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चंद्रेश कुमार छतलानी की कहानी - मृत्यु का वरण

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मृत्यु का वरण वो मृत्यु से डरते थे, वैसे तो यह डर सभी के मन में होता है, लेकिन एक वैरागी के मुख से यह बात सुन कर शायद कुछ अजीब लगे। अमृत्...

मृत्यु का वरण

वो मृत्यु से डरते थे, वैसे तो यह डर सभी के मन में होता है, लेकिन एक वैरागी के मुख से यह बात सुन कर शायद कुछ अजीब लगे।

अमृत्यानंद जी ने 10 वर्ष की आयु में ही वैराग्य ले लिया था। और पिछले 40 वर्षों से ज्ञान-ध्यान में लिप्त थे। आज 50 वर्ष की आयु होने के पश्चात् और इतने वर्षों की ज्ञान चर्चा के पश्चात भी उन्हें मृत्यु से डर! अति आश्चर्य है। आज आश्रम में यही चर्चा हो रही है।

अमृत्यानंद जी के वचन ऐसे होते कि हर कोई मन्त्र-मुग्ध हो जाता, उनकी वाणी में जैसे सरस्वती का निवास था। उनके मुख-मंडल की आभा किसी सूर्य की भांति थी और उनकी आँखों में सागर के सामान शांति थी। वो जब प्रवचन आरम्भ करते तो झरने भी शांत हो जाते, पक्षी कलरव छोड़ कर उन्हें सुनना आरम्भ कर लेते। कृष्ण की बांसुरी की ध्वनि के समान उनकी वाणी को सुनने के लिए हर कोई लालायित था।

अमृत्यानंद जी ने ज्योतिष के द्वारा यह जान लिया था कि उनकी मृत्यु इसी माह के भीतर हो जायेगी। वो भयभीत से हो गए, वो स्वयं नहीं समझ पा रहे थे कि उन्हें भय क्यों हो रहा है। वो शरीर त्यागना नहीं चाह रहे थे। एक वैरागी को शरीर से प्रेम हो गया था। वो दर्पण में स्वयं को निहार कर सोच रहे थे कि इस आयु में भी मेरा मुख इतना सुन्दर है, मेरी वाणी इतनी मधुर है, मेरा शरीर सुडौल है, मुझे कई वेदों का-शास्त्रों का ज्ञान है.... इन सबको मैंने बहुत ही कठिनाइयों से संचय किया है... मृत्यु के पश्चात यह सब छूट जाएगा। केवल 50 वर्ष की आयु में क्या मैं जीवन त्याग दूंगा? ईश्वर ने ऐसा क्यों किया?

विचार करते हुए वो अपने गुरुजी की कुटिया की ओर प्रस्थान कर गए।

अमृत्यानंद के गुरु ऋषि सर्वानंद बहुत ही उच्च श्रेणी के साधक थे। वो ज्ञान का अथाह सागर थे। अमृत्यानंद ने उनके समक्ष पहुँच कर अपनी बात रखी। सर्वानंद जी यह सुन कर बहुत दुखी हुए कि उनका सबसे पुराना शिष्य इस तरह भयभीत है। उन्होंने सांत्वना देते हुए कहा कि, “चिन्ता मत करो, मैं मृत्यु से निपट लूंगा।”

उसी रात्रि को ऋषि सर्वानंद ने यज्ञ द्वारा मृत्यु देवता का आव्हान किया और उन्हें आदेश दिया कि जब तक अमृत्यानंद ना चाहे, उनके पास मत जाना। मृत्यु देवता ने उन्हें समझाने का प्रयत्न किया कि “होनी को कोई नहीं टाल सकता, स्वयं ईश्वर भी नहीं। आप कृपा करके यह आदेश ना दें।”

लेकिन ऋषि सर्वानंद शिष्य मोह में आ गए थे, सब कुछ जानते हुए भी सर्वानंद जी ने जिद पकड़ ली। मृत्यु देवता ने तब कहा कि यह मेरे वश में नहीं, आप स्वयं जानते हैं कि मैं आदेश का पालन करने को विवश हूँ, आप विधि का विधान बदलना चाहते हैं तो विधि अर्थात ईश्वर से ही कहें।

