मंगलवार, 25 जून 2013

सुरेन्द्र बोथरा ‘मनु’ की कविताएँ

-- सुरेन्द्र बोथरा ‘मनु’





1. पुराना प्रश्न

[पुस्तक: मैने तुम्हारी मृत्यु को देखा है

प्रकाशक: सर्जना, शिवबाडी रोड, बीकानेर - 334003. Email: vagdevibooks@gmail.com]



वर्षों पहले

एक प्रश्न पूछा था मैंने

आज देखता

वह प्रश्न

खड़ा है वैसा ही

चौराहे पर।



वो एक आदमी

दुविधा में जो जन्मा था

अब भी ज्यों का त्यों

खड़ा हुआ है

दौराहे पर।



अदने से आदमी

चंद अदनी सी जरूरतें

बस के अड्डे पर

या रेल के स्टेशन पर

लावारिस पडे़ है।



व्यवस्था का प्यादा

दुत्कारता है आज भी

संतोष यही भर

कि पहले कभी

व्यवस्था विदेशी थी

आज स्वदेशी है

अपनी है।



अपने अधिकार के लिये

किससे लडें

जिससे लडें

वह अपना है

जरूरत के लिये

किससे कहें

जिससे कहें

उसे पाना

सपना है।



व्यस्त है वह

समस्याओं की चिन्ता में

जो महत् हैं

देश की

देश के करोड़ों की

और

गौण है यह बेचारा

अपने घर में बंजारा।



बहुत आये

बहुत चले गये

बहुत सी पगडंडियां

बनीं राज मार्ग

वह प्रश्न फिर भी

चलता रहा

ऊबड-खाबड़ राहों पर

ठोकरें खाता

अंधरे में टटोलता

खड्डों में गिरता

चलता ही रहा।



उत्तर आया

कई बार आया

आता रहा

जाता रहा।



कभी बड़ी सी गाड़ी में बैठ

मुस्काता हाथ हिलाता

पास से निकल गया

कभी वायुयान में बैठ

बहुत दूर चला गया

प्रश्न औचक था

औचक ही रह गया।



रौंदा गया तो

उत्तर भाषण में खो गया

बाढ़ में बहा तो

उत्तर मुआयने पर

शायद सैर को

निकल गया

दुर्घटना में कटा तो

उत्तर मुआवज़े में

सिमट गया

भूखों मरा तो

उत्तर वादों में हँसने लगा

अकाल पड़ा तो

उत्तर राहत बन

बड़ी जेबों में

चुपके से जा छुपा।



हर उत्तर देने वाला

अपने निजी प्रश्नों के उत्तर

बटोरता रहा।



कोई यह नहीं बता सका

कि देश में राज्य में

जिले में शहर में

कस्बे या गाँव में

सड़क की धूप

या ठूंठ की छाँव में

कहाँ है स्थान

इस अदने आदमी का ?



व्यवस्था की सीढ़ी पर

वह कहीं बीच में है

सबसे ऊपर

या सबसे नीचे

या कि कहीं भी नहीं

सुविधानुसार हर कहीं ?



पर लगता है

हर प्रश्न महत् है

इस प्रश्न से

तभी तो

वह प्रश्न आज भी

कंकाल सा खड़ा है

चौराहे पर।



एक प्रश्न

जो पूछा था मैंने

वर्षों पहले।

---



2. अनाथ सत्य

[पुस्तक: मैने तुम्हारी मृत्यु को देखा है

प्रकाशक: सर्जना, शिवबाडी रोड, बीकानेर - 334003. Email: vagdevibooks@gmail.com]



