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एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - दसवाँ ग्रह

दसवाँ ग्रह

शर्मिला के बेटा नहीं था । उसके एक बेटी थी जो शादी के कुछ समय बाद ही पैदा हो गई थी । अब उसे एक बेटे की कामना थी । बेटी जब लगभग तीन बर्ष की हो गई तो बेटे की चाह प्रबलतम होने लगी । लेकिन धीरे-धीरे चार, पाँच और छे वर्ष भी बीत गए लेकिन बेटा तो दूर फिर कोई सन्तान नहीं हुई ।

वह पण्डितों, ज्योतिषियों व संतों से मिलकर उपाय पूछने व करने लगी । पूजा-पाठ तो वह पहले भी करती थी । लेकिन अब पुत्र की कामना से व्रत, उपवास और पूजा पाठ करने लगी थी । लोग तरह-तरह की बात कर रहे थे । लोग कहते कि हम कई लोगों को जानते हैं जिनके सिर्फ एक संतान होकर लाख उपाय करने पर भी दूसरी सन्तान कभी नहीं हुई । वह बहुत ही निराश रहने लगी थी । दिनों-दिन उसकी चिंता बढ़ती ही जा रही थी ।

इस बीच उसे श्वेतप्रदर नामक बीमारी भी हो गई । और वह एक गाइनो डॉक्टर से इसकी तथा बच्चा होने की दवा कराने लगी । डॉक्टर से वह दवा कराती जा रही थी और पूछा करती थी क्या हमारे बच्चा होगा ?

उसे बेटा चाहिए था लेकिन उसे इसके अनुकूल कुछ भी सुनने को नहीं मिल रहा था । उसका ब्लड ग्रुप आर एच निगेटिव था । विज्ञान के अनुसार इस स्थिति में दूसरी संतान होने में काफी दिक्कत होती है । कुछ लोग कहते कि आर एच निगेटिव वाले को दूसरी संतान होती ही नहीं । गर्भ ठहरे भी तो गिर जाता है । आदि । वह क्या करती सुनती जाती थी ।

धीरे-धीरे समय बीतता गया । अब उसकी बेटी लगभग आठ वर्ष की हो चुकी थी । उसे श्वेतप्रदर के साथ रक्तप्रदर भी हो गया था । पहले वाले डॉक्टर ने जबाब दे दिया था और वह अब लखनऊ के एक प्रसिद्ध गाइनो से इलाज कराने लगी थी । उसकी सास से कुछ लोग कहने लगे थे कि यदि पोते का मुँह देखना हो तो बेटे की दूसरी शादी करा दो । यह सब सुनकर उसकी दशा जड़ कटे पौधे की तरह होती जा रही थी । वह सोचती कि मैंने ऐसा कौन सा पाप कर दिया है कि भगवान मुझे एक पुत्र नहीं दे सकते । हमारी सभी सहेलियों के पुत्र हैं । किसी-किसी के तो दो-दो । लेकिन मेरे एक भी नहीं ।

मैं उसे समझाया करता था । एक तरह से विश्वास दिला रखा था कि आपको बेटा जरूर होगा । मुझे लगता है कि मेरी बात पर भी उसे सौ प्रतिशत विश्वास नहीं था । लेकिन कर ही क्या सकती थी ? एक दिन उसने कहा कि एक पंडित जी कह रहे थे कि ग्रह अरिष्ट हैं । इसके लिए कई चीजें करने को कह रहे थे ।

मैंने कहा कि लोग कुल नौ ग्रह मानते हैं और इनका प्रभाव जीवन पर जरूर पड़ता है । यह बात सही है । लेकिन ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है । जो कर सकती हो करो बाकी छोड़ दो । सिर्फ ‘राम-राम’ करो सब ठीक हो जाएगा । मैंने आगे कहा कि बहुत कम लोग जानते हैं कि इन नव ग्रहों के अलावा एक दसवाँ ग्रह भी होता है । जो इन सब ग्रहों पर भारी होता है । वह बोली यह दसवाँ ग्रह कौन सा है ? मैंने कहा कि दसवाँ ग्रह भगवान श्रीराम का ‘अनुग्रह’ है जो बड़े-बड़े-दुष्प्रभावों को मिटा देता है । दुःख को सुख मे बदल देता है । निराशा को आशा में बदल देता है । असंभव को संभव बना देता है । इसलिए तुम किसी की मत सुनों, कुछ मत करो, चिंता निकाल दो सिर्फ राम जी से कहो । यह सब सुनकर वह चली गई ।