ऋषि सर्वानंद को क्रोध आ गया, क्रोध वैसे तो साधू की प्रकृति नहीं, लेकिन चूँकि विषय उनके अभिमान का था, उन्होंने अपने प्रिय शिष्य को वचन दे रखा था। क्रोध के फलीभूत उन्होंने मृत्यु देवता को श्राप दे दिया कि “अगर मेरी तपस्या सच्ची है तो हे मृत्यु देव, अगर आप मेरे शिष्य अमृत्यानंद के चाहे बिना उसका वरण करने जाएंगे तो आप उसे स्पर्श भी नहीं कर पायेंगे और अगर आपने प्रयत्न किया तो आप स्वयं एक मिट्टी की मूर्ती बन जायेंगे।”

ऋषि सर्वानंद बहुत ही पहुंचे हुए साधू थे, उनकी वाणी झूठी हो जाए वो संभव नहीं था। मृत्यु देव भयभीत हो गए और तुरंत-फुरत ही वहां से प्रस्थान कर गए।

ईश्वर की लीला ईश्वर ही जाने। उसे तो संसार को ज्ञान देने के लिए कुछ ऐसा करना था जिससे मानव जाति यह जान जाए कि संसार चक्र में उचित कार्य का फल क्या है और अनुचित कार्य का फल क्या है?

भय और क्रोध दोनों अनुचित हैं, अमृत्यानंद म्रत्यु से भयभीत थे और ऋषि सर्वानंद क्रोधित, लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि ईश्वर केवल उनके इस कृत्य का यथेष्ट दंड दे दे। उनके साथ सम्पूर्ण जीवन के सत्कर्म भी जुड़े हुए थे।

यहाँ मृत्यु देव संकट में थे, विधि का विधान कैसे बदला जा सकता है, उन्हें तो अमृत्यानंद के प्राण हरने जाना ही जाना है और अगर चले गए तो ऋषि का श्राप कार्य कर जाएगा।

ऋषि सर्वानंद ने अपने शिष्य अमृत्यानंद को निर्भय कर दिया कि मृत्यु अब तेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती। अमृत्यानंद अब अत्यंत ही प्रसन्न थे। इसी प्रसन्नता में उन्होंने देश भ्रमण की ठानी और गुरूजी से आशीर्वाद ले कर चल दिए। कुछ दिन पश्चात वो उज्जैन पहुंचे, वहां महाकालेश्वर के दर्शन करते समय उन्हें उज्जैन की राज-नर्तकी वैशाली ने देख लिया। उनके मुख-मंडल के तेज से वो अति प्रभावित हुई। दर्शनों के पश्चात वो बहुत ही आग्रह करके अमृत्यानंद को अपने महल में ले गयी और उनका बहुत ही सत्कार किया।

अमृत्यानंद ने भोजन के पश्चात आगे जाने की अभिलाषा व्यक्त की तो वैशाली ने कहा कि “मुनिवर अगर आप कुछ दिन मेरा सत्कार ग्रहण नहीं करेंगे तो मैं अभी प्राण त्याग दूंगी।” अमृत्यानंद को रुकना ही पड़ा।

अगले ही दिन राज-नर्तकी ने अमृत्यानंद से विवाह की अभिलाषा प्रकट की और कहा कि “मैं मन से वशीभूत होकर आपसे विवाह करना चाहती हूँ, मेरे मन में आप जैसा तेजस्वी पुत्र हो ऐसी उत्कंठा हुई है। मैं वासना से लिप्त नहीं हूँ, लेकिन जैसा तेज आपके मुख पर है मेरा पुत्र भी ऐसा ही तेजस्वी हो, ऐसी अभिलाषा है। मुनिवर, अगर आप मेरी बात नहीं मानेंगे तो मैं प्राण-त्याग दूंगी और स्त्री ह्त्या का पाप आप पर लगेगा।”

