शनिवार, 15 जून 2013

सुनीता : मैं अपने बच्चे के लिए फिर से जीना चाहती हूँ...

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सुनीता अपने जीवन के सबसे बुरे समय से गुजरने के बाद, अब उन बिखरे हुए पलों को समेटने की कोशिश में लगी हुई हैं, जो उन्होंने पिछले एक सालों में खोए हैं. मां बनने से हुई खुशी पर हावी हुए अवसाद ने उन्हें जिंदगी के कई बहुमूल्य पलों से वंचित रखा है.

सुनीता इस बीमारी के बारे में इसलिए भी बोलने के लिए तैयार हुईं, क्योंकि वे चाहती हैं कि लोगों का ध्यान इसकी गंभीरता की ओर जाए. सबसे अहम बात, लोग यह समझ सकें कि ऐसी भी कोई बीमारी होती है.

खुशी का पल

परिवारवालों की सहमति से हुए प्रेम विवाह के बाद 28 वर्षीया आईटी एग्जेक्यूटिव सुनीता की जिंदगी अच्छी- भली चल रही थी. वे और उनके पति कुछ समय बाद परिवार बढ़ाना चाहते थे, लेकिन घरवाले बच्चे के लिए

दबाव डाल रहे थे. '' हम पहले तो कुछ समय बाद बच्चे के बारे में सोचना चाहते थे, पर बाद में लगा कि मेरे 3० के होने से पहले बच्चा हो जाए तो अच्छा ही होगा. प्रेग्नेंसी के दौरान मैं बहुत खुश थी. परिवार के सभी

लोग भी मेरा खूब ध्यान रखते थे. डिलिवरी के पहले मैं मायके आ गई, जहां 18 फरवरी 2०12 को मेरा बेटा पैदा हुआ. उसे हाथ में लेते ही मेरा सारा दर्द पल भर में काफूर हो गया. वह मेरे जीवन का सबसे खास पल था. पति राकेश और घरवाले भी बहुत खुश थे. '' पर दुर्भाग्य से वह खुशी लंबी नहीं

चली. डिलिवरी के तीन-चार दिन बाद मैं अचानक दुखी-दुखी और उदास रहने लगी. मैं गुमसुम-सी एक जगह बैठी रहती. मेरी दीदी मुझसे मिलने के लिए घर आई थीं,

उन्होंने मेरी उदासी का कारण जानना चाहा तो मैंने उन्हें बताया कि मुझे ये बच्चा नहीं चाहिए. इसे मेरे सामने से हटा दो. यह सुनकर वे भौंचक्की रह गईं. उन्होंने और घर के सभी लोगों ने मुझे समझाया, पर मुझे किसी की भी बात अच्छी नहीं लग रही थी. ''

डिप्रेशन का वह दौर

धीरे- धीरे बच्चे के प्रति सुनीता के मन में गुस्सा बढ़ता गया. '' मुझे नहीं पता कि ऐसा क्यों हो रहा था, पर मैं अपने बच्चे से और दूर होती जा रही थी. उसके लिए मेरे मन में कोई लगाव न था. वह मुझे अपना नहीं लगता था. मैं सिर्फ औपचारिकता के लिए उसे दूध पिला देती. बाकी उसका ध्यान मेरी मां रखतीं थीं. मुझे हमेशा लगता कि जब से यह बच्चा मेरी जिंदगी में आया है सबकुछ गड़बड़ हो रहा है. कभी मन करता कि उसे मार डालूं तो कभी खुद को खत्म करने का ख्याल आता. '' चार महीने बाद घरवालों ने उन्हें ससुराल भेजने का फैसला किया, पर वहां उनकी मानसिक स्थिति और बिगड़ गई. ''मेरे दिमाग में आत्महत्या के विचार चलते रहते थे. क् सोचती कि यह बच्चा मुझसे नहीं संभलेगा. मैं उसके प्रति और उदासीन हो गई. जब वह रोता तो उसकी तरफ देखती तक नहीं. ई

