जसबीर चावला की सामयिक व्यंग्य कविताएँ व क्षणिकाएँ

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तलाक तलाक तलाक
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-जसबीर चावला




टूटा
गठबंधन टूटा
बरसों का संग
पल में छूटा
**
किसके वादे
किसकी कसमें
कसमों का घट
क्षण में फूटा
**
कौन भारी
कौन पिटा है
किसने घर में
किसको लूटा
**
यह हरजाई
वह दगाबाज
कौन कहेगा
किसको झूटा
**
बहुत मनाया
बहुत डराया
सनम बेवफा
जम कर रूठा
***
 
"वे"

-जसबीर चावला


वे न दुआ करते हैं
न वे दवा करते हैं
*
बोते हैं घृणा के बीज
देश में बारूद भरते हैं
*
किसी पर रहम नहीं करते
लोग घुट के मरते हैं
*
वे बस पलिता लगाते हैं
देश में बारूद भरते हैं
*
आत्मा मर चुकी उनकी
वे विद्रूप से हंसते हैं
*
हिंसक हुआ चेहरा उनका
जिसे लोग देख डरते हैं

***
 
क्षणिकाएं
'''''''''''''''''''''
-जसबीर चावला

काश
न होता असीम
आकाश
*
धन
भरा होता
मन
*
उदास
गहरी चुभी
फांस
*
जीवन
उधेड़ बुन
सीवन
*
पत्ते
पेडों के
लत्ते
*
उड़ान
छू लंू आकाश
अज्ञान
*
बुद्ध
कब तक
युद्ध
*
समान्तर
चले अब
दिशान्तर

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1 टिप्पणी "जसबीर चावला की सामयिक व्यंग्य कविताएँ व क्षणिकाएँ"

  1. akhileshchandra srivastava9:40 am

    Kavitayen aur chadikayen dono hi uttam hain aur sashakt bhi badhaiee

    उत्तर देंहटाएं

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