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एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य - एक और वाक इन

एक और वाक इन......

जो प्रसन्नता मयूरी को आकाश में बादल छाते देखकर होती है। चकोर को चाँद देखकर होती है। समुन्द्र को पूर्ण चन्द्र देखकर होती है। प्रेयसी को प्रियतम को देखकर होती है। वैसी ही प्रसन्नता बेरोजगार युवक-युवतियों को विज्ञापन देखकर होती है। भले ही अंत में निराशा ही हाथ क्यों न लगे ? लेकिन विज्ञापन देखकर नयी स्फूर्ति आ जाती है। नई आशा का संचार हो जाता है। किसी ने सच ही कहा है कि आशा ही जीवन है। बिना आशा के सिर्फ निराशा में कोई कितने दिन जीवित रह सकता है।

एक लड़के ने अभी हाल में ही आशा से निराश होकर आत्महत्या किया है। सुसाइड नोट में लिखा कि सिर्फ बेरोजगारी और आशा ही हमारी थी। अब आशा भी नहीं रही। तब सिर्फ बेरोजगारी के साथ कैसे जीवित रहूँ ?

एक संस्था ने एमएससी में पढ़ाने हेतु एक पद के लिए 'वाक इन इंटरव्यू' का विज्ञापन निकाला । बेरोजगार युवक-युवतियों ने हमेशा की तरह इसे हाथों-हाथ लिया। बेरोजगार एक-दूसरे को सूचित करते हुए कह रहे थे कि पेपर मे देखा कि नहीं ‘एक और वाक इन...’ है। वैसे ख़ुफ़िया सूचना के अनुसार मनोरमा देवी को पहले ही इस पद के लिए योग्य माना जा चुका था । उन्होंने किसी तरह जुगाड़ बैठा लिया था। नगदेश्वर के भी अहम रोल को नकारा नहीं जा सकता। फिर भी सिर्फ विज्ञापन की रस्म पूरा करने के लिए 'वाक इन इंटरव्यू ' आयोजित किया जाना था। साथ ही इसी माध्यम से कुछ आमदनी कर लेने की भी योजना थी।

विज्ञापन में छपी कुछ महत्वपूर्ण बातें बताना जरूरी है। पहली थी कि सभी शैक्षणिक योग्यताओं तथा बायोडाटा की कम से कम १५ प्रतियाँ अवश्य लायें। कई विज्ञापनों में तो इससे भी अधिक मांग लेते हैं। मैंने खुद भी भेजा है। लेकिन तब इसका कारण और आवश्यकता नहीं समझ पा रहा था। दूसरी थी कि इंटरव्यू की फीस जो २५० रूपये है, जमा करने के बाद ही इंटरव्यू में प्रवेश दिया जायेगा। तीसरी थी कि सभी शैक्षणिक योग्ताओं व दावों के लिए प्रमाणपत्र के बिना अभ्यर्थी को अयोग्य माना जायेगा। चौथी थी कि नेट अथवा पीएचडी न होने पर इंटरव्यू में सम्मिलित होने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

इंटरव्यू के दिन सुबह से ही युवक-युवतियों की भीड़ जमा होने लगी। समय तो दस बजे का दिया गया था। लेकिन कहीं देर न हो जाये। इसी चक्कर में लोग साढ़े आठ बजे से ही जुटने लगे थे। समय किसके रोके रुका है। कब शुरुआत हुयी। कब समाप्त होगा। आज के वैज्ञानिक भी नहीं समझ सके। खैर दस भी बज गया। लेकिन अभी कोई कारगुजारी शुरू नहीं की गयी। शायद प्रतीक्षा में थे कि भूला-चूका, लेट-लतीफ कोई हो तो वो भी आ जाय। कहीं ऐसा न हो कि यह खबर मिलते ही कि इंटरव्यू शुरू हो गया है। यहाँ तक आये ही न। और हाथ में आने वाली लक्ष्मी रूठकर चलीं जाएँ।