कहती कि मुझे मरना है. शुरू के कुछ दिनों तक घरवालों ने मुझे संभालने की कोशिश की, पर उनका धैर्य भी जवाब दे गया. उन्हें लगा कि मैं मायके जाने के लिए नाटक कर रही हूं वह ऐसा दौर था जब मैं क्या कर रही थी और क्यों कर रही थी, नहीं जानती थी. ''मेरी बिगड़ती मानसिक स्थिति से सबसे अधिक परेशान मेरे पति रहते थे. वे मुझे डाँक्टर के पास ले गए तब हमें इस बीमारी का पता लगा जिसे पोस्टपार्टम कहते हैं. यह जानने के बाद पति का रवैया मेरे

प्रति सहानुभूतिपूर्ण हो गया, पर बाक़ी घरवाले मेरी हरक्रतों से चिढ जाते थे. जब मेरे मम्मी- पापा मिलने आए तो मैंने उनसे कहा मुझे अपने घर ले चलो, पर बच्चे को नहीं. चूंकि इसके पहले मैं फिनाइल देकर बच्चे को मारने की कोशिश कर चुकी थी इसलिए और भी डरती थी कि यदि वह पास रहा तो उसे फिर नुक़सान न पहुंचा दूं हालांकि सभी चाहते थे कि मैं बच्चे के साथ रहूं पर मैं जिद पर

अड़ी रही. और न चाहते हुए भी घरवालों और मम्मी-पापा को बच्चे को मुझसे दूर

करना पड़ा. ''

उनकी स्थिति बिगड़ती जा रही थी. ''मैं कभी बिल्डिंग की छत पर चली जाती, तो कभी घर में ही कोई लिक्विड पीकर जान देने की सोचती. उस समय मुझे का ख्याल नहीं आता. जब कभी दूसरी को उनके बच्चों के संग खुश देखती तो सोचती कि काश मेरा बेटा भी साथ होता, पर दूसरे ही क्षण फिर नकारात्मकता से भर जाती. हर समय एक अजीब तरह की घबराहट होती थी. ''

अपनों का साथ

सुनीता की मानसिक स्थिति में फिलहाल काफी सुधार आ गया है. उनका खोया हुआ आत्मविश्वास फिर से लोट रहा हे बकौल सुनीता, यदि आज वे कुछ सोचने समइाने की स्थिति में हे तो इसमें अपनों का बड़ा हाथ है. '' अब मेरी दवाइयों का डोज काफी कम हो गया हे मैं डिप्रेशन से बाहर आ चुकी हूं मुझे.

जीवन में वापसी कराने के लिए अपनों ने कड़ी मेहनत की है. उन्होंने मुझे बच्चे की

तरह संभाला और मेरे बेटे को भी मेरी कमी महसूस नहीं होने दी. उन्होंने मेरी बेहूदा हरकतों को झेला है. जब बच्चा मेरे पास रहता था तो एक दिन मैंने गुस्से में उसे उठाकर बिस्तर पर फेंक दिया था. उस दिन मेरे पति बहुत रोए थे. उन्होंने मुझे डांटा नहीं, बल्कि प्यार से समझाया था. लेकिन उस समय मुझे कहां कुछ समझ आता था. जब मुझे साइकोथेरेपी के लिए अस्पताल में रखा गया था, वे पूरे समय मेरे साथ थे. मेरे साथ रहने के लिए उन्होंने अपनी अच्छी-खासी नौकरी भी छोड़ दी. मेरे ठीक होने के बाद भी उन्होंने जॉब जॉइन नहीं किया, क्योंकि बच्चे की देख-रेख वे ही करते है. ''

बच्चे से दूर रहने का दर्द

'' किसी भी मां के लिए अपनी संतान से दूर रहने की मजबूरी, दुनिया का सबसे बुरा अनुभव है, कहते हुए सुनीता आगे बताती हैं,' ' 16 फरवरी को बेटे प्रदीप का पहला जन्मदिन था. मैं उससे मिलने गई थी. वह थोड़ा- थोड़ा बोलने लगा है. जब सभी कहते कि ये तुम्हारी मम्मी है तो वह मुझे ध्यान से देखता. मुझे देखकर वह बहुत खुश हुआ था. उससे दूर रहकर जितनी तकलीफ मुझे हुई है, उससे कहीं ज्यादा उसने खोया है. उसे अभी तक अपनी मां का प्यार नहीं मिला है. पांचवें महीने से ही उसकी ब्रेस्ट फीडिंग बंद है. अब मैं उसे काफी मिस करती हूं.

