प्रमोद यादव का व्यंग्य - मेरी यादों के 'तार'

मेरी यादों के ‘तार’/प्रमोद यादव

clip_image002

मेरी यादों के तार तब ‘तार’ से जुड़े जब मैं केवल सत्रह बरस का था. पहली बार जब तार करने तार-आफिस पहुंचा तो एक तार-मास्टर (अनुभवी) भी अपने साथ ले गया था.वह बताता रहा कि तार में कम से कम शब्दों के उपयोग से कम से कम पैसे लगते हैं. पहली बार जाना कि ‘तार’ के हर शब्द के पैसे लगते हैं.इतना भर जानता था कि इसके द्वारा मेसेज त्वरित गति से गंतव्य तक पहुँचता है.तार किया तो एक-दो घंटे में निश्चित ही गंतव्य तक पहुँच ही जाएगा. इसके विश्वसनीयता पर किसी को शक न था उन दिनों तार के बहूउद्देशीय उपयोगों से मैं अनभिज्ञ था.तार का पर्याय मुझे केवल ‘निधन’ लगता.’तार’ आया कि समझो कोई चटक गया. देर रात जब दरवाजे के बाहर ‘टेलीग्राम’ या ‘तार’ की ऊँची आवाज दस्तक देती तो भीतर के लोग सहम जाते, उनके दिल बैठ जाते. बड़ी मुश्किल से सांकल खोल टेढ़े-मेढे अ क्षरों से उनकी पुस्तिका पर सा इन कर पाते.फिर धीरे से पूछते-सब खैरियत तो है ना ? तब तारबाबू एक प्रोफेशनल की तरह बिना किसी हिचकिचाहट के सीधे-सपाट शब्दों में बक देता-‘गनपत गुजर गया है’ सुनते ही घर में हाय-तौबा मच जाता तारवाला उदास होने का उपक्रम करते बिना बख्शीश के चला जाता.

अरसे बाद मैंने जाना कि तारवाले अच्छी खबर पर अच्छी बख्शीश भी मांगते हैं जैसे- पास होने पर, प्रमोशन होने पर, लड़का या लड़की होने या विवाह फिक्स होने पर, जनम-दिन पर आदि आदि आदि. लेकिन ‘निधन’ वाले केस में भरपूर कोशिश करते हैं कि बख्शीश न लें.धीरे-धीरे मैं समझदार होता गया तो ‘तार’ के और कई तार खुलने लगे, लिहाजा यह भी जाना कि ‘डेथ’ वाले केस को ये अविलम्ब हैंडिल करते हैं और ऐसे मेसेज पर पैसे भी कम लेते हैं.वैसे भी डेथ मेसेज तो दो शब्दों में बयाँ हो जाता है-‘ फादर एक्सपायर्ड’ या ‘गनपत एक्सपायर्ड’ मुझे तो अब लगता है कि सरकार जब ‘डेथ मेसेज’ पर इतनी उदार थी, मरनेवाले के परिवार के साथ सहानुभूति रखती थी तो इसे ‘फ्री आफ कास्ट’ क्यूं नहीं किया ?

खैर...मैंने अपनी जिंदगी का जो पहला तार किया ,वह भी ‘डेथ मेसेज’ ही था.दूसरी बार जब दूसरी तरह का मेसेज किया तब मैं जवान और समझदार हो गया था,नौकरी पर था. आदमी के साथ ये तीनों बातें हो तो आदमी बौरा जाता है, तिकडमी हो जाता है.मैं भी हुआ.दूसरा मेसेज जो किया वह पूरी तरह ‘फ़ाल्स’ था.आफिस से चार दिनों की छुट्टी लेकर पूरी गया पर चार दिनों बाद भी लौटने को मन न किया तो एक टेलीग्राम पेल दिया कि बीमार पड़ गया हूँ अतः अनिश्चितकाल के लिए छुट्टी बढ़ाने की कृपा करें.यह आइडिया मेरे साथ गए शातिर मित्र ने दिया जिसका मैंने वक्त-बेवक्त भरपूर उपयोग किया.तब ‘तार-सेवा’ को मैंने सही तौर पर ‘सेवारुपी’ पाया.