कुछ भी हो ग्यारह बजते-बजते एक व्यक्ति को फीस और एक व्यक्ति को सर्टिफिकेट आदि इकट्ठा करने के लिए बैठा दिया गया। एक लड़के ने प्रमाणपत्र इकट्ठा करने वाले व्यक्ति से पूछा- सर, विज्ञापन में शैक्षणिक योग्यताओं की कम से कम १५ प्रतियाँ लाने को कहा गया था। निर्धारित संख्या तो लिखी नहीं गयी थी। इसलिए मैं बीस प्रतियाँ ले आया हूँ। सर बोले कोई बात नहीं जितना लाये हो सब यहाँ जमा कर दो। जो लोग कम लाये हों अथवा और अधिक जमा करना चाहते हों। वे लोग बगल से फोटो प्रति करा सकते हैं। एक पृष्ठ का तीन रूपये लगता है। एक दूसरे लड़के ने पूछा सर मेरे पास नेट का प्रमाणपत्र नहीं है। लेकिन मैंने परीक्षा दी थी। अभी रिजल्ट नहीं आया है। सर ने कहा कि इसका कोई प्रमाणपत्र है कि तुमने परीक्षा दिया था। फीस जमा करने वाले सर ने पूछा फीस है कि वो भी नहीं है। लड़का बोला फीस तो है। तब फीस वाले सर ने कहा कि एक सादे कागज पर लिखकर दे दो कि तुमने परीक्षा दिया था। सादा कागज पाँच रूपये जमा करके ले सकते हो। इसके बाद फीस जमा कर दो। तुम्हारा भी इंटरव्यू हो जायेगा।

अभ्यर्थियों की संख्या अनुमानित संख्या से भी अधिक देखकर सभी लोग खासा प्रसन्नचित थे। इंटरव्यू फीस के रूप में ही हजारों रूपये मिल जाने का आंकड़ा लगाया जा रहा था। चूंकि अभ्यर्थी अधिक हो गये थे। इसलिए कई कमरों में इंटरव्यू चालू कर दिया गया। जो विषय के जानकर थे उन्हें भी तथा जो नहीं थे उन्हें भी इंटरव्यू लेने के लिए बैठा दिया गया। यहाँ तक कि चपरासी भी इंटरव्यू लेने लगे। संकेत था कुछ भी पूछो। उल्टा सीधा जो मन में आ जाये। लेकिन जिस ब्रांच में कोई पीएचडी हो अथवा उसके पसंद की ब्रांच से, यदि तुम्हें पता हो तो भी कुछ नहीं पूछना है। सभी अभ्यर्थी को ऐसा संदेश जाना चाहिये कि या तो वह सही जबाब नहीं दे सका अथवा उसके पास आवश्यक प्रमाणपत्रों की कमी थी। ध्यान रहे सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे। मतलब इंटरव्यू भी हो जाये और कोई भी अभ्यर्थी खुद को पद के लिए फिट ना पा सके ।

इंटरव्यू कमेटी के एक सदस्य ने एक अभ्यर्थी से कहा कि जवाब अंग्रेजी में दो। अभ्यर्थी बोला "सर ! आप लोग तो प्रश्न हिंदी में ही पूछ रहे हैं। इसलिए ..."। सदस्य बोला " आप हम लोगों का इंटरव्यू लेने आयें हैं या फिर अपना इंटरव्यू देने। आप बतायेंगे कि हम लोगों को क्या और कैसे पूछना है ? आप जा सकते हैं।

दूसरे अभ्यर्थी से पूछा जाता है कि मुकेश आप का ही नाम है ? अभ्यर्थी बोला " यस सर" ! सदस्य बोला "क्या आपको हिंदी नहीं आती ?" अभ्यर्थी बोला " आती है श्रीमानजी "। सदस्य ने आगे कहा तब हिंदी में पूछे गये प्रश्न का जबाब अंग्रेजी में देकर अपनी काबिलियत दिखा रहे हो । इतना भी पता नहीं कि जिस भाषा में प्रश्न किया जाय उसी भाषा में उसका उत्तर देना चाहिये। और इंटरव्यू देने चले आये। नेक्सट वन । अभ्यर्थी मायूस बाहर निकल आया।

एक अभ्यर्थी से पूछा गया कि राजीव आपका ही नाम है ? अभ्यर्थी बोला " हाँ

श्रीमानजी।" सदस्य ने सवाल किया कि इसका क्या प्रमाण है कि राजीव आपका ही नाम है ? अभ्यर्थी आश्चर्य से देखता रह जाता है। किसी तरह बोला सर ! मुझे बचपन से ही सब इसी नाम से पुकारते हैं। राजीव ही मेरा नाम है। सदस्य बोला लगता है आपने विज्ञापन ठीक से पढ़ा नहीं था। यहाँ हर दावे के लिए प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना आवश्यक है। अभ्यर्थी वहाँ से निकलकर मैनेजर के पास गया। बोला सर जी मुझे सिर्फ इसलिए इंटरव्यू से निकाल दिया गया क्योंकि मेरे पास यह प्रमाणपत्र नहीं है कि राजीव ही मेरा नाम है।