कभी-कभी इंसान के जीवन में ऐसा समय आ जाता है कि उसे लगने लगता है कि उसके दुःख का अंत नहीं होने वाला है । उसके जीवन के अंधकार को मिटाने के लिए सारे प्रकाश कम हैं । ऐसे में बड़े-बड़े भी धैर्य खो देते हैं । यही उसके साथ भी हुआ । लखनऊ के डॉक्टर ने कई महीने दवा करने के बाद कह दिया कि अब तुम्हारे बच्चा होने की कोई उम्मीद नहीं है । जितना जल्दी हो सके गर्भाशय निकलवा दीजिए । यह सुनकर मानो उसके पैरों तले की जमीन ही खिसक गई । उसने अपने को कैसे संभाला होगा भगवान ही जानें । बाद में उसने मुझे फोन पर यह सब बताया । उसकी बातों में इतना दर्द था कि मैं बयां नहीं कर सकता । मैंने इस बार भी उसे भरोसा दिया । मैंने उसकी इच्छा, लगन और दर्द देखा था । सो मैंने कहा कि चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा । वह बोली अब कैसे ठीक होगा ? मैंने कहा रामजी बड़े दयालु हैं । उन पर भरोसा रखो । और अपना डॉक्टर बदल दीजिए ।

उसने ऐसा ही किया और गोरखपुर में दवा कराने लगी । यहाँ की दवा से उसे काफी राहत हुई । बाद में वह इलाहाबाद में दवा कराने लगी । यहाँ के डॉक्टर ने फ्लोपियन ट्यूब की जांच कराई और कहा सब ठीक है । समझ में नहीं आता कि क्या बात है ? उसने अब सोच लिया कि रामजी को जो करना होगा करेंगे ।

अब भी वह निराशा में जी रही थी । लेकिन कुछ समय बाद उसे दसवें ग्रह की अनुकूलता मिली और उसे गर्भ ठहर गया । अब उसकी बेटी लगभग दस साल की हो चुकी थी । वह खुश थी फिर भी आर एच निगेटिव होने की चिंता, लंबी बीमारी के बाद यह दिन आने से चिंता थी कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए । उसने फिर से दवा कराना शुरू कर दिया । सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था । लेकिन एक दिन फिर से वह चिंता में घिर गई । डॉक्टर ने अल्ट्रासाउंड के बाद बताया कि बच्चे का एक पैर छोटा और एक बड़ा होगा । जबकि पहले के अल्ट्रासाउंड में ऐसा कुछ नहीं आया था । डॉक्टर ने कहा कि अब कुछ किया भी नहीं जा सकता । यह सुनकर वह काफी देर तक रोती रही । रात में जगती थी और ठीक से खाना भी नहीं खा पाती थी । मैंने उसे फिर धैर्य से काम लेने की बात कही । और दसवें ग्रह की अनुकूलता से सब कुछ ठीक हो जाता है ऐसा उसे समझाया । मैंने कहा जैसे अभी तक जो हुआ वह भी एक तरह से असंभव से संभव हुआ है ठीक ऐसा ही आगे भी होगा और आपको एक पुत्र की प्राप्त होगी । क्योंकि आपको दसवें ग्रह की अनुकूलता मिल चुकी है । यह सुनकर वह प्रसन्नचित हो गई और भगवान ऐसा ही करें कहने लगी ।

कुछ दिन बाद उचित समय पर उसने एक बेटे को जन्म दिया । जो सुंदर, हष्ट-पुष्ट और किसी भी अंग विकार से मुक्त था । उसने उसका नाम ‘श्रीराम’ रख दिया है और वह अब दसवें ग्रह पर बलिहारी जाती है ।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.) ।
ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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Hum do hamari ek vibhuti ki salah dene se ukt mahila duraagrah se bhi bachati aur hamara desh aabaadi ke mahabojh par atirikt bojh se bhi bach jaataa

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