ईमानदार धूप

मेहनती हवा को

तरस जाय

दूसरों की नीयत से उलझ

अपनी नियति

बदल जाय



अंधेरे बंद कमरे में

घुट कर मर जाय

या किसी सुनसान में

किसी हैवान के हाथों

निरीह बच्चों सा मारा जाय



खुली धूप में

हँस कर खिलना न सही

खुली हवा में

मर पाने का सुख भी नहीं



क्या आदमी

इसीलिए जिए जाता है

कि आदमियों को मारता रहे

या मरते देख मुंह मोड़ता रहे



पूछो, जरा उनसे पूछो

जिनकी देशभक्ति

क्रान्ति के नाम से चल

कुर्सी तक जाती है



जिनकी दृष्टि

आम आदमी से छिटक

विरोधी दल तक जाती है



और इस यात्रा में

सत्य अनाथ सा

काफिले से दूर

खड़ा एक किनारे उदास



हर गुज़रते दौर से

माँगता है

साथ लिए चलने की भिक्षा



और कहता है:

खेत का धान

आदमी का चेहरा

तभी खिलेंगे

जब मिलेंगे

उसकी नियति को न्याय

और नियत को शिक्षा।

---



3. आजकल



-1-



आदमियों से डर

आदमी

जब आदमी न रहे

खिलती कली

अनदेखी रह जाने की व्यथा

किससे कहे?



आदमियों की भीड में फँसा

आदमी

अनजानेपन की टीस

कैसे सहे?



बर्फ सी जमी

संवेदन की सरिता

स्नेह की धूप बिना

कैसे बहे?

---



-2-

वो एक

सडक पर

लाश पडी है लावारिस



लोग अनेकों गुज़र गये

चुपचाप देखकर अनदेखा कर



सबके मन में भय है

उस कानून का

रेंग-रेंग कर जो चलता है

और समय का

जिसको कोई भान नहीं



पीठ फेर कर खडे हुवे हैं

पहरेदार व्यवस्था के

जिनके पास सभी कुछ है

बस थोडा सा ईमान नहीं



शाम हो चली

अपना-अपना स्वार्थ सिद्ध कर

सभी लौटने लगे नीड को



वो लाश अभी भी

वहीं पडी है लावारिस।

---



-3-



बाप दवा-दारू बिना

मरता है मरे

बेटों में बजेंगे लट्ठ

दुनियां जो चाहे करे



देश भाड में जाता है

जाय

हम तो अभी

यही सोचेंगे

कहेंगे

करेंगे:



अंगना मेरा

अटारी तेरी

बटुआ मेरा

पिटारी तेरी

---



-4-

आदर्श देश से बडे

साधू बनने में शरम



स्वार्थ देश से बडे

लूटना ही करम



दो तरह के लोग

दो तरह के काम



सडक का आदमी

भटकता रहा

बढता रहा भरम

---



-5-



गली के कुत्ते

अजनबी पर भौंकते हैं

3 blogger-facebook:

  1. Akhilesh Chandra Srivastava6:26 pm

    manu ji seedha saada such hi to likha hai aapne saargarbhi aur prabhavi roop men , aam aadmi ki itni sunder prastuti ke liye aur such likhne ki himmat ke liye badhaiee pl keep it up and high

    उत्तर देंहटाएं
  2. स्थिति बड़ी अद्भुत है
    जो भी प्रश्न उठते हैं
    औचक ही उठते हैं
    अभी वे
    हमारे अणुओं के ताल मेल में
    बैठे नहीं कि
    हम चल पड़ते हैं
    उत्तर की खोज में औचक ही
    सड़क पर.

    हमें
    प्रश्नों के उत्तर पाने की
    इतनी बेचैनी होती है कि
    हम हवा में दागने लगते हैं इन्हें
    अपनी वाणी के तमंचों से.

    हम भूल ही जाते हैं
    उन प्रश्नों का एक आयाम
    हमारी तरफ भी खुलता है
    यहाँ वाणी के नहीं
    मौन के तमंचे चलते हैं.

    इन प्रश्नों को
    अपनी तरफ साधने में
    खुद ही घायल होना पड़ता है
    प्रश्न का रुख
    हवा की तरफ करने में
    दार्शनिक की मुद्रा ग्रहण करने में
    सुविधा होती है
    सोहरत मिलती है.

    उत्तर देंहटाएं

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