मंगलवार, 4 जून 2013

सीताराम पटेल के दोहे - रसधर

             रसधर
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कर युग योग करूँ नमन, सुनो मेरी पुकार।
किशन कन्हैया कान्हा, जगदीश के अवतार ।।


कारावास में जन्म लेकर, माता पिता को तारे।
आप आकर मुझ दुःखवा, के दुःख को टारे।।

यशोदा नंदराजा के घर, गाय आप चराए।
गो सेवा करके आप, गोपाल नाम धराए।।

छोटी उंगली से आप ,गोवर्धन को उठाए।
आँधी तूफान से गिरधारी, ग्वालों को बचाए।।

बालकपन में आप माखन बहुत को चुराए।
बलवान बनें सखा कहके माखनचोर कहाए।।

अच्छा रहें बालक कह, माँ रहती खम्हरछठ।
नहीं जान पाई कनु , यशोदा तुम्हारे बालहठ।।

बाँध दिया माता यशोदा, तुमको मया के डोरी।
किसमें है इतना दम , खोल सके जो ये डोरी।।

कितने आए कंस मामा के नौकर चाकर भूसंडा।
उनको उसने मार मार कर , भगाए डंडा डंडा।।

लड़कपन से खेलते आए, संग तुम राधा गोरी।
एक में बँध गए दोनों अद्वितीय प्रेम के डोरी।।

खेलते खेलते राधा किशन दोनों हंसी ठिठोली।
कब गड़ गया हृदय में मया बंदूक की गोली।।

प्रेम के हाला पी पी कर बने दोनों मतवाला।।

मूँह के आने तक पिया तुमने भर भर पियाला।।

कानन के तरू लता भी दे रहे मया के साखी।
और चार पैर के जानवर और सुराज पाखी।।

कान्हा कदम्ब पेड़ पर बैठ बाँसुरी को बजाए।
राधिका पगली दौड़ते दौड़ते यमुना तीर आए।।

पनिहारिनें यमुना से पानी ले आ रही हैं गगरी।
नटखट मोहन उसको गुलेल से फोड़ दे सगरी।।

थोड़े से माखन के लिए गोपियाँ मोहन रहे नचा।
जो संसार को एक पल में सकता है नचा नचा।।

करील के कूँज में बेसुध पड़े किशना और राधा।
अपने अपने प्रेम पीड़ा  को दोनों हैं रहे साधा।।

राधा राधा किशन रटे, किशन किशन राधा रटे।
गोकुल में आप दोनों कहाँ है एक दूसरे से बँटे।।

जन्म जन्म से हैं अर्द्धनारीश्वर एक दूसरे में सँटे।
जलकर भी नहीं जल पाता है बटे सूत के बटे।।

दूर दूर रहने से लग रहा है मोहब्बत का पीरा।
और वह भी लग रहा है उँट के मुँह में जीरा।।

राधेश्याम राधेश्याम हैं युग युग से जांवर जोड़ी।
दोनों परस्पर बँध गए बिना बाजा न बिना घोड़ी।।

वे मिलते गहन सुनसान यमुना तीर गन्ना के बारी।
नयनों से पीते हैं परस्पर प्रेम के रस सारी के सारी।।

दोनों हैं वृन्दावन के प्रेम वाटिका में मकई के तरी।
उड़ रहे हैं उन दोनों का स्वच्छन्द प्रेम का परी।।

ऐसे ही प्रेम के भवसागर में सभी हैं यहाँ पिपासा।
इससे आतंकवाद होगा खत्म सभी कर रहे हैं आशा।।

लगा हुआ है पुआल में राधा माधव का अग्नि प्यार।
परस्पर मिटाकर प्रेम के रंग खेल रहे होली त्यौहार।।

मां पूछ रही रधिया बेटी पीठ में पुआल कहां से आया।
गोरस के लिए माता मैंने दिया है गाय को खिलाया।।

पिता पूछ रहे कान्हा बेटा पेट में पुआल कहाँ से आया।
दादा उज्ज्वल गोरी गाय अपने सींग से है छिटकाया।।

तंग गली में गई राधा कान्हा रोके खड़ा रास्ता।
गोरस दे पहले फिर जाने दूँगा प्रेम के वास्ता।।

मटका का गोरस निकालकर राधा पिलाई अंजुली।
बस नही कहे कनु नहीं है अघाया,राधा भी भूली।।

किशन मनाया अपना जन्मदिन खेले दही काँदो।
सभी जानते गोकुल में आ गया जनमाश्टमी भांदो।।

कदंब के डाल ग्वाल बाल सभी झूल रहे हैं झूला।
संसार को भुलाकर कान्हा अपने आराध्या संग भूला।।