अमृत्यानंद मृत्यु से अभय होकर आये थे, उनके मन में अभिमान ने कहीं ना कहीं डेरा जमा लिया था, और राज-नर्तकी बहुत ही सुन्दर थी। उन्होंने मन ही मन सोचा कि, “कुछ दिन विश्राम करने में क्या आपत्ति है? राज-नर्तकी भी बहुत ही सुन्दर है। यात्रा पश्चात् तो आश्रम में जाकर प्रभु सेवा ही करनी है। क्यों ना यात्रा में ही सामान्य जीवन क्या होता है यह भी जाना जाये। और वैशाली सरीखी सुन्दर स्त्री स्वयं आग्रह कर रही है तो मुझ में कुछ बात होगी।”  यह सोच कर उन्होंने विवाह के लिए हामी भर ली।

अभिमान ने अपने आप को और भी गहरा कर लिया।

अमृत्यानंद और वैशाली ने उसी दिन गन्धर्व विवाह कर लिया। पांच दिनों के पश्चात, अमृत्यानंद कुछ अस्वस्थ से हो गए। इन पांच दिनों में वो हर समय अपनी पत्नी के साथ ही रहते थे। दिन-रात प्रभु का नाम रटने वाले सन्यासी, प्रत्येक क्षण गृहस्थी क्या होती है जान रहे थे। अस्वस्थ होते ही उन्हें वैशाली ने वैद्य को बताया, लेकिन वैद्य जी उनकी अस्वस्थता का कारण जान नहीं पाये। उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया। और आने वाले तीन दिनों के भीतर उनके मुख की कान्ति समाप्त हो गयी, उनकी मधु वाणी में घरघराहट आ गयी।

वैशाली को वैद्य जी ने रोग को समझ कर बताया कि अमृत्यानंद को एक ऐसा रोग हो गया है, जिसके फलस्वरूप उनके शरीर में विष घुलता जा रहा है और इसका निदान संभव नहीं है। वैशाली घबरा गयी और उसी क्षण अपने नौकरों द्वारा अमृत्यानंद को अपने महल से निकाल दिया। स्वयं की मृत्यु के भय से कोई भी ऐसा कार्य कर सकता है। वैशाली ने स्वार्थवश अमृत्यानंद से विवाह किया था और इस रोग के पश्चात वो स्वार्थ स्वतः ही समाप्त हो गया, इसलिए अमृत्यानंद की कोई आवश्यकता नहीं थी।

अमृत्यानंद अकेले रह गए। वैशाली से उन्हें प्रेम हो गया था, लेकिन वो कुछ नहीं कर सकते थे। अपने अस्वस्थ शरीर के साथ वो प्रयाग की तरफ निकल गए।

प्रयाग पहुंचते ही अमृत्यानंद जी को एक दिव्य साधू के दर्शन हुए, उन्होंने ऐसी दिव्यता पहली कभी नहीं देखी थी... दर्पण में भी नहीं। वो उस दिव्य पुरुष को प्रणाम करके उनके चरणों में बैठ गए। उस साधू ने उनका नाम लेकर पुकारा, “अमृत्यानंद! बहुत दिनों से भटक रहे हो।” अमृत्यानंद अचंभित नहीं हुए, उन्हें पता था दिव्य व्यक्तियों में कई तरह की सिद्धियां होती हैं, उन्होंने कहा कि “ऋषिराज, मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं किस राह पर चल रहा हूँ?”

उन्हें उत्तर मिला, “मृत्यु से पूर्व ही मृत्यु को भोगने वाले अमृत्यानंद! तुम तो मृत हो, केवल तुम्हारे भीतर से जीवात्मा बाहर नहीं आयी है। तुम एक महान साधू थे, फिर एक दम्भी साधू बने, फिर सामान्य मनुष्य और अंत में मृत मनुष्य, जिसके पास कुछ भी नहीं।”

अमृत्यानंद को याद आया जब वो दर्पण में स्वयं को निहार कर सोच रहे थे कि इस आयु में भी मेरा मुख इतना सुन्दर है, मेरी वाणी इतनी मधुर है, मेरा शरीर सुडौल है, मुझे कई वेदों का-शास्त्रों का ज्ञान है.... इन सबको मैंने बहुत ही कठिनाइयों से संचय किया है... मृत्यु के पश्चात यह सब छूट जाएगा....

समय ने उन्हें बता दिया था कि वेद-शास्त्रों को वो पिछले कई दिनों से भूले बैठे थे, अस्वस्थ हो गए थे, मुख का तेज कम हो गया, वाणी की मधुरता चली गयी... लेकिन मृत्यु नहीं हुई...। मृत्यु के बिना भी वो सब कुछ छूट सकता है जो मृत्यु के आने पर...!