अब दुखी हूँ कि तार-सेवा बंद हो जाने के बाद क्या करूँगा? एस.एम्.एस., ई-मेल, सेल-फोन जरुर हैं पर इनकी विश्वसनीयता बिलकुल नहीं है.१६३ साल बाद एकाएक इस सेवा को बंद करने से कोई दुखी हो या ना हो , मैं जरुर दुखी हूँ. सेमुअल मोर्स (तार के अन्वेषक ) ने कभी सपने में भी नहीं सोचा रहा होगा कि जिस उपकरण को ईजाद करने में उन्हें कई बरस लगे, वह एक दिन इस तरह सहज ही दम तोड़ देगा. कईयों ने आखिरी बार तार कर अपने को ,बिदाई के इस पल को इतिहास में दर्ज किया. सेमुअल होते तो उन्हें तार कर मैं भी आज कृतार्थ होता.

तार से जुड़े मेरी यादों के कई तार अब भी झन-झना रहे हैं...टिक-टिक कर रहें हैं.तार से कभी-कभी पेचीदगियां भी पैदा हो जाती.तार मिलता तो उसकी लिखावट अंग्रेजी टायपिंग की होती जो इस कदर अदृश्य सा होता कि बामुश्किल पढ़ा जाता. कई बार ‘ मनोहर सिंह एक्सपायर्ड ‘ होता और रिसीवर को ‘ नोहर सिंह एक्सपायर्ड ‘ मिलता. बेचारे झारसुगडा की जगह नागपूर पहुँच जाते और वहाँ नोहर सिंह को बरामदे में बैठे भुट्टे खाते देख पागल हो जाते.फिर माजरा समझ उलटे पाँव झारसुगडा की ट्रेन पकड़ते. तब तार वालों को इतना कोसते कि भूले से भी कोई मिल जाए तो उसे तार से लपेटकर ‘टिल डेथ’ वाली सजा देने की सोचते.

तार से जुड़े एक सच्ची घटना का जिक्र कर बताना चाहूँगा कि तार कई लोगों को कई बार कैसे तार-तार करता था. शहर के बीचों-बीच मुख्य बाजार में मेरे एक मित्र की ‘ लांड्री ‘ की दुकान है.सभी बड़े वर्ग के लोग-व्यापारी,वकील,डाक्टर आदि के कपडे वहीँ धुलते हैं.मेरे मित्र के एक और करीबी मित्र हैं-अरविन्द.शहर में सबसे बड़ा परिवार है उनका.७०-८० लोग एक साथ रहते,खाते पीते हैं.इन सबका भी कपडा इसी लांड्री में धुलता है. एक दिन एकाएक धडधडाते हुए अरविन्द लांड्री वाले मित्र के पास आया और बोला कि क्या वह एक दिन में उसके थ्री पीस सूट की धुलाई कर देगा ? मित्र ने असमर्थता जताई तो अरविन्द परेशान हो गया कि अब वो क्या करे? बिना सूट विवाह में कैसे जाए ? तब लांड्री वाले मित्र ने सलाह दी कि एक ग्राहक का सूट १५-२० दिनों से रखा है,कोई बाहर के व्यक्ति का है अगर तुझे फिट आ जाये तो ले जा. चार-पांच दिनों में तो तू आ ही जाएगा.काम चलता है तो देख ले.उसने कोशिश की,एकदम फिट आया. सूट लेकर वह सुबह की ट्रेन से भोपाल चला गया.जाते-जाते भोपाल का पता मित्र को देता गया.

जिस दिन भोपाल में शादी थी,उसी दिन वह लोटकर शहर आ गया.पहले घर गया फिर धडधडाते हुए लांड्री आया और गुस्से से एक लाल कागज (तार) फेंक मित्र पर तमका- ‘ ये क्या बेहूदगी है...तुम्हारी बेवकूफी की वजह से मुझे शादी छोड़ कर आना पड़ा..टेलीग्राम करते तो कुछ ढंग का करते...इस तरह का तार देकर मुझे क्यों जार-जार रुला रहे हो ?