मैनेजर बोला आपको प्रमाणपत्र लाना चाहिये था। इसमें मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता हूँ। आपको शायद पता नहीं की प्रमाणपत्र के अभाव में आज जीवित आदमी को जीवित तक नहीं माना जाता। अभी हाल में एक बृद्ध की पेंशन रोक दी गयी। कार्यालय में गया तो क्लर्क बोला कि आपने अपने जीवित होने का प्रमाणपत्र जमा नहीं किया है। बूढ़ा चिल्लाने लगा कि मैं तो जिन्दा तुम्हारे सामने खड़ा हूँ। इससे बड़ा और क्या प्रमाण हो सकता है ? बूढ़ा रुआंसा हो गया कि जो हाल घर में वही बाहर भी। क्लर्क बोला बिना प्रमाणपत्र के मैं नहीं मान सकता हूँ कि आप जिन्दा हैं। प्रमाणपत्र लेकर आइये।

आगे बताया कि एक आदमी मरा हुआ सड़क के किनारे पड़ा था। लेकिन पुलिस आई और उसे जिन्दा कहकर चली गयी। कारण उसके जेब में जीवित होने का प्रमाणपत्र था। एक आदमी बोला कि यह जिन्दा नहीं मरा है। तो उसे साथ ले गयी। झूठा बयान देने तथा कानून के आँख में धूल झोकने के आरोप में वह जेल में बंद है। अब आप ही बताइए कि जब प्रमाणपत्र के अभाव में जिन्दे को मुर्दा माना जाता है। तथा प्रमाणपत्र होने पर मुर्दे को जिन्दा। तब इस स्थिति में कैसे मान लिया जाय कि राजीव आपका ही नाम है ?

इंटरव्यू ले रहे चपरासी ने एक अभ्यर्थी से पूछा कि क्या यह तुम्हारा ही प्रमाणपत्र है ? अभ्यर्थी बोला हाँ ! श्रीमानजी यह मेरा ही प्रमाणपत्र है। चपरासी बोला क्या आपके पास इसका प्रमाणपत्र है ? अभ्यर्थी भौचक्का रह गया। मुंह से निकला प्रमाणपत्र का प्रमाणपत्र ! सर ! मैं कुछ समझा नहीं आप किस प्रमाणपत्र की बात कर रहे हैं। चपरासी बोला इसी से तो बेरोजगार हो। अगर बात समझ में ही आती तो अब तक रोजगार नहीं मिल गया होता। कितने इंटरव्यू दे चुके हो। अभ्यर्थी बोला दस। चपरासी बोला देते रहो। मेरा मतलब है कि आपके पास हाई स्कूल परीक्षा का एडमिट कार्ड होता तो उसे देखकर पता चल जाता कि यह प्रमाणपत्र तुम्हारा ही है। उसमें परीक्षा का नाम, तुम्हारा नाम, परीक्षा वर्ष, तुम्हारा फोटोग्राफ सब कुछ होता न। अभ्यर्थी बोला सर मुझे हाई स्कूल पास किये हुए दस वर्ष हो गये। प्रवेश पत्र रखना मैंने जरूरी नहीं समझा। चपरासी बोला अभी मैं अपने आठवीं वाला प्रवेश पत्र सुरक्षित रखे हूँ। ठीक है आप जाइये।

इसी तरह एक-एक करके सभी को निपटा दिया गया। सभी मुंह लटकाए वापस लौटने लगे। किसी दूसरे विज्ञापन की प्रतीक्षा में। जो सोच कर आये थे कि इस बार तो मेरा हो ही जायेगा। वे बेचारे थोड़ा ज्यादा परेशान थे।

खैर अभ्यर्थी बाहर निकल रहे थे और दो ठेले वाले अंदर आ रहे थे। शायद प्रिंसिपल साहब कह रहे थे कि कुन्टलों रद्दी भी इकट्ठा हो गयी । तभी किसी चपरासी ने आवाज दिया कि मैनेजर साहब हिसाब ठीक करने के लिए आपको बुला रहे हैं।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।
ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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Akhilesh Chandra Srivastava

pandeyaji aapne aaj ke walkin interview ki pole hi khol kar rakh di hai ,vastav me bina source sifaras nagdi ke koi ghas bhi nahi dalta aur is prakar ke walk in berojgaron ko thagne ke madhyam ban chuke hain aur badi sankhya me dhoort log berogaron naukari ke jarooratmando ka shoshan kar rahen hai

Itne mahatav ke vishya par aur itna sunder likhne par hardik badhaiee

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