मंगलवार, 4 जून 2013

ललित भाटिया की लघुकथाएँ

पागल कौन 

शहर में धार्मिक दंगे हो रहे थे । एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे  । दंगो के कारण हर कोई अपने २ घर में घुस गए थे । एक तरफ से अगर कोई बाहर  निकलता तो दूसरी तरफ मारो २ की आवाज़ के साथ पत्थरों की बौछार शुरू हो जाती । सब ओर भयानक शांति छाई हुई थी तभी सामने से कोई आता दिखा दोनों तरफ के लोगों ने मोर्चे संभाल लिए ओर उस के पास आने का इंतज़ार करने लगे । अरे ये तो पागल कालू हे हाँ लोग इसे इसी नाम से जानते हे । शहर के बाहर गंदे नाले की पुलिया के नीचे उस डेरा हे । उस तरफ कोई नहीं जाता हाँ कभी कभार बच्चे उस तरफ जा कर उसे छेड़ते हे तो वो जमकर गालियाँ देता हे । एक पागल को आता देख सभी के हाथ झुक गए । पागल मस्ती में गुनगुनाता जा रहा हे । सोच रहा है पागल कौन मैं या ये सब ?

 

                                       जानवर और इंसान 

बड़ा बाज़ार शहर का भीड़ भाड़ वाला इलाका हे  । उस दिन रोज़ की तरह व्यापारी सामान खरीद बेच रहे थे तभी दो  आदमी बाइक पर आये ओर दनादन फायर कर के भाग गए ।
गोली एक अनाज व्यापारी को लगी एक गोली छत पर बैठे एक बंदर को लगी दोनों सड़क पर आ गिरे कुछ देर तड़पने के बाद शांत हो गए । बाज़ार में दहशत फ़ैल गई । सभी अपनी अपनी दुकानें बंद कर के भाग गए । व्यापारी की खून सनी लाश सड़क पर पड़ी थी ।

दूसरी तरफ बन्दर मरा पड़ा था पर व्यापारी की तरह वो अकेला नहीं था उस चारों तरफ बंदरों की पूरी फ़ौज थी । 

ललित भाटिया 

सुभाष नगर  रोहतक 124001

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