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अनिंद्या तोगड़े की चार कविताएं

"...तेरे मेरे वजूद के दरमियां

मुद्दतों का झीना सा पर्दा है

जब उस पर प्रेम लिखा, तो वो आसमां हो गया

जब उस पर लाज लिखा, तो लिहाज़ के तागों से सिल गया

जब उस पर परंपरा लिखा, तो ढ्योड़ी के आगे की लकीर बन गया

जब उस पर सम्भावना लिखा, तो वज़ूद के भीतर की आखरी परत हो गया..."

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अनिंद्या तोगड़े की चार कविताएं

एक

ओढ़ी हुई संपूर्णता

तुम्हारी ही फितरत की तरह
ये शाम घुल रही है
घुल कर .... धुल रही है
एक गीत आकर ले रहा है
गुम होती सिंदूरी लकीरों में, साँस ले रहा है
मैं आँखें मूंदें, किसी उर्दू अदब सा
सिंदूरी साँसों का गीत, संगीत की प्याली में चख रही हूँ
ये गीत मैं, यहीं छोड़ रही हूँ
कुछ किस्सों के अर्ध्य पर
मन के गान को स्वाहा कर रही हूँ
किस्सों को पूर्ण होना है
मन का गीत अधूरा रहना है
अधूरेपन को स्वभाव में समेटे
संपूर्ण हो रही हूँ
दिन के उजास की आखरी नमाज़ सुन रही हूँ
अधूरा घूँट पी रही हूँ
तुम्हारी फ़ितरत की तरह ही
शांत शाम से ढलकर स्याह रात हो रही हूँ
कल के उजाले का स्वप्न आंजे
संपूर्णता के भ्रम में सो रही हूँ
मन के गान का तकियाँ लगा
बाहर के किस्सों की रस्म निभा
गुम होती सिंदूरी लकीरों को ढूंढ़ रही हूँ
तुम्हारी ही फितरत की तरह
शाम की तरह घुल रही हूँ, धुल रही हूँ
ये गीत यूँ ही अधूरा रख रही हूँ
किस्सों के अर्ध्य पर, ओढ़ी हुई संपूर्णता जी रही हूँ ...!!

-----++------

दो

इससे उससे, पता नहीं किससे
उधार माँग कर
पहन लिए थे पंख

चार दिन की मोहलत लेकर
उड़ आई थी, सुदूर आसमान में
इन्द्रधनुष के, थोड़े से रंग लेकर
खोल दी थी मुट्ठी
बिखरा दिए थे रंग, नीले आकाश में
(हमेशा ही चाहती थी ना , रंग-बिरंगा आसमान
घड़ी भर को ही, रंगा था, पर रंगा था )

अब
गुज़र जाने वाले वक्त को आवाज़ दे रही हूँ
और आसमान भी लौट रहा है
नितान्त नीले व्यक्तित्व में
जैसा की मुझसे पहले था, जैसा की मेरे बाद में होगा

अब जबकि , मोहलत खत्म हो रही है, नीलापन भी मेहरबान है
तब मैं खुद को ही मुनासीब नहीं !!

नहीं लौटना चाहती मैं जमीनी हकीक़तों में
उधर के पंख जकड़ लिए है
रंगों की मुट्टी भींच ली है
स्वाभाविक कुछ भी नहीं बचा

सुदूर आकाश में, बादलों से आसमान होने के दंभ में
नीलेपन की बौद्दिकता में, अकेली हूँ

इससे उससे, पता नहीं किससे
उधार माँग कर
पहन लिए थे पंख

मोहलत अब ख़त्म हो रही है !!!

--

तीन

तुम और मैं

--------

तुम और मैं

जैसे की किसी ने

मौन को रंग ओढ़ा दिए हो

और

आखें मींचे मौन

लगातार उन रंगों को जी रहा हो

रंगों की जीवटता को पी रहा हो

अब

ये रंगीन जीवटता

शब्दों की ज़मीन पर

उतर रही है

इस तरह जैसे

पाखी आता हो दूर गगन से

पोखर तक, कतरे की प्यास लेकर

अक्षर मैं सींच रही हूँ,  परवाज़ तुम दे रहे हो

मैं पोखर हो रही हूँ, तुम पाखी बन रहे हो  

असीम तुम, सीमित मैं को चुन रहे हो

सीमित मैं, असीम तुम की संभावनाए बुन रही हूँ

तुम और मैं

पाखी और प्यास हो रहे है

रंग और मौन हो रहे है

तुम और मैं

एक दूजे से, बिल्कुल अलग

एक दूजे से बहुत दूर

एक हो रहे है

तुम और मैं

लगातार

हम हो रहे है

---------------------

चार

तेरे मेरे वजूद के दरमियां

----------

तेरे मेरे वजूद के दरमियां

मुद्दतों का झीना सा पर्दा है

जब उस पर प्रेम लिखा, तो वो आसमां हो गया

जब उस पर लाज लिखा, तो लिहाज़ के तागों से सिल गया

जब उस पर परंपरा लिखा, तो ढ्योड़ी के आगे की लकीर बन गया

जब उस पर सम्भावना लिखा, तो वज़ूद के भीतर की आखरी परत हो गया

इक दफ़े

पर्दे के पार झाँका

दो से चार आँखें जुड़ी

मौन मौन वर्तनी में

खुशबू की भाषा लिखी

फिर यूँ हुआ

आसमां ने सम्भावना के लिहाज़ सिल दिए

रिवायती ढ्योड़ी से पार पाने को पंख दे दिए

दो से चार आँखों में, अनगिनत मुद्दतों को पंख मिल गए

वज़ूद, आसमानी होकर खुशबू हो गए

! ! ! !

 

ईमेल anindhyaa@gmail.com

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bhavo ka hubsurat sangam hai ye rachnaaye....

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Heartiest congratulations Anindhyaa. This is not a surprise as it was supposed to be happening, now or later. :)
A very well composed poems, as usual. :)

~Mohit Verma

akhilesh Chandra Srivastava

Achcha prayas hai. Aasheerwad avm badhaee

Dhanyawaad Sushma Ji :))

पूनम जी, बहुत बहुत धन्यवाद्

Thank you Mohit. You were always there to read me... :))

Akhilesh Ji...Dhanyawad Sir :))

behtreen....sch me lajwab.
bilkul naye parteek pryog kiye hain..

बेनामी

all poems are very nice but "Tere mere vajood k darmiyan" is awesome
wish ur very good luk for ur bright future

Bahut Bahut DHanyawad Krishna Ji... Benami :)))

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