बाद में लांड्री वाले मित्र ने जब पूरा माजरा बताया तो मैंने अरविन्द के गुस्से को जायज पाया लेकिन मित्र के कारनामे पर मुस्कुराए बिना न रह सका. दरअसल हुआ यूँ था कि जिस दिन अरविन्द सूट लेकर गया उसी शाम उसका मालिक सूट लेने आ गया. मित्र दुविधा में कि अब क्या जवाब दे ? उसे एक-दो दिन में देने की बात कही तो वह बौखलाया कि बीस दिनों में भी एक सूट न धुल सका तो दुकान में ताला क्यों नहीं लगाते ? किसी तरह उसे ‘परसों’ डिलवरी देने के लिए प्रोमिस किया.अब दुविधा ये कि अरविन्द तो शादी निपटने के बाद ही आएगा यानी चार-पांच दिनों बाद उसे तुरंत कैसे बुलाये ? धंधा तो धंधा है,इसे भी देखना था.सो उसने तय किया कि उसे तुरंत ‘तार’ कर दिया जाए.यही एक तरीका था उसे अविलम्ब बुलाने का.पर तार में लिखे क्या ? किसी ने सलाह दी कि ‘कम सून इमीजियेटली’ लिख दो ...आ जायेगा. उसने वैसा ही किया पर भेजने वाले की जगह पर अरविन्द का ही नाम लिख दिया. अरविन्द ने तार को इस तरह पढ़ा- ‘कम सून इमीजियेटली अरविन्द ’ उसने तुरंत अनुमान लगाया कि दादाजी तड़क गए (बीमार चल रहे थे ) शादी छोड़ उसी वक्त जो ट्रेन मिला उसमे बैठ गया.घर पहुंचा तो दादाजी को दीवान में पसरे पपीता खाते पाया.थोड़ी देर में उसे माजरा समझ में आ गया, तब वह मित्र की ओर गुस्से से लपका और काफी गाली दी उसे.पर मित्र ने भी भोलेपन से कहा-‘ और क्या करता यार...परसों उसे सूट देना है ...जा ...सूट लेकर आ ...वह आता ही होगा..’

आज तार को डेड कर दिया गया ..उसे ‘वार्म फेयरवेल ‘ दे दिया गया..पर ‘तार’ के कई तार अब भी जेहन से जुड़े हैं और हमेशा जुड़े रहेंगे.

xxxxxxxxxxx

प्रमोद यादव

दुर्ग,छत्तीसगढ़

मोबाईल-09993039475

टिप्पणियाँ

  1. रचना रोचक है ,बधाई

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर

    1. सैम-सामयिक रचना है,इसलिए पसंद आया होगा...धन्यवाद.
      प्रमोद यादव

      हटाएं
  2. Akhilesh Chandra srivastava8:17 am

    Bahut badhiya promod ji vastav men tar bahut kam ki. Yadgar cheej. thi. us par likhne ke liye badhai2

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर

    1. श्री श्रीवास्तवजी,
      धन्यवाद् आपका..कोई भी चीज के खोने का दर्द तो होता ही है..और जब ये मालुम हो जाए की दुबारा उस चीज को नहीं देख पायेंगे तो दर्द कुछ ज्यादा होता है.
      -प्रमोद यादव

      हटाएं
  3. समय और आधुनिकता के चलते भविष्य में कई परिवर्तन होने वाले है उसके लिए व्यक्ति हमेशा तैयार रहें। जैसे किसी चीज को स्वीकारते हुए आनंद होता है वैसे किसी चीज को छोडते वक्त आनंद न हो दुःख हो पर उसमें डूबने की जरूरत है नहीं। प्रमोद यादव जी आपके समान अनेकों की यादें तार के साथ जुडी है, भावनामयता तो रहेगी ही। प्रसंग कौतुहलवर्धक है।
    तार के बंद होने पर पूरे भारत वर्ष में जो चर्चा हुई वह बेमतलब की है। पोस्ट वालों को पूछे और कुछ सालों के पोस्ट के दफ्तरी आंकडों को देखे तो पता चलता है कि तार पहले से बंद हो गई थी। 25 पैसे (चवन्नी)का बंद करवाना भी वैसे ही था। वैसे ही कुछ साल या दिनों के बाद 50 पैसे (अठन्नी)का बंद होना तय है। तात्पर्य यहीं कि परिवर्तन के प्रवाह में कई चीजें बनती और बिघडती है उसे स्वीकारना ही पडेगा।

    उत्तर देंहटाएं

  4. आदरणीय डाक्टर साहब,
    आपकी कही सारी बातों से मैं इत्तेफाक रखता हूँ.पर किसी जमाने में 'तार' का जो जलवा था ,उससे इनकार नहीं किया जा सकता..यह रचना केवल मीठी यादों को संजोने का प्रयास मात्र है.
    प्रमोद यादव

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.