऊंगा । 

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पता -- बाबा आश्रम , आदित्यपुर - २ 

         जमशेदपुर -- १३ 

         झारखण्ड 

फोन -- 0657/2370892

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