राधा किशन खेलें अमराई में लुकाछिपी का खेल।
छुक छुक चला रहे हैं दोनों जोड़ी मया के रेल।।

राधा छिपती है लता ,किशन राधा राधा चिल्लाए।
हार मान जाए तो राधा आकर पीठ में चढ़ जाए।।

किशन छिपता है पेड़ उपर राधा डर के चिल्लाती।
किशन आता उसके पास उसे बाँहों में भर लेती।।

क्वांर के महीना वृन्दावन में बढ़ा हुआ है स्वर्णा धान।
खेत के अंदर राधा लीलाधर का एक हुआ है जान।।

कार्तिक के महीना खेलते खेलते हो गया है सांझ।
महुआ के खोखर में बज रहे है परस्पर दोनों झांझ।।

अगहन के महीना राधा और किशन तन सेकें आग।
यमुना के किनारे किनारे नाप रहे हैं अनोखा राग।।

पूस के महीना गिरता शबनम कटकटा रहा है दाँत।
भोर का शुक्रतारा उग गया फिर भी बचा है बात।।

माघ के महीना संसार सारा गिर रहा है पानी कारा।
मदन मदना भी इस सुन्दरता को देख देख  हारा।।

फाल्गुन के महीना बरसाने में सभी खेल रहे हैं होली।
सारा संसार इसको देख ,बोल रहा है प्रेम की बोली।।

चैत्र के महीना नीलम आकाश छिटका है चंदैनी रात।
फिर दोनों में परस्पर हो रहा है प्रस्वेद की बरसात।।

बैशाख के पूनम किशन की आराधिका का है जन्मदिन।
विदाई को दोनों काट रहे हैं एक एक पल गिन गिन।।

जेठ का महीना जल रहा है वृन्दावन का सारा जंगल।
परस्पर कर संगम दोनों प्रेमी मना रहे हैं यहाँ मंगल।।

आशाढ़ का महीना गोकुल में गिर रहा झरझर पानी।
बहुत ही मीठा लग रहा है परस्पर प्रीति प्रेम के बानी।।

सावन के महीना गोवर्धन में बरस रहा पानी रिमझिम।
दोनों को पकड़ा का प्रेम का नशा झिमझिम झिमझिम।।

भादों कृश्णाश्टमी में मनाता है कृश्ण का जन्मदिन।
नहीं जी सकते हैं दोनों अब एक दूसरे के बिन।।

अथाह गहराई है कृश्णा यमुना नदी का निर्मल पानी।
नाव चला रहा है कन्हाई राधा कर रही है मनमानी।।

पतवार को छोड़कर मोहन प्यारी राधा को मनाने आए।
राधा किशन को है मरना मस्ती का नाव भी डगमगाए।।

डरती डरती राधा अपने आराध्य कान्हा से चिपक जाए।
दूसरे तरफ मुख कर नटनागर छलिया मोहन मुस्काए।।

दोनों के प्रेम को भवसागर के कौन वर्णन कर पाएंगे ।
सृजन किए है  विधाता फिर भी वे इसे बाँच न पाएंगे।।

कैसे होता है इस भूलोक में ये प्रेम मोहब्बत की डोरी।
यहाँ आ भगवान भी मिलते हैं चुपके चुपके चोरी चोरी।।

चोरी में मिलने से मोहब्बत में मिलता है ये कैसे मजा।
घड़ी अब जल्दी से बारह बजा, मत दे मुझको सजा।।

ये नींद में है दोनों कि ये जाग रहे, अनचेताय सो रहे।
इसे दुनिया कभी भी नहीं जाने, वे परस्पर हैं खो रहे।।

राधा का गाय गुम जाए, किशन उसे खोजकर लाए।।

दोनों का नयन हुआ चार, और हृदय में कटार खाए।।

राधा अनमने मन से खींचते गाय को अपने घर लाई।
अपने प्राण में उसने बसा लिया है तिरछे खड़े कन्हाई।।

आग जलाई ,भांड़ा रखी, पानी में चला रही है बटार।
खली डालना भूली, हृदय पहुँच गई है यमुना के पार।।

उधर किशन अपने महल में पलंग पर सोने को जाए।
अपने सामने सामने में अपने आराध्या राधा को पाए।।

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा चिल्लाए।
उसे छूना चाहे तो सपनों की महरानी को कहाँ पाए।।

प्रेम के छाँव में राधा किशन हो गए पगली पागल।
अमर नाम अपना कर वो जीने लगे प्रेम के दलबल।।

