शुक्रवार, 7 जून 2013

आशीष त्रिवेदी की लघुकथा - उम्मीद

उम्मीद

रज़िया बेगम आकर थाने में बैठ गईं। इन्स्पेक्टर सक्सेना किसी की शिकायत सुन रहे थे। उन्होंने रज़िया बेगम को देखा और मन ही मन भुनभुनाये ' फिर आ गईं मानती ही नहीं।' फिर अपने काम में लग गए।

पिछले छह महीने से रोज़ रज़िया बेगम थाने के चक्कर लगा रही हैं। एक दिन अचानक ही उनके बुढ़ापे का सहारा उनका जवान बेटा दानिश कहीं गायब हो गया। उसी के बारे में पूछताछ करने वो थाने आती हैं।

अपना काम निपटा कर इन्स्पेक्टर सक्सेना रज़िया बेगम से बोले " खाला क्यों रोज़ रोज़ परेशान होती हैं। जब भी हमें कोई खबर मिलेगी हम आपको भिजवा देंगे।"

रज़िया बेगम ने उनकी तरफ इस प्रकार  देखा जैसे वो उनसे कोई मकसद छीन ले रहे हों " सही कहा बेटा लेकिन इस बेवा के जीवन में अपने बेटे के इंतजार के अलावा और कोई मकसद ही नहीं बचा है। इसलिए रोज़ इस बूढ़े जिस्म को इस उम्मीद से घसीट कर यहाँ लाती हूँ की शायद कोई अच्छी खबर मिले। फिर मायूस होकर जब यहाँ से जाती हूँ तो दिल को फिर तसल्ली देती हूँ की कल फिर जाकर देखूंगी की शायद कोई खबर हो। एक उम्मीद के सहारे ही तो इसे चला रही हूँ। नहीं तो ये कब का थक कर बैठ गया होता।"

यह कह कर रज़िया बेगम अपने घर को चल दीं।

6 blogger-facebook:

  1. Akhileshchandra srivastava8:33 am

    Kahani rochak par adhoori adhoori lagi shayad ise hi laghu katha kahte hain. Dwiwedi ji ko badhai

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  2. बेनामी3:54 pm

    sahi kaha kahaani kuch adhoori adhoori si lagi?

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  3. कथा का आरंभ और मध्य उत्तम है । सायद उत्कर्षपूर्ण अंत के अभाव में यह अधूरापन महसूस हो रहा है ।

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    1. टिपण्णी के लिए धन्यवाद। मैं अभी सीख रहा हूँ। आपका सुझाव काम आएगा।

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  4. कुछ कुछ प्रभावशाली बन पड़ी है जो यह दर्शाती है कि एक क्षीण सी आशा भी कभी कभी जीने का बहाना पकड़ा देती है।

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    1. टिपण्णी के लिए धन्यवाद। मैं अभी सीख रहा हूँ। आपका सुझाव काम आएगा।

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