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राजीव आनंद का व्यंग्य - व्‍यंग्‍य लेखकों की पहली पंसद-प्रसिद्ध आलोचक रावणदुलारे त्रिकालदर्षी

व्‍यंग्‍य लेखकों की पहली पंसद-प्रसिद्ध आलोचक रावणदुलारे त्रिकालदर्शी

साहित्‍य के प्रायः हर विद्या में अपने हाथ-पांव मार कर भी जब जम नहीं पाए या यूं कहिए कि उन्‍हें जमने नहीं दिया गया तो रावणदुलारे त्रिकालदर्शी हिन्‍दी की नयी विद्या जिसे आलोचना कहते हैं के क्षेत्र में अपनी कलम घिसने लगे. खूद को रचना से ज्‍यादा रचनाकार के परत दर परत खोलने में माहिर बताते रावणदुलारे त्रिकालदर्शी अपने समकालीन सभी पुस्‍तकों की समीक्षा और ं आलोचना कर डालते. नयी पुस्‍तक आयी नहीं कि त्रिकालदर्शी चले गए लेखक के यहां और आलोचना की धौंस जमाते हुए दो-चार पुस्‍तक की लेखकीय प्रतियां उठा लाए, साथ में अगर लेखक के रॉयल्‍टी में से कुछ मिल गया तो अपने समीक्ष या आलोचना में लेखक से सहमति जताते हुए सारा संवाद सूचना की भाषा में कर दिए और अगर लेखक ने कुछ भी नहीं दिया तो रचना की नहीं रचनाकार की परत दर परत उधाड़ दिया.

आज के दौर के साहित्‍यकारों के लिए त्रिकालदर्शी जी बहुत ही पसंदीदा आलोचक बन गए थे. आज के दौर में तो कई तथाकथित साहित्‍यकार खूद ही लिखते हैं और छदमनाम से खूद ही अपनी पुस्‍तक की आलोचना और जरूरत पड़ी तो समीक्षा भी कर डालते हैं. कई तथाकथित कविगण तो अपनी कविताओं की पुस्‍तक की संपादकीय भी खूद ही लिख डालते हैं. ऐसे माहौल में रावणदुलारे को कुछ दे लेकर समीक्षा या आलोचना करवाना कौन नहीं चाहेगा लिहाजा हिन्‍दी के आलोचना विद्या में वे जम गए तथा अपने को वर्तमान हिन्‍दी साहित्‍य के मुर्धन्‍य आलोचक साबित कर दिया

रावणदुलारे जी का आलोचना का तरीका बड़ा ही निराला है, लेखकगण इनके आलोचना से बेहद खुश होते हैं. रामविलास जी की आलोचना जिस तरह निराला के व्‍यक्‍तित्‍व और कृतित्‍व को नये ढ़ंग से सामने लाती है, वैसे ही रावणदुलारे जी अपने समकालीन कई वेस्‍टसेलरों जैसे उमाशंकर प्रसाद, युक्‍तिबोध के व्‍यक्‍तित्‍व और कृतित्‍व को नए ढ़ग से सामने लाए. आलोचना मूल्‍यवान असहमति से बनती है परंतु त्रिकालदर्शी जी ऐसा नहीं मानते, उनका कहना है कि वे सफलता को सिर्फ भौवागम विमर्ष के सहारे ही समझते हैं तथा साहित्‍य के सरलीकरण करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैंं. आज के इस नेट युग में ऐसा नहीं करने पर कोई पढ़ेगा ही नहीं, फुर्सत किसे है ?