अच्छा कर्म है मोहब्बत फिर होता है भैया दूधारी तलवार।
प्रेम में पहले मैं मरता, मरना ही है इसका अच्छा संस्कार।।

राधा हुई किशन , किशन हुआ राधा फिर कैसे रहेंगे आधा।
प्रेम में एक एक हो जाते हैं ग्यारह, फिर कैसे होगा बाधा।।

सारा संसार समझे इस शक्ति को ,दोनों प्रेम हैं फैलाए।
नीचे सिर करके जो बीने वो सबके सब प्रेम कोे पाए।।

उपर की ओर सिर करेंगे परिन्दा पपीहा और चकोर।
स्वाति जल और चाँद प्रेम में ताकते रहते हैं उस ओर।।

छाती में पड़ जाता है प्रेमियों के प्रेम का ये घाँठा।
प्रेम बढ़ता है अति ,करने से उसका अधिक बाँटा।।

यशोदा के नंदन, नंदराजा के लाल, गोपियों का गोपाल।
तेरे बिना हुआ बिहारी नटखट छलिया मेरे जी के काल।।

चल चुराएँगे हम तुम दोनों दउवा के बारी के खीरा।
पास में आना राधा रानी , दूर में बढ़ जाता है पीरा।।

शाम को आना गोरी तुम यमुना तीर केला के बारी।
नहीं आउँगी पागल मां मेरी मुझे देगी बहुत  गारी।।

मत बजाना तुम मुरली मोहन अपने से कर देता दूर।
मिलने को तरसती हूँ मैं ,अंग अंग मेरा होता है चूर।।
 
खलिहान में मींजते हैं बेलन दौरी टेक्टर से सब धान।
मींजा जाता यहां मेरा गेहूँ, आके बचाना तुम वो जान।।

सूरज भी तेरे सामने शरमाए, चांद भी पानी पीने जाए।
मेरा सपना गोरी तू सपनाए, सपना में मुझे पास पाए।।

महबूब मेरे मन की आस, तेरे बिना भूख लगे न प्यास।
पूनम आ रही है शरद की, आ रचाएँ हम तुम महारास।।

किशन राधा और राधा किशन नाच रहे हैं छम छमाछम।
सौन्दर्य का दर्शन कर संसार लग रहा है झम झमाझम।।

मंदिर में जाती हूँ मैं ललिता के संग करने शंकर पूजा।
कुछ नहीं सुनती, तुम्हारे छोंड़ मोहन नहीं माँगती दूजा।।

सहेलियों के संग राधा रानी नहाने गई यमुना के पानी।
उनसे अलग उसमें झलक रहा है उसकी सारी जवानी।।

नटखट किशन कन्हैया चढ़ छिपा हुआ है कदंब के डारा।
अपने नयनों से लूट रहा है नटनागर चितचोर मजा सारा।।

यमुना के धारा के संग ही संग बह रहा है प्रेम के धार।
प्रेम की धार को पीने कौन धरती के मानव पाएंगे पार।।

किशन ने पकड़ा कलाई राधारानी को आई बड़ी लाज।
दूसरे तरफ मुँह कर छिपाई अपने इस मया  के राज।।

राधारानी बोली किशन से लगा लगा मेरे हाथ में मेंहदी।
इसका रंग नहीं छूटेगा जानती हूँ इस सदी से उस सदी।।

राधारानी खेल रही होली, किशन महाराज खेल रहा होली।
महारानी और महाराजा दोनों संसार में प्रेम के रंग है घोली।।

आया है फाल्गुन होली का त्यौहार, बढ़ रहा है बहुत प्यार।
दोनों में बह रहा है प्रेम की मोरी, रति कामदेव के अवतार।।

नाना स्वांग बना कर रहे है सभी गोप गोपियाँ प्रेम की चोरी।
प्रेम के रस में बने हैं मतवाला, कोई बहरा काना अंधा खोरी।।

शरद के पूर्णिमा में चाँद अमृत बरसाए,प्रीति फिर बढ़ती जाए।
किशन राधा को राधा किशन कोे अपने अगुँली को छुआए।।

नयनों से प्रीत हम को हैं पीते, उसको देख संसार हैं जीते।
यमुना में दीपदान कर आएँ, युगल योग देख देख हम जीते।।

                                            सीताराम पटेल

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  1. आपकी सर्वोत्तम रचना को हमने गुरुवार, ६ जून, २०१३ की हलचल - अनमोल वचनपर लिंक कर स्थान दिया है | आप भी आमंत्रित हैं | पधारें और वीरवार की हलचल का आनंद उठायें | हमारी हलचल की गरिमा बढ़ाएं | आभार

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