शनिवार, 1 जून 2013

सुशील यादव का लघुव्यंग्य - मेरी जानकारी का वो पहला...

मेरी जानकारी का वो पहला ‘अन्ना’ ज्योतिषाचार्य पन्डित रामनारायण त्रिवेदी थे। वे ब्राम्हण पारा ,जो उन दिनों शहर का सिविल लाइन जैसा रुतबा रखता था , वही रहते थे। खपरैल वाला ,लिपा-पुता ,साफ सुथरा सा मकान था। उनके मकान की खासियत थी। अजीब गहरे नीले रंग की दीवाल पर गेरू से लिखे पहले लाइन की शुरूआत ही जबरदस्त थी , सब आने –जाने वालो की निगाह बरबस चली जाती थी , किस्सा-कोताह यूँ कि ‘ कांग्रेस के नम्र हराम , गद्दार ......., साठ के दशक में जब सभी कांग्रेस की तारीफ के कसीदे काढ़ते रहते थे , तब उनका यू चलैन्ज करता हुआ खुला इश्तेहार , बेखौफ ,बेलाग , बेधड़क बयान , हम लोगो के लिए अजूबा हुआ करता था ,वैसे तब हमारी समझ भी ज्यादा नही थी , बमुश्किल प्रायमरी में पढ़ते थे।

उनका लिखा पूरा मजनून भी सिवाय उस सामने की लाइन के ख्याल नहीं आ रहा। मगर पन्डित जी के चैलेंजदार तबीयत के चलते उन्हें देखने की इच्छा रहती थी। कभी- कभार वो आराम कुर्सी में बैठे पंचांग मिलाते मिल जाते। पंडिताई से उनकी जीविका कैसे चलती थी पता नहीं। लगता था , उनके भित्त-लिखित सरकार के खिलाफ प्रवचन को पढ़ कर कोई भी अपना हाथ दिखा भविष्य जानने की इच्छा नहीं रखता आ होगा । पूजा-पाठ ,शादी-ब्याह में जाते वो कभी दिखे नहीं ,या उनको बुलाने की किसी की हिम्मत भी नहीं होती रही होगी।

बहुत व्यस्तता के बाद , शहर की उस गली में जाना हुआ। सब बदला –बदला सा लगा। पुराना कोई मकान साबूत नहीं था , नई-नई बिल्डिंग बन गई थी। पन्डित जी के पूरे भित्त-आलेख को, सज्ञान पढ़ना चाहता था। उनके उन दिनों के मनोविज्ञान में घुसने की दबी हुई कोशिश सी थी । वो घर खँडहर में तब्दील हुआ सामने था। बाहरी दीवाल गिर चुकी थी। पन्डित जी के बारे में पता चला , उनको गुजरे हुए अरसा हो गया। मैंने उस मुहल्ले में रहने वाले परिचित से जानना चाहा। उसने बताया , यार वो सनकी था। लोग अलग –अलग बातें करते हैं। कोई कहता है , वो स्वतंत्रता संग्राम में जेल गया था , उसकी मुखबिरी करने वाला आजादी के बाद , नेतागिरी करके खूब कमाया। वही इनको कांग्रेस से निकलवाने में एडी-चोटी का जोर किए रहता था। कोई कहता है ,निकाल दिया तो कोई बताते हैं खुद निकल गए। कट्टर कांग्रसी थे , किसी दूसरी पार्टी में नहीं गए। स्वार्थ के लिए अनशन नहीं किया। सिफारिश ले के नहीं पहुचे| बस मन की कुछ चुभन थी सो दीवाल पे लिख दिया।

मैं भारी मन से उस गिरी दीवाल की मिट्टी को देखते रह गया।

SUSHIL YADAV

7.9.12

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