वो दिव्य पुरुष फिर बोले, “यह केवल तुम्हारी दशा नहीं है, अमृत्यानंद, सारा संसार ऐसा ही है। किसी को मृत्यु नहीं चाहिए, लेकिन मृत्यु से पूर्व मृत जीवन अवश्य ही जी रहे हैं। अगर तुम्हें यह लगता है कि तुम्हारा आलोक, ज्ञान, सुन्दरता और स्वास्थ्य मृत्यु के साथ समाप्त हो जाएगा तो तुमने कुछ भी नहीं जाना।

तुम्हारी आत्मा करोड़ों सूर्यों से भी अधिक आलोकित है, कभी अस्वस्थ नहीं हो सकती, सुन्दर इतनी है कि प्रकृति का निर्माण भी “परमात्मा” अर्थात एक आत्मा के द्वारा ही हुआ है, प्रकृति के हर कण में तुम्हारी आत्मा छुपी है, और सारे ऐसे ज्ञान जिन्हें मानव जानता है और ऐसे ज्ञान भी जिन्हें कोई नहीं जानता आत्मा को ज्ञात है। आत्मा शाश्वत है उसमें कुछ भी समाप्त नहीं होता। यही परम-ज्ञान है, जो गीता में श्री कृष्ण ने कहा।

अमृत्यानंद, अगर कुछ करना है तो मानव-प्रजाति के लिए कुछ कर जाओ, तुम्हें सभी याद रखेंगे, अन्यथा अब तुम्हारे पास इस मृत जीवन के अलावा क्या है?”

अमृत्यानंद को बोध हो गया कि वो भ्रम में जी रहे थे, शास्त्रों को पढने के बाद भी पूर्ण रूप से नहीं जान पाये । उन्होंने उस दिव्य पुरुष से आशीर्वाद लिया, प्रयाग में नहाते ही उसकी अवस्था पूर्व जैसी हो गयी, उनका मुख-मंडल चमक गया और वह पूर्व स्वस्थ हो गये।

प्रयाग में उन्होंने प्रण लिया कि, मानव-प्रजाति की सेवा करनी है और वे पास के गावों की ओर चल दिए ताकि जीवन के कुछ दिन दीन-दुखियों सेवा में काट सकें।

मृत्यु की गणना तो उन्होंने कर ही ली थी, मृत्यु से दो दिवस पूर्व वे अपने आश्रम चले गये। वे अत्यंत ही प्रफुल्लित थे। ऋषि सर्वानंद ने उनका स्वागत किया और पूछा कि “पुत्र, यात्रा कैसी रही?”

अमृत्यानंद जी ने गुरु के चरण स्पर्श करते हुए कहा कि, “गुरूजी, यात्रा तो बहुत सुखद रही, लेकिन ये भान हुआ कि दो दिन आपके चरणों में निकाल सकूं और आपकी सेवा का आनंद प्राप्त कर सकूं।”

ऋषि सर्वानंद ने कहा कि, “पुत्र दो दिन ही क्यों? सारे जीवन साथ ही रहना।”

अमृत्यानंद जी ने कहा, “गुरु आज्ञा शिरोधार्य है।”

दो दिन ऋषि सर्वानंद की सेवा के पश्चात, अमृत्यानंद जी ने गुरु से मृत्यु का वरण करने की आज्ञा माँगी। ऋषि सर्वानंद चकित रह गए, लेकिन सारी घटना सुनने के बाद, उन्होंने अपने शिष्य को मृत्यु वरण करने की आज्ञा दे दी। अब मृत्यु भी निर्भय थी और अमृत्यानंद जी भी। दोनों आनंदमय थे एक दूसरे को पाकर।

- चंद्रेश कुमार छतलानी

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3790,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,326,ईबुक,182,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2744,कहानी,2067,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी 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पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,16,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,306,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1882,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,676,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,52,साहित्यिक गतिविधियाँ,181,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,52,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: चंद्रेश कुमार छतलानी की कहानी - मृत्यु का वरण
चंद्रेश कुमार छतलानी की कहानी - मृत्यु का वरण
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