घरवाले चाहते हैं कि मैं बच्चे के पास रहूं, पर मुझमें अभी भी उसे अकेले संभाल पाने का आत्मविश्वास नहीं आया है. मैं अपने बेटे के लिए डायरी लिखना चाहती हूं. डायरी के माध्यम से उसे बताऊंगी कि कौन-से कारण थे, जिनके चलते मुझे उससे दूर रहना पड़ा था. ताकि बड़ा होने के बाद वो मेरे बारे में गलत न सोचे. ''

अब खोना नहीं, सिर्फ पाना है इस एक साल में सुनीता ने जीवन के कई बहुमूल्य पलों को खोया है, पर इसी दौरान उन्हें अपने पति के स्नेहमयी पहलू से रूबरू होने का मौक़ा भी मिला. '' बीमारी के चलते मैंने अपना आत्मविश्वास खोया है और अपने बच्चे का सामीप्य भी. लेकिन मैंने यह महसूस किया है कि हर स्थिति में मेरे माता- पिता और पति चदटान की तरह साथ रहेंगे. उनमें का धैर्य है. इस बीमारी ने जहां मुझे सबसे दूर किया है, वहीं मैं अपने पति के और करीब आई हूं मैं अब जल्द से जल्द पूरी तरह ठीक होना चाहती हूं ताकि अपने पति और बच्चे को वो सब लौटा सकूं, जिसके वे हक़दार हैं. ''.

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क्या है पोरटपार्टम डिप्रेशन 7

''बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं के व्यवहार में आनेवाले अचानक बदलावों को मेडिकल शब्दावली में पोरटपार्टम डिप्रेशन (पीपीडी) कहा जाता है. हर 2००० में से करीब 3 महिलाएं इसका शिकार होती हैं. आमतौर पर बच्चे के जम्म के 2-3 हफ्ते में इसके लक्षण दिखने शुरू हो जाते हैं. मूड स्विंग, निराशा, लोगों से कटना, आत्मविश्वास की कमी, नकारात्मकता, अनिद्रा, अकारण चिड़चिड़ापन, चक्कर, आत्महत्या की कोशिश आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं. कुछ माएं हिंसक हो जाती हैं और बच्चे को क्षति भी पहुंचा सकती हैं. पीपीडी का कोई एक खास कारण नहीं बताया जा सकता. हां, प्रेग्नेंसी के दौरान के हार्मोनल बदलावों की इसमें

बड़ी भूमिका होती है.

''पीपीडी पूरी तरह से ठीक हो जाता है. इसमें छह हफ्ते से छह महीने का समय लग सकता है, पर मरीज को करीब दो साल तक मेडिकल निरीक्षण के दायरे में रखा जाता है. दवाइयों के साथ मरीज की काउंसलिंग भी करते हैं. परिवार के सदस्यों को चाहिए कि वे बच्चे को मां के पास अकेला न छोड़ें. लोगों को समझना होगा कि पीपीडी दिमाग और शरीर में होनेवाले बायोलाजिकल बदलावों का नतीजा है, न कि किसी प्रकार का ढोंग.''

डॉ. संदीप जाधव, डायरेक्टर, मानव न्यूरो साइकियाट्रिक हास्पिटल, कल्याण

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(फ़ेमिना, मई 2013 से साभार)

2 blogger-facebook:

  1. akhileshchandra srivastava12:29 pm

    Suneeta ji ki is ajeeb bimari ke bare me padha such me hum non medicos ko iski jankari nahi thi aur hum maa ke is tyohar ko samajh nahi sakte dr jadhav ne ise likh kar manav jati par ahsaan kiya hai badhaiee

    उत्तर देंहटाएं
  2. thanks for this good informative article .

    उत्तर देंहटाएं

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