दरअसल त्रिकालदर्शी जी यह मानते हैं कि पिछले पांच दशकों में हिन्‍दी के बड़े आलोचक ही बड़े रचनाकार हुए है जैसे मुक्‍तिबोध, अज्ञेय और विजय नारायण देव फिर श्रीकांत बर्मा, मलयज और वर्तमान में कुंवर नारायण, अशोक बाजपेयी आदि इसलिए रावणदुलारे जी भी आलोचना के माध्‍यम से बड़े रचनाकार बनने के जुगत में लगे हुए है. अपनी अपढ़ता, सतही संवेदना, वैचारिक दिवालियापन, संदिग्‍ध राजनीतिक समझ तथा मुल्‍यों के स्‍तर पर पाखंडपूर्ण व्‍यवहार को पालते-पोसते आज तक हजारों पुस्‍तकों की आलोचना और समीक्षा लेखकों से सहमति जताते हुए कर चुके है. लेखकगण भी खुश क्‍योंकि ज्‍यादातर लेखकों की रचनाएं गहन रचनात्‍मकता के स्रोत से वंचित होते हैं तथा साहित्‍य के सरलीकरण की प्रवृतियां उनमें भरी पड़ी होती है. ऐसी परिस्‍थिति में रावणदुलारे जी की समीक्षा, विमर्ष, आलोचना सभी सूचना की भाषा में चलना लेखकगण की प्रथम पसंद बनती गयी है.

हाल ही में जमीन दलाली के धंधे से आए उमाशंकर प्रसाद ‘अफीम धर्म' नामक पुस्‍तक लिखकर तथा पुस्‍तक का भव्‍य लोकार्पण करवाने के बाद अपनी पुस्‍तक की समीक्षा करवाने के लिए रावणदुलारे जी को पकड़ा. बस क्‍या था रावणदुलारे जी को भी समीक्षा की कीमत मिल गयी और रावणदुलारे जी ‘अफीम धर्म' नामक पुस्‍तक की समीक्षा करते हुए पुस्‍तक को समाज के लिए बहुमूल्‍य बताया तथा उमाशंकर बाबू को भारत का कार्ल मार्क्‍स कहते हुए समीक्षा में लिखा कि मार्क्‍स ने तो धर्म को अफीम मात्र कहा था परंतु मार्क्‍स भी उमाशंकर बाबू द्वारा लिखित ‘अफीम धर्म' जैसी कालजयी रचना करने की सोच भी नहीं सकता था. आगे लिखा कि दरअसल इस पुस्‍तक में लेखक तेजी से युवाओं के बीच फैलते हुए नशाखोरी की लत पर प्रकाश डाला है तथा नशाखोरी को युवाओं ने इस तरह धारण किया है कि इसे धर्म की संज्ञा दी जा सकती है और इस तरह रावणदुलारे जी सामान्‍यीकरण और वैचारिक सरलीकरण करने के अभ्‍यस्‍त पुस्‍तक की आलोचना लिख डाली. ‘अफीम धर्म' पुस्‍तक में जो भाषा का अवमूल्‍यन और भाषा से खिलवाड़ स्‍पष्‍ट दृष्‍टिगोचर होती है उससे प्राय अनभिज्ञ से रहे है रावणदुलारे जी अपनी पुस्‍तक समीक्षा में. उनका कहना है कि विषय जैसा होगा भाषा भी वैसी ही होगी, अगर नशाखोर युवा गाली-गलौज करता है तो उसपर लिखी गयी पुस्‍तक में भाषा में खिलंदड़पन रहेगा ही. हालांकि लेखक उमाशंकर बाबू और आलोचक रावणदुलारे जी दोनों ही आलोचनात्‍मक अवमूल्‍यन में बराबर के हिस्‍सेदार बनते गए और राजनेताओं से पुरस्‍कृत होकर दोनों अपने को धन्‍य समझते रहे.

कोई भी लेखक या कवि अगर अपनी रचना की समीक्षा या आलोचना लिखवाना चाहे तो रावणदुलारे जी शांतिपूरी थैली कंधे पर टांगें, कान पर कलम लिए सुबह-सुबह सड़क पर ही लिखने को तत्‍पर मिलते हैं, उन्‍हें आसानी से उम्र से लंबी आवारा सड़कों पर संपर्क किया जा सकता है.

राजीव आनंद

सेल फोन - 